Saturday, October 3, 2026
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अरूणा सब्बरवाल की कहानी- महकती बयार 

वह  तो ख़ुशखबरी  सुना कर चली गयी। ख़ुशी के मारे उसकी आँखो से नींद  ऐसी उड़ी की रात भर करवटें बदलती रही। यह आम ख़ुशियों  जैसी ख़ुशी नहीं थी। उससे भी बढ़ कर थी। पर कैसी? जिसे न तो  वह किसी से  बाँट सकती थी और न ही किसी को बता ही सकती थी। इस ख़ुशी को पाने  के सपने वह  , बचपन से ही देखती आयी थी । नींद की प्रतीक्षा करते-करते , हार कर वह बिस्तर से उठ ही  गयी। चाय का प्याला लिया और  अख़बार ले कर बग़ीचे में कुर्सी पर बैठ कर, एक ताज़गी भरी कुरमुरी सुबह का आनंद लेने लगी।  सुबह का कोहरा छितरा चुका था। आज नजारा ही कुछ और था। क़तार में खड़े वृक्ष अपनी हरी-हरी शाखाओं  के दुपट्टे लहरा  रहे थे। धूप भी ख़ूब उजली हो कर फैली थी  । चिड़ियाँ  एक डाली से दूसरी डाली पर झूम – झूम कर बतिया रहीं थी। उसे लगा ,फूल भी उसकी ओर देख मुस्कुरा रहे थे। मानो उसे  बधाई दे रहे हों। पूछ रहे हो बात क्या है ? आज बहुत ख़ुश हो ।उसे  आज की सुबह और दिनों से अलग लगी… फिर ध्यान आया सुबह कैसे अलग हो सकती है। सुबह का स्वभाव तो एक ही है। बदली तो मैं हूँ, मुझे ही  सब बदला-बदला नज़र आ रहा है।

उसने अपने चारों तरफ़ देखा। साड़ी के पल्लू में बांधे पत्र को निकाला, और पढ़ने लगी। मन ही मन में  सोचने लगी,रात को पढ़ा तो था कई बार ,किंतु धीमी रोशनी में  धुँधला -धुँधला सा ही दिखा। अब दिन के उजाले में पत्र को पढ़ कर उसने ठंडी साँस ली । इतनी ख़ुश थी ,कि ख़ुशी सम्भाले नहीं संभल पा रही थी। मानो कुबेर का ख़ज़ाना  मिल गया हो। सोचा जाये कुबेर का खज़ाना ही तो था । अभी भी उसे विश्वाश नहीं हो रहा था। होंठों ही होंठों में बुदबुदायी , क्या यह सचमुच पत्र उसी के नाम का था ? । उसने एक बार फिर चश्मा लगा कर देखा तो तसल्ली हुई । सोचने लगी बेटा आयुष अवश्य ख़ुश होगा । वह तो झट से ताड़ जाता और कहता माँ बहुत ख़ुश लग रही हो । मुझे भी तो बताएँ बात क्या है ? फिर उसे ध्यान आया ।।।उसे तो मेरा लेखन में कोई रुचि  नहीं है  और मुस्कुरायी।

“मम्मी जी चाय“ उसकी बहु भावना ने उसकी सोच को विराम लगाया। और उसके साथ कुर्सी डाल कर बैठ गयी।  कावेरी जी का हाथ अपने हाथ में लेते बोली “ मम्मी जी रात भर आपके कमरे की बत्ती जलती रही ,सुबह भी जल्दी उठ कर बैठ गयीं। देख रही हूँ कल से ही आप बहुत  विचलित हैं। प्लीज़ बताएँ न मैं जानना  चाहती हूँ। “ सास बहू दोनो के अच्छे सम्बंध थे।
“नहीं …नहीं  ऐसी कोई बात नहीं है। उन्होंने दबे स्वर में कहा
भावना ने सुझाव देते कहा “ मम्मी जी एक विचार आया है । क्यूँ न हम घर के काम-काज को भूल कर घूमें -फिरें, छुट्टी मनायें। मम्मी जी बच्चे तो स्कूल जाएँगे, आयुष भी एक सप्ताह के लिए  टूर पर गये हैं ।खाना भी बाहर ही खाएँगे, कैसा रहेगा?
“मैं कुछ समझी नहीं बेटा।“ कावेरी  ने विस्मय से कहा।
“मुझे थोड़ा काम करना है जो आयुष  के सामने नहीं कर सकती। इन्हें पसंद नहीं।  गोलचा में बहुत बढ़िया मूवी लगी है , क्यूँ न आप और  रश्मि  आंटी जी के साथ मूवी देखो ,बाहर खाना खाओ , एंजॉ करो। टिकट ओन लाइन  मैं बुक कर देती हूँ।” भावना ने उल्लसित होते कहा।

भावना ने दोनो के लिये  मूवी के टिकट बुक कर दिए। कावेरी असमंजस  में थी । भावना की बातों ने उसे उलझा दिया था। कावेरी ने रश्मि  से बात की , दोनो इसी निष्कर्ष पर पहुँची कि शायद भावना को  शक हो गया,  है कि हमारे बीच कुछ खिचड़ी पक रही है। इस बात को दो दिन बीत गये ।बच्चे अपने दोस्तों के साथ बाहर गये थे, देर से आने वाले थे। कावेरी के चेहरे पर एक सूखी  सी जिज्ञासा चहल कदमी करने लगी। जो हो रहा था उसकी समझ  से बाहर था। जब से पत्र मिला है उसकी चिंता बढ़ती जा रही है। कि आयुष को कैसे बताया जाएगा  सुनते ही वह तो लाल -पिला हो जाएगा। वह उलझी सी अपने कमरे में  चर्कखड़ी की तरह घूमती रही।

भावना को कावेरी जी की बेचैनी का एहसास था। अब भावना से रहा नहीं गया। उसने कावेरी जी का दरवाज़ा खटखटाया  ,उत्तर का  इंतज़ार किए वह  कावेरी जी  के अंदर पास जा कर बैठ गयी। कुछ पल दोनों  में मौन चहल कदमी करता  रहा।  भावना ने मौन तोड़ते कावेरी जी  का प्यार से हाथ पकड़ा और बोली

“ मम्मी मैं देख रही हूँ कि आप कुछ परेशान हैं ? अपनी  बेटी से   मन की बात नहीं करेंगी  क्या ? “  भावना ने प्यार से कावेरी के कंधे पर हाथ रखा। उनके बाल सहलाते बोली प्लीज़ मम्मा “  बताओ न ऐसा  क्या है जो आपको साल रहा  है । क्या  परेशानी  हैं प्लीज़?“ वह उतावली थी जानने के लिए ….

प्यार के दो शब्द सुनकर कावेरी की पलकों पे छाए बादल बरसने लगे ,सुबकते-सुबकते  बोली “  बेटा ख़ुश हूँ कि कोई तो है जो मेरी बेबसी समझता है । बचपन से आज तक कोई भी  मेरी भावनाओं को समझ नहीं पाया। क्या बताऊँ,कहानी बड़ी लम्बी है…. जब से लिखना पढ़ना आया तो लेखन में रुचि पैदा हो गयी ।छोटी – छोटी बच्चों की कवितायें, कहानियाँ लिखनी आरम्भ कर दीं । स्कूल में बहुत प्रोत्साहन मिला । मैंने स्कूल की प्रतियोगिताओं और कार्यकर्मो में भाग लेना आरम्भ कर दिया। पुरस्कार भी मिले ।किंतु घर में कोई मेरी बात सुनने को तय्यार ही  नहीं था। पिता जी कह देते यह सब काम नहीं आने वाला ,पढ़ायी में ध्यान दो, सुनकर चुप हो जाती ।माँ ने भी बहुत समझाने की कोशिश की, किंतु पापा टस से मस नहीं हुए। बात ठंडी पड़ गयी। उन दिनों सदा सहेलीयो का अम्बार लगा रहता था ।अधिक ध्यान भी नहीं गया।

विश्वविद्यालय पहुँचते ही फिर से मन में हूक उठने लगी । जब तक कुछ काग़ज़ पर उकेर न देती ,तब  तक मन की
ज्वाला ठंडी नहीं पड़ती थी। फिर भी चोरी छिपे लिख ही लेती थी। विश्वविद्यालय में एक लेखन  की प्रतियोगिता थी । जिसका प्रथम पुरस्कार एक हज़ार रुपए था । उन दिनों एक हज़ार रुपये बहुत  बड़ी राशि थी। उसमें भाग लेने का  मेरा बहुत मन था । पिता जी से पूछने की मेरी हिम्मत नहीं थी ।माँ को मक्खन लगाने के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं था। मैंने माँ से विनती करते कहा, ” माँ… मेरी प्यारी माँ आप ही बतायें मैं क्या करूँ मन में मेरे लेखन का ज्वार -भाटा उफना  रहा है ।ऐसा लगता है मानो शब्दों की  तेज़ प्रवाह से बहती नदी बाँध तोड़ कर बह निकलेगी। जिसे रोक पाना आसान नहीं होगा। कभी कभी मन में बैठी आग मुझे बहुत व्याकुल कर देती है जो केवल लेखन से ही शांत होती है  “ मैंने माँ से अनुरोध किया कि  वह पिता जी से बात करें । एक दिन हौसला बटोर कर हम दोनों पिता जी के पास गये, माँ आगे -आगे और मैं पीछे -पीछे। माँ ने पापा  को समझाने का प्रयास किया किंतु वह टस से मस नहीं हुए। माँ बेबस थीं, उनकी कहाँ चलती थी। मैंने फिर पिता की अनुरोध करते कहा, “ पिता जी, मेरे चंचल विचलित मन की लहरें, सरिता सी बहना चाहें ,किस से कह दूँ राज़ हियाँ , काग़ज़ पर सजना चाहें, मन में उमड़ घुमड़ मचा है, प्रसव पीड़ा सा तड़प रहा है। हो आज्ञा तो सर्जन करूँ मैं, नव भावों को जीवन दूँ मैं ।”

पापा  जी माँ से बोले,  “ तुम दोनो ध्यान से सुन लो जो कल मेरा उत्तर था , आज भी मेरा वही उत्तर है ,जो पहले भी बता चुका हूँ “ तब बड़े प्यार से पिता जी बोले “ बेटा भाग्य तेरा सीपी में बंद है , स्वप्न विचार सभी स्वछंद हैं , इच्छाओं को तू छुपा ले एसे, पलता सीप में मोती जैसे ।जीवन के इस नग्न सच में ही तुझे रहना है।क्यूँ कि तुझे किसी के गले का हार बनना है। यही जीवन का नग्न सत्य है ”। पापा जी की तो एक ही रट थी ,लेखन में बर्बाद किया समय आगे काम नहीं आने वाला। पढ़ायी में मन लगाओ । एक बार कह दिया नहीं , तो नहीं ।पिता जी के ऐसे  तर्कों के सामने शेष  कुछ कहने को बचा ही क्या था ।मेरी पीड़ा का एहसास तो उन्हें कभी हुआ ही नहीं । हाँ पापा से चोरी कालॉज़ की पत्रिकाओं में मेरी कविताएँ ,कहानियाँ छपने लगीं ।

आईटी की डिग्री के पश्चात्, मम्मी की पापा जी से जिद्द के कारण थोडे दिन नौकरी की  ,पिता जी हक़ में नहीं  थे। जल्दी ही उन्होंने लड़का ढूँढ कर विवाह  कर दिया और मैं रिश्ते की गाँठ में बन्ध कर  लंदन आ गयी। मैं प्रसन्न थी कि अब मुझे आज़ादी मिलने वाली है । बिना रोक -टोक  के लिख सकूँगी।  दूसरा मेरे बचपन की सहेली रश्मि  भी लंदन में  ही थी। पति का स्वभाव  कुछ टेड़ा था । उन्हें समझने को समय लगा। मेरी ख़ुशियाँ  शादी के एक साल बाद ही फीकी पड़ गयीं। मैं धीरे – धीरे समझ गयी थी  कि  चूहे दानी  में फँस गयी हूँ ।

एक दिन आयुष के पापा अच्छे मूड में थे। मैंने हिम्मत बटोर कर कह ही दिया “आयुष के पापा सोचती हूँ बच्चे बड़े हो गये हैं। दोनो ख़ुद स्कूल जाते हैं और आप दफ़्तर। मैं  ख़ाली बैठी रहती हूँ। अक्सर मेरे मन में ऐसा उमड़-घुमड मचा रहता है। प्रसव पीड़ा जैसे  तडपती हूँ, कुछ लिखने के लिये , कुछ नया सृजन करने के लिये,  जब तक उन भावों को काग़ज़  पर नहीं उकेर लेती, तब तक चैन नहीं पड़ता। कृपया  आज्ञा दो कि मैं,अपने उमड़ते नए भावों को नया जीवन दे सकूँ। “

वह शब्दों की आरी से मुझे काटते बोले “ठीक है सोच लो मेरी सजनी , यह तुम पर भारी  पड़ सकता है । लोग तुम पर पुरुषों को ललचाने का , इल्ज़ाम भी लगा  सकते  हैं । यह कीड़ा या यह बीज कहाँ से आया एसा , ऐसे प्रश्न भी  उठा सकते हैं । यह जो तुम्हारे ऊपर लेखन का भूत सवार है , मुझे यह कदापि गँवारा नहीं । मैं तुम्हें इन्हें प्रदर्शित करने की आज्ञा नहीं दे सकता ।जान बूझ कर  बदनामी में नहीं  पड़ना चाहता । हमारे हिसाब से जीना सीखो “।

मेरे सपनों का कच्चा घड़ा  वक़्त से पहले ही घुल गया और अरमानों पर पानी फिर गया । इच्छाओं को त्याग कर  विरोधी भावों की धूप-छांव में कर्तव्य निभाती रही ।दिन ठिठक -ठिठक कर गुज़रने लगे । मैं जान गयी थी कि घर की विसंगत स्थितियों में संगत बातें कैसे हो सकती हैं।

“पति की बात सुनकर  मेरा शरीर सूखे पत्ते की तरह हवा में तैरने लगा । शरीर का भार जाता रहा । मैं भीतर तक सूख गयी । ऐसा लगा मानो किसी ने हवा से फुले ग़ुब्बारे में सुई  चुभो दी हो । मुझे अपने सवालों  के उत्तर मिल गए थे ।मैं हार रही थी या जीत रही थी । मुझे अपने शब्द निर्रथक  लगने लगे । समानता में विश्वास रखने वाले व्यक्ति से  न्याय  के आधार पर कुछ माँगती ,  तो लड़ायी हो जाती । मेरा आत्मविश्वास चिरमिराने  लगा  । उस दिन से मैंने अपनी महत्वआकांक्षों का गला घोट दिया ,अपनी सब योजनाएँ रद्द कर दीं ।अपना पढ़ा लिखा होना फ़िज़ूल लगने लगा । मैं पत्नी नहीं सामाजिक प्रतिष्ठा के शोकेस  में रखी पत्नि का ढाँचा मात्र बन कर रह गयी  ।अचानक मुझे माँ की बात याद आ गयी, बचपन में वह  कहा करती थी  कि बेटा डटी रहना , जो थक जाते हैं वे रुक जाते हैं ।जो चलते  रहते हैं वे मंज़िल पा लेते हैं। रश्मि  आंटी ने सदा मेरा साथ दिया “।
“मम्मी आप चिंता न करें  करो, मिल कर कोई हल निकलते हैं कि आयुष को कैसे समझाना  और मनाना है ,आप मुझ पर छोड़ दें।“  भावना ने आश्वासन देते कहा।

“ भावना बेटी  मैंने एक बार आयुष से बात की थी कि  “ बेटा जीवन के इस पड़ाव में, जब मेरे पास अधिक समय नहीं है। मैं तुम्हें अपने घायल मन की अंतिम इच्छा बताना चाहती हूँ ।मेरे चिंतन का घड़ा ऊफ़ना  रहा है ।मन करता है मैं एक भाव ग्रंथ लिख डालूँ। बचपन से जो मन में है कर डालूँ।“ कुछ पल वह मौन रहा। चिंतित सा बोला “ माँ आपने कभी सोचा है , आपकी यह अस्थिर अंगुलियाँ न जाने क्या – क्या उगलेंगी जग से। यह कमज़ोर काम्पते  हाथ क़लम कैसे पकड़ पाएँगे । कैसे रचोगी भाव ग्रंथ। सोचा है कभी? आपकी  यादाश भी तो विचरने लगी है । बूढ़ी हो गयी हो । माँ मैं हाथ जोड़ कर विनम्रता से निवेदन करता हूँ। जग में अपना और मेरा उपहास मत कराओ। मत बाँटों अपनी ममता और माँ का एहसास “। बेटे के मुँह से यह सब सुन कर वक़्त वहीं  थम गया आँखों में नमी तैरने लगी। आयुष की बातें मेरा पीछा करती रहीं ।मेरे लिए चुनौती बन गयीं। मेरे दिमाग़ में भाव विचार ख़ुद ब ख़ूब उमड़ने लगे।

कावेरी की बातें सुन कर भावना की आँखों में आँसू छलक आये वह  कावेरी को बाहों में लेते बोली “ मम्मी मैंने कभी जतलाया नहीं ।मैं सब जानती हूँ  कि रश्मि  आंटी आपके पास पत्रिकाएँ  लेकर क्यूँ आती हैं । हर बात समझने के लिये शब्दों का सहारा ज़रूरी तो नहीं।”

बहू से  इतना स्नेह  पा कर कावेरी पिघल गयी और  बोली हाँ बेटा मैं  आज कंफ़ेस करती हूँ फिर भी  मैंने लेखन कभी छोड़ा नहीं। अपने नाम से नहीं, एक लेखन के नाम “ रश्मि “ से  और रश्मि आंटी के घर के पते पर ।उसने पुरस्कार का पत्र भावना को पकड़ा दिया। पत्र पढ़ते ही  भावना ख़ुशी से कावेरी जी को अपनी बाहों में लेती बोली “ वाह मम्मी जी इतनी बड़ी बात आपने कैसे छुपाए रखी? यह तो बड़े गर्व की बात है। रश्मि आंटी को पता है क्या?”
“ हाँ हाँ वही तो पत्र दे कर गयीं थी ।अगले सप्ताह सम्मान समारोह है । मैं और रश्मि आंटी आप सब को अचंभित करना चाहती थीं ,पर कैसे? यह नहीं सूझ रहा था।“

“रश्मि आप निश्चिंत रहें, रश्मि आंटी को बुला लें, मिल के योजना बनाएँगे।“ भावना ने विश्वास दिलाते कहा।
वो दिन भी आ गया। पूरे परिवार सहित आयुष और भावना हॉल में पहुँच गये। रश्मि आंटी अपने परिवार सहित।
हॉल में सभी साहित्यकार अपनी-अपनी कुर्सी  पर बैठ गए । आयुष की नज़र वहाँ पर लगे ध्वज पर पड़ी , जिस पर लिखा था, पदमभूषण सम्मान समारोह ‘वह चकित था कि रश्मि आंटी जी को यह पाँच लाख रुपए का यह सम्मान मिल रहा है। सभा की सभी औपचारिकताओं के पश्चात कार्यक्रम आरम्भ हुआ। सभी को रश्मि आंटी के मंच पर आने की प्रतीक्षा थी।संचालिका मंच पर आयीं और बोलीं ।…” मंच पर बैठे वरिष्ठ साहित्यकार तथा सभा में बैठे सभी अतिथियों का अभिनंदन करती हूँ “ अब तो आप जान गये होंगे कि इस वर्ष यह सम्मान ऐक स्त्री को दिया जा रहा है।

हमारे समाज में स्त्री को सदैव ही दोयम दर्जे का प्राणी माना जाता है। उसके जन्म पर आंसू बहाए जाते हैं ।कितनी भ्रूण हत्याएँ की जातीं हैं। भाई की तुलना में कम माना जाता है ।उनके लिए कितनी वर्जनाएँ खड़ी कर दी हैं।
इन वर्जनाओं को तोड़ कर  वह कुछ करना चाहती है  तो समाज और घरवाले उसकी हौंसला अफ़्जाई के बदले उसे हतोत्साहित करते हैं। आज कि नारी ने साबित कर दिया है कि ‘आज की नारी, राम के युग की सीता ।’नहीं वह अपने लिए खुला आस आसमान ढूँढ  ही लेती है। अब मैं मंच पर एक ऐसी ही नारी  को बुला रही हूँ, जिन्होंने विपरीत दिशाओं का रूख मोड़ कर अपने लिए खुला आसमान ढूँढा है। अब मैं पदमभूषण सम्मान के लिये आदरणीय रश्मि जी को मंच  पर बुलाती हूँ “। हॉल तालियों से गूँज उठा। रश्मि जी मंच पर आयीं और सभा को सम्बोधित करते बोलीं

“मंच पर बैठे सभी वरिष्ठ साहित्यकार तथा सभा में बैठे सभी सभागार सब को मेरा प्रमाण मैं आप सब को एक सर्प्राइज़ देना चाहती हूँ। सच तो यह है इस सम्मान की हक़दार मैं नहीं, मेरी प्रिय मित्र ‘कावेरी‘ जी हैं। मैं तो इनके लेखन में इनकी मिडल मैन हूँ। यह भी एक कहानी है। ’रश्मि‘ इनका लेखन का नाम है । भावना बेटी अपनी मम्मी जी को मंच  पर लाएँ।
आयुष हक्का-बक्का स्तब्ध और निश्ब्ध।  माँ को मंच पर ले जाने के लिए वह उठने लगा,न जाने क्या सोच कर बैठ गया। उसे विश्वाश नहीं हो रहा था। ख़ुशी से उसकी आँखे भर आयीं । गर्व से उसके चेहरे पर मधुर मुस्कान फैल गयी।

कावेरी जी ने सभी का अभिनंदन किया और बोलीं “ मैं आपका अधिक समय न लेकर केवल दो शब्द ही कहूँगी, यही ‘शब्द‘ मुझे आज यहाँ ले कर आए हैं। यहाँ मैं अपनी माँ की कही एक बात दोहराना चाहती हूँ “बचपन में जब कभी मैं निराश हो जाती तो  मेरी माँ कहती थी, ‘बेटा जीवन में जो चाहती हो उस  पर डटी रहना, जो थक  कर रुक जाते हैं वह नहीं , जो चलते रहते हैं वे मंज़िल पा लेते हैं। बस अंत में यही कहूँगी ۔۔۔” लेखन दिल के दरवाज़े और खिड़कियाँ को खोल कर उन्मुक्त हो जाता है। कहानी बात कहती है ख़ामोशी के साथ।”

“ आत्मा के सौंदर्य का शब्द है काव्य। मानव होना भाग्य है। कवि होना सौभाग्य।”  कावेरी जी के कानों में तालियों की गूँज गूँजती रही۔۔۔

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अरूणा सब्बरवाल
2,  Russettings
Westfield Park
Hatch End
HA5 4JF
U।K 044 07557944220

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