- हिन्दी अनुवाद : डा. अमरजीत कौंके
‘नामा’ बाज़ीगर अपने बड़े बेटे लाली को बांह से पकड़े थप्पड़ मारता हुआ घर की ओर लिए जा रहा था। लाली की दाईं आँख पर अभी-अभी ताज़ी चोट लगी होने के कारण आँख पहले ही सूजकर ढेला बनी हुई थी, और ऊपर से पिता की गालियाँ और थप्पड़ खा रहा लाली, “हाय नहीं… हाय नहीं… आगे से नहीं लड़ूँगा किसी के साथ…” कहता हुआ रोता और मार खाता हुआ पाँव घसीटता पिता के साथ चला जा रहा था।
लेकिन नामे बाज़ीगर पर पुत्र के विलाप और मिन्नतों का कोई असर नहीं हो रहा था। उसने जैसे आज लाली को जान से ही मार डालने की ठान ली थी। वह लगातार लाली को मारता और घसीटता अपने साथ खींचे जा रहा था और हर थप्पड़ मारने के बाद कहता…
“ससुरे उनका क्या जाएगा, वे तो ज़मींदार लोग ठहरे… कल को कोई और कांड कर आएगा… तो मैं किस-किस के आगे हाथ-पाँव जोड़ता फिरूँगा… ओए हमारा उनका क्या मुकाबला… तूने गाँव में रहना है कि नहीं… साले वे तो ठहरे साहूकार और तू? …अगर कल को उन सबने एकता कर ली तो गाँव में रहना मुश्किल हो जाएगा… छोटा मुँह, बड़ी बात ‘..।”
बस इसी सुर को अलापता हुआ वह अपने लड़के लाली को पीटता हुआ घर ले जा रहा था। उन दोनों से थोड़े फासले पर नामे का छोटा बेटा ‘कैला’, पीछे से पिता की गालियां सुनता और भाई को पड़ती मार देख खुद को आगे होने से बचाता हुआ चला आ रहा था।
वैसे ‘कैले’ की अपने भाई के साथ दिल से हमदर्दी थी, क्योंकि वह जानता था कि उसके भाई की कोई गलती नहीं है और उसे बिना किसी कसूर के नाजायज़ सजा मिल रही है।
दरअसल ‘लाली’ ज़मींदारों के लड़के के साथ झगड़ पड़ा था और उससे ताकतवर होने के कारण उसने उसकी खूब पिटाई की थी। लेकिन उसी समय ज़मींदारों के और लड़के आकर बीच में पड़ गए और तीनों ने मिलकर लाली को खूब पीटा था । फिर भी लाली उन तीनों के आगे बहादुरों की तरह टिका रहा। भले ही उसे मार पड़ रही थी लेकिन वह मैदान छोड़कर भागा नहीं था, बल्कि मौका मिलते ही ज़मींदारों के लड़कों की अच्छी ठुकाई कर रहा था।
एक के तो टक्कर मार कर उसने होंठ फाड़ दिए थे, जिसमें से खून की धारें बह निकली थीं। लेकिन तीनों के आगे उसकी एक न चली और वह पीटा गया। ‘कैला’ शारीरिक रूप से कमज़ोर होने के कारण बीच में पड़ने की हिम्मत न कर सका, लेकिन भाई को मार खाते देख भी नहीं सका था, इसलिए वह भाग कर घर से पिता को बुला लाया ।
नामे ने भी लड़कों को पीटने की बजाय उल्टा हाथ ही जोड़े । साथ ही जमींदारों के लड़कों को बहुत गुस्से में देखकर अपने बेटे की गलती मानकर उसे वहां से जैसे-तैसे छुड़ाया। इसीलिए अब घर ले जाते समय सारी भड़ास लाली पर निकाल रहा था। घर के दरवाजे पर पहुँचते ही उसने लाली को पूरे जोर से अंदर धकेला जिससे वह खुद को संभाल नहीं पाया और आंगन में गिरकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा।
बेटे की चीखें सुनकर करमी भागती हुई बाहर आई और लाली को उठाकर पूछने लगी… “अरे क्या हुआ ?…झगड़ के आया है किसी से… ये चोटें कैसे लगीं…?”
इससे पहले कि लाली कुछ बोलता, नामा छड़ी लेकर आ गया और एक के बाद एक दो-तीन लाली के जड़ दीं, लड़का बिलबिला कर अपनी माँ के पीछे छिप गया। नामे ने गालियाँ देते हुए सारा हाल करमी को सुनाया कि क्या हुआ है। एक बार फिर वह छड़ी लेकर लाली की ओर बढ़ा पर करमी ने बीच में ही रोक लिया…
” अब हट भी जा, मार डालेगा क्या लड़के को?”
“तेरा ही सिर चढ़ाया हुआ है ये।”
कहता हुआ नामा बड़बड़ाता हुआ बाहर चला गया। जली भुनी करमी ने लाली को पानी पिलाया तब जाकर लाली की जान में जान आई। सिसकियाँ भरता और हिचकियाँ लेता लाली आंगन में पड़ी खाट पर बैठा सोचने लगा कि उसका कसूर क्या था जिसकी उसे इतनी बड़ी सज़ा मिली है?
आंगन के दूसरे कोने में नीम के पेड़ से चिपक कर खड़ा कैला सब कुछ चुपचाप देखे जा रहा था। घर का माहौल शांत होते ही वह लाली के पास जाकर उसके घाव देखना चाहता था लेकिन शर्मिंदगी के कारण आगे नहीं बढ़ पाया। भीतर ही भीतर उसे अपनी कायरता का एहसास कचोट रहा था। उसकी आँखों के सामने उसके भाई को पीटा गया पर वह बीच-बचाव करने की हिम्मत नहीं कर सका। फिर भी हिम्मत करके लाली के करीब जाने ही वाला था कि बाहर से नामे ने उसे आवाज़ दे दी। मार के डर से कैला तेज़ी से नामे की ओर चला गया।
सर्दियों के दिन होने के कारण दिन जल्दी ढल गया। करमी चूल्हा जलाकर रसोई की चौखट पर बैठ गई। अब तक लाली की चोटें ठंडी होने के कारण उसका सारा शरीर दर्द से तड़प रहा था, लेकिन वह बिना कुछ बोले ढीठ बन कर चुपचाप बैठा रहा। खूँटे पर बंधे दो गधे बार-बार अपने खुर ज़मीन पर मार मार कर लाली का ध्यान अपनी ओर खींच रहे थे । लाली काफी देर तक एकटक उनकी ओर देखता रहा। खूँटे के आसपास इस प्रकार ज़मीन कुरेदते हुए गधों को देख एक पल के लिए लाली को ऐसा लगा जैसे वे लाली का दर्द महसूस कर रहे हों और उसके प्रति अपनी हमदर्दी जता रहे हों।
जब चूल्हे में उपलों की आग अच्छी तरह जल गई, तो करमी ने लाली को आवाज़ दी;
“चल आ जा यहाँ, आकर अपनी चोटों को सेंक ले…” लाली अभी उठने की कोशिश ही कर रहा था कि करमी का भाषण शुरू हो गया…
“कितनी बार कहा है कि दिमाग ठिकाने रखा कर, आखिर हमारे पास कौन से बीघे पड़े हैं जिन्हें बेचकर हम खा लेंगे?…” माँ की बातें सुनकर लाली भीतर ही भीतर दुखी हुआ, लेकिन वह हिम्मत करके पी गया। भारी मन से वह चूल्हे के पास आकर बैठ गया, चूल्हे की गर्माहट से उसे कुछ आराम महसूस हुआ। करमी ने हाथ लगाकर लाली की चोट वाली आँख देखी, तो उसे देखकर उसका कलेजा मुँह को आ गया। करमी ने आँख खोल कर देखने से लाली के चीस उठी, लेकिन वह अंदर ही अंदर पी गया । करमी ने कपड़े की एक पोटली बनाई, उसे चूल्हे की आग के पास गरम किया और लाली को देते हुए बोली…
“ले सेंक ले, सूजन उतर जाएगी।”
लाली गरम हुए कपड़े से आँख सेंकने लग पड़ा । करमी फिर से बोलने लगी, पर इस बार उसकी बातों में बेटे के प्रति दर्द साफ झलक रहा था।
“लड़ाई क्यों हुई थी, किस बात पर?…” इससे पहले कि लाली कुछ बोलता, करमी फिर बोल पड़ी।”
“वे नामुराद तो अहंकार में अंधे हुए फिरते हैं, इन कम्बख्तों को कोई ऊँच नीच याद नहीं … ना, ज़रा भी तरस नहीं आया इन नीचों को? लड़के को मार-मारकर बुरा हाल कर दिया इन नासपीटों ने।”
माँ को दुखी होते देखकर लाली का गला भर आया और वह मन ही मन खुद को कोसने लगा कि यदि वह न लड़ता, तो उसकी माँ को इतना दुख न पहुँचता। अगले ही पल वह सोचने लगा कि उसने तो लड़ाई की ही नहीं थी और न ही वह उन लोगों से लड़ना चाहता था। जमींदारों के लड़के हैप्पी ने न तो कोई बात की और न ही कुछ पूछा, बस सीधे उसे मारना शुरू कर दिया… आगे वह केवल अपना बचाव ही कर रहा था कि इतने में दो और आ गए।
“लड़ाई क्यों हुई थी?”… करमी ने अपना सवाल फिर दोहराया।
कुछ देर चुप रहने के बाद जब करमी ने फिर पूछा तो लाली ने बोलने की कोशिश की पर उसका गला भर आया, फिर भी हिम्मत करके रोती आवाज़ में बोला;
“मुझे पता नहीं था कि उन्होंने मेड़ बाँध रखे हैं, मैंने मेड़ पर से घास काट ली, अभी थोड़ा ही काटा था कि वह पीछे से आकर मुझे लातों से मारने लगा, मैंने कुछ नहीं कहा… फिर उसने मेरे दो-तीन बेंत मारे मैंने फिर भी कुछ नहीं कहा…लेकिन जब उसने माँ-बाप की गाली दी तो मुझसे सहा नहीं गया और मैंने उसे नीचे गिरा लिया ।” कहते-कहते लाली का रोना निकल गया।
करमी कुछ देर चुप-चाप रोटियां सेकती रही। कटोरी में दाल डालकर और साथ में गरम रोटियां देकर बोली..
“ले गरम-गरम खा ले।”
लाली ने थाली अपनी ओर खींच ली और छोटे-छोटे निवाले तोड़कर खाने लगा। ‘नामे’ द्वारा मारे गए थप्पड़ों ने उसकी बतीसी हिला दी थीं जो मुँह हिलाते ही दुखने लगतीं थीं । लाली सूखी रोटी के निवाले चबाने की बजाये सीधे ही गले के नीचे उतारने लगा। इतने में करमी अंदर से एक पुराना सा घी का डिब्बा उठा लाई और उसमें से चम्मच-चम्मच खुरच खुरच कर घी इकट्ठा करने लगी। काफी मशक्कत के बाद उसने आधा चम्मच घी इकट्ठा करके लाली की कटोरी में डाल दिया। लाली को चौके (रसोई) में ही बैठा छोड़ वह गिलास उठाकर बाहर निकल गई और जल्दी ही वापस लौट आई। फट्टे पर बैठते हुए करमी ने चिमटे से कोयले हटाकर चूल्हे से आग बाहर निकाली और गिलास उस के ऊपर रख कर फिर से रोटियां सेकने लगी। जब लाली ने रोटी खा ली तो करमी मसालेदानी में से हल्दी का आधा चम्मच गिलास में घोल कर लाली को पकड़ाते हुए बोली …
“ले पी ले, दर्द दूर हो जाएगा, आज सोहणे की बहू से मांग कर लाई हूँ थोड़ा सा दूध।”
लाली दूध का गिलास पकड़कर पीने लगा तो करमी अंदर जाकर चारपाई बिस्तर बिछाने लगी। जब लाली ने गिलास खाली किया तो करमी ने उसे आवाज़ दी… “चल आ सो जा…” लाली चुपचाप उठा और चारपाई पर जाकर लेट गया, कुछ देर वह लेटा-लेटा सोचता रहा फिर पता ही नहीं चला कि उसे कब नींद आ गई।
चूल्हा-चौका संभालकर जब करमी डिब्बे वगैरह अंदर रखने गई तो कितनी ही देर तक सो चुके लाली को देखती रही । चारपाई पर बैठकर वह उसके सोए हुए बेटे के सिर पर हाथ फेरने लग पड़ी । लाली का सूजा हुआ होंठ देखकर एक बार फिर उसके अंदर वही टीस सी उठी और उसकी आँखों में आँसू भर आए। कितनी देर वह इसी तरह लाली के सिरहाने बैठी कभी कुछ तो कभी कुछ सोचती रही। जब बाहर का दरवाजा धड़ाम से खुला, तो करमी की एकाग्रता टूटी। नामे ने घास की गठरी आँगन में फेंकी थी, उसे देखकर खूँटे से बँधे भूखे गधे अपने अगले पैर खुरली पर मार-मारकर अपनी भूख जाहिर करने लगे। नामे के पीछे-पीछे कैला भी अंदर आया , घर में घुसते ही कैले ने इधर-उधर निगाह दौड़ाई और लाली को सोया देखकर उसे थोड़ी राहत मिली। शायद इसलिए कि कहीं वह (लाली) उससे पूछ ही न ले कि “तुम्हारे भाई को पीटते रहे और तू बीच में क्यों ना आया , और तु खड़े खड़े देखता क्यों रहा ? “
कैले के मन में बीच-बचाव न करने की कायरता की शर्मिंदगी जरूर थी। एक पल के लिए वह खुद को कोसने लग जाता कि उसे बीच में दखल देना चाहिए था, लेकिन अगले ही पल उसके भीतर का डर उस पर हावी हो जाता और उसके मन में विचार आते कि यदि आज वह बीच में दखल दे कर हैपी वगैरा को थप्पड़-घूँसे मार देता और कल स्कूल आते-जाते रास्ते में जमींदारों के लड़के उसे घेर लेते तो फिर…?
करमी गुस्से से भरी अपने काम में लगी रही। बाहर से आए नामे को उसने न पानी पिलाया और न ही उसकी ओर ध्यान दिया। लाली की बात सुनकर करमी नामे से नाराज थी कि उसने बिना वजह लड़के को पीट दिया था। उसने कैले को बाँह से पकड़कर रसोई में बिठाया और रोटी देकर खुद साग के डंठल छीलने लगी।
करमी के हाव-भाव देखकर नामा भी समझ गया कि अंदर की बात कुछ और है। अब तक उसका गुस्सा भी ठंडा हो चुका था और वह भी जानना चाहता था कि असली वजह क्या थी। वह असल सच्चाई से अब भी अनजान था और फिर उसने सच्चाई जानने की कोशिश भी नहीं की थी। यही सोच-सोचकर उसे खुद पर गुस्सा आने लगा कि बिना बात जाने उसने लड़के को पीट दिया, चलो एक दो थप्पड़ तो ठीक हुआ… पर…
अगले ही पल उसे अपनी लाचारी पर तरस आने लगता… कि वह भी क्या करता? अपने से बड़े लोगों से वह कैसे उलझ सकता था? उसे तो मौके पर जो ठीक लगा वही किया। काफी देर तक जब करमी ने उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया, तो नामे ने खुद उठकर नलके से पानी पिया और सीधे लाली की चारपाई के पास जा बैठा। इससे पहले कि नामा कुछ कहता, गुस्से से भरी करमी बोल पड़ी…
“ना वो तो बेगाने थे , और तुझे शर्म क्यों न आई ? बिना देखे-भाले लड़के को पकड़कर पीट दिया। पता नहीं कि कितनी गहरी चोट मारी है… लड़के से रोटी भी नहीं चबाई गई ।”
“तुम क्या चाहती हो कि मैं भी लड़ता उनके साथ ? वे ठहरे ज़मींदार लोग, हम उनकी बराबरी कहाँ कर सकते हैं?”.. नामा ने चिढ़कर कहा।
“और लाली ने क्या गलत किया? .. बता.. किस्मत से जवान हो गया है.. अगर कोई बिना वजह उसे माँ-बहन की गालियाँ देगा, तो वह कैसे सह लेगा? .. और कोई लड़ाई नहीं थी उसकी … तेरे लिए लड़ा वह… अरे बेशर्म अगर कोई तेरे सामने तेरे बाप-दादा को गाली दे, तो क्या तू चुपचाप सुन लेगा? ..क्या मुँह नहीं तोड़ेगा उसका ?”.. और इसी तरह गुस्से से भरी करमी न जाने कितनी देर तक नामे को कोसती रही।
नामा, जिसे असल बात का पता अब चला था, चुपचाप बैठा करमी की बातें सुनता रहा और मन ही मन खुद को कोसता रहा। सोए हुए लाली के मुँह से ‘कराह’ निकली। लाली की दर्द भरी कराह सुनकर नामा उसकी ओर मुड़ा और लाली का सूजा हुआ मुँह देखकर एक बार तो उसके आँसू निकल आए, जिन्हें उसने बड़ी मुश्किल से काबू किया। अब वह खुद को लाली का कसूरवार मान रहा था। भरे मन से उसने लाली के सिर को सहलाया और उसके पास से उठकर करमी के पास जा बैठा।
करमी के पास बैठते हुए वह लंबी सांस लेकर बोला… “मैं भी क्या कर सकता , घास-फूस, दातुन, जंगल-पानी, साग-ईंधन सब उन्हीं लोगों के खेतों से ही तो आना है, फिर उन लोगों से बिगाड़ करके”… इसके आगे वह कुछ न बोल सका।
करमी ने रोटी परोसकर थाली नामा के आगे रख दी और खुद मुँह फुलाकर काम में लगी रही। नामा ने निवाला मुँह में डाला, लेकिन निवाले के साथ उसका कलेजा बाहर आने को कर रहा था ।
सहमा हुआ कैला रोटी खत्म करके अंदर चला गया। आज वह लाली के साथ नहीं सोया, बल्कि करमी के बिस्तर पर जा लेटा, पर उसे नींद नहीं आ रही थी। बार-बार उसके दिमाग में लड़ाई की फिल्म घूम रही थी। करवटें बदलते हुए कई तरह के विचार उसके मन में उलझने लगे… “अच्छा होता अगर वह पहले ही लाली को पीछे खींच लाता, तो शायद लड़ाई इतनी न बढ़ती और शायद उसे चोट भी न लगती… अगर वह लड़ाई के बीच में पड़कर बात खत्म करने की कोशिश करता तो शायद… अगर मेड़ काट दी थी, तो मुझे आगे बढ़कर कह देना चाहिए था कि भाई गलती हो गई, आगे से नहीं करेंगे, तो शायद!…ऐसी ही सोचों में… बहुत देर रात जाकर उसे नींद आई और उसकी आँख तब खुली जब करमी ने उसे आवाज़ देकर जगाया और स्कूल के लिए तैयार होने को कहा।
कैले ने आँखें मलते हुए सबसे पहले लाली की ओर देखा जो अभी भी सो रहा था। वैसे रोज़ लाली, कैले से पहले उठ जाता था पर आज न वह उठा था और न ही करमी ने उसे जगाया था।
चूल्हे पर चाय उबल रही थी और भाप के साथ चाय की खुशबू सारे आँगन में फैली हुई थी। कैला मुँह-हाथ धोकर रसोई में जा बैठा। करमी ने गरम-गरम चाय गिलास में डालकर साथ में दो सूखी रोटियाँ उसे दीं। कैले ने दोनों रोटियाँ गोल कर लीं और बड़े-बड़े निवाले लेकर चाय के साथ गले के नीचे उतारी और बस्ता उठाकर स्कूल की ओर चल पड़ा।
रास्ते में उसका अंदरूनी डर बार-बार उस पर हावी होने लग पड़ा । वह चलते हुए सोचे जा रहा था कि अगर उसे अकेला देखकर ज़मींदारों के लड़कों ने घेर लिया तो वह क्या करेगा..? वह बार-बार पीछे मुड़कर देखता कि शायद कोई साथी मिल जाए पर आज वह घर से ही देर से चला था इसलिए सब पहले ही जा चुके थे। फिर वह मुड़कर देखता कि कहीं कोई बड़ा आदमी ही आ जाए जिसके सहारे वह स्कूल तक पहुँच जाए। आज पता नहीं उसके लिए घर से स्कूल का रास्ता इतना लंबा क्यों हो गया था जो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। डर के मारे वह ज़मींदारों के मोहल्ले में से गुज़रने की बजाय दूसरी ओर से घूमकर स्कूल पहुँचा। कक्षा में बैठे हुए उसका ध्यान सारा दिन लाली की ओर ही लगा रहा।
स्कूल में कई शरारती बच्चों ने उस पर तंज कसे… “ओए कल तेरे भाई की बहुत पिटाई हुई…” कोई कहता.. “आज फिर पीटेंगे वो तुम्हें” … सबसे मुश्किल बात यह लगती जब कोई उसे कहता… “ओए तेरे सामने तेरे भाई को पीटते रहे, तू बीच में क्यों नहीं पड़ा?”… इस तरह कोई उसका मज़ाक उड़ाता और कोई हमदर्दी जताता। सारा दिन यही कानाफूसी कक्षा में चलती रही। ऐसी बातों ने सारा दिन कैले के सिर में दर्द किए रखा।
स्कूल की छुट्टी होते ही वह सबसे पहले बस्ता उठाकर भागा और घर आकर ही दम लिया। जब वह घर पहुँचा तो लाली छत पर पतंग उड़ा रहा था, करमी घर के कामों में व्यस्त थी, नामा बाहर कहीं काम पर गया हुआ था। घर में ज़िंदगी बिल्कुल सामान्य थी और कल वाले हादसे का किसी को कोई ख्याल भी नहीं था। घर का माहौल ठीक-ठाक देखकर कैले की जान में जान आई। अगले दो-तीन दिन वह बुखार आदि का बहाना बनाकर स्कूल नहीं गया और उसके आगे तीन-चार सरकारी छुट्टियाँ आ गईं। वैसे भले ही अब गाँव में किसी को भी उस दिन वाली लड़ाई का कोई ख्याल नहीं था, फिर भी जब कभी लाली अकेला बाहर जाता तो कैला किसी न किसी बहाने उसके पीछे-पीछे ज़रूर जाता।…
….. इस तरह समय बीतता गया। अब दोनों भाई नौवीं कक्षा में हो चुके थे और दोनों की मूँछें भी फूटने लगी थीं। पिछले दो-तीन सालों में लाली के शरीर में स्वाभाविक रूप से बहुत बड़ा बदलाव आया था। लाली की जांघों की मछलियाँ अपने-आप गोल होने लगी थीं और सीने के दो भाग अलग-अलग हिस्से साफ़ दिखाई देने लगे थे। ऊँचाई भी लगभग पौने छह फुट के आसपास निकल आई थी। उस पर सोने पे सुहागे वाली बात यह थी कि कुदरत की तरफ़ से लाली के मन में अब तगड़ा शरीर बनाने की चाहत भी पैदा हो गई थी। वह सुबह-शाम दौड़ने जाता, मालिश करता और गाँव के लड़कों के साथ कबड्डी खेलता।
जब इंसान कुछ करने की ठान लेता है, तो भगवान भी उसकी मदद करता है। लाली के साथ भी ऐसा ही हुआ। एक दिन पास से गुज़रते लाली ने सहज ही गाँव के बूढ़े और अनुभवी ‘बूई ‘ पहलवान के चरण छू लिए थे। आगे से ‘ बूई ‘ पहलवान ने खुश होकर लाली की पीठ थपथपाई और कहा— ” बेटा , तेरा शरीर बहुत अच्छा है, तू मेरे पास आकर डंड-बैठक लगाया कर।”
…अगले ही दिन से लाली ने बोई पहलवान की पशुओं वाली हवेली में बनी कसरत की जगह पर जाना शुरू कर दिया। पहले पंद्रह दिनों तक तो बोई पहलवान ने लाली से केवल मालिशे ही करवाई, लेकिन जब उन्हें यकीन हो गया कि इस लड़के में शरीर बनाने की लगन है, तो उन्होंने उसे ज़ोर (कसरत) करवाना शुरू कर दिया। लाली भी सच्चे शागिर्द की तरह उनके हर निर्देश का पालन करता। कभी-कभी चारे की मशीन (टोका) चलाकर वह गुरु की भैंसों के लिए चारा भी काट देता। खुश होकर उस्ताद उसे अपनी ताज़ा ब्याही भैंस के दूध का गिलास भर कर देते और लाली खुशी-खुशी उसे कच्चा ही पी जाता।
बेटे की लगन देख कर नामे ने भी मुश्किल से उसको दो किलो देसी घी ला दिया । फिर क्या था, कुछ ही दिनों में लाली का शरीर सबको दिखने लगा। भाई का तगड़ा शरीर देखकर कैले को अंदर से बहुत खुशी होती और कभी-कभी वह खुद भी लाली के साथ डंड-बैठक लगाता। कई बार दोनों भाई घर के आँगन में ही ज़ोर आज़माने लगते, और हर बार कैले को ‘बस थक गया’ कह कर अपनी गर्दन छुड़ानी पड़ती। लाली की बढ़ती ताकत देखकर कैले को पक्का यकीन हो गया कि अब एक या दो आदमी मिलकर भी लाली को पीट नहीं सकते।
गाँव के बीचों-बीच भैरो राजपूत का खाली खेत जोतकर और सुहागा फेरकर उसने समतल कर दिया। नरम मैदान को तैयार देखकर गाँव के छोटे बच्चे वहाँ कबड्डी खेलने लगे। देखा देखी गाँव के बड़े लड़के भी आ गए और कबड्डी का खेल देखने के लिए गाँव के बड़े-बुजुर्ग भी वहाँ जुड़ने लगे। कबड्डी खेलने के बाद एक-दो… लड़के वहाँ ज़ोर आज़माइश करने लगे। और तभी नामा और लाली भी पास के गाँव से खाल खरीदकर वापसी पर वहाँ आ खड़े हुए ।
ज़मींदारों के एक लड़के ने लाली का ज़ोर देखने के लिए उसे ललकारा..”चल ओ लाली! ज़रा देखें तेरे में कितनी जान है, या फिर ऐसे ही तेल मलकर घूमता रहता है।”
उसकी बात सुनते ही लाली बिना एक भी पल गँवाए अखाड़े में आ गया और बुई पहलवान के सिखाए कुश्ती के दांवों से शरीर को बिना मिट्टी लगे पल भर में ही ज़मींदारों के लड़के को चित्त कर दिया। फिर देखते ही देखते बिंटू, बंता, बब्बू, गौरखा समेत कई अन्य लोगों को लाली ने पल भर में ही चित्त कर दिया। लाली की फुर्ती और कुश्ती की कलाबाज़ियों को देखकर गाँव के सभी बड़े-बुजुर्ग वाह-वाह करने लगे। कई लोगों ने नामा को बधाइयाँ भी दीं, जिन्हें सुन-सुनकर खुशी से नामा के पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। कुछ पलों के लिए नामा अपना कद गाँव के प्रतिष्ठित व्यक्ति जैसा महसूस करने लगा।
अगले दिन गाँव के और ज़मींदारों के कई लड़कों ने, जिनमें हैप्पी भी शामिल था, लाली के साथ ज़ोर करने की कोशिश की, पर बुई पहलवान के सिखाए दांवों के आगे कोई टिक न सका। जब हैप्पी की पीठ ज़मीन से लगी तो किनारे खड़ा कैला खुशी से उछल पड़ा। उसे लगा कि आज लाली ने हैप्पी से उसकी कई साल पहले वाली पिटाई का बदला ले लिया है और वह भी पूरे गाँव के सामने। कई लोगों ने लाली से खुश होकर उसे दस-बीस और पचास के नोट इनाम के तौर पर दिए। खुशी से फूला न समाते हुए नामा ने छाती पहाड़ जैसे तानकर चारों ओर निगाहें दौड़ाईं तो पीछे खड़े कैले को आगे आकर ज़ोर लगाने के लिए कहा, लेकिन आज उसका आगे आने का साहस नहीं हुआ। बल्कि वह ढीठों जैसे बतीसी निकालता हुआ चुपचाप वहां से खिसक गया।
जैसे ही अखाड़ा समाप्त हुआ, लाली ने इनाम के पैसे लिए और जाकर ‘खरैती’ की दुकान से दो किलो देसी घी ले आया। नामा खुशी से झूमता हुआ लाली को गले लगाकर घर में दाखिल हुआ और करमी को अपने बेटे की जीत की बातें बढ़ा-चढ़ाकर सुनाने लगा। इसी खुशनुमा माहौल के बीच पूरे परिवार ने रात का खाना खाया और सो गए।
अगले दिन नामा तड़के सुबह उठकर कहीं चला गया और जब सूरज अच्छी तरह चढ़ आया तो वह एक भैंस लिए घर में दाखिल हुआ। भैंस को खूंटे से बांध कर उसने करमी को आवाज़ दी और भैंस को पानी पिलाने के लिए कहा। करमी के पूछने पर नामा ने बताया…
“यह बंते के गुर्जरों की भैंस है, गुर्जर कौम का धंधा ही दूध-दही का है, फिर बघिया भैंस उनके किस काम की… गुर्जर ने पहले भी एक दो बार कहा था।”
“… ‘नामे , भैंस तो तंदुरुस्त है लेकिन अभी दूध नहीं देती, ले जा सेवा करके देख ले, शायद तेरे कर्मों से उसे दूध आ जाए!’… पहले तो मैंने उसकी बात पर कभी ध्यान नहीं दिया था, पर कल लाली के शरीर का दम देखकर मैंने सोचा कि चलो दो महीने चारा खिलाकर देख लेते हैं! शायद लाली की किस्मत से ही उसे दूध आ जाए।”
करमी ने पानी की बाल्टी भैंस के मुँह के आगे रख दी और भैंस सुड़क-सुड़क कर पानी पीने लग गई। पानी पी रही भैंस के सींगों से लेकर पूंछ तक नज़र मारकर करमी बोली, “भैंस तो अच्छी है, पर यदि नए दूध नहीं होती तो चारा डालने का क्या लाभ?”
“चलो दो-चार महीने सेवा करके देख लेते हैं, यदि दूध दे दिया तो ठीक है नहीं तो वापस अगले के खूँटे पर बांध आएँगे”… कुछ देर चुप रहने के बाद… “यदि यह बच्चा दे देगी , दूध तो घर का हो ही जाएगा … साथ ही फिर लाली को कसरत करने का मजा आएगा …” नामे ने खाट पर सीधा होकर लेटते हुए उम्मीद भरी नज़रों से आकाश की ओर देखते हुए कहा।
अभी भैंस को घर लाए पंद्रह-एक दिन ही हुए थे कि ईश्वर की कृपा हो गई और भैंस नए दूध से हो गई । नामे के परिवार की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। कैला और लाली बड़े चाव से चुन-चुन कर अच्छी किस्म का चारा और लंबा लंबा घास काट कर लाते। सुबह-शाम करमी भैंस को पेड़ा देती , खुरों और सींगों को सरसों का तेल लगाकर चमकाती। नामा जब भी बाहर जाता तो किसी न किसी के घर से गुड़ की डली मांग लाता और घर आते ही अपनी जेब से निकाल कर भैंस के मुँह में डाल देता और माथे पर हाथ फेरता। काला नमक हमेशा उसकी नाँद में पड़ा रहता। दो-तीन महीनों के भीतर ही भैंस का शरीर बदल गया और उसकी पसलियों से गर्भ दिखने लगा, थन भी उभरने शुरू हो गए…।
अब तक लाली लगभग गाँव के सभी लड़कों के अखाड़े में प्रसिद्ध हो चुका था। पूरे गाँव में उसके ज़ोर के चर्चे होने लगे थे। गाँव के कई बुजुर्ग और नामे के साथी भी अब लाली को प्यार से ‘भलवान’ कहकर बुलाने लगे थे। गाँव के जिन घरों में पशु ज़्यादा थे, उन कई घरों के बढ़े बूढ़े गली में से गुज़रते लाली को आवाज़ देकर दूध का गिलास पिला देते और उसका हौसला बढ़ाते हुए कहते कि एक दिन ज़रूर वह नामी पहलवान बनकर गाँव का नाम रौशन करेगा। इससे लाली का हौसला भी दोगुना-चौगुना होता गया। स्वभाव से नरम होने के कारण लाली सब के साथ हँसता-बोलता रहता था। जहाँ एक ओर गाँव के सभी लड़के लाली के साथ अच्छी दोस्ती रखते थे, वहीं गाँव की कई युवतियाँ और जवान औरतें उसके गठीले शरीर को देख कर उस पर मरने-मिटने को तैयार बैठी थीं।
ज़मींदारों के सारे लड़के लाली के अच्छे दोस्त बन गए थे, वे अक्सर खेतों को जाते समय लाली को आवाज़ देकर साथ ले जाते थे और वे सब मिलकर कसरत करते थे। कभी-कभी करमी के कहने पर घर आते हुए लाली उनके खेतों में से साग बाथू भी तोड़ लाता था।बड़े बजुर्गों ने सच कहा है कि दुनिया उगते सूरज को सलाम करती है। जिन मेढ़ों पर से घास काटने पर एक दिन लाली को ज़मींदारों के लड़कों ने मिल कर पीटा था, अब समय-असमय ज़रूरत पड़ने पर लाली उन्हीं के खेतों में से बरसीम काट कर गट्ठा बाँधकर भी ले आता तो भी कोई कुछ न बोलता, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर और ले जाने के लिए कहते।
भले ही सारे ज़मींदारों के लड़के लाली के दोस्त बन गए थे, पर फिर भी जब वह अकेला उन्हें कुएँ पर जाता तो कैला उसके पीछे ज़रूर जाता। जब उन्हें लाली के साथ मिलकर कसरत करते, इकट्ठे बैठकर गन्ने चूसते और हँस-हँसकर गँदलें खाते देखता तो उसे अंदर से तस्सली होती। लाली के मुकाबले कैला भैंस की ज़्यादा सेवा करता था। जब लाली कसरत कर रहा होता तो वह अकेले ही चारे की बड़ी भारी गठरी बाँध लाता, उसे नहलाता, बाहर चराने ले जाता और रोज़ करमी से पूछता रहता… “यह कब बच्चा देगी?” आगे से करमी हिसाब लगाकर चार-पाँच महीने बता देती।कैले के लिए ये चार-पाँच महीने सब्र करना मुश्किल हो रहा था। वह अक्सर भैंस की ओर देखकर सोचता रहता कि जब यह जनेगी , हम दोनों भाई भरपूर कर दूध पिएंगे, फिर तो लाली और भी ताकतवर बन जाएगा। फिर तो कोई हमारे साथ लड़ने की हिम्मत नहीं करेगा। कभी वह सोचता कि जब भैंस जनेगी, तब वह भी लाली के साथ कसरत किया करेगा और तगड़ा शरीर बनाएगा, फिर किसी की क्या मजाल कि उसके सामने उसके भाई को कोई हाथ भी लगा जाए ।
जब भैंस के बच्चा देने में दो महीने रह गए तो नामे ने भैंस के संभावित दूध और उसके मूल्य के कारण गाँव के बैंक से दस हज़ार का कर्ज़ ले लिया। बात यह हुई कि अतिरिक्त दूध बेचकर कर्ज़ उतार दिया जाएगा। कर्ज़ की निशानी के तौर पर बैंक वाले भैंस के कानों में टैग लगा गए। कर्ज़ मिलते ही सबसे पहले उसने लाली को पाँच किलो देसी घी और दो किलो बादाम ला दिए, बाकी कुछ मोटे -मोटे उधार थे जो उसने चुका दिए, नई रजाइयाँ बनवा लीं। बाकी बचे पैसे उसने करमी को संभाल कर रखने के लिए दे दिए।
वैसे तो गुज्जर का भैंस के कटड़े पर कोई हक़ नहीं बनता था, क्योंकि उसने तो चारा डालने से बचने के लिए अपने गले से उतार कर नामे के गले मढ़ दी थी । पर बच्चे के जन्म का समय पास आता देख वह भी लालची हो गया और नामे से मालिकी जताते हुए मुनाफे में हिस्सा मांगने लगा।
लाली के कहने पर ज़मींदारों के बेटों ने बीच में पड़कर फैसला करवा दिया। फैसला यह हुआ कि बच्चे के जन्म के बाद चार महीने तक गुज्जर हर रोज़ दो किलो दूध ले जाया करेगा ताकि उसकी भैंस की कीमत पूरी हो जाए। जैसे-जैसे बच्चे के जन्म का समय नज़दीक आ रहा था, नामे ने भैंस को घर से बाहर निकालना बंद कर दिया ताकि किसी की बुरी नज़र न लगे। फिर भी लोग आते-जाते नज़रें मार ही जाते थे। कोई कहता कि कट्टी हुई तो दूध ज़्यादा देगी, कोई कहता कि कट्टा दिया है तो दूध कम देगी।
बच्चे के जन्म को अभी मुश्किल से पंद्रह दिन ही रह गए होंगे कि एक दिन सोने से पहले करमी ने नामे को बताया कि कल से भैंस एक पैर उठा कर खड़ी हो रही है। साथ ही चारा भी आज कम खाया है। करमी की बात सुनकर थके हुए नामे ने बस इतना ही कहा कि “कोई बात नहीं, सुबह गाँव के किसी बज़ुर्ग आदमी से पूछ लेंगे।” इतना कह कर वह दूसरी तरफ करवट लेकर सो गया।
अगले दिन सुबह सवेरे जब करमी भैंस को घास डालने गई, तो वह घबराकर उलटे पाँव वापस आई और नामे को जगाने लगी।”क्या हुआ करमिए?” आँखें मलते हुए नामे ने पूछा।
“भैंस खड़ी नहीं हो रही और न ही चारे को मुँह लगा रही है।” डरी हुई करमी ने जवाब दिया।
यह सुनते ही नामे के जैसे होश उड़ गए। वह झटपट उठकर भैंस के पास गया, उसकी पीठ पर प्यार से हाथ फेरा, पूंछ संवारी, फिर सींगों के बीच माथे पर रोज़ की तरह हल्के हाथों से थपकियाँ दीं। पर आज भैंस ने किसी दुलार का जवाब फुँकार भरकर या सिर हिलाकर नहीं दिया। नामा समझ गया कि ज़रूर भैंस को कोई तकलीफ है। उसी समय उसने नंबरदार का दरवाज़ा खटखटाया। करमी ने लाली और कैले को भी जगा दिया। वे दोनों भी भैंस को खड़ा करने की कोशिश करने लगे। इतने में नामा भी नंबरदार को साथ ले आया।
नंबरदार ने भैंस का मुँह खोलकर देखा, पूंछ उठाकर देखी, थन देखे, खुरों के बीच की दरारें देखीं और नामे से कहने लगा, “इसे खड़ा करो किसी तरह।”
नामे ने पांच-छह पड़ोसियों को आवाज़ दी और जहाँ-जहाँ नंबरदार ने कहा, वहाँ बल्लियाँ लगाकर बड़ी मुश्किल से झोटी को खड़ा किया।
अभी बल्लियाँ नीचे से निकालीं ही थीं कि भैंस पछाड़ खाकर गिर पड़ी।
भैंस के गिरते ही करमी की चीख निकल गई… “हाय कहीं बच्चा अंदर ही न…” इसके आगे वह कुछ बोल न सकी और रोने लगी… उसकी चीखें सुनकर उन तीनों के दिलों में भी घबराहट सी होने लगी।
नंबरदार ने नामे को हौसला देते हुए भैंस का गोबर मूत्र सूंघा और दबी आवाज़ में बोला, “कवारगंदल और गुड़ दे कर देखो, लगता है इसे बाई बादी हो गई है।”
नामा उसी समय किसी के घर से कवारगंदल उखाड़ लाया, सौभाग्य से गुड़ भी घर में पड़ा था। कवारगंदल को काटकर गुड़ में मिलाकर भैंस को देने की कोशिश की गई पर भैंस ने मुँह नहीं खोला। फिर किसी ने सलाह दी कि गुड़ को पानी में घोल लो और कवारगंदल काटकर नलकी के ज़रिए इसके गले में डाल दो। बड़ी मुश्किल से घोल भैंस को पिलाया गया पर कोई असर नहीं हुआ। अब तक दिन काफी चढ़ आया था। नामे ने पशु अस्पताल से कंपाउडर को बुलवाया। कंपाउडर आकर भैंस की सारी हालत लिखकर ले गया । दोपहर के करीब पशु डॉक्टर आया और भैंस को देख कर दवाइयाँ दे गया। गोलियां नलकी के ज़रिए भैंस के गले में डाली गईं। सारा दिन भैंस ने न चारा खाया और न पानी पिया। शाम होते-होते भैंस की हालत और भी खराब हो गई। अब उससे बैठा भी नहीं जा रहा था। नामे और उसके दोनों बेटों ने मिलकर कई बार उसे खड़ा करने या बिठाने की कोशिश की लेकिन वह अधमरी सी होकर एक तरफ गिर जाती। हर बार भैंस को गिरता देख सारा परिवार रोने लगता। शाम तक गाँव के कई और बज़ुर्ग लोग भैंस को देखने आए और अपनी-अपनी समझ के अनुसार सलाह देकर चले गए।
अगले दिन सुबह-सुबह डॉक्टर फिर आया, भैंस को दो टीके लगाए और दवाइयाँ भी बदल दीं। पर दवाई तो क्या , भैंस ने तो पानी को भी मुँह नहीं लगाया था। उसका मुँह जैसे बंद हो गया हो। डॉक्टर के कहे अनुसार सारा परिवार समय-समय पर दवाइयाँ पीसकर नलकी से भैंस के मुँह में डालते रहे, लेकिन भैंस की ओर से कोई हलचल न होने के कारण आधी-अधूरी दवा ही अंदर जाती और बाकी बाहर बह जाती।
पड़ोसी आकर अपनी हमदर्दी जताते और अपनी-अपनी सलाह देकर चले जाते। कोई कुछ कहता, कोई कुछ। जब भी कोई बच्चे के अंदर मर जाने की शंका जताता, तो करमी की चीखें निकल जातीं। उसे देख कर कैले और लाली की आँखें भी भर आतीं।
आज सारा दिन नामे के घर चूल्हा नहीं जला और न ही किसी को भूख लगी थी। सारा दिन, सारी शाम और देर रात तक सारा परिवार भैंस के आस-पास बैठा भगवान के आगे प्रार्थनाएँ करता रहा। खुरली में बैठे-बैठे पता ही नहीं चला कि कब दोनों भाइयों की आंख लग गई, पर जल्द ही ‘करमी’ की चीखों ने दोनों को जगा दिया।
बिना कुछ बताए भैंस की पथराई आंखों को देखकर दोनों भाई समझ गए कि भैंस मर चुकी है। दोनों मां की बगल में सिर छिपाकर रोने लगे। नामा एक तरफ बैठा आंसू पोंछ रहा था। करमी विलाप करती हुई बार-बार भगवान को उलाहने दे रही थी… “मेरे फूल से बच्चों पर भगवान् , तुझे ज़रा भी तरस नहीं आया, जो उनके मुंह से दूध छीन लिया।”…।
दिन चढ़ते ही गांव के कुछ लोगों को बुलाकर भैंस को ‘हड्डा रोड़ी’ ले जाया गया। चारों पैर बांधकर जब भैंस को उठाने के लिए चमारों ने लकड़ी के डंडे डाले और उसे उठाते हुए देखकर पूरे परिवार की चीखें निकल गईं। करमी के मुंह से निकल ही गया कि… “अरे धीरे उठाओ, उसे तकलीफ …” बस इतना ही कह सकी थी कि बाकी के शब्द चीखों में बदल गया। भैंस को ले जाते समय भैंस के मुंह से निकली दवाई जमीन पर एक लंबी लकीर जैसी बना गई।
बैंक वालों को भी भैंस की मौत की खबर दी गई। वे भी फोटोग्राफर और पशु चिकित्सक को साथ लेकर ‘हड्डा रोड़ी’ पहुंच गए। पहले भैंस के टैग वाले कानों को नामे के हाथ में देकर फोटो खींचे गए। फिर बूचड़खाने का डॉक्टर हाथों में सफेद रंग के लंबे-लंबे दस्ताने और घुटनों तक ऊंचे जूते पहनकर भैंस का पोस्टमॉर्टम करने के लिए आगे बढ़ा। उसे आगे आता देख नामे को ऐसा महसूस होने लगा जैसे यह पोस्टमॉर्टम भैंस का नहीं, बल्कि उसके सपनों का हो रहा हो। एक बार तो उसे चक्कर आ गया और वह गिरते-गिरते बड़ी मुश्किल से खुद को संभाल सका।
डॉक्टर ने चामड़ी से भैंस का पेट चिरवाया और गर्भाशय बाहर निकलवाकर अच्छी तरह देखा, फिर जब बच्चा बाहर निकलवाया तो वहां खड़े सभी लोग उत्सुकता से आगे बढ़कर यह जानने की कोशिश करने लगे कि बच्चा ‘कट्टी’ है या ‘कट्टा’। करमी, लाली और कैला घर की छत पर चढ़कर सारा दृश्य देख रहे थे। जैसे ही डॉक्टर के मुंह से निकला “कट्टी!” इतना सुनते ही वहां खड़े चामड़ियों का छह-सात साल का लड़का दौड़ता हुआ आया और गली में खड़े होकर छत पर खड़े करमी, लाली और कैले की ओर मुंह करके ऊंची-ऊंची आवाज़ में कहने लगा- “कट्टी ओए कट्टी, कट्टी देनी थी तुम्हारी भैंस ने…!”
इतना सुनते ही करमी ने एक बार फिर आसमान की ओर देखा और हिचकियां भरते अपने दोनों बेटों को अपने गले लगाकर वहीं बैठ गई।
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