सन् 1891 की बात है। बंगाल के मेदिनीपुर जिले में वीरसिंह नामक गांव में में एक अत्यन्त गरीब बंगाली दंपति रहता था- ठाकुर दास और भगवती देवी। सौभाग्य से भगवती देवी गर्भवती थी परंतु उनकी मानसिक हालत ठीक नहीं थी। यह देख कर ठाकुर दास  चिंतित थे।
एक दिन उनके द्वार पर एक संन्यासी भिक्षा मांगने आये।
ठाकुरदास सन्यासी को यह कहकर रोने लगे- मैं आपको क्या दूं। मेरे घर में एक मुट्‌ठी अनाज भी भिक्षा में देने के लिए नहीं है । मैं तो अपनी गरीबी के कारण अपनी गर्भवती पत्नी का इलाज भी नहीं करा पा रहा हूँ।
तब संन्यासी ने हंसते हुए कहा- ”अरे बावले! तेरी पत्नी तो एक तेजस्वी बालक के गर्भ में आ जाने के कारण उसके तेज से पागल-सी हो गयी है । घबराने की कोई बात नहीं, सब कुछ ठीक हो जायेगा ।” 
हुआ भी ठीक वैसा ही, जैसा कि उस संन्यासी ने कहा था । बालक का जन्म होते ही माता की अवस्था सामान्य हो गयी ।
बालक जन्म से ही कुशाग्रबुद्धि था। पांच वर्ष की अवस्था में गांव की पाठशाला में भरती होने के बाद उनकी बुद्धिमानी और सदचरित्रता से सभी अध्यापक अत्यन्त प्रभावित होने लगे। बालक कमजोर और असहाय लोगों की मदद करने में खुशी महसूस करता था।
ठाकुरदास अपने होनहार बेटे को उच्च शिक्षा देना चाहते थे जो कि गांव में रहते हुए संभव न थी। वह कलकत्ता में नौकरी करते थे। अतः उन्होंने बालक को अपने साथ कोलकाता ले जाने की सोची। 
उन दिनों यातायात के साधनों की इतनी सुविधा नहीं थी उस पर ठाकुरदास गरीब थे। इसलिए उन्होंने कोलकाता पहुंचने के लिए पैदल यात्रा शुरू कर दी। रात होने पर वे किसी गांव में रुक जाते थे।
चलते-चलते जब वे गांव-देहात से निकल कर मुख्य सड़क पर पहुंचे तो बालक ने सड़क किनारे एक पत्थर देखा।
उसने अपने पिता से पूछा- पिताजी, ये पत्थर क्या है?
पिता ने बताया- ये मील का पत्थर है। कुछ दूर चलने के बाद दूसरा पत्थर आ गया। बालक ने फिर पूछा- पिताजी यह पत्थर क्या है? 
पिता ने फिर बताया- ये पत्थर भी वैसा ही है। लेकिन इस पर लिखा अंक दूसरा है‌। साथ ही ये भी बताया कि कलकत्ता तक ये पत्थर मिलते रहेंगे लेकिन इन पर लिखे अंक घटते रहेंगे।
बालक का कौतुहल शांत नहीं हुआ था। उसने फिर पूछा- इस पर लिखे अंक कैसे हैं? 
पिता ने बताया- ये अंग्रेजी में लिखे अंक हैं। यहां उन्नीस लिखा है। एक और नौ।
उस बालक लिए ये अंक नई बात थी क्योंकि उसके गांव में हिंदी के अंक सिखाए जाते थे। 
इसके बाद बालक ने चुप्पी साध ली। जब वह काफी देर तक कुछ नहीं बोला पिता को कुछ संशय हुआ। उन्होंने पूछा-  इतने चुप क्यों हो, कुछ चाहिए तो नहीं?
बालक ने जवाब दिया- नहीं, मैं तो अंग्रेजी के अंक सीख रहा हूं।
पिता ने अगला पत्थर दिखाकर पूछा- अच्छा तो बताओ इस पत्थर पर क्या लिखा है। हम कोलकाता से कितनी दूर हैं?
इस पर उस बालक ने बताया- सामने पत्थर पर 10 लिखा है। यानी कि हम कोलकाता से 10 मील दूरी पर हैं। हम अब तक 9 मील की यात्रा कर चुके हैं। आसपास के सारे यात्री चकित थे और पिता अपने नन्हे से बालक की मेधा पर खुश। 
जानते हो यह बालक कोलकाता जाकर खूब पढ़ा। विपरीत परिस्थितियों में भी उसने मेहनत और लगन से उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा अपना व अपने माता-पिता का नाम भी रोशन किया। साथ ही देश और समाज की सेवा भी की। यही बालक बड़ा होकर ईश्वर चंद्र विद्यासागर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर उन्नीसवीं शताब्दी के बंगाल के प्रसिद्ध दार्शनिक, शिक्षाविद, समाज सुधारक, लेखक, अनुवादक, मुद्रक, प्रकाशक, उद्यमी और परोपकारी व्यक्ति थे। वे बंगाल के पुनर्जागरण के स्तम्भों में से एक थे।  संस्कृत भाषा और दर्शन में अगाध पाण्डित्य के कारण विद्यार्थी जीवन में ही संस्कृत कॉलेज ने उन्हें ‘विद्यासागर’ की उपाधि प्रदान की थी।
ईश्वर चंद्र विद्यासागर उम्र भर समाज में नारियों की स्थिति सुधारने में जुटे रहे। समाज में विधवा स्त्रियों की दयनीय स्थिति देखकर उन्होंने वेदों और पुराणों में लिखित तथ्यों के आधार पर विधवा विवाह को प्रमाणिक सिद्ध कर कानूनी मान्यता दिलवाई थी। उन्होंने बालिकाओं को घर की चारदीवारी से बाहर निकाल कर उनके लिए शिक्षा की द्वार खोल दिए। ईश्वर चंद्र विद्यासागर सादगी भरा जीवन जीना पसंद करते थे। वे स्वयं घर में बुने हुए कपड़े पहनते थे और अपनी आय का अधिकतर भाग गरीबों और असहायों को दान स्वरूप दे देते थे। प्रकांड विद्वान होने के बावजूद भी उन्हें घमंड छू तक नहीं गया था।

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