मनुष्यता को बचाने की आवाज है काव्य संग्रह - 'मेरे गांव का पोखरा' 3
वरिष्ठ कवि एवं समीक्षक नीलोत्पल रमेश जी के हाल में ही प्रकाशित प्रथम काव्य-संग्रह “मेरे गांव का पोखरा” ने हिन्दी साहित्याकाश में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज की है। एक ही महीने में प्रथम संस्करण का हाथों-हाथ बिक जाना संग्रह की उपादेयता और कवि की महत्ता को स्वयं सिद्ध करता है। क्रांतिकारी विचारक चेखब ने कहा था-“मैं केवल दर्शक मात्र नहीं हूं । यदि मैं लेखक हूं तो मेरा यह दायित्व है कि मैं उन लोगों के दुख-दर्द के बारे में लिखूं,उन लोगों की भावनाओं और परिवेश का अंकन करूं जिनके बीच मैं रहता और जीता हूं”।
नीलोत्पल रमेश जी की कविताओं में यह बात अक्षरश: प्रकट होती हुई, दिखाई देती है।उनकी कविताओं में साम्प्रदायिक परिवेश सम्पूर्णता के साथ उद्घाटित होता दिखाई देता है । वास्तव में वही कवि संवेदनशील होता है जो अपने समय की नब्ज को टटोलते हुए प्रतिक्षण परिवर्तित हो रहे परिवेश एवं परिस्थितियों के स्पंदन को अनुभव करता हुआ चलता है । कवि नीलोत्पल रमेश की कविताओं में यह प्रवृत्तियां प्रतिपल परिलक्षित होती हैं। उनकी कविताएं वर्तमान की तीव्र पीड़ा और व्यापक भविष्य दृष्टि सहेजे क्षत-विक्षत होते आदर्शों और मूल्यों के संरक्षण की पुरजोर वकालत करती हैं।
नीलोत्पल रमेश की कविताएं कल्पना के आकाश में विचरण नहीं करतीं,अपितु गांव-गली, खेत-खलिहान, अहरा-पोखरा और जंगलों के इर्द-गिर्द घूम मानवीय मूल्यों के रक्षार्थ मनुष्यता की मशाल थामे दिग्भ्रमित समाज को उजाले की तरफ़ ले जाने को कटिबद्ध दिखाई देती हैं।उनकी कविताएं हमारी अनुभूतियों को संस्पर्शित कर हमें सचेत करने का प्रयास करतीं हैं। उनकी कविताएं सामाजिक परिवर्तन की अदम्य लालसा लिए लोकहितों के विरुद्ध खड़ी व्यवस्था से सीधा मुकाबला करती हुईं पाठकों के भीतर क्या सही तथा क्या गलत,की चेतना का संचरण करती हुई दिखाई देती हैं । उनकी कविताएं सीमा पर तैनात सैनिकों की भांति मर्यादाओं की सीमा लांघ अनैतिक आचरण में संलिप्त अन्यायी और आतताइयों के विरुद्ध सीना ताने खड़ी दिखाई देती हैं –
“कविता वहां भी पहुंचती है
जहां हो रहा हो बलात्कार
हो रहा हो अन्याय
हो रहा हो कोई अनैतिक काम
बेखटके पहुंचकर
संघर्ष के लिए
हो जाती है तैयार
प्रतिबद्ध सैनिक की तरह”।
नीलोत्पल रमेश एक सहज,सरल और संवेदनशील व्यक्तित्व के धनी हैं। उनकी कविताएं मानवीय संवेदनाओं को संस्पर्शित करतीं हुईं संवेदनसिक्त हृदय की एक साकार तस्वीर प्रस्तुत करती हैं ।काव्य संग्रह ‘मेरे गांव का पोखरा’ में कई कविताओं में देश के भविष्य कहे जाने वाले बच्चों की दुर्दशा और खस्ताहाल स्वास्थ्य व्यवस्था से असमय अस्पताल के विस्तर पर दम तोड़ती उनकी सांसों की करुण कथा का वर्णन दिखाई पड़ता है। उनकी कविता “बच्चे मर रहे हैं” भगवान कहे जाने वाले डॉक्टरों के उन क्रूर चेहरों को बेनकाब करती है जो अपने चिकित्सीय धर्म से विरत पार्टियों में मशगूल रहते हैं, उन नेताओं के चरित्र को उजागर करती है जो अय्याशी के सागर में डुबकी लगाते रहते हैं तथा प्रशासन की उस संवेदनहीनता का पर्दाफाश करती है जो आंखें बन्द कर उस भयावह मंजर को देखते रहते हैं और जिनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगती –
बच्चे मर रहे हैं
डॉक्टर पार्टी मना रहे हैं
प्रशासन मौन है
नेता ऐश कर रहे हैं
और बच्चों के माता-पिता
बदहवास दौड़ रहे हैं
पागलों की तरह
ताकि किसी तरह
बचा सकें अपने लाल को”।
आए दिन बच्चों के अपहरण और हत्याओं ने आम आदमी के मन में एक खौफ भर दिया है जिसके कारण बच्चों को स्कूल भेजते समय माता-पिता और परिजनों की क्या मनोस्थिति रहती है इसका वर्णन उनकी कविता ‘बच्चे स्कूल जा रहें हैं’ में साफ दिखाई देता है –
बच्चे स्कूल जा रहे हैं
और माएं आशंकित हैं
पिता सहमे हुए हैं
भाई-बहन भी असहज हैं
कि समय पर, सही-सलामत
लौट आएगा न मेरा लाल
कहीं प्रद्युम्न की तरह
कुछ हो तो नहीं जाएगा न!”।
नीलोत्पल रमेश जी की कविताओं में गरीबी की चक्की में पिसते तथा अभाव के दल-दल में फंसे नारकीय जीवन जीने को विवश नौनिहालों की दयनीय दशा का यथार्थ चित्रण देखने को मिलता है। अभाव में आंखें खोलते और अभाव के ही दोलने में झूलते सामान्य बच्चों का जीवन वैसा नहीं होता, उन्हें वैसी सुख सुविधाएं नहीं मिल पातीं जैसीं उन बच्चों को मिलती हैं जो चांदी की चम्मच मुंह में रख पैदा होते हैं। धनाभाव के कारण जिस उम्र में उन्हें स्कूल जाना चाहिए वह अपने पिता के साथ सुअर चराने,मूस मारने,और मछली पकड़ने जैसे काम करने निकल पड़ते हैं –
बच्चे अभी चलना भी
नहीं सीख पाए हैं ठीक से
कि निकल पड़ते हैं
पिता के साथ-
सूअर चराने,मूस मारने, मछली पकड़ने
और-और बहुत सारे काम करने”।
ग़रीबी की आग में जलती खुशियों की बानगी उनकी दूसरी कविता ‘भिखारिन की बच्ची’ में भी दिखाई देती है इस कविता में कवि को भिखारिन की बच्ची बच्ची ही नहीं लगती है क्योंकि उसे कभी बच्चियों की तरह सुन्दर फ्राक-सलवार और समीज कवि ने पहने ही नहीं देखा उसे तो कवि ने हमेशा लड़कों की उतरन ही पहने देखा –
“भिखारिन की बच्ची
लगती नहीं है कि बच्ची है
क्योंकि वह कभी पहनती नहीं
लड़कियों की फ्रॉक-सलवार-समीज
वह अक्सर लड़कों का ही पहनावा
पहना करती है”।
परिवार के गुरुतर उत्तरदायित्व का बोझ अपने कन्धों पर लादे सड़कों,चौराहों, स्टेशनों पर सभ्य कहलाने वाले समाज की हिकारत भरी निगाहों और झिड़कियां झेलते अबोध बचपन का चित्रण उनकी एक अन्य कविता ‘कचरा चुनते हुए बच्चे’ में भी दिखाई देता है जहां उनका खेल,उनका उत्साहऔर उनकी पढ़ाई-लिखाई उनसे जबरन छीन असमय उनकी पीठ पर कचरे का बोझ लाद दिया जाता है जिसके बोझ तले दबकर असमय ही जिनका बचपन प्रौढ़ता और वयस्कता में परिवर्तित हो जाता है –
“ये बच्चे
समय के पहले ही
दुनिया का बोझ उठा
बन जाते हैं प्रौढ़
और उठा लेना चाहते हैं पृथ्वी को
अपने कन्धों पर
जीवन-भर के लिए”‌।
आज जब संयुक्त परिवार तेजी से विखंडित हो रहे हैं तथा आपसी सौहार्द दिनों-दिन क्षरण होता जा रहा है। माता-पिता को टूटे-फूटे सामान की तरह निकाल कर घर से बाहर फेंका जा रहा है। रिश्तों के दरकते पुल और उत्तरोत्तर ह्रास की ओर अग्रसर मानवीय मूल्यों तथा छीज होतीं मर्यादाओं पर भी कवि दृष्टि पूर्णतः निबद्ध दिखाई देती है। स्वार्थ की नींव पर खड़े रिश्तों की हकीकत उनकी कविता ‘कैसा समय है आज’ में साफ दिखाई देती है –
“समय पड़ने पर
मां को मां
पिता को पिता
और भाई को भाई कहने से
साफ कतरा जाते हैं वे”।
ऐसी परिस्थितियों में माता-पिता के प्रति संतान के उत्तर दायित्व व कर्तव्यबोध का पथभ्रष्ट नव पीढ़ी को भली भांति भान कराते हुए अपनी गौरवशाली परंपराएं,जो हमारी विरासत हैं,जो हमारी पहचान हैं, के संवर्धन और संरक्षण की ओर उन्मुख करने का प्रयास कवि ने अपनी कविताओं के माध्यम से किया है । जिसकी एक बानगी उनकी ‘मेरी मां’ कविता में दृष्टव्य है –
“पत्र में भैया
अक्सर मां की चिंता करते
और बार-बार लिखा करते
तुम अपने पर ध्यान देना
पिताजी पर ध्यान देना
उम्र के साथ
तुम्हारे ऊपर रोगों का
हो गया है आक्रमण
संयम ही तुम्हारी दवा है”।
वर्तमान परिस्थितियों में शिक्षित होना कितना महत्वपूर्ण है कवि इस बात से भलीभांति परिचित है। उनकी ‘मेरी मां’ कविता की अन्तिम पंक्तियां इस बात को प्रमाणित करतीं हैं –

“बेटा पढ़ लो
हम नहीं पढ़े हैं
तो देख ही रहे हो
हमारी स्थिति”

स्त्री जीवन के विविध पक्षों पर कवि की पैनी नजर दिखाई देती है। स्त्री जीवन की विभिन्न त्रासदियों और विडम्बना पूर्ण स्थितियों को कवि ने अपनी कविताओं का कथ्य बनाया है जिनमें दहेज के कारण प्रताड़ना,अनमेल विवाह,भ्रूणहत्या जैसे विषयों पर लिखीं कविताएं स्त्री जीवन के दारुण दुःख की कहानी बयां करतीं हैं जिन्हें स्त्रियां ताउम्र उफ न करते हुए सहन करती हैं। उनकी एक कविता ‘बेटी का पत्र मां के नाम’ में वह पीड़ा दृष्टव्य है-
“मैं भी
अपने ससुराल में सुखी हूं मां!
क्या हुआ,
अगर मेरे पति की उम्र
मुझसे दुगुनी से भी अधिक है
क्या हुआ,
अगर दहेज में साइकिल और रेडियो
न लाने के कारण
सास-ससुर के ताने सुनना
मेरा रोजनामचा हो गया है!”।
वर्तमान समाज में व्याप्त लिंगीय भेदभाव जहां बेटे की चाह में गर्भ में ही बेटी की हत्या करना आम बात हो गई है। उन अजन्मी बेटियों का करुण क्रन्दन उनकी अंतिम कविता ‘अजन्मी बेटियां’ में स्प‌ष्ट रूप से सुनाई देता है –
“मां!
मुझे मारकर
ममता किस पर वरसाओगी
किसमें
अपने खून का
प्रतिरूप पाओगी
तेरी गोद
मेरे लिए
क्यों न तरसती है मां!”।
आए दिन बेटियों के साथ होते बलात्कार और हत्याएं कवि के संवेदनशील हृदय को झकझोर कर रख देती हैं। कवि को लगता है आज सैकड़ों साल बाद भी स्त्रियों की स्थिति वही है जो पहले थी। आज भी बेटियों का अकेला घर से निकलना खतरे से खाली नहीं है।आज भी देह के भूखे भेड़िए घात लगाकर उनकी बोटी-बोटी नोंचने के लिए उद्धत हैं और जिनके कन्धों पर उनकी सुरक्षा का उत्तरदायित्व है वह सिर्फ सुरक्षा के खोखले वादे कर रहे हैं। इसलिए कवि बेटियों को अपनी सुरक्षा स्वयं करने की नसीहत देते हुए ‘ऐ मेरी बेटियों’ नामक कविता में कहता है –
“ऐ मेरी बेटियों!
घर से निकलना
पर, अपनी सुरक्षा के
सारे इंतजामात लेकर
क्योंकि सुरक्षा के
सारे तंत्र पंगु हो चुके हैं
इन पर कभी भी
विश्वास मत करना”
नीलोत्पल रमेश की कविताएं मानवता की प्रबल पक्षधर हैं। उनकी कविताएं शान्ति का संदेश देतीं हैं। वह हर प्रकार के ख़ून-ख़राबे के बरक्स शान्ति की मशाल थामे युद्ध के तुमुल कोलाहल में “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना से सराबोर “जियो और जीने दो” की हिमायत करतीं हैं –
“हम नहीं चाहते जंग
हम शांति के पुजारी हैं”।
वह राक्षसी ताक़तें जो देश से मनुष्यता को मिटाने की पुरजोर कोशिश कर रहीं हैं जो एक मानव को दूसरे मानव से लड़वाकर देश में खूनी खेल खेलने को उतारू हैं । ऐसे नाजुक हालातों में जब कि अभिव्यक्ति के बहुत सारे खतरे पग-पग पर मुंह बाये खड़े हों, को नजरंदाज कर, देश के जन साधारण को एकजुट हो उन मनुष्यता विरोधी ताकतों के खिलाफ खड़े होने की सीख तथा उनके सर्वनाश का आह्वान करती उनकी कविता ‘ऐ मेरे देश’ निश्चित ही विपरीत परिस्थितियों में कवि की दृढ़ इच्छाशक्ति, देशभक्ति व देश और दुनिया में शान्ति की चाह की परिचायक है –
“ऐ मेरे देश
तुम किस खोह में छुपे हो
एक बार लो अंगड़ाई
कि मनुष्यता के सारे दुश्मन
धराशायी हो जाएं
और विश्व पटल पर
एक नई छवि
तुम्हारी अंकित हो जाए”।
उनकी कविताओं में धर्म के नाम पर जो उन्माद फैलाया जा रहा है, धर्म के नाम पर जो बसुधा को रक्तरंजित किया जा रहा है, धर्म के नाम पर जो लोगों को डराया जा रहा है,धर्म के नाम पर जो आपसी सौहार्द को खंडित कर देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने का प्रयास किया जा रहा है उसका यथार्थ चित्रण दिखाई देता है।आज जो भय, जो अनैतिक आचरण तथा जो माॅब लिंचिंग,वह भी “जो अनीति कछु भाखौं भाई,तो मोहि बरजहु भय बिसराई” कहने वाले उन राम के नाम पर आए दिन ढोंगी रामियों द्वारा की जा रही है, उसका प्रबल प्रतिरोध उनकी ‘हे राम’ कविता में दिखाई देता है –
“हे राम!
तुम्हारे नाम मात्र से
तुम्हारी प्रजा सताई जा रही है
और अब तो
भारत के लोगों को
तुम्हारे नाम से भी
डर लगने लगा है”।
“अब आ भी जाओ
कुछ बिगड़ा नहीं है
ताकि भारत की जनता को
त्राण मिल सके
इन ढोंगी रामियों से”।
6 दिसम्बर,1992 ई. को मन्दिर-मस्जिद के नाम पर अयोध्या में जो नंगा-नाच उन्मादी शक्तियों के द्वारा किया गया, धर्म के नाम पर जो खून की होली खेली गई तथा जिसके बाद बैमनष्यता की आग में देश को जलने के लिए छोड़ दिया गया के बीच दोस्त सलमान के जीवन की सलामती के लिए लिए एक हिन्दू दोस्त के द्वारा की गई प्रार्थना, मां के द्वारा किया गया व्रत, पिता द्वारा किया गया अखंड पाठ, उन उन्मादी शक्तियों के मुंह पर तमाचा है जो देश की एकता व अखण्डता को खण्डित करने का स्वप्न संजोए बैठे हैं। उनकी कविता ‘दोस्त सलमान के लिए’ करोड़ों भारतीयों के मन में इस आशा का संचार करती है कि कोई भी शैतानी ताकत देश की एकता और अखंडता तथा आपसी सौहार्द को मिटा नहीं सकती –
“मां से भी हमने कहा
कि मां
सलमान के लिए रखो व्रत
पिता से भी हमने कहा
कि पिता
सलमान के लिए करें
अखंड-पाठ
तुम ठीक-ठाक ही रहोगे
मुझे विश्वास है
और हम-तुम
हमेशा मिलते रहेंगे”।
क्योंकि नीलोत्पल दशा की यथार्थ तस्वीर दिखाई पड़ती है। किस तरह कोयलांचल के श्रमिक सुबह से लेकर शाम तक पत्नी और बच्चों के संग जी तोड़ मेहनत करते हैं, तब जाकर कहीं एक बोरी कोयला इकठ्ठा कर पाते हैं जिसको बेचने के बाद ही उनके घरों में शाम का चूल्हा जलता है।उनकी कविता ‘कोयला ढोने वाला’ उसकी मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत करती है –
“वह निकल पड़ता है तड़के ही
कोयले की बोरी से लदी
साइकिल को लेकर
ताकि दोपहर तक
पहुंच सके रांची
फिर उसे बेच
खरीद लाएगा
अपने परिवार की खुशी
जो कई-कई दिनों से
मंद पड़ी है”।
कोयले के उत्पादन के समय किया गया विस्फोट, उस विस्फोट की आवाज तथा उससे निकली जहरीली गैसें और उड़ती धुन्ध किस प्रकार कोयलांचल को विषाक्त कर वहां की उपजाऊ जमीन,जीव-जंतुओं, घरों, सड़कों तथा पेड़-पौधों के लिए घातक बन रहीं हैं, इसका वर्णन उनकी ‘भुरकुंडा’ कविता की इन पंक्तियों में दिखाई देता है –
“कोयले की यह धूल
चाटती रहती है भूमि की उर्वरा
दोपायों के भीतर उतर
पोसतीं हैं बीमारियां”।
इन कविताओं के अलावा ‘दशरथ ‘मांझी’ ,’जंगल की आग’,’मनातू का आदमखोर’ आदि ऐसी कविताएं हैं जो कोयलांचल की सुरम्यता,संस्कृति और समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं ।वहीं ‘राष्ट्रनायक’,’जन अदालत’,’विमुद्रीकरण’, ‘सत्ता के लिए मुसीबत’ और ‘परिवेश’ राजनीतिक उठा-पटक के बीच छद्म राष्ट्रवाद के नाम पर गला फाड़ू और बांह उखाड़ू भाषणों तथा आत्मश्लाघी विज्ञापनों के मोहपाश में न फंस गहन चिंतन और विमर्श के लिए जमीन तैयार करतीं हैं साथ ही साथ ‘मेरे गांव का पोखरा’ ,’जल है तो कल है’, ‘हे वसन्त’,’हे मां गंगे’ कविताएं मानव द्वारा प्रकृति के साथ अनधिकृत हस्तक्षेप और भविष्य में उसके दुष्परिणामों के प्रभाव पर सोचने के लिए विवश करतीं हैं।
संग्रह में 67 कविताएं हैं। सभी कविताएं भाषा,भाव और शिल्प की दृष्टि से पूर्ण हैं।प्रतीक और विम्ब भी सहज एवं सरल हैं जिन्हें बिना दिमागी कसरत किए आसानी से हृदयंगम किया जा सकता है। कहीं-कहीं आंचलिक शब्दों का प्रयोग दिखाई देता है जो कवि की उस क्षेत्र की भाषा और बोली के प्रति लगाव को दर्शाता है।  कुल मिलाकर काव्य-संग्रह पठनीय एवं संग्रहणीय है।गुणवत्ता पूर्ण कागज, त्रुटि रहित टंकण और आकर्षक आवरण के लिए प्रलेक प्रकाशन,मुम्बई को भी बहुत साधुवाद देने के साथ ही कवि नीलोत्पल रमेश जी को उनके प्रथम संग्रह के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं!
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कविता संग्रह – ‘मेरे गांव का पोखरा’
कवि – नीलोत्पल रमेश
प्रकाशन – प्रलेक प्रकाशन, मुम्बई-401303
मूल्य-240/-रुपये ,पृष्ठ-152, प्रथम संस्करण-2020 ।
अरविन्द यादव
पाखी, समहुत, कथाक्रम,अक्षरा, विभोम स्वर ,सोचविचार, सेतु , समकालीन अभिव्यक्ति, किस्सा कोताह, तीसरा पक्ष, ककसाड़, प्राची, दलित साहित्य वार्षिकी, डिप्रेस्ड एक्सप्रेस, विचार वीथी, लोकतंत्र का दर्द, शब्द सरिता,निभा, मानस चेतना, अभिव्यक्ति, ग्रेस इंडिया टाइम्स, विजय दर्पण टाइम्स आदि पत्र- पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित. सम्पर्क - arvindyadav25681@gmail.com

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