‘औरत बुद्ध नहीं हो पाती
क्योंकि वह जब माँ होती है तो कुछ और नहीं होती,
बनी रहती है जीवन पर्यंत , सांसारिक मोह माया से घिरी बस एक औरत….
       साहित्य समाज का दर्पण होता है। कुछ इस प्रकार का भाव ’औरत बुद्ध नहीं होती’ अन्नपूर्णा सिसोदिया के काव्य संकलन को पढ़कर लगा। लेखिका की प्रत्येक कविता जहाँ एक ओर समाज की वर्तमान स्थिति को उजागर करती है वही निरन्तर परिवर्तित समय और विषयों की ओर पाठक का ध्यान खींचती है।
अपनी कविताओं में कभी कवयित्री औरत की दयनीय स्थिति और संघर्षशील को दर्शाती है तो कहीं उसे शक्ति रूप में हमारे सामने लाकर खड़ा कर देती है। कभी वर्तमान में बच्चों के भविष्य को लेकर चिन्तित दिखती है तो कभी श्रमिकों की दुरावास्था और दलों, संगठनों द्वारा एक आम आदमी को कैसे इस्तेमाल किया जा रहा है उनकी स्थिति को बयां करती है। वे कभी नारी, कभी शिक्षिका, तो कभी एक विचारक के रूप में अपनी काव्यात्मकता को सरल शब्दों में पाठकों के सामने रखती विशेष चिंतक प्रतीत होती है।

डॉ. योग्यता भार्गव द्वारा अन्नपूर्णा सिसोदिया के काव्य-संग्रह 'औरत बुद्ध नहीं होती' की समीक्षा 3

जब मैंने इसका नाम पढ़ा तो इसके शीर्षक ने मेरे मन में  पुस्तक को पढ़ने की लालसा हजारों गुना बढ़ा दी और ये मेरा सौभाग्य ही था कि मैं पहली पुस्तक क्रेता बनी। यह संकलन वर्तमान समाज, राष्ट्र, पर्यावरण और नारी वेदना के साथ उसके मन की परतों को उजागर करती हुई पाठक को सोचने पर विवश करने के साथ निशब्द कर देती है। यूँ तो इस काव्य संकलन में इक्यवान कविताऐं संकलित हैं परंतु पहली ही कविता से कवयित्री पाठक हृदय को बाँध लेती है। इस कविता ’मदारी आया खेल दिखाने’ भ्रष्ट राजनीति, नव साम्राज्यवादी ताकतों में पिसती आमजनता की पीड़़ा संघर्ष और अंध स्वामी भक्ति कुछ इस प्रकार उजागर होती हैं –
’’ राजा साहब चाहते है कि तुम नाचो इसके लिए तुम्हें मुफ्त में घुंघरू मिलेंगे
और फिर यह तुम्हारी सेहत के लिए भी बहुत अच्छा है-
क्या तुम अपने राजा के लिए नाचोगे?
 बंदर ने यंत्रवत सर हिलाया और खुशी-खुशी नाचने लगा
बंदरिया को भी मना लिया’’
ये पंक्तियाँ स्वार्थी विचारधारा, अवसरवादी राजनीति पर कटाक्ष के साथ कई प्रश्न लिए लेखिका पाठक को एक बड़े चिंतन की ओर धकेलती है जहाँ भ्रष्ट राजनीति द्वारा जनता को बहलाया-फुसलाया जाता है और उसकी पीड़ा को किनारे किया जाता है। ‘बारिश में’ कविता बरसात के आगमन पर एक गरीब की चिंता को कुछ इस प्रकार रेखांकित करती है कि-
’’सावन के गीत प्रभावित नहीं करते उसे
पांचवे माले की बालकनी में बैठे, चाय की चुस्कियों के साथ
फुहारों का आनंद, उसके भाग्य में नहीं
उसे बांधनी है, एक बड़ी सी पाॅलीथिन अपनी झोपड़ी के टूटे-फूटे छप्पर पर’’
’नमक की कमी’, जगनिर्माता और ’नमन कर्मवीर’ आदि कविताओं के माध्यम से हमारे देश के किसानों, सफाईकर्मी, समाजसेवी, मजदूर, सहायकों की कर्मठता को नमन कर उनके महत्व को दर्शाया है।
’’नमन, हर उस कर्मवीर को जिसने इस दुनिया को इतना सुन्दर बनाया’’
कवयित्री ने हर वर्ग की स्त्री के विभिन्न रूप, परिस्थिति और मनोभावों का वर्णन किया है घर के कामों में उलझी वह कहती है –
 ’’वो तह कर रही थी कपड़ों के साथ भविष्य के कई विचार
बरतनों के साथ मांज आई थी, मन के हर कोने को
थोडी सी पीर बांची थी, किताबों के पन्ने पलटते हुए
झाडू के साथ बुहार दिए थे, अनगिनत रंगीन सपने
जो देख लिए थे गलती से,
जानते हुए भी कि यह अधिकार नहीं उसका………..
        स्त्री सृष्टि में सृजक के रूप में जानी जाती है। वह प्रकृति के अमूल्य वरदान से माँ बन संसार को सजाती है। वह भावुक होती है ’स्त्री लिखती है मन’ कविता में कवयित्री ने स्त्री मन की सहजता, उसकी मन शक्ति और उमंग को प्रदर्शित किया है –
 ’’ जब वो ’प्रकृति’ लिखती है
तो तितली के परों पर सवार हो नाप आती है, सारा जंगल
फूलों के सारे रंग चुरालाती है, अपनी ओढ़नी रंगने के लिए
मोर के साथ नाचकर आती है, झरने के संग झूम कर जीवन के सब राग गा लेती है।’’
इस कविता में लेखिका स्त्री मन की ग्रंथियों के रसों को समेटे कहती है कि-
’’उसे कुछ कहना है कुछ ऐेसा, जो उसका मन कहता है’
डॉ. अन्नपूर्णा सिसोदिया की कविताओं में हमारे समाज में स्त्री की वास्तविक स्थिति से साक्षात्कार होता है। एक ओर जहाँ स्त्री सशक्तीकरण की अनेक योजनाएँ चलाई जा रही है, वही दूसरी ओर कुंठित मानसिकता उसे वासना का शिकार बना रही है। गर्भ में ही उसे मार रहे हैं ‘गर्भ में आत्महत्या’ कविता इसी व्यथा को प्रकट करती है।
इस संग्रह की अधिकांश कविताएँ नारी हृदय के भावों को उद्घाटित करती हैं। एक स्त्री को निभाने होते हैं कई रिश्ते जो उसने अपनी ममता, प्रेम और समर्पण से बनाए। यही नारी की सबसे बड़ी ताकत भी है और उसकी कमजोरी भी वह हमेशा स्वयं को बांधे रहती है और मुक्त नहीं हो पाती इसलिए वह कहती है-
’’लेकिन कोई औरत नहीं छोड़ पाती आधी रात को
गहन निद्रा में लीन अपने पति और बच्चे को
वह नही लांघ पाती उस देहरी को,
जो उसके स्नेह के रंगो से बनी रंगोली से सजी है
विरक्ति के महान भाव को धारण करने योग्य नहीं शायद उसका हृदय’’
स्त्री प्रधान कविताओं में कवयित्री की लेखनी अत्यंत मार्मिकता और सहजता के साथ उभरी है ये कविताएँ एक नई ऊर्जा के साथ स्त्रियों को प्रेरित करती हुए दिखाई देती है।
अन्नपूर्णा जी अपने इस संग्रह में व्यापक स्तर पर अपने पाठकों का ध्यान विविध क्षेत्रोंकी ओर आकर्षित किया है प्रेम और प्रकृति उनकी कविताओं में अपने सुंदरतम स्वरूप में विद्यमान हैं। वह ‘धन्यवाद’ कविता में प्रकृति के समर्पण भाव को दिखाते हुए लिखती हैं कि प्रकृति हमें बहुत कुछ देती है अन्न, फल, फूल, ताजी हवा, शुद्ध जल, जीवन में हर पल प्रकृति अपने रंग बिखेरती है –
’’ हर रंग, जीवन उल्लास लिए बस देना,
बदले में कुछ न लेना प्रकृति की सुंदर रीत यही है
गेहूँ की हर बाली से गुंजित जीवन का संगीत यही है।’
इसी प्रकार अपनी कविता ’दमक उठे पर्ण’,’ चिड़िया तुम आ जाओ’,’मैं गुलमोहर हूँ ‘ आदि कविताओं में प्रकृति के सुंदर स्वरूप के साथ उसके दोहन पर चिंता भी व्यक्त की गई है। प्रतियोगिता के इस युग माता-पिता की अपने बच्चों से बढ़ती अपेक्षाएँ बच्चों के सम्पूर्ण विकास मे एक बड़ी बाधा है। इसी भाव को ’बच्चे अब खेल नही रहे’ कविता में उद्घाटित किया गया है –
’’मैदानों मे अब शोर नहीं गूँजता, सन्नाटा पसरा है वहाँ
सारे गेंदे आसमान ने लील ली है। या उस भारी बस्ते ने
जिससे झुकी है बचपन में ही उनकी कमर।’
समाज में बढ़ती असंवेदनशीलता पर व्यंग्य करती इस कविता में कवयित्री कहती हैं –
’’सेलेक्टिव संवेदनओं के दौर में
आदिम सभ्यताओं की गुफाओं से
कुछ हाथ निकल आये है।
क्रूर और खुरदुरे से अदृश्य और बेलगाम ये हाथ’’
कवयित्री डॉ.अन्नपूर्णा सिसोदिया ने इस काव्य संग्रह में विविध विषयों को समेटते हुए अपने विचार रखे। यह पुस्तक वास्तव में स्त्री मन की परतों को खोलती, पाठक हृदय को उद्वेलित करने में पूर्णतः सक्षम है।
काव्य संग्रह – औरत बुद्ध नहीं होती : डॉ. अन्नपूर्णा सिसोदिया 
प्रकाशन –  दिव्य प्रकाशन, मुंबई                                                       
 पृष्ठ संख्या – 150
मूल्य – 200 रु. 
डॉ.योग्यता भार्गव (विभागाध्यक्ष हिन्दी) शा.नेहरू स्नात्तोकतर महाविद्यालय, अशोकनगर (म.प्र.) 473331 संपर्क - yogyatabhargava@gmail.com

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