‘औरत बुद्ध नहीं हो पाती
क्योंकि वह जब माँ होती है तो कुछ और नहीं होती,
बनी रहती है जीवन पर्यंत , सांसारिक मोह माया से घिरी बस एक औरत….
साहित्य समाज का दर्पण होता है। कुछ इस प्रकार का भाव ’औरत बुद्ध नहीं होती’ अन्नपूर्णा सिसोदिया के काव्य संकलन को पढ़कर लगा। लेखिका की प्रत्येक कविता जहाँ एक ओर समाज की वर्तमान स्थिति को उजागर करती है वही निरन्तर परिवर्तित समय और विषयों की ओर पाठक का ध्यान खींचती है।
अपनी कविताओं में कभी कवयित्री औरत की दयनीय स्थिति और संघर्षशील को दर्शाती है तो कहीं उसे शक्ति रूप में हमारे सामने लाकर खड़ा कर देती है। कभी वर्तमान में बच्चों के भविष्य को लेकर चिन्तित दिखती है तो कभी श्रमिकों की दुरावास्था और दलों, संगठनों द्वारा एक आम आदमी को कैसे इस्तेमाल किया जा रहा है उनकी स्थिति को बयां करती है। वे कभी नारी, कभी शिक्षिका, तो कभी एक विचारक के रूप में अपनी काव्यात्मकता को सरल शब्दों में पाठकों के सामने रखती विशेष चिंतक प्रतीत होती है।

