Thursday, March 5, 2026
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प्रताप नारायण सिंह की कलम से – मृत्यु कलिका : पाठकीय अभिमत

पुस्तक – मृत्यु कलिका (सॉनेट संग्रह)
सॉनेटियर – अनिमा दास
प्रकाशक – प्रलेक प्रकाशन, मुम्बई
पृष्ठ संख्या – 114
मूल्य – ₹225/-
काव्य संग्रह “मृत्यु कलिका” का शीर्षक ही स्वयं में विलक्षण है और साथ ही सर्जक की कल्पनाशीलता और विचारशीलता का द्योतक भी| मृत्यु से अब तक भयावहता, रात्रि या कालिका जैसे शब्द और भाव ही सम्बद्ध रहे हैं , किन्तु सृजनकर्ता ने अपने इस काव्य संग्रह में मृत्यु को एक कलिका के रूप में बिम्बित करके इसके एक नवीन आयाम को न मात्र प्रतिपादित करने अपितु आभाषित करवाने का भी प्रयास किया है| 
इस काव्य संग्रह की रचयिता श्रीमती अनिमादास जी हिन्दी की एक अनन्य सॉनेट लेखिका हैं| उनकी सेवा हेतु उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है| हिन्दी सॉनेट लेखकों में जो स्थान उन्हें प्राप्त है और जिस स्तर का सृजन वे करती हैं वह अन्यत्र अप्राप्य है| उनका  पिछ्ला संग्रह “शिशिर के शतदल” एक उत्कृष्ट सृजन था और साथ ही सॉनेट-जगत में अत्यंत  चर्चित  भी रहा| 
काव्य संग्रह “मृत्यु कलिका” एक सामान्य सॉनेट संग्रह नहीं है, यह लेखिका की वर्षों की तपश्चर्या, अनुभव, गहन चिंतन और सूक्ष्म अवलोकन का उद्भास है| यह मानव के अंतर्जगत में सतत संवाहित भावनाओं और संवेदनाओं के वैविध्य को प्रकाशित करने वाला एक ज्योति पुंज है और साथ ही एक अद्भुत शब्द-सागर भी| 
यह संग्रह दो भागों में विभाजित है, प्रथम भाग है “प्रेम – पर्व” जिसमें  प्रकृति और जीवन सौन्दर्य का प्रकटीकरण हुआ है| इसमें  “मोहन – प्रिया”, “नर्तकी”, “वर्षा”,  “उक्त-अनुक्त”, “मदन-लेखा”, मृगनयनी, “शिशिर”, “ऋतु प्रियतमा”, “पर्वतों की तंद्रा”, “रंग्मल्ली”, “अनाहूत”, “तपस्विनी”, “प्रेयसी”, “प्रतीक्षा”, “प्रेम पर्व” इत्यादि रचनाएं सम्मिलित हैं, जिनके माध्यम से लेखिका प्रकृति और अपने अलौकिक आराध्य या अभीष्ट से संवाद करती हैं| इन कविताओं का कलेवर सौन्दर्य और प्रणय से निर्मित है| यथा – 
घन अलकों में कर आबद्ध सहस्र प्रहेलिका
स्वर्णजल की कुमुदिनी,हे!स्वप्नमग्न प्रेमिका
आओवृष्टि संग..बजे हृद-मृदंग,उठे मन में तीव्र तरंग
विश्वास की भूमि होमरु सम….झर-झर झरे रसरंग।
सौन्दर्य और प्रणय के भावों को प्रबलता से उद्भासित करने हेतु लेखिका ने अनेक स्थलों पर संबोधनों और आह्वान को माध्यम बनाया है जो काव्य सौन्दर्य में चार चाँद लगा देता है – 
आ !! मेघ वाहिनी..आ !! मधुर शिंजन.. की निर्झरिणी 
अंग-अंग कुमकुमित नृत रंग,सखी! तुम ही हो चित्रिणी
ऐ..भामिनी !अतृप्ति की रागिनी ! पबाँध नूपुर
लिए अश्रुझर..क्यों संगीतमयी शर्वरी हो रही आतुर
ऐ.. कामिनी ! तुम्हारे ताल में हैप्रत्यारोप का स्वर 
बह रहा चिबुक पर झर , असहाय सा प्रतीत अध्वर।
लेखिका जो संवाद अपने आराध्य या अभीष्ट से करती हैं वास्तव में उसी रूप में उनका काव्य पाठक-हृदय से संवाद करता है और कथ्य को अत्यंत प्रबल और आकर्षक बना देता है|-
द्वार से द्वारिका पर्यंत है कृष्णछाया, हाँ ! क्यों कहो न ?
ऐ ! लास्य-लतिका, ऐ ! मानिनी मदना, शून्य में बहो न!
प्रथम भाग की रचनाओं में प्रमुखता सौन्दर्य और प्रेम की है, तद्यपि पीड़ा की एक अदृश्य चादर का आभास होता है- 
इस प्रेम पर्व की मूर्च्छना में हो रही आर्द्र..इरा प्रणयिनी
लज्जानत मैं भी माधवी लता सी.. कृष्ण-मनमोहिनी।
संग्रह का दूसरा भाग “पीड़ा पर्व” है और इस पर्व का पहले सॉनेट ही पीड़ा अनेक रूपों में व्यक्त होती दिखाई देती है- 
प्रबल पीड़ा का प्रलाप है,  अमर्त्य का यह असह्य विलाप है 
जीवन लाक्षा गृह सा ऐ स्वार्थी! अक्षर अंत का शेष संलाप है
क्षत का क्षितिज है विस्तृत…है मृग..माया का ही  अधिकृत 
आज तपोवन में है गहन तमस.. स्निग्ध ज्योति हुई परावृत्त।
वेदना सदा से ही मानव का मेरुदंड रहा है और कदाचित इसी कारण आदिकाल से ही मनुष्य वेदना को भी सजाता और संवारता रहा है, शब्दों में पिरोता और गाता रहा है| किसी ने कहा –“आह से उपजा होगा गान” तो किसी ने लिखा – पीड़ा में आनंद जिसे हो आये मेरी मधुशाला| किन्तु अनिमा दास जी की पीड़ा से मृत्यु कलिका उन्मेषित होती है- 
प्रिय!अनुरोध..अनुरक्ति से ऊर्ध्व है अन्य एक आख्यायिका 
मेरे अव्यक्त शब्दों में ढूँढ़ लेना,भविष्य की रूपसी नायिका ।
मृत्यु कलिका न मात्र उन्मेषित होती है, वह पल्लवित भी होती है और विस्तार भी पाती है – 
नहीं हत्या कर पाओगे तुम पुरातन पीड़ा की, महात्याग से
संन्यासी बनना यदि सहज होता तो तुम होते विश्वामित्र 
लांघते अस्थियों के अंतर्नाद को..देह का वह वासित चित्र
वास्तव में,..निर्वाण प्राप्ति है कठिन इस अबाध्य पूर्वराग से।
कलिका पुष्ट होती जाती है…वह महकती है, उपवन बनती है, नृत्य करती है और उत्सव मनाती है – 
उत्सव मृत्यु का है… उत्साह है देह-दाह का
रम्य लगता है यह क्षण..है चतुर्दिक सुगंधित
घृत में काष्ठ..काष्ठ में अग्नि..अग्नि में काया 
है शून्यमंडल अद्य वाष्पित-व्यथा से पूर्ण पूरित।
श्रीमती अनिमा दास जी के अभिव्यक्ति का अपना एक अनूठा और बिलकुल अछूता ढंग है| वे शब्दों को इस तरह से बुनती है कि मानस पटल पर एक रंगपूर्ण दृश्य उभर आता है| उदाहरणार्थ  – 
शकुंतला की विरह वाटिका में अब होते हैं कंटक
स्वर्गपथ की अग्नि में दग्ध होती…दुष्यंत की निशा 
कहाँ रही अब मधुक्षरा की सुगंध में प्रेम की गमक!
प्रतिश्रुति का वह क्षण… अब है वृंतरहित..पुष्प सा ।
यहाँ सादृश्यविधान के माध्यम से उन्होंने एक चित्र खींच दिया है| शब्दों का कसाव अर्थ को अधिक प्रखरता से उभारता है|
लेखिका की शब्द साधना अभूतपूर्व है| यही कारण है कि उनके पास सटीक की कभी कमी नहीं रहती| उनका काव्य संग्रह एक शब्द-सागर भी होता है जिसमें शब्दों के विविध माणिक प्राप्त होते हैं| उनके विशेषण सदैव चम्त्क्रिक करते हैं| यथा – देह दीर्घिका , प्रथित आकाश| 
अनिमा जी की रचनाओं में अनुप्रास की छटा सदैव देखी जा सकती है- 
प्रथम प्रणय के प्रलंबन मेंप्रेयसी प्रतिमा की
मधुर मृदु मोह में प्रतीक्षा की प्रतिछाया है प्रतिबिम्बित 
संग्रह के सभी सॉनेट अद्भुत भाव संयोजन और काव्य सौष्ठव से अभिसिक्त हैं| इन्हें पढ़ना एक सुखद यात्रा पर जाने जैसा है| निश्चित रूप से यह संग्रह हिन्दी साहित्य की एक अमूल्य निधि है|
प्रताप नारायण सिंह
कवि, लेखक व उपन्यासकार
गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश
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