रमेश कुमार 'रिपु' की कलम से 'लिफाफे में कविता' की समीक्षा - कवि सम्मेलन की दुनिया का सच 3
समीक्षक – रमेश कुमार ‘रिपु’
कवि सम्मेलन की दुनिया में कैसे कैसे तिकड़म होते हैं जानना है,तो अरविंद तिवारी का ‘लिफाफे में कविता’ पढें। काल्पिनिक पात्रों के जरिये कवि सम्मेलन की तल्ख सच्चाई का एक्सरे किया गया है। कवि सम्मेलन को अपना कॅरियर बनाने वाले कवि और कवियित्रयाँ  नैतिकता की दीवार गिरा चुकी कौन सी वाली हैं। मंचो पर पढ़ी जाने वाली अश्लील कवितायें और चुटकुले ने साहित्य का मेयार गिरा दिया है। लेकिन ऐसे ही लोग ही मंचीय कवि कहे जाते हैं। कवि सम्मेलन के ठेकेदारों ने ऐसे कई कवि पैदा कर दिये हैं,जो कविता का क ख ग भी नहीं जानते।
पन्नाराम के बेटे की पांँच पंडितों ने जन्म कुंडली बनाई। परसादी लाल जन्म कुंडली से नाम निकलने पर किसी ने भी पसंद नहीं किया। पंडितों ने हिदायत दी, कि नाम बदले तो बालक की तरक्की रूक जायेगी। उपन्यास का नायक परसादी लाल जोड़-तोड़ कर मंच का चर्चित कवि बन जाता है। और राज्य अकादमी का अध्यक्ष भी। कवि परसादी लाल का ज्वलंत जगतपुरिया बनना और फिर राज्य अकादमी का अध्यक्ष बनने की गाथा में कई मजेदार मोड़ हैं। तिकड़मों से दूर और सादगी पंसद ज्वलंत पद पाने के बाद खुद भी तिकड़मी और अय्यास हो जाते हैं। कई कवियित्रियों से अतरंग रिश्ते बना लेते हैं। एक साधारण कवि का अर्श पर पहुंचने के बाद उसका किस तरह आचरण गिरता है,उसे जगतपुरिया के जरिये दिखाया गया है। साहित्य जगत की गंदी राजनीति से सामना कराती है यह किताब है। सुरा सुन्दरी आज के कवि सम्मेलन के प्रेरणा स्त्रोत हैं। कोई भी अदना सा कवि या तो बड़े कवि को शराब पहुंँचाने का काम करके कवि सम्मेलन में जाने का मौका पा सकता है।
परसादी लाल एक कवि सम्मेलन के बाद ज्वलंत जगतपुरिया हो जाते हैं। अंगद ज्वलंत जगतपुरिया को कवि बनाने में सफल हो जाते है। लोमड़ कवि ने परसादी को अखिल भारतीय कवि बनाने की जिस तरह जुगत की,ऐसा आज कल बहुत कम देखने को मिलता है। वैसे लोमड़ कवि बेहद धूर्त हैं। आगे चलकर लोमड़ और जगतपुरिया में ठन जाती लोमड़ को पछाड़ कर ज्वलंत जगतपुरिया सबसे व्यस्ततम कवि हो जाते हैं।
प्रेमचंद ने कहा था,साहित्य राजनीति के आगे-आगे मशाल लेकर चलता है। लेकिन आजकल साहित्यकार नेताओं के पीछे-पीछे चलते हैं। वहीं ज्वलंत जगतपुरिया पुरस्कार देने में लेखकों से कमीशन लेना और अपने प्रतिद्वंदियों को पटकनी देने में उनके नायब तरीके हैं, जो आजकल के मंचीय कवि करते हैं। उपन्यास में खलनायक न हो तो कहानी आगे नहीं बढ़ती। ज्वलंत जगतपुरिया फिल्मी गीतकार निर्निमेष के जरिये स्थापित हो जाते हैं। उनकी बेटी आभा उनसे जबरन अतरंग रिश्ते बना लेती है। लेकिन वो उससे शादी नहीं करना चाहते। फिर भी हो जाती है।
ज्वलंत अपने ससुर निर्निमेष को नीचा दिखाने एक कवि सम्मेलन भोपाल में कराते है। खार खाये निर्निमेष काॅल गर्ल माधुरी के जरिये उन पर रेप का मामला दर्ज करा देते है । ज्वलंतपुरिया अर्श से फर्श पर आ जाते हैं। उनका आगरा वाला घर उनके हाथ से निकल जाता है। आभा को देना पड़ता है। जहांँ से उनकी कवि बनने की यात्रा शुरू हुई थी, अपने लोमड़ मित्र के साथ चाय पीते पुराने दिनों की बातों में खो जाते हैं।
इस उपन्यास में कुल इक्कीस अध्याय है। हर अध्याय में कवि सम्मेलन में शिरकत के लिए कवियों की मक्कारी और तिकड़म की कथा है। सिटी मजिस्ट्रेट को भी कवि उल्लू बनाने से नही छोड़ते। बाद में उनके सिर से कविता का भूत उतर जाता है।
इस उपन्यास की कथा में कुछ बातें कोट करने वाली है। मसलन, छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस और इटारसी स्टेशन न होता तो कवि सम्मेलन न होता। जो कवि मंच पर पहले चुटकुला पढ़ दे,चुटकुला उसी के नाम पर दर्ज हो जाता है। अंगद ने अखिल भारतीय कवि होने का नुस्खा ज्वंलत जगतपुरिया को बताया। बिना पिटे कोई अखिल भारतीय कवि नहीं बनता। हम भी पिटे हैं। पीने के बाद अमरूद खाना अनिवार्य है। क्यों कि इससे शराब की बू नहीं आती। जिसे कवि खुशबू कहते हैं। मेहनत से लाई दारू क्रिकेट की बाॅल की तरह होती है। जिसे घायल होकर भी मंच का कवि नहीं छोड़ता।
लेखक – अरविंद तिवारी
प्रकाशक – प्रतिभा प्रतिष्ठान
कीमत- 400 रूपए

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