Sunday, April 19, 2026
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सूर्यनाथ सिंह की कलम से – प्रकाश मनु की कविताएँ : संभावनाओं से सजा संसार

मैंने किताबों से घर बनाया है : प्रकाश मनु; प्रकाशक : संधीस पब्लिकेशन प्रा. लि., प्लॉट नं.-1, फ्लैट नं.- एस-2, सेकेंड फ्लोर, एमएस रोड, डीएलएफ, अंकुर विहार, लोनी, गाजियाबाद; संस्करण : 2024; पृष्ठ : 184; मूल्य : 500 रुपए।
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कोई रचनाकार आखिर क्यों कुछ रचता है। वह आखिर रचना से क्या चाहता है? जवाब कई हो सकते हैं, पर मक़सद सबका एक ही होता है। हर रचनाकार अपने रंग-रेखाओं, स्वरों, लकड़ी-पत्थर, शब्दों से मनुष्य ही रचने का प्रयास करता है। एक बेहतर मनुष्य; बाउल संत ने जिसे ‘मोनेर मानुष’ कहा था। हर रचनाकार अपने भीतर बसे मनुष्य को ही तो रचना-पाना चाहता है। मनुष्य की एक ऐसी दुनिया रचना चाहता है, जहाँ किसी तरह का झगड़ा न हो। किसी तरह का विवाद, संघर्ष, मारकाट न हो। एक समरस, सुंदर, सुखकर दुनिया। इस तरह हर रचनाकार अपने को भी रच रहा होता है। अपने लिए एक अलग, अपनी मनचाही दुनिया रच रहा होता है।
प्रकाश मनु ने भी अपनी रचनाओं से अपने लिए एक दुनिया रची है। हालाँकि कोई भी दुनिया दरअसल एक नहीं होती, एक की नहीं होती है। उसमें दूसरों की अपनी दुनिया भी किसी न किसी रूप में प्रवेश कर ही जाती हैं, हर किसी की दुनिया दूसरों की दुनिया में प्रवेश पा ही लेती है। इस तरह हर दुनिया की एक साझा दुनिया भी बनती है। प्रकाश मनु की दुनिया भी अनेक दुनियाओं से जा मिलती है, अपने भीतर अनेक लोगों की दुनियाओं को आने का निमंत्रण देती है। प्रकाश मनु उसे घर कहते हैं- मैंने किताबों से घर बनाया है।
घर भी एक संसार ही तो होता है। वह केवल ईंट-गारे, लोहा-लक्कड़, पत्थर-पानी से नहीं बनता। वह तो उसका भौतिक रूप है। दरअसल, घर एक वैचारिक जगह है। हर घर उसमें रहने वाले लोगों के विचारों से बनता है। इसलिए प्रकाश मनु का किताबों से बनाया घर एक वैचारिक दुनिया है। यह किताबों से बना घर है, किताबी घर या किताबघर नहीं है। किताबों से बनी इस दुनिया में कौन आ-जा सकता है, उसके नियम-कायदे भी हैं-
जो घर बनाया है मैंने किताबों से
उसका आसमान जरा अलग है
उसके नियम-कायदे थोड़े अलग
अगर आप जरा घमंडी हैं अफ़लातून
तो दोनों हाथ बढ़ाकर दाखिल होने
से रोक देंगी किताबें
दरवाज़े पर लग जाएगी अर्गला
मगर ग़रीब रफ़ूगर या आत्मा का दरवेश कोई नजर आए
तो उसे प्यार और आँसुओं से नहलाकर
दिल के आसन पर बैठाती हैं किताबें।
(शीर्षक कविता)
आज जब विचारों की दुनिया उजड़ती, बियाबान होती नज़र आती है, उसे तहस-नहस कर डालने के सुनियोजित प्रयास हो रहे हैं, विचारों के घर लगातार ढहते देखे जा रहे हैं, ऐसे में अगर प्रकाश मनु के यहाँ विचारों के ऐसे चमकते, मजबूत, हवादार घर दिखते हैं, तो निस्संदेह भरोसा बनता है कि दुनिया अभी इतनी बदरंग, बेजान और बेतुकी नहीं हुई है। प्रकाश मनु का मिज़ाज विद्रोही रचनाकार का है। प्रतिकार के साहस से लबरेज़ रचनाकार का है। जहाँ भी उन्हें व्यवस्था के उगाए झाड़-झंखाड़, अवरोधक के रूप में रखे भारी पत्थर, जगह-जगह खड़ी कर दी गई दीवारें नज़र आती हैं, वे उन्हें हटाने, तोड़ने की पुरज़ोर कोशिश करते देखे जाते हैं। जब तक ज़मीन समतल नहीं होगी, मजबूत घर कैसे बन सकता है, कैसे कोई समरस दुनिया बसाई जा सकती है?
हालाँकि उनके प्रतिकार में रक्तपात नहीं है। वहाँ हथियार, विचार ही हैं। विचार सबसे बड़े हथियार होते हैं, इस बात पर प्रकाश मनु का विश्वास दृढ़ है। युद्ध और रक्तपात तो कमजोर शहंशाहों की युक्तियाँ हैं। भय भरने, वर्चस्व हासिल करने के लिए। कोई रचनाकार हथियार उठा ही नहीं सकता। जो रचता है, रचना चाहता है, रचना जानता है, वह रक्तापात कर ही नहीं सकता। उसकी लड़ाई तो विचारों से ही हो सकती है। रचना ही उसका सबसे बड़ा युद्ध है। इसलिए प्रकाश मनु का रचा घर, उनकी किताबों की दुनिया, एक सुंदर, कोमल, समरस दुनिया है। मगर वह पिलपिली और निष्प्राण दुनिया नहीं है। उस दुनिया में, उस घर में रहने वाले, उस घर में आने-जाने, उठने-बैठने वाले लोग घोंघे की तरह अपनी खोल में घुसकर सुरक्षित महसूस करने वाले लोग नहीं हैं। वे अत्याचार, अनाचार के ख़िलाफ़ खड्गहस्त भी हैं।
यह घर नहीं है किसी
लड़ाई में शामिल
इसने नहीं बहाया रक्त…
नहीं किया पददलित किसी को।
….
इसने नहीं लिखा इतिहास,
बनाया तो कतई नहीं
कतई नहीं किया रक्तपात
किसी सत्ता-संघर्ष में…
मगर क्या सचमुच?
अलबत्ता
जब-जब इसके धीरज की सीमा टूटी है
और जुल्मी के पैर गए हैं
खड़िया घेरे के बाहर…
तब-तब कुछ हुआ है!
(यह घर)
गांधी ने दुनिया को प्रतिकार का एक नया तरीक़ा सिखाया था- सविनय अवज्ञा। बिना आवाज ऊँची किए, बिना कोई तोड़-फोड़, बम धमाका, बिना रक्तपात किए विरोध करने का तरीक़ा। बसी-बसाई सुंदर दुनिया को बिना कोई नुकसान पहुँचाए, उसकी दीवारों, दरवाजों-खिड़कियों के कांच पर बिना पत्थर का कोई निशान छोड़े, प्रतिरोध की ताकत का अहसास दिलाने का। वह तरीक़ा हजारों-हजार सशस्त्र क्रांतियों पर भारी पड़ा। बार-बार भारी पड़ता देखा गया है। प्रकाश मनु के प्रतिरोध का तरीक़ा भी वही है।
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मगर ऐसा नहीं कि प्रकाश मनु के यहाँ केवल प्रतिरोध है। जो कुछ सुंदर है, उसे सहेजने, सुरक्षित रखने, सजा-सँवारकर रखने, उसे सींचते-हरियाते रहने का जतन अधिक है। बदरंग होती चीज़ों को थोड़ा पोंछ-मांज कर सुदंर बनाने की कोशिश है। उनकी संवेदना उन मलिन, जीवन-जीने के लिए संघर्ष करते, सत्ता-प्रतिष्ठानों की साज़िशों से दो-चार होते लोगों के प्रति अधिक है। आख़िर ऐसे ही लोगों ने इस दुनिया को सुंदर बनाया है, वही इस सुंदर दुनिया को बचाकर रखने को तत्पर हैं। इसलिए प्रकाश मनु को सड़कों पर खटते, वहीं चूल्हे पर रोटियाँ सेंकते, खटते-खटते सड़क किनारे ही सो गए, फिर उठकर काम में जुट गए लोगों का संघर्ष ज़्यादा अपना लगता है।
दरअसल, संघर्ष उन्हें ही करना पड़ता है, जो इस दुनिया को बनाते हैं, इस दुनिया को सुंदर-सुरक्षित बनाए रखने के लिए खटते हैं। जो कुछ रच रहा होता है, संघर्ष उसी को करना पड़ता है। वही संघर्ष दरअसल, मूल्यवान है। बाकी, सत्ता और वर्चस्व के लिए संघर्ष करने वाले तो केवल रची हुई, बसी-बसाई, सजा-सँवारकर रखी गई दुनिया पर आधिपत्य जमाने के लिए करते हैं। वहाँ चालबाज़ियाँ हैं, तिकड़म, धोखे, छल-छद्म, बेईमानियां, मक्कारियां, रक्तपात के मंसूबे ही हैं। हर रचने वाले का मूल संघर्ष इन विध्वंसक ताकतों से है- चाहे वह गैंती-फावड़ा, करनी-साहुल, छेनी-हथौड़ी से रच-बना रहा हो या कलम, कूँची, कैमरे से। उस संघर्ष में रचने का सौंदर्य है-
पहली बार खचाखच भरे
रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म
पर देखी है
सीता की रसोई
खड़िया के एक गोल घेरे के भीतर…..
चारों ओर की भीड़
और संकरी निगाहों से बेपरवाह
एक काली सी गठीली औरत
(जिसका चमकता था माथा तेज आँच की लपटों में।)
जुटी थी अपने काम में
इस कदर विश्वास से कि…
चारों ओर का गोल लक्ष्मण-घेरा
फटकने न देगा
किसी दुष्ट राक्षस को उसके पास।
(सीता की रसोई)
इस छटा की कविताएँ हिंदी में नहीं हैं। मजदूर परिवार की गृहस्थिन की रसोई को सीता की रसोई कहना पूरे विमर्श को बदल देने का प्रयास है। कहाँ सीता जैसी कुलीन स्त्री, कहाँ एक मजदूर स्त्री। मगर श्रमशील समाज में पहुँचकर मिथकीय चेतनाएँ ऐसे ही लोकराग में पग जाती हैं। इंडोनेशिया की एक रामलीला में राम और सीता को सामान्य कृषक की तरह खेत में खटते दिखाया गया है। सीता आखिर लोक की ही तो मिथक हैं, हल चलाते समय खेत से प्रकट हुई, उन्हें आज रेलवे स्टेशन पर इस रूप में देखना सीता को नए रूप में गढ़ना है। ‘सबाल्टर्न’ चेतना इसी तरह मिथकीय चरित्रों को नए रूप में गढ़ती-बनाती है।
प्रकाश मनु भी इसी तरह कई प्रचलित मिथकों को अपने समकाल की स्थितियों में ढाल देते हैं। राम और सीता, लोक के सबसे सहज और अपने मिथक हैं। लोक के राम और सीता, शास्त्र के राम और सीता से बिल्कुल भिन्न हैं। उनकी एक छवि प्रकाश मनु के यहाँ बिल्कुल भिन्न रूप में उतरती है। ये राम और सीता हमारे ज़्यादा करीब महसूस होते हैं। ये राम और सीता ‘सबाल्टर्न’ हैं। हाशिए के लोगों में जगह बना कर घुस गए चरित्र।
पड़े थे राम भूमि पर
निद्रालीन…
सोई थीं बगल में सीता कृशकाय।
एक चादर मैली सी
जिस पर दोनों सिकुड़े से पड़े थे
इस प्रतिज्ञा में मानो कि
कम से कम जमीन वे घेरेंगे,
एक सिरे पर राम दूसरे पर सीता,
बीच में संयम की लंबी पगडंडी…
पास में एक परात एल्यूमिनियम की
एक पतीला बहुत छोटा
एक करछुल एक लोटा
फावड़ा… गेंती…
एक छोटा ट्रांजिस्टर भी !
और हाँ, सोती हुई सीता की
कलाई पर चमक रही थी
एक बड़ी सी मर्दाना घड़ी,
जरूर राम की होगी।
यों बहुत सुख था ढेर-ढेर सा सुख
जो शहर में साथ-साथ
मजूरी करते-खटते उन्होंने पाया था
और जो उनके साँवले चेहरों पर
दियों की-सी जोत बनकर झलकता था।
शहर फ़रीदाबाद का यह स्टेशन
नहीं-नहीं स्टेशन का यह सर्वथा उपेक्षित, धूलभरा प्लेटफार्म नंबर चार,
लेटे थे जहाँ राम और सीता
दिन भर के श्रम के बाद बेसुध निद्रालीन…
अयोध्या के राजभवनों का-सा
आलोकित नज़र आता था!
(राम-सीता)
वाल्मीकि के शास्त्रीय राम और सीता को तो तुलसी ने ही लोक में ढाल दिया था। प्रकाश मनु ने उन्हें राजभवन से उतारकर श्रमशील समाज के बीच बिठा दिया। फ़रीदाबाद के टुटहे, धूलभरे प्लेटफ़ार्म पर विश्राम की अवस्था में लिटा दिया। थकन से भरे, बेसुध नींद में पड़े मजदूर के रूप में। आस्था का यह बिल्कुल नया सौंदर्य है। आस्थाएँ अपने ईश्वर को अपने जैसा ही गढ़-बना लेती हैं। उनके अर्थ तभी खुलते हैं, जब उन्हें उसी संदर्भ में देखने का प्रयास हो। प्रकाश मनु ने आस्था के सर्वहारा सौंदर्य को बहुत बारीकी से देखा, समझा और चित्रित किया है। प्रकाश मनु की बनाई दुनिया, उनके बनाए घर में ऐसी छवियाँ अनेक हैं। उनकी सौंदर्य चेतना, देखने के प्रचलित ढंग-ढर्रे को बदल देती है।
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प्रकाश मनु की सौंदर्य-चेतना बहुत विस्तृत है। उसमें बारिश का आनंद है, जाड़े की धूप है, हरे हो रहे पेड़ हैं, फूलों की घाटी में खेलते बच्चे हैं, बनारस की गंगालहरी है, बारिश की हवा में झूमते पेड़, बूढ़े मल्लाह के गीत, मोगरे के फूल, नन्हें-नन्हें उगते पौधे हैं, खिलखिलाती नदियाँ, उमगते पहाड़ हैं। उनके यहाँ दुनिया बहुत सुंदर है। दुनिया को बदरंग करने की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रकाश मनु की दुनिया बहुत सुंदर है। संभावनाओं से भरी दुनिया। संभावनाएँ तो बनी ही रहनी चाहिए। विध्वंस के बीच भी संभावनाएँ सिर उठा, उग ही आती हैं; दूब की तरह। संभावनाओं का समाप्त हो जाना तो दुनिया के ख़त्म हो जाने, जीवन के ही सूख जाने के भय से भर देता है। इसलिए प्रकाश मनु में जीवन के प्रति अगाध आस्था है। इसीलिए तो वे मृत्यु को भी अस्वीकार करते हैं- ‘अभी मैं नहीं मरूँगा/ अभी करने हैं बहुत काम।’
उनके कामों की फ़ेहरिस्त में जीवन की उमंग है। इस सुंदर दुनिया को भर-भर आँख देख लेने, महसूस कर लेने, भरपूर जी लेने की उमंग। इस दुनिया को थोड़ी और बेहतर दुनिया बना देने का संकल्प है।
प्रकाश मनु जितने सहज ढंग से कविता में अपनी बात रख देते हैं, वह दुर्लभ है। कविताएँ वही ज़्यादा समय तक हमारे भीतर बजती रह जाती हैं, जो सादा होती हैं, जिनमें ज्यादा बेल-बूटे नहीं कढ़े होते, जिनमें ज्यादा सजावट नहीं होती। प्रकाश मनु इसी तरह नितांत निजी अनुभवों, चिंताओं को सामूहिक अनुभव और चिंता में ढाल देते हैं। वे कविता में कोई कहानी बुन देते हैं, कोई किस्सा उठा देते हैं, बतकही के अंदाज में, किसी से बतियाते हुए अपनी गहरी चिंता बता डालते हैं।
‘बेटी जो गई है काम पर’ कविता जितने सहज ढंग से समय और समाज की विसंगतियों को रेखांकित कर देती है, वह बहुत मार्मिक है। यह पीड़ा हर बेटी के पिता की है। लड़कियों को हमने काम पर जाने लायक बना तो दिया है, उन्हें इस काबिल तो बना दिया है कि अपने हुनर के बल पर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें, पर उनकी दुश्वारियाँ कम कहाँ हुई हैं। हम उनमें सुरक्षा का अहसास नहीं भर पाए हैं। उन्हें निर्भय रह पाने का विश्वास नहीं दे पाए हैं। यह कविता जितनी एक पिता के भीतर उठती आशंकाओं, भय और धड़कते हृदय का पता देती है, उससे कहीं ज्यादा समाज के बर्बर होते जाने पर चिंता प्रकट करती है। इस जटिल होते गए समय में बेटियों की सुरक्षा पर लगा प्रश्नचिह्न लगातार गाढ़ा होता गया है। वह इस कविता में देखा जा सकता है-
बेटी गई है बाहर काम पर…
ओ हवाओं, उसे रास्ता देना
दूर तक फैली काली लकीर-सी
वहशी सड़कों,
तनिक अपनी कालिख समेटकर
उसे दुर्घटना से बचाना।
भीड़ भरी बसों,
तनिक उस पर ममता वारना
उसे इस या उस या उसके वाहियात स्पर्शों
और जंगली छेड़छाड़ से बचाना।
ताकि बेटी जो गई है बाहर
लौटे तो उसकी चाल में
लाचार बासीपन का बोझ नहीं,
चलने और बस चलते चले जाने की उमंग हो।
(बेटी जो गई है काम पर)
इस संग्रह में ऐसी ही एक कविता है ‘एक अजन्मी बेटी का खत’। गर्भ में ही मार दी जाती बच्चियों की अनकही रह गई पीड़ा उसमें फूट-फूट पड़ती है। संवेदनाओं के कुंद होते जाने के इस दौर में, यह कविता, बहुत हल्के हाथों, मर्म पर गहरी चोट करती है। एक ऐसे दौर में जब ‘दुनिया के और पेशों की तरह हत्या भी एक पेशा है’ का उद्घोष करने वाले ‘हत्यारे’ सगर्व हत्या को महिमामंडित करते फिर रहे हैं, तब यह कविता न जाने कितने सवाल हमारे सामने बिखेर देती है। उन सवालों के जवाब अगर हम तलाश लें, तो शायद बेटियों की दुनिया सुंदर हो जाए। संबंधों के बीच पड़ गई दरारें मिट जाएँ। सचमुच एक समरस समाज का सपना कुछ साकार होता नज़र आने लगे।
मगर अभी शायद इन सवालों के जवाब तलाशने को कोई तैयार नज़र नहीं आता। इसीलिए बर्बरताएँ बढ़ रही हैं। शातिर हत्यारे जनसंहार की योजनाएँ रचते देखे जाते हैं-
पर सबसे शातिर हैं वे हत्यारे
जो शांत चेहरे और सधे हाथों से
सामने रखे कागज पर कुछ लिखते हैं
और कट जाती हैं
सामने वाले की जीभ और गर्दन…
(हत्यारे)
प्रकाश मनु के इस घर में स्मृतियों की एक धड़कती हुई दुनिया है। इस घर में उन तमाम लोगों के लिए जगहें बनाई गई हैं, जो उनके जीवन से किसी भी रूप में जुड़े रहे हैं। उनमें उनके सखा, मित्र, परिजन सब शामिल हैं। इस घर में ‘एक कवि की दुनिया है’। जीवन में जिससे भी, कुछ भी, मिला है, वे सब हैं। उसमें पिता हैं, घर की मल्लिका हैं, बेटियाँ हैं, रामविलास शर्मा, रामदरश मिश्र, विष्णु खरे, बाबा नागार्जुन, दिविक रमेश, रमेश तैलंग, अमृता प्रीतम, कुबेर दत्त, हरिपाल त्यागी आदि हैं। कवि की इस दुनिया में रहने, उठने-बैठने-बतियाने वालों की संगत से भी कवि के मिज़ाज का पता मिलता है। वे कवि की दुनिया में प्रवेश कर थोड़े और उजले हो उठे हैं। उनकी उपस्थिति थोड़ी और महत्त्वपूर्ण, थोड़ी और उदात्त हो गई है।
मगर इस इस दुनिया में एक अनुपस्थित की जैसी मार्मिक उपस्थिति है, वह लगातार गूँजती रहती है- ‘मैं फिर आऊँगा’। यह गूँज (अमेरिका में असमय गुजर गए अपने भांजे धीरज के लिए एक कविता) की है।
मैं कहीं गया थोड़े ही हूँ मामा जी,
मैं फिर आऊँगा
मैं फिर-फिर आऊँगा।
यह धरती इतनी सुंदर है
यह दुनिया ऐसी लाजवाब,
जैसे गुलाब का ताजा-ताजा फूल खिला हो
मैं इसे छोड़कर जाऊँगा कहाँ?
मैं फिर आऊँगा मामा जी,
मैं फिर आऊँगा।
मैं विभा की आँखों की चमक
मैं आन्या के होंठों की हँसी
मैं अयान की मीठी किलकारी बनकर,
मैं अपनी नर्मदिल मां के आँसू पोंछने
पापा के हाथों की लाठी बनकर आऊँगा,
मैं फिर आऊँगा मामा जी,
मैं फिर-फिर आऊँगा।
लौटकर फिर आने का वादा जीवन की सबसे सुंदर और सशक्त संभावना का जन्म लेना है। इस वादे से बेहतरी की संभावनाएँ पैदा होती हैं। प्रकाश मनु इसी तरह कठिन समय में संभावनाओं के फूल रोपते चलते हैं। उन फूल की क्यारियों में अद्भुत चटक बिंब पल्लवित होते हैं। भाषा, हवा की तरह अपनी मद्धिम चाल में, सुखकर अहसास लिए बहती है।
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सूर्यनाथ सिंह, एसोसिएट एडिटर, जनसत्ता, ए-8, सेक्टर-7, नोएडा, उत्तर प्रदेश, पिन-201301,
मो. 9958044433,
ईमेल – [email protected]
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2 टिप्पणी

  1. सूर्यनाथ सिंह की प्रकाश मनु के कविता संग्रह पर सनीक्षा बहुत ही विश्लेषणयुक्त है। श्री सिंह ने इन कविताओं की बारीकियों को गहराई से समझा है। अत्यंत पठनीय संग्रह है। हिंदी कविता में एक मूल्यवान वृद्धि!

  2. किसी भी साहित्यिक रचना के पाठक के साथ संप्रेषण के तीन प्रमुख आधार भावप्रवणता, हार्दिकता और आत्मीयता हैं; कविता के तो यह प्राण ही हैं। प्रकाश मनु के लेखन में ये गुण सर्वत्र दृष्टिगोचर होते हैं। कविताओं में तो वे खुद को निचोड़ डालते हैं।
    ऐसा टूटकर और डूब कर लिखने वाले कवि को यदि सूर्यनाथ सिंह जैसा समझ रखने वाला मिल जाए तो सोने पर सुहागा। मनु जी की कविता संग्रह के शीर्षक से लेकर उनकी चुनिंदा कविताओं और उनके कवि रूप पर सूर्यनाथ सिंह जी की पकड़, उनकी व्याख्या ऐसी है कि नए पाठक के मन में भी अन्य कविताओं को पढ़ने का चाव उठेगा।
    ऐसी विचारपूर्ण और संतुलित समीक्षा से पाठकों का उपकार होता है।

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