Saturday, May 18, 2024
होमपुस्तकविजय कुमार तिवारी की कलम से - 'रेड वाइन जिन्दगी' के बहाने...

विजय कुमार तिवारी की कलम से – ‘रेड वाइन जिन्दगी’ के बहाने यथार्थ की उड़ान

समीक्षित कृति : रेड वाइन जिन्दगी (उपन्यास); लेखिका : निर्मल जसवाल; मूल्य : रु 300/; प्रकाशक : आधार प्रकाशन,पंचकूला (हरियाना)

समीक्षक – विजय कुमार तिवारी

हिन्दी,पंजाबी और अंग्रेजी में लिखने वाली बहुचर्चित लेखिका,कवयित्री, कहानीकार, अनुवादक,समीक्षक और उपन्यासकार निर्मल जसवाल सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं। उन्होंने साहित्य की हर विधा में प्रभावशाली तरीके से लेखन किया है,उनका लिखा विद्यालयों में पढ़ाया जा रहा है,युवा,नारी-विमर्श और देश-विदेश के समाज में व्याप्त विसंगतियों को अपने लेखन में प्रमुखता से उठाया है। बातचीत में उन्होंने स्वयं कहा है,वे प्रेम लिखती हैं और प्रेम जीना चाहती हैं। उन्हें साहित्य सेवा के लिए चंडीगढ़ साहित्य अकादमी सहित अनेक पुरस्कार मिले हैं और आज भी पूरी सक्रियता के साथ उनका लेखन जारी है।
उनका हाल में ही प्रकाशित प्रथम उपन्यास ‘ रेड वाइन जिन्दगी’ मेरे सामने है। यह भी उनका कोई प्रयोग ही है,अंग्रेजी-हिन्दी के शब्दों को जोड़कर उपन्यास का नामकरण करना। शीर्षक को लेकर,हो सकता है,उनके मन में कोई गहरा विचार हो,कोई उड़ान हो या कोई जबरदस्त मुद्दा रहा हो। हिन्दी भाषा में उपन्यास विधा पर बहुत से विमर्श चर्चा में हैं,मैं उनमें उलझे बिना सहज ही उपन्यास की महत्ता व व्यापकता को स्वीकार करता हूँ।
‘रेड वाइन जिन्दगी’ उपन्यास के  प्रथम भीतरी आवरण पर उपन्यासकार और इस उपन्यास को लेकर प्रकाशक की ओर से सशक्त टिप्पणी की गई है-“निर्मल जसवाल ने आधुनिक साहित्य में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। जीवन के विभिन्न आयामों मुहब्बत-आक्रोश, उतार-चढ़ाव आदि को केन्द्रित कर इस उपन्यास में आने वाली परिस्थितियों का पात्रों द्वारा आकलन और विश्लेषण किया है। ‘रेड वाइन जिन्दगी’ चाहे जसवाल का प्रथम उपन्यास है परन्तु यह उसके साहित्य की यात्रा और अनुभवों की पराकाष्ठा है। अन्य रचनाओं की भाँति यह उपन्यास भी असीमित परिकल्पना को उड़ान देने वाला है जो केवल मंझा हुआ लेखक ही लिख सकता है। भाषा की शैली और वाक्यों का चयन दोनों ही समकालीन दृष्टि से पाठकों को बाँधें रखने के लिए बहुत सशक्त है। भाषा का स्वरुप युवा पीढ़ी तथा गंभीर वर्ग दोनों के लिए पर्याप्त है।” इसका निम्न कथन भी देखने,समझने योग्य है-“एक स्त्री का पुरुष प्रधान समाज में यह सिद्ध करना कि वास्तव में स्त्री ही समाज का आधार होती है और पुरुष को उड़ान भरने की क्षमता प्रदान करती है लेकिन पुरुष इससे अनभिज्ञ रहता है। समाज में स्त्री ही ऊर्जा और चेतना का  संचार करती है।” इस वक्तव्य से असहमत हुआ नहीं जा सकता जिसमें लिखा है,”रेड वाइन जिन्दगी’ एक संवेदनशील,प्रगतिशील समाज को उसका आईना दिखाने में बहुत बड़ा कार्य करेगा और युवा पीढ़ी को मुहब्बत के बदलते नये आयामों को समझने का भी मार्ग प्रशस्त करेगा।” ऐसी सशक्त,महत्वपूर्ण और पर्याप्त विवेचना के बाद किसी दूसरे के लिए ‘रेड वाइन जिन्दगी’ पर अलग से विचार करने की आवश्यकता ही नहीं है।
‘रेड वाइन जिन्दगी’ उपन्यास को लेखिका ने 12 खण्डों में विस्तार दिया है और दो खण्ड बिना किसी गिनती के जोड़ दिए गए हैं। ऐसा भी हो सकता है, निर्मल जसवाल की सोच से कुछ छूट रहा हो जिसे अलग से विस्तारित कर दिया गया हो या साहित्यिक औपन्यासिक विधा का यह कोई नया अनुप्रयोग हो। आजकल लेखक, रचनाकार नित्य नया-नया प्रयोग करते रहते हैं।
उपन्यास का प्रथम खण्ड ‘नगीना और महेश्वरम्–‘ शीर्षक से है। नगीना को पत्र-पत्रिकाओं के बीच नीला सा लिफाफा मिलता है जिस पर प्राप्त कर्ता का नाम नहीं था। लिफाफे के भीतर किसी कश्मीरी लेखक द्वारा लिखा लेख,उपर कोने में लेखक का नाम और मोबाइल नम्बर था। लेख में कश्मीरी पंडितों का पलायन,1947 के बँटवारे की तुलना में,बेहद संगीन आरोपों व अपनी जमीं से विलग कर दिए जाने का दर्द उभरा हुआ था। सब कुछ नगीना को बेहद संगीन,दिलचस्प व पीड़ादायक लगा। ‘वाकिंग डेड’ अमेरिका के बहुचर्चित सिरियल के भयावह दृश्यों को देखते हुए नगीना के मन में मनुष्यता को लेकर प्रश्न उठते हैं,जैसे वह भी उनमें से ही एक चलता-फिरता कंकाल हो। उनका चिन्तन देखिए–“इतिहास कितना क्रूर है? धरती शहर में तब्दील हुई तो लोमड़ी-सी चालाकियाँ सभी में खुद-ब-खुद उभर आईं। धरती से हरियाली गायब हुई तो वृक्षों के कंकाल भी गायब हो गये। प्रकृति का रौद्र रुप केवल इन्सानों से प्रतिशोध रुप में? इन्सान कहाँ है यहाँ?”
उपन्यास की शुरुआत और विवरण से स्पष्ट है,निर्मल जसवाल की उड़ान कम नहीं है,बिम्ब जीवन्त ढूँढ लाती हैं,ढलती उम्र को रोकना चाहती हैं और भाषा-शैली को लचीला,खनकदार बना देती हैं। निर्मल जिन दृश्यों को बुनती हैं उनमें रोमांच है,भय है,प्रेम है,कोई अतीन्द्रिय रहस्य है और किन्हीं बलिष्ठ बाँहों का घेरा भी। प्रश्न करती हैं-यह कैसी इच्छा पनप रही है इस उम्र में उसके भीतर? नगीना को किसी की उपस्थिति महसूस होती है। भाषा और वाक्य-विन्यास कहीं-कहीं व्यवधान डालते हैं। नगीना किसी सहेली के यहाँ जाती है,फिर लौट आती है मानो कोई बेचैनी है उसके भीतर। सारी बातचीत आधी-अधूरी है या जो भीतर है,उसका सत्य छिपा जाती है। वह पसीना-पसीना हो रही है। स्वप्न में कोई बच्चा अंगुली पकड़ना चाहता है,पूछता है-“तुम क्यों छोड़ आई थी मुझे वर्षों पहले?”
“ओह! मेरा कोई अतीत-मेरा पाप-या पुण्य को दोहराना चाह रहा है।” “कहीं वह मेरा शिशु-” चोट खाई नागिन-सी वह तड़प उठती है। नगीना के भीतर प्रश्न है,उत्तर है,अन्तर्द्वन्द है–“यथार्थ से कहाँ भाग सकती है? जिन्दगी है यह! जिन्दगी में पुण्य क्या और पाप क्या? मैंने कोई पाप नहीं किया। मैंने पुण्य भी कहाँ किया? मुस्कराती है।” “कोई है,साथ चल रहा है,” नगीना सोचती है-“जो कोई होगा भी तो वो मेरा अंश -सिर्फ मेरा अंश ही होगा।” वह भगवान शिव की साधना करती है। शिव ने उसे सब कुछ दिया है-सांसारिक प्रपंच,झूठ-फरेब,धोखा,अपने अजन्मे शिशुओं से त्याज्य। वह चौंकती है-इस व्यक्ति का नाम महेश्वरम है, शिव का पर्याय? फोन की घंटी बजती है। परिचय हुआ-महेश्वरम और नगीना। उसी ने लिखा है,तीन लेख हैं। निर्मल जसवाल संवेदना,करुणा और भावनाओं से भरा दृश्य चित्रित करती हैं। कश्मीर से 1990 के पलायन का भाव उभरता है। महेश्वरम किसी प्रोफेसर पद के लिए साक्षात्कार देने कश्मीर जा रहा है। उसे अपना गाँव रैनावारी देखना है। कल्हण की राजतरंगिणी राजनाक वाटिका या रण्णवोर उसका ऐतिहासिक नाम है जो आगे चलकर रैनावारी हो गया है। महेश्वरम अपना पैतृक घर निहार रहा है जहाँ उसका जन्म हुआ था। महेश्वरम के दूसरे लेख में  आर्टिकल 370 और 35 ए की चर्चा है। नगीना को महेश्वरम के प्रति अपनत्व का भाव जाग रहा है,कोई बेचैनी है।
दूसरे खण्ड में लीना सिंह और इन्द्र की कहानी है। लीना ने बगावत करके शादी की है। पहले का सब कुछ याद आता है,इसलिए प्रकृति की खूबसूरती देखने आयी है। घोड़े पर बैठी डर रही है और  घोड़ेवाले को डाँटती है। मां कहती थी,” मर्द भी घोड़े ही होते है,रस्सी खींच के रखना–।” कनाडा में वैसे भी खींचकर रखना पड़ता है। गोरे-देशी एक जैसे ही होते हैं। लीना भाग आई है कश्मीर और एक कश्मीरन के घर में है। इन्द्र से वहीं मुलाकात हुई। उसे भी कनाडा जाना है। कश्मीर की हवा में दहशत है। निर्मल जसवाल की नायिका लीना उदात्त चरित्र की है,पहले उसकी शादी भोपाली से होने वाली थी। निर्मल ने खूब मजे ले-लेकर लिखा है,हास्य,व्यंग्य,रोमांस और खुला-खुला सब कुछ। कनाडा में जो देखा,सीखा,सब लेखन में परोस दिया,बेचारे पाठक भी खुश। जैसे शादी में बगावत,लेखन में भी वही साहस। लीना को भोपाली ने अस्पताल में कहा,”शादी तो नहीं हो सकी,मेरे पैसे वापस करवा देना।” लीना कहती है,”मैं उस एक-दो घण्टों में ही जैसे जवान हो गई,दुनियादारी को समझने के काबिल हो गई। मेरा दिमाग उबलने पर आ गया।” भाई के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था,लीना सिंह बताती है,”सौदेबाजी थी वह। हम दोनों बहन-भाई अपने मां-बाप का बिजनस-स्कैंडल थे। कभी बेचे और कभी खरीदे जाते रहे थे।” निर्मल जसवाल ने रहस्य खोल कर रख दिया है,पूछती है,”पैसों से भी कभी किसी को जीवन मिला है?” आगे लिखती है,”सुना था, बीयर ईट्स देयर कब्स,ह्वेन दे आर हंगरी,अदरवाइज दे गिव बर्थ।” निर्मल बीच-बीच में कविता की कुछ पंक्तियाँ लिखती हैं,प्रकृति के बदलते स्वरूपों से जीवन की तुलना करती हैं,दर्द और चुम्बन सहित प्रेम से भरे संवाद करती है,”हर एक का अपना एक टुकड़ा आसमां होता है। हर एक की अपनी एक दास्तां है,एक अनकही कहानी है-एक चुप-सा दर्द है।”
निर्मल जसवाल के लेखन में प्रकृति है,जीवन-दर्शन है,सुख-दुख और प्रेम-प्रदर्शन भी। सभी पात्र अपने-अपने दर्द के साथ जी रहे हैं। नगीना 60 की हो रही है,संतुष्ट है,एकान्त खलता नहीं। वह भौचक रह गई जब एलिसा ने उसे हेनरी के साथ का आफर दिया। बेटी-दामाद ने खुशी जाहिर की। वे विदेश में हैं,जिन्दगी की खुशियों,इन्सानी जरुरतों को समझते हैं। दूसरी बेटी बँगलोर में है,वह बहुत गुस्से में थी जब बहन ने जानकारी दी। निर्मल जसवाल नगीना की तनहा रातों का दर्द बखूबी बयान करती हैं। नगीना चन्द्र को याद करते हुए नाना प्रश्नों को महसूस करती है।  ताजमहल गवाह था उनकी मुहब्बत का। दोनों लुधियाना आ गये और संगमरमर के ताजमहल के टूटने की स्मृति ने दोनों को धड़का दिया। निर्मल जसवाल की उन्मत्त प्रेम की शैली पाठकों को रोमांचित करती है। वह बार-बार ऐसे क्षणों को मूर्त करती है और अपनी नायिका के बहाने आनंद लेती हैं। यही हर लेखक का आनंद है। अपने पात्रों में वह कहीं न कहीं होता ही है। निर्मल जसवाल प्रेम में डूबी हर लड़की के चरित्र में है। उनका प्रेम पूर्ण नहीं हो पाया है, इसलिए पीड़ा का बेहतरीन चित्रण हुआ है। नगीना चन्द्र के मित्र के साथ सब गवाँ बैठी,उसे उबकाई आने लगी और भीतर कोई सांस लेने लगा। वह सोचती है,”यह गर्भ निरुद्देश्य नहीं है।” नगीना अपने निर्वस्त्र शरीर के बारे में सोचती है,भीतर पल रहे शिशु के आलोक का अनुभव करती है और बहुत सारी  सुखद अनुभूतियों में बहती रहती है। अंत में नगीना तड़प कर रह गई–भ्रूण-हत्या? नहीं! समाज के नियमों का पालन करना उसे इस संसार के दुखों से बचाने का विकल्प मात्र। निर्मल जसवाल ने इस प्रसंग को लिखते समय उन अनुभूतियों का सटीक चित्रण किया है जब कोई अविवाहित लड़की गर्भवती हो जाती है।
निर्मल जसवाल हिन्दी के साथ-साथ पंजाबी और अंग्रेजी भाषा में लिखती हैं। नगीना चंडीगढ़ के हास्टल में रहते हुए नाना तरह की तैयारियों में लगी हुई है। उसकी जिन्दगी में लहरों ने तूफान खड़ा किया था- अब तो वह स्वयं तूफानों से जूझने के लिए तैयार। व्वाय फ्रेंड्स की कोई सीमा न थी। दिलरुप ने जो बताया वह रोंगटे खड़े करने वाला घृणित था। नगीना सावधान हुई। सफलताएं मिलीं। उसने खेलना शुरु कर दिया। वह समीर से मिली। दोनों के संवाद दूरियों को कम कर देते। नगीना अपना अतीत खोलकर बता देती है समीर से,कुछ भी नहीं छिपाती। समीर किसी संशय में है,वह कुछ भी नहीं बताता। ‘रेड वाइन जिन्दगी’ के पाँचवें खण्ड  की शुरुआत महेश्वरम और नगीना की बातचीत से होती है। नगीना बताती है,”वह रिटायर्ड है,दो बेटियाँ हैं,एक कनाडा में,दूसरी बँगलोर में। परसो बँगलोर जाना है,दूसरी बेटी के पास।” दोनों के बीच अंग्रेजी में संवाद हो रहा है,कविता,कहानी की प्रशंसा के साथ,दोनों एक-दूसरे के बारे में पूछते-बताते हैं। महेश्वरम बताता है,”अभी मेरी शादी नहीं हुई है। मैं 40 का हूँ। असिस्टेंट प्रोफेसर हूँ। शाकाहारी हूँ।” नगीना अपनी पुस्तक भेजती है,महेश्वरम पात्रों को लेकर शंकित है। निर्मल जसवाल लिखती हैं,”मीलों-कोसों दूर दो अतृप्त रुहें,अनजानी-पहचानी एक-दूसरे को शब्दों में तलाश करतीं-शब्दों का बाना-सा बुन रही थीं।” नगीना हँसती है। शायद यही हँसी महेश्वरम के इश्क को हवा देने का कारण बनी। नगीना पूछती है,’महेश्वरम! जीवन में तुम्हारे कितने अफेयर हुए हैं?” वह अपने बारे में बताती है-“सुनो,मेरे बहुत से अफेयर्स हुए हैं परन्तु कोई परवान नहीं चढ़ा। लेखिका हूँ–आशिक जात की हूँ।” निर्मल इस संवाद में समय और स्थान की सीमा पार करती है,दोनों कल्पना में पास-पास अनुभव करते हैं। कुछ अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ भी हैं। उसने कहा,”नगीना! प्रकृति ने तुम्हें पहले भी मेरे पास भेजा था। तुम चली आई थी बिना मुझे देखे-पहचाने। क्यों छोड़ आई थी तब?” नगीना ने ठहाका लगाया,”तब तुम मेरे पुत्र होते।” “हम जिस्म के किसी भी घेरे में नहीं-हमारा सम्बन्ध रुह से है।”
निर्मल जसवाल को अतीन्द्रिय शक्तियों की अनुभूति है,इसलिए उनका उपन्यास कुछ विशेष है,प्रगाढ़ प्रेम में डूबता-उतराता। उनकी पंक्तियाँ देखिए-“शनैः शनैः रात ढलती है/तुम आते हो चुपके-से/कुछ कह जाते हो/कसमसाती,बोझिल/पलकों पर स्निग्ध/चुम्बन-प्रगाढ़ निद्रा/में डूबती-उतराती/खो जाती हूँ-“। नगीना और महेश्वरम की फोन वार्ता में कभी-कभी समय का भी ध्यान नहीं होता,रात-देर रात कभी भी मानो प्रथम प्रेम हो। उधर समीर को जब नगीना मिली थी,मेधावी,जागरूक,विलक्षण,दबंग और सत्य के बिल्कुल निकट थी वह,इसलिए वह जिन्दगी के कड़वे घूँट का रसास्वादन करते-करते स्वयं ही विष-कन्या सी ढल चुकी थी। उसे लगता जिन्दगी इसी खिलवाड़ का नाम है। उसने तय कर लिया,बहुत हो चुका,अब वह अपने खोये हुए शिशुओं को जन्म देगी,प्यार ही प्यार का संसार होगा। समीर अपने जीवन के झंझावातों को इत्मीनान से सुनाना चाहता था। उसने तय कर रखा था,यदि वह विफर गई तो कसके बाँहों में जकड़ अपने से तभी विलग करूँगा,जब वह सब बातों को स्वीकृति दे देगी।
कहानी बुनते हुए निर्मल जसवाल अपने पात्रों को कश्मीर में एकत्र करती है। लीना कश्मीरन के घर में थी,नगीना भी तो तब वहीं थी परन्तु मिली नहीं लीना से। समीर और नगीना पहाड़ी शहर जम्मू के बस स्टैंड से होटल के कमरे में पहुँच चुके हैं। निर्मल एकालाप,आत्मालाप या मोनोलाग बहुत अच्छा लिखती हैं,भीतर की भावनाएं उभर आती हैं बिना किसी छिपाव-दुराव के। एक ही बिस्तर पर सोये दोनों के बीच के संवाद गहरे अनुभवों से गुजरते हुए किंचित संशय से भरे हैं। ऐसे में संवाद की भाषा और शैली रोमांचित करती है और चमत्कृत भी। बहुत से पाठक,समीक्षक असहमत हो सकते हैं या अनावश्यक, अत्यधिक आग्रह के साथ लेखिका पर प्रश्न खड़ा कर सकते हैं। इसे उनका व्यापक अनुभव व साहस मानना चाहिए और कथा-सृजन का उदाहरण भी। निर्मल बतौर उपन्यासकार चमत्कृत करने वाले संयोगों की रचना करती हैं और कहानी की दिशा मोड़ देती हैं। वहीं समीर की पत्नी मिलती है और बताती है,यह आपका ही बेटा है,सम्बन्ध-विच्छेद से पहले मैं गर्भवती थी। समीर में क्षणिक वात्सल्य जागा और उसने पुत्र को छाती से लगा लिया। उसके बाद वही हुआ जो होना था,समीर रो पड़ा और सब कुछ खत्म हो गया। नगीना बंद कमरे में अकेली रह गयी।
नगीना की नौकरी शिमला के पास हो गयी। पिता नहीं रहे,उसे मां की चिन्ता हुई। उसने शिमला वासी खूबसूरत आर्मी नौजवान से ब्याह रचाने की हामी भर ली। नगीना उन दिनों को याद करती हैं,बड़ी के बाद पाँच वर्षों तक गर्भ नहीं ठहरा,पति एक शिशु और की रट लगाये रहते थे,हमने किसी को गोद लेने का विचार किया। किसी दिन नगीना ने स्वप्न में एक नन्ही-सी परी को छुआ। किसी सुनहली शाम में मेडिटेशन के लिए आँख बंद करते ही नन्ही परी की गंध महसूस हुई,नगीना मुस्कराई और ऊँचे स्वर में आवाज दी,”ओ मेरे नन्हे शिशु,मुझपर तुम्हारा कोई भी कर्ज है या मुझे ही अपनी तृप्ति के लिए कर्जदार करना चाहते हो तो आओ और मेरे गर्भ से जन्म ले मुझे भी मुक्ति दो। देखो,किसी को भी गोद ले,किसी को किसी के कर्ज से मुक्ति नहीं देना चाहती-यदि गोद ले लिया तो फिर मैं किसी को भी जन्म देना नहीं चाहूँगी।”
बडी के जन्म के ठीक दो वर्ष बाद 30 नवम्बर को एक शिशु ने जन्म लिया था और उसके ठीक एक वर्ष बाद 30 नवम्बर को ही नगीना को रोता-बिलखता छोड़ चला गया। अब यह नन्ही-सी परी,बिल्कुल वैसी ही,अलौकिक, अद्भुत, नगीना आनंद से भर उठी। परी और बड़ी दो पुत्रियाँ नगीना के संरक्षण में पलने-बढ़ने लगी। कोई दिव्य पुरुष,कोई दिव्य बौद्ध लामा और ‘बुद्धम शरणम’ का संगीत,नगीना खो जाती। उसके अंदर जैसे कोई विस्फोट होना चाह रहा हो-वह अपने खोए हुए शिशुओं को विस्मृत नहीं कर पाई थी। जीवन ने फिर धोखा दिया, पति नहीं रहे। निर्मल जसवाल नगीना के माध्यम से  भ्रूण-हत्या या बार-बार गर्भपात करवाने वाली महिलाओं की व्यथा का चित्रण करती हैं और आत्माओं के ऋण-सिद्धान्त को समझाना चाहती है। हमारे सारे रिश्ते-नाते इन्हीं आत्माओं के ऋण से जुड़े हैं।
निर्मल जसवाल अपने लेखन में बहुत कुछ मिलाकर सम्मिश्रण तैयार करती हैं,भावनाएं,घटनाएं, कल्पनाएं और रुमानियत से भरी उड़ान भी। उन्हें अपने कथ्य-कथानक के पक्ष में नाना तर्क हैं और कहानी के पात्रों को सहज ही चुन लेती हैं। उनका उपन्यास पाठकों को दुनिया भर की यात्रा करवा रहा है और उत्सुकता खत्म नहीं होती। सन 1996 की फरवरी और बोस्टन (अमेरिका) की भयानक ठंड। नगीना ने बोस्टन यूनिवर्सिटी में हिन्दी ट्यूशन के लिए आवेदन दिया था। पहली बार अकेले निकली है। अजनबी शहर,अजनबी लोग,दामोदर को आना था,नहीं आया। परी को घर में छोड़कर आई है। नगीना पाल की कार में बैठ गई। उसने सही-सलामत घर छोड़ दिया। दामोदर गुस्से में है। उधर नगीना को प्री मोनोपाज से गुजरना पड़ रहा है। शरीर में खून जितना बनता है,सब निकल जा रहा है।  दामोदर के बारे में सब झूठ बताया गया है। वह उम्र में 20 वर्ष बड़ा है,उसके दांत असली नहीं हैं,वह डायरेक्टर नहीं है,अकाउंटेंट है। नगीना भय में जीने लगी है कि ये लोग मार डालेंगे। वापस चंडीगढ़ आते ही वह स्वस्थ होने लगी। पूरे उपन्यास में नारी की समस्याओं का यथार्थ चित्रण हुआ है जो लेखिका के व्यापक अनुभव को दर्शाता है।
नगीना अकेली है,कभी बड़ी बेटी के पास ,कभी परी के पास आना-जाना लगा रहता है। परी एडमिंटन में आ गयी है। वहीं बूढ़ा हेनरी अपने बच्चों के साथ है। नगीना युवावस्था पार कर चुकी है परन्तु मन अभी भी चंचल है। उसे अभी भी आभास होता जैसे उसका भ्रूण शिशु कहीं न कहीं अवश्य मिलेगा। बूढ़ा हेनरी काफी पीने आता है और नगीना भी। दोनों का मिलना नित्य होने लगा,जान-पहचान भी हो गयी। हेनरी 80 वर्ष का है और नगीना 60 साल की। हेनरी अपने बेटे-बहू के पास है और नगीना अपनी बेटी के पास। हेनरी ने बातचीत करते नगीना के हाथों को सहला दिया,वह चौंक उठी। वह नगीना को आयरलैंड की कहानियाँ सुनाता,एकान्त घरों की कहानियाँ जहाँ आत्माएं निवास करती हैं। एलिसा,हेनरी की बहू नगीना को जानती है। हेनरी-नगीना प्रसंग लिखते समय निर्मल जसवाल उम्र की ढलान की चिन्ता करती हैं और करुणा,प्रेम,संवेदना की भावनाएं उजागर करती हैं। उस उम्र की अलग समस्याएं हैं और किसी को ऐसे ही छोड़ा नहीं जा सकता। वैसे भी बर्फ अधिक है और ठंड भी।
किसी दिन एलिसा अपने पालतू कुत्ते के साथ कहीं चली गयी थी। हेनरी नीचे उतरते समय गिर गया,उसे आपातकालीन वार्ड में रखा गया। नगीना और उसकी बेटी ने मदद की थी। एलिसा दोनों का हाथ बार-बार चूमती हुई धन्यवाद दे रही थी। हेनरी को माइनर अटैक हुआ था। उसकी जान पालतू कुत्ते सैमी में अटकी थी। एलिसा की कहानी भी मार्मिक है। उसके माता-पिता के खो जाने पर हेनरी ने उसे अपना लिया था और बहू बना लिया। निर्मल जसवाल का मन नाना संभावनाओं को टटोलता रहता है। एलिसा नगीना को हेनरी के साथ के बारे में पूछती है। नगीना चौंकती है और अपने चिन्तन में खो जाती है।
लीना और नगीना दो मुख्य नारी पात्र हैं जिनके आसपास सारी कहानियाँ घूमती हैं। लीना सिंह के मा-बाप कीनिया से कनाडा आ गये और सम्भ्रान्त जीवन जीने लगे। शायद इसीलिए निर्मल जसवाल के पात्र भारत को पिछड़ा या कूड़ा-कर्कट जैसा मानते हैं। आधुनिकता की दौड़ ने अंधा कर दिया है, उन्हें सभ्यता-संस्कृति दिखाई नहीं देती, प्रवासी लेखन की ये कुछ समस्याएं हैं। लड़कियाँ पैसा कमाने के साथ थोड़ी मस्ती भी चाहती हैं। खूब ताना-बाना बुना है लेखिका ने और सारे चरित्रों को उघाड़ कर रख दिया है। लीना, मिताली, दिलजोत,मौसी,चन्द्र,मीकू सबके सब अपने-अपने तरीके से खेल रहे हैं। यहाँ चरित्र में जटिलता और मनमानापन है। सबको पैसे की भूख है।
भ्रूण को खत्म करने वालों के लिए निर्मल जसवाल की ये मार्मिक पंक्तियाँ विचलित कर सकती हैं,”क्यों छोड़ आई थीं तुम मुझे वहाँ श्रीनगर के उस गाँव में भ्रूण रुप में तन्हा—-मैं मिट्टी में भी बिलख रहा था—-।” नगीना पुनर्जन्म की रोशनी मे जी रही है। महेश्वरम और नगीना के बीच का यह संवाद बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है-लबों पर प्रेम की मिठास,हृदय में धड़कनों की थाप,एक लय युक्त संगीत उनके कानों में अमृत तो घोल ही रहा था परन्तु उस पार धरती को छूकर घातक किरणों का गुजरना भी तय था। राम,कृष्ण, शिव के चिन्तन के साथ 16 कलाएं,16 श्रृंगार और 64 कलाएं सब की व्याख्या जीवन से जोड़ते हुए लेखिका ने किया है। महेश्वरम नगीना को निरुत्तर कर देता है। लीना और इन्द्र अपने पुत्र नीलाभ से मिलने के लिए कहते हैं। नगीना समझती है-यह पुनर्जन्म का मिलन होगा। अमृतसर के बस स्टैंड पर नगीना और महेश्वरम मिल रहे हैं। निर्मल जसवाल की पंक्तियाँ देखिए-‘उसे पता था कि अजनबी,अजनबी राहों पर ही मिलते हैं,एक सन्नाटा बुनने के लिए,कुछ क्षणों के लिए, और चले जाते हैं एक-दूसरे के लिए अजनबी बनकर- अजनबी राहों पर।” नगीना बस से उतरती है,”तुम्हें छू तो लूँ महेश्वरम!” दोनों आलिंगनबद्ध हुए और अपनी-अपनी बस में बैठ गये।
नगीना और महेश्वरम के बीच जम्मू-कश्मीर के हालात पर चर्चा होती है। दोनों मिलना चाहते हैं परन्तु संभव नहीं दिखता। नगीना को सबसे मिलना है,महेश्वरम से दिल्ली में,नीलाभ से कनाडा में,अमेरिकन दोस्त से और मिताली से —। नगीना स्मृतियों में खो जाती है-लीना और इन्द्र दौड़ रहे हैं,दिलजोत याद आती है-अरे कैसे है दिलजोत और मीकू? लीना ने बताया-दिलजोत मीकू के दो बच्चों को पाल रही है। दोनों के घर वाले साथ नहीं दे रहे, कारण वही जाति और धर्म। नगीना के दिल को गहरी चोट लगी। नगीना दिवास्वप्न देख रही है। अचानक हेनरी की उपस्थिति महसूस करती है। एलिसा ने बताया,हेनरी को उसकी एक्स दोस्त मार्था फिर मिल गई है। नगीना महेश्वरम को याद करती है-कभी बेटा,कभी प्रेमी या अतीत का कोई सम्बन्धी। नगीना पाँच वर्षों बाद लीना-इन्द्र और नीलाभ से मिलने वाली है। परी ने बिना बताए लीना के साथ उसके रहने का प्रबन्ध कर दिया था क्योंकि वह स्वतंत्र रहना चाहती थी। लीना ने देखा पुस्तक के पन्ने बिखरे हुए हैं। उसने पूछा। महेश्वरम ने लिखी है यह पुस्तक। नगीना हँसती है,”इन पन्नों में आग है-तापोगी?” नगीना उदास है,”मेरा मुल्क जल रहा है लीना!”
नगीना बार-बार फोन करती है,’महेश्वरम,मेरी नींद उड़ाकर तुम कैसे सो सकते हो?” वह गीत की पंक्तियाँ गुनगुनाती है और हँसती है,”देखो,लीना का बेटा नीलाभ तुम-सा ही दिखता है–मैं उसमें तुम्हें ही ढूँढती हूँ–मेरा और तुम्हारा रुह का रिश्ता और पक्का हो गया महेश्वरम—तुम में मैं अपना जीवन— अपना वर्तमान ढूँढती हूँ—।” इन्द्र नगीना के साथ बहस करता रहता है। वह भी महेश्वरम से जुड़ गया है। दोनों कश्मीर से हैं। धारा 370 और 35ए से तो निजात मिल गई है,क्या हम अपने गाँव जा पायेंगे? क्या हमारी जमीनें हमें मिलेंगी? महेश्वरम तल्खी से कहता है,”यहाँ 4 वेद,6 शास्त्र,18 पुराण,60 नीतियाँ और 108 उपनिषद हैं लेकिन कर्महीन लोग तो साईं,पीर,फकीर, मजार में मारे फिर रहे हैं।” आजकल नगीना मिस्टीरियस उपन्यासों को पढ़ने में लगी है,कभी इश्क की बातें करती है,कभी इस संसार की नश्वरता,कभी पंजाब की अवस्था से चिंतित लगती है–और—-कभी-कभी हर शिशु के चेहरे में अपने शिशु की झलक के लिए लालायित रहती है।  महेश्वरम पाश की ‘संविधान’ कविता की चर्चा करता है। नगीना लीना को भी सम्मिलित करना चाहती है। दोनों हँसती है और नीलाभ भी-मुहब्बतें मरी नहीं हैं,/मुहब्बतें बेवफाई का शिकार हुई हैं।
लीना सलाह देती है,”नगीना,क्यों न तुम एक-दो माह के लिए इण्डिया तफरीह कर आओ—?” “मैं रेड वाइन ले रही हूँ, तुम ग्रीन टी लो लीना–” वह ग्रीन टी का मग वापस करती है। नगीना मानो सोते से उठी,”तुमने मेरे मन को कैसे पढ़ लिया? बड़ी को कहती हूँ,टिकट बुक करा दे।” परी का फोन सुन  सन्न रह जाती है,”लीना देखो,परी क्या कह रही है–टी वी लगाओ—। बाइरल बुखार बढ़ता जा रहा है–वायरस है—इण्डिया जाओगे तो फँस जाओगे,एयरपोर्ट बंद हो रहे हैं।” सन 2020–कोविड-19 फैल रहा है। नगीना को रेड वाइन का लाल रंग ताबूत व ढेरों लाशों के उपर उड़ेलती,सफेद रंग में ढलती प्रतीत हो रही थी जैसे उसे चारों ओर से किसी बर्फीली धूँध ने दूर-दूर तक जकड़ लिया हो।
यहाँ संवाद है,सवाल है और संस्कृति की चिन्ता भी। एक ओर पाश्चात्य देशों की पतनशील दशाएं हैं जिसमें हमारी लड़कियाँ आधुनिकता के नाम पर शिकार हो रही हैं। नगीना जैसी हजारों लड़कियाँ, महिलाएं किसी अंधेरे में जीने को बाध्य हैं,उन्हें रोशनी दिखाई नहीं देती। जीवन अनियंत्रित हो चला है,बार-बार गर्भ-धारण करना और भ्रूण हत्या जैसा जघन्य अपराध भारतीय मनीषा में स्वीकार नहीं है। नगीना के रुप में निर्मल ने बेहतरीन चरित्र उजागर किया है। अंग्रेजी,हिन्दी,उर्दू,पंजाबी और कश्मीरी जैसी अनेक भाषाओं की जानकार लेखिका ने मार्मिक कहानी बुनी है। कहानी बार-बार भटकती है,उलझती है और बहकती है। यहाँ कोई नया चिन्तन उभरता है, जो शिशु जन्म नहीं ले पाते,वे किसी ऋण के तहत बार-बार उसी गर्भ को चुनते हैं। निर्मल जसवाल आत्मा के सम्बन्ध को शायद स्वीकार करती हैं और वह आत्मा प्रेमी,पति या पुत्र के रुप में अपनी उपस्थिति दर्शाती है। बहुतेरे जानकार लोग सहमत हो सकते हैं परन्तु असहमति के साथ जसवाल का विरोध करने वाले भी कम नहीं होंगे। यह उपन्यास बहुत सारी विसंगतियों पर चर्चा करता है और सावधान करता है। बहुत सारे विरोधों-अन्तर्विरोधों के बावजूद निर्मल जसवाल का उपन्यास संदेश देने में सफल हुआ है।
RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest

Latest