वन्दना वाजपेयी द्वारा 'हाशिये का हक़' उपन्यास की समीक्षा 3
साहित्य में नए -नए प्रयोग होते रहे हैं | ऐसा ही एक प्रयोग है साझा उपन्यास .. जिसका प्रयोग यदा  कदा तो होता रहा है पर मुख्य धारा में इसके अंगुलियों पर गिने जाने वाले नाम ही हैं |
इधर ऑनलाइन के दौर में मातृभारती डॉट कॉम पर ये प्रायोग शुरू हुआ और इसे बहुत सराहा गया | कई ऐसे उपन्यास आए जिनके पाठकों की संख्या इस विधा के उनके द्वारा पसंद किए जाने की सूचक थी |
फिर इन्हीं उपन्यासों में से कुछ को किताब रूप में भी लाया गया | और कुछ सीधे साझा उपन्यास भी लिखे गए | ऐसा ही एक उपन्यास है शिवना प्रकाशन से प्रकाशित “हाशिये का हक” जिसे चार लेखिकाओं ने लिखा है ..नीलिमा शर्मा, डॉ. रंजना जायसवाल, डॉ. जया आनंद और डॉ. गीता द्विवेदी | इसका संपादन किया है नीलिमा शर्मा जी ने | जो की इस नई विधा को किसी ऑनलाइन साइट पर सबसे पहले ले कर आई थी | आइए करते हैं एक पड़ताल इस उपन्यास की |
इस उपन्यास को तीन भागों में बाँटा जा सकता है |
स्मृतियों की आईने से
दिखावे और झूठ का ताना बाना
संघर्ष या हाशिये का हक
जीवन स्मृतियों का कोलाज है | हर रोज हमारे मन के पटल पर ना जाने कितनी अच्छी बुरी स्मृतियाँ दर्ज होती जाती हैं | पर भूचाल उस दिन आता है जब ये गठरी एक दिन अचानक से खुलती है | स्मृतियाँ संभालें नहीं संभलती और बेरोकटोक बिना किसी क्रम के दस्तक देती जाती है | ऐसा ही हुआ प्राची के साथ ..उस रात जब वो अपनी माँ को सदा के लिए खो देने का समाचार सुन कर मायके की ओर सफर प्रारंभ करती है तो स्मृतियों के दरवाजे से झाँकता है अकेली माँ का संघर्ष, भाई का किशोर वय में अश्लील कही जाने वाली किताबों की ओर विचलन, प्राची के पहले प्रेम की दस्तक, और दमन साथ ही घर की छोटी बड़ी बातें |
जिन माँ का घर था उन्हीं को एक कोने में जगह मिली | जिसने घर की एक-एक ईंट जोड़ी उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे की विदा करते हुए बेटी के हाथ पर रख सकें | जो रसोई उनके व्यक्तित्व का एक हिस्सा थी उनका उसे रसोई में प्रवेश वर्जित हो गया | ये सच्चाई उन घरों की है जहाँ बेटे बहु साथ रहते हैं | बाहर से देखने वालों को लगता है की बुजुर्ग सुखी हैं पर उनकी व्यथा अकेले रहने वाले बुजुर्गों से कम नहीं होती | पर यही परिवार मृत्यु के बाद बड़ा पाखंड करता है |
एक-एक बात का उपन्यास में विस्तार से वर्णन है , जिन्हें समाज के नाम पर ढोया गया है | पर समाज हमीं से तो बनता है | इसलिए कह सकते हैं की ये पाखंड समाज को दिखाने से कहीं ज्यादा खुद को “अच्छे होने” का सर्टिफिकेट देने के लिए है | और “बड़े अच्छे बेटा बहु” सुन कर पीछे की गई अपनी गलतियों पर सदा के लिए पर्दा डालने के लिए भी है |
उपन्यास का तीसरा हिस्सा सभी महिलाओं की बात करता है जिनके पास अधिकार तो हैं पर वो हमेशा कर्तव्य चुनती हैं और हाशिये पर बनी रहती हैं | इनका जीवन यातना से भर जाता है तब भी कोई अपना साथ नहीं देता |
अधिकार कभी थाली में सजा कर नहीं दिए जाते |उनके लिए संघर्ष करना पड़ता है | ये संघर्ष अपनों से होता है, इसलिए दुगनी हिम्मत माँगता है | उपन्यास अपनी माँ से तुलना करते हुए आधी आबादी को दिशा देता है |
एक आम जिंदगी के संघर्षों की बात रखता ये उपन्यास कई जगह मार्मिक हुआ है, तो कई जगह एकदम घरेलू टाइप के झगड़े कभी कहीं किसी घर में देखे सुने लगते हैं .. पर इनके अति प्रयोग से थोड़ा बचना बेहतर था | शुरू से अंत तक उपन्यास ने पठनीयता और कसाव को बनाए रखा है | चारों लेखिकाओं के लेखन में, भाषा, शैली और सोच के स्तर पर सामंजस्य बना रहा और कहीं भी नहीं लगा की इसे चार लोगों ने लिखा है | सकारात्मक अंत सुकूँन देता है पर माँ के लिए एक तड़प छोड़ जाता है |

1 टिप्पणी

  1. शिवना प्रकाशन से प्रकाशित हाशिए का हक के साझा प्रयासों ने उपन्यास महत्वपूर्ण बना दिया है। राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी जी का एक ईंच मुस्कान याद आ गया।
    सराहनीय समीक्षा की गई है।

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