समीक्षा - कीलें (कहानी संग्रह - एस.आर. हरनोट )  - अनिल सोनी     5

कीलों की चुभन  (समीक्षा)   – अनिल सोनी    

एस.आर. हरनोट को उनके कहानी संग्रह दारोश एवं अन्य कहानियां के लिये अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान से अलंकृत किया जा चुका है।           

(कहानी संग्रह, लेखकः एस.आर. हरनोट, प्रकाशकः वाणी प्रकाशन, अंसारी रोड, नई दिल्ली)

हिंदी साहित्य में एस.आर.हरनोट चर्चित नाम है. पिछले दिनों उनका वाणी प्रकाशन से नया कहानी संग्रह ‘कीलें’ प्रकाशित होकर आया है. इस संग्रह की सभी कहानियां सामाजिक वजूद से लड़ रही हैं। उस खोखलेपन की दीवारों से झांक रही हैं, जो हमें दिखाई नहीं देता या हम देखना नहीं चाहते। अपने संबोधन की परख में एस.आर. हरनोट की कहानियों का एक अलग परिवेश ‘कीलें संग्रह के मार्फत जो बता रहा है, उसकी चुभन से आम पाठक भी गवाह बन जाता है। ‘भागा देवी का चाय घर’ में कहानी के बीच चिंतन केवल चरित्र को नहीं, बल्कि पर्यावरण को भी उकेर देता है। कथानक के भूगोल, अर्थशास्त्र, सांस्कृतिक परिदृश्य और सामाजिक आवरण पर वक्त के छींटे दिखाई देते हैं, तो औरत के माथे पर लगे टीके से बहता मेहनत का पसीना स्पष्ट हो जाता है। अनगढ़े पत्थरों पर जैसे करीने से कोई मूरत बनाकर हरनोट ने कहानी के बीच पर्यावरण को समेट लिया हो। यह लेखक की सदा खूबी रही है कि एक साथ सामाजिक दर्पण में भी प्रकृति के अनेक रिश्ते प्रतिबिंबित होते हैं।
‘कीलें’ महज एक प्रश्न नहीं, बल्कि हजारों प्रश्नों का घेरा है, जो अनंतकाल से हम सभी के आसपास रहा है। जिंदगी के ढकोसलों से बाहर जीवन की मर्यादा खोजती कहानी का संघर्ष नापाक रूढिय़ों से है और अंत में सवाल उसी देवता से जिसने खुद को भी किसी न किसी कवच में रखा है। सामाजिक विराम से आगे चिंतन की ये ‘कीलें’ उद्वेलित करती हैं और कहीं विश्वास की छाती में घुसी कील से मुखातिब होने का दंड भी रेखांकित है।
‘फूलों वाली लड़की’ में हम कहानी से कहीं अधिक शारीरिक भाषा से जो सुनते हैं, उससे संवेदना के कान फट सकते हैं। कहानी की सादगी व सौम्यता में ही नारी सम्मान का संघर्ष जब भिखारियों के बीच समाज को पनाह देता है, तो ऊंचे ओहदे व उच्च पदस्थ प्रतिष्ठा भीगी बिल्ली बनकर आंख मूँद लेती है। जाहिर है हरनोट की कहानियां सामाजिक अवलोकन की तह पर जमी फंफूद को हटाने से वृतचित्र सी कलम बन जाती हैं और ‘भीख मांगते जीवन की कटोरी में’ अपना अक्स खोज लेती हैं।
‘लोहे का बैल’ तो हर पाठक के करीब खड़ा है, बस इसे छूने की देरी भर है। महत्वकांक्षा की पतंग ऊपर चढ़ाते हुए हम यह भूल जाते हैं कि यह आकाश तक पहुंचने की हवा नहीं डोर पर चढ़े मांजे से घायल होने की कवायद है। जीवन की खाइयों के बीच का कंद्रन, रिश्तों के बदलते संबोधनों का घर्षण, पहचान का संघर्ष और गिड़गिड़ाते हैसियत के नकाब हमसे कुछ पूछ रहे हैं। यहां जातीय छलांग का कोहराम गूंजता है, तो पूरे युग के कान बंद हो जाते हैं। कमोबेश हरनोट की हर कहानी में अनेक बिंदुओं से विमर्श और वार्तालाप होता है।
‘पत्थर का खेल’ मानवीय प्रवृत्ति के परिवर्तन में अपने आसपास की दुर्गंध के प्रतीकों की पत्थरबाजी ही तो है, इसलिए समीक्षा - कीलें (कहानी संग्रह - एस.आर. हरनोट )  - अनिल सोनी     6जातियों की विभाजक रेखा पर कहानी का मोम पिघलता है, तो समाज के पांव दर्द से कराह उठते हैं। लेखक ‘सीतु’ के निर्लिप्त मन से लिखता हुआ उस चौराहे तक पहुंच जाता है, जहां ढोंग और फरेब ही मानवता के गहने बन रहे हैं। मनुष्य जीवन के मिजाज पर जख्मों से लबरेज यह कहानी हमारे बीच के पत्थरबाजों को ढूंढ ही लेती है। यहां मानसिक चिंगारियां यूं यकायक ‘आग’ नहीं बनतीं, बल्कि उनके साथ माहौल का ईंधन अपना काम करता है।
‘आग’ कहानी के इर्द-गिर्द का ताप कई भट्टियों पर चढ़ा है, तो प्रसंगवश यह कहानी दाभोलकर, पंसारे और प्रो. कुलबुर्गी की हत्याओं के कारण ढूंढते हुए समाज के तमाम पर्दे हटा देती है। कहानी के भीतर भारत के कई युग और आंदोलन, धर्म के मुसाफिर और ठेकेदार, लेकिन लेखकीय सरोकारों पर देश की चश्मदीद गवाही अंत में फिदा हो जाती है।
‘फ्लाई किल्लर’ मात्र एक दृष्टांत नहीं, बल्कि मौत के घेरे में जिंदगी का पूरा वाकया है। कहानी की आंखों में हजारों क्रांतियां तैरती हैं, तो जाहिर तौर पर लेखक की भीतरी जद्दोजहद को रोक पाना मुश्किल है। न जाने कितने पोस्टर, सूचनाएं, नीतियां अपनी विफलताओं से उलझ रही हैं। कहानी में ‘पैसों के बोझ की थकान’ का जिक्र हर उस जिगर से पूछ रहा है जो देश के पैगंबर बनकर, समाज का अंतिम सौदा करने पर उतारू रहते हैं।
कुल सात कहानियों से सजे इस संग्रह में आसपास की कीलों पर चोट करते, सपनों की मशक्कत और यथार्थ की टूटन से गुजरते संवेग की नई परिभाषा हरनोट ने गढ़ी है, जो मौलिक तथा मर्मस्पर्शी है। इन कहानियों में आप खुद को टटोल सकते हैं या ऐसा बहुत कुछ चुन सकते हैं, जो भाषा की संवेदना को नए प्रयोगों की माटी प्रदान कर रहा है।
एसआर हरनोट की कहानियां समय के तात्कालिक प्रभाव-दबाव, असमानता और मानवीय चिंताओं के बीच साहित्यिक विवेक की चुप्पी को तोड़ती हैं। नागरिक कर्तव्यबोध बोध की साझेदारी में उनके लेखन की वफादारी समय, समता, भाषा, स्वतंत्रता और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता का सबूत बन कर दर्ज होती है। हर कहानी में अनेक बिंदू-विमर्श तथा बेताबियां हैं, तो मानवीय उत्थान की तहों में फंसी खुरचनें यथार्थ को स्वीकार करती हैं।
इन कहानियों में जीवन का मूल्यांकन, वैचारिक सघनता से होता है और इसी तरह समय को सीधे और बेलौस कहने का उनका अपना एक खास अंदाज फिर सामने आता है। हमारे आसपास के परिदृश्य में घूमता कहानियों का मंचन, सामाजिक विडंबनाओं से उपजे भ्रष्ट रिश्तों और मानसिक चिंगारियों से निकलते आग के दरिया में पहचान का संघर्ष देखता है, तो इन ‘कीलों’ के नीचे आत्मसम्मान का सिर खोजना होगा। गरीबी-अमीरी की विषमताओं के साक्ष्यों को बुनता यह संग्रह, किसी ‘आइडियोलोजी’ विशेष का गवाह माना जा सकता है, लेकिन समाज में व्यवस्था के सिद्धांतों पर चिंतन को शिखर तक पहुंचाने की कसौटियां इसे सार्थक संवाद की प्रस्तुति बना देती हैं। तब यह संग्रह बौद्धिक बहस के खुले आकाश में इतना कुछ लिख देता है कि हम चीखते मंजर से नए साहित्यिक इतिहास की कोमल सी मंजरी चुन लेते हैं।
हिमाचल जैसे पहाड़ी क्षेत्र की साहित्यिक धाराओं को तसल्ली से छूना हो, तो एसआर हरनोट की सृजनशीलता के मर्म में अनेक स्रोतों का प्रभाव पाठक को अद्वितीय जवाबदेही से भर देता है। लेखक वास्तव में कई प्रगतिशील आंदोलनों की हिस्सेदारी में लिखते हुए अपनी भूमिका के अनेक अक्स पैदा करता है, जहां कहानी केवल एक वैचारिक परिधि नहीं, बल्कि साहित्य चेतना का संगठन खड़ा कर देती है। सामाजिक बैसाखियों के लडख़ड़ाते सफर पर चोट करतीं अनेकों कीलें एक साथ दिशाओं के परिवर्तन की हामी भरती हैं, इसलिए संग्रह अपने कथानक से पैदा विषाद को कहीं दफन करके अंत में हर द्वन्द के बाहर जीने की संभावनाएं पैदा कर देता है। लेखन का सकारात्मक पक्ष मनुष्य और प्रकृति के बीच ऊर्जा का संतुलन और भाषाई क्षमता के ओजस्वी संदर्भों से जो लॉजिक पैदा करता है, वहां संग्रह की प्रासंगिकता व स्वीकार्यता बढ़ जाती है। निसंदेह दारोश, मिटटी के लोग, जीनकाठी, लिटन ब्लाक गिर रहा है कहानी संग्रहों और उपन्यास हिडिम्ब की तरह यह संग्रह भी खूब पढ़ा जायेगा.
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अनिल सोनी वरिष्ठ लेखक और पत्रकार हैं. वे इन दिनों हिमाचल प्रदेश धर्मशाला में हिमाचल प्रदेश के प्रतिष्ठित दैनिक समाचा पात्र ‘दिव्य हिमाचल’ में बतौर सम्पादक कार्यरत हैं.
एस.आर. हरनोट के अब तक 13 कहानी संग्रह एवं दो उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं।
संपर्कः E mail:    harnot1955@gmail.com Mobile: 00-91-98165 66611        
 

 

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