- डॉ. सुषमा देवी
नालंदा विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान, शिक्षा और संस्कृति की प्राचीन परंपरा से सम्बद्ध है। वर्तमान समय में यह विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों और विभिन्न देशों के विद्वानों के लिए आकर्षण का केंद्र है। ऐसे वैश्विक शैक्षिक वातावरण में हिंदी की भूमिका विशेष महत्त्व रखती है। हिंदी आज केवल भारत की भाषा नहीं है, बल्कि विदेशों में भी विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थाओं, प्रवासी समुदायों और डिजिटल माध्यमों के द्वारा इसका अध्ययन और प्रयोग बढ़ रहा है। नालंदा विश्वविद्यालय में हिंदी की स्थिति को समझने के लिए इसे भाषा, साहित्य, भारतीय संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय संवाद के परिदृश्य में देखना उचित होगा। विश्वविद्यालय का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप विदेशी विद्यार्थियों को भारतीय समाज और संस्कृति से परिचित कराने में हिंदी को उपयोगी माध्यम बना सकता है। विशेष रूप से वे विद्यार्थी जो भारत की संस्कृति, साहित्य, इतिहास और समाज को निकट से समझना चाहते हैं, उनके लिए हिंदी का ज्ञान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
विदेशी विद्यार्थियों के लिए हिंदी केवल संचार की भाषा नहीं है। हिंदी सीखने के माध्यम से वे भारतीय जीवन-पद्धति, सामाजिक व्यवहार, साहित्य, सिनेमा और संस्कृति को अधिक गहराई से समझ पाते हैं। विदेशों में भी हिंदी का अध्ययन भाषा के साथ भारतीय संस्कृति और साहित्य से जोड़ा जाता है। नालंदा जैसे अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी शिक्षण को इसी व्यापक दृष्टिकोण के साथ विकसित किया जा रहा है। आरंभिक स्तर पर दैनिक बातचीत, परिचय, परिवार, भोजन, यात्रा और विश्वविद्यालय जीवन से संबंधित हिंदी सिखाई जाती है। उन्नत स्तर पर साहित्य, संस्कृति, अनुवाद और भारतीय समाज से जुड़े विषयों को शामिल किया जा सकता है। हिंदी साहित्य विदेशी विद्यार्थियों को भारतीय समाज की विविधता और संवेदनशीलता समझने का अवसर देता है। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक और संस्मरण के माध्यम से विद्यार्थी भारतीय जीवन के विभिन्न पक्षों से परिचित हो सकते हैं।
वर्तमान समय में प्रवासी हिंदी साहित्य ने भी हिंदी की विषय-वस्तु को व्यापक बनाया है। इसमें प्रवास, पहचान, सांस्कृतिक स्मृतियाँ, पीढ़ियों का अंतराल, बहुसांस्कृतिक जीवन और भाषा-संकट जैसे विषय प्रमुख हैं। नालंदा विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय वातावरण में ऐसे साहित्य का अध्ययन विद्यार्थियों को हिंदी के वैश्विक स्वरूप को समझने में सहायक बन रहा है। नालंदा की ऐतिहासिक पहचान को देखते हुए हिंदी को भारतीय संस्कृति से जोड़ना विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। हिंदी के माध्यम से विद्यार्थी भारतीय त्योहारों, लोक-संस्कृति, दर्शन, साहित्य, संगीत, सिनेमा और सामाजिक जीवन को अधिक गहराई से समझ सकते हैं। इस दृष्टि से हिंदी केवल एक भाषा-विषय न होकर भारतीय संस्कृति को समझने का माध्यम बन रही है।
हिंदी के अंतरराष्ट्रीय विकास में अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका है। हिंदी साहित्य का अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी भाषाओं में अनुवाद और विदेशी साहित्य का हिंदी में अनुवाद अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक संवाद को मजबूत करता है। नालंदा विश्वविद्यालय में हिंदी और विश्व साहित्य अध्ययन को बढ़ावा देने से अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों को भारतीय साहित्य से जुड़ने का अवसर मिल रहा है। इससे हिंदी का अकादमिक और वैश्विक महत्त्व भी बढ़ेगा। आज हिंदी सीखने और पढ़ने के लिए केवल पारंपरिक कक्षा पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। ई-पुस्तकें, ऑनलाइन पत्रिकाएँ, वीडियो, पॉडकास्ट, डिजिटल साहित्य और सोशल मीडिया हिंदी के नए पाठक और विद्यार्थी तैयार कर रहे हैं। नालंदा विश्वविद्यालय में डिजिटल हिंदी शिक्षण सामग्री, ऑनलाइन हिंदी कक्षाएँ, हिंदी साहित्य का डिजिटल संग्रह और बहुभाषी ई-संसाधन विकसित किए जा रहे हैं। इससे विदेशी विद्यार्थियों के लिए हिंदी सीखना अधिक सहज और आकर्षक बनता जा रहा है।
वर्तमान में स्नातकोत्तर हिंदी कार्यक्रम भारतीय और विदेशी विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर बनाया गया है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो हिंदी-भाषी और अहिंदी-भाषी क्षेत्रों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन से जुड़े हैं। पाठ्यक्रम में भाषा-शिक्षण, भाषावैज्ञानिक पक्ष, हिंदी के सामाजिक प्रयोग तथा हिंदी साहित्य को स्थान दिया गया है। विश्वविद्यालय वर्तमान में पीएच.डी. में हिंदी को स्थान भी प्रदान कर रहा है। इससे हिंदी में उच्च स्तरीय शोध और अकादमिक अध्ययन को संस्थागत आधार मिलने की पूर्ण संभावना है। हिंदी सीखने के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए एकसत्रीय का हिंदी प्रवीणता प्रमाण-पत्र कार्यक्रम के माध्यम से दर्जनों देश के विद्यार्थी जुड़े हुए हैं, जिसके अंतर्गत हिंदी पढ़ना, लिखना, सुनना और बोलना तथा दैनिक जीवन में सरल हिंदी वाक्यों का प्रयोग करना सिखाया जाता है। विश्वविद्यालय हिंदी में डिप्लोमा कार्यक्रम भी संचालित कर रहा है। ध्यातव्य रहें कि इन हिंदी कार्यक्रम का उद्देश्य साहित्य से अधिक विद्यार्थियों को व्यावहारिक परिस्थितियों में हिंदी के प्रयोग और हिंदी भाषा-शिक्षण के विभिन्न पक्षों से परिचित कराना है। जो नालंदा के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। विश्वविद्यालय के भाषा कार्यक्रमों में भाषा के साथ सांस्कृतिक संदर्भ, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और समाज-भाषावैज्ञानिक पक्षों पर भी ध्यान दिया जाता है। यहाँ हिंदी को केवल संचार की भाषा न मानकर उसके सांस्कृतिक संदर्भ को विशेष महत्त्व दिया जाता है। विश्वविद्यालय का उद्देश्य विद्यार्थियों को विभिन्न भाषाओं के संसाधनों तक पहुँच के साथ हिंदी को अंतरभाषिक और अंतरराष्ट्रीय संवाद से जोड़ने का अवसर प्रदान करना है। नालंदा विश्वविद्यालय में हिंदी को मजबूत करने का प्रयास एक ही स्तर पर नहीं, बल्कि प्रमाणपत्र, डिप्लोमा, एम.ए., पीएच.डी. तथा पोस्ट डॉक्टरल जैसी अकादमिक संरचना के माध्यम से संचालित किया जा रहा है। इसके साथ विदेशी विद्यार्थियों के लिए व्यावहारिक हिंदी, भाषा-संस्कृति अध्ययन आदि पर भी विशेष बल दिया जा रहा है। यह व्यवस्था हिंदी को स्थानीय भाषा से आगे बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय अकादमिक और सांस्कृतिक संवाद की भाषा बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है।
हिंदी आज केवल भारत की भाषा नहीं रह गई है। भारत की भौगोलिक सीमाओं से बाहर निकलकर हिंदी ने अनेक देशों में अपनी सांस्कृतिक, शैक्षिक और साहित्यिक उपस्थिति दर्ज कराई है। प्रवासी भारतीय समुदायों, विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थाओं, साहित्यिक संगठनों और आधुनिक संचार माध्यमों ने हिंदी के अंतरराष्ट्रीय विस्तार को नई गति प्रदान की है। अमेरिका, मॉरीशस, फिजी, नेपाल, ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, सूरीनाम, त्रिनिदाद एवं टोबैगो तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में हिंदी का अध्ययन, अध्यापन और साहित्य-सृजन अलग-अलग रूपों में विकसित हुआ है।
नालंदा प्राचीन भारत में ज्ञान और अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संवाद का ऐसा केंद्र था, जहाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ-साथ दूर-दूर के देशों से विद्यार्थी और विद्वान अध्ययन के लिए आते थे। इस दृष्टि से नालंदा भारतीय ज्ञान-परंपरा के उस वैश्विक चरित्र का प्रतिनिधित्व करता है, जिसकी आधुनिक अभिव्यक्ति आज हिंदी के अंतरराष्ट्रीय विस्तार में दिखाई देती है। नालंदा की परंपरा हमें यह समझने में सहायता करती है कि भारत में ज्ञान का प्रसार कभी केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहा। प्राचीन काल में जिस प्रकार भारतीय दर्शन, बौद्ध चिंतन, तर्कशास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा और अन्य ज्ञान-विषयों का संवाद भारत से बाहर तक पहुँचा, उसी प्रकार आज हिंदी भाषा और साहित्य भारतीय सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक अनुभव और साहित्यिक संवेदना को विश्व के विभिन्न समाजों तक पहुँचा रहे हैं। इस अर्थ में नालंदा से विश्व हिंदी तक की यात्रा भारतीय ज्ञान और संस्कृति की निरंतरता की यात्रा के रूप में देखी जा सकती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए नालंदा विश्वविद्यालय में ‘नालंदा परंपरा’ विषय को क्रेडिट व्यवस्था की तरह अपरिहार्य विषय के रूप में पढ़ाया जा रहा है |
आज अमेरिका में हिंदी भाषा, साहित्य और दक्षिण एशियाई संस्कृति का अध्ययन विश्वविद्यालयों में हो रहा है। प्रवासी भारतीय समुदाय की नई पीढ़ियाँ हिंदी को अपनी सांस्कृतिक विरासत, परिवार, त्योहार, संगीत, सिनेमा और साहित्य से जोड़ रही हैं। प्रवासी साहित्य में पहचान, भाषा-संकट, पीढ़ियों के अंतर, बहुसांस्कृतिक जीवन और भारतीय-अमेरिकी संबंध जैसे विषय उभर कर सामने आ रहे हैं। डिजिटल माध्यमों ने भारत और अमेरिका के हिंदी पाठकों तथा लेखकों के बीच दूरी को और कम किया है। यह स्थिति नालंदा की उस अंतरराष्ट्रीय ज्ञान-परंपरा की आधुनिक प्रतिध्वनि प्रतीत होती है, जिसमें ज्ञान का आदान-प्रदान सीमाओं से परे जाकर होता था। अंतर केवल माध्यम का है।
मॉरीशस में हिंदी का संबंध भारतीय मूल की आबादी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्मृतियों से जुड़ा हुआ है। महात्मा गांधी संस्थान ने हिंदी भाषा और साहित्य के संरक्षण तथा विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वहाँ हिंदी में कविता, कहानी, नाटक, शोध-लेख, यात्रा-वृत्तांत और अन्य साहित्यिक सामग्री प्रकाशित होती है। मॉरीशस के लेखक स्थानीय जीवन, सामाजिक अनुभव और बहुसांस्कृतिक परिवेश को हिंदी में अभिव्यक्त करते हैं। मॉरीशस का उदाहरण यह बताता है कि जब कोई भाषा किसी नए भौगोलिक परिवेश में पहुँचती है तो वह केवल अपने मूल रूप को सुरक्षित नहीं रखती, बल्कि वहाँ के सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभवों को आत्मसात करके नए साहित्यिक रूप भी ग्रहण करती है। आधुनिक विश्व हिंदी भी इसी संवादात्मक परंपरा को आगे बढ़ाती दिखाई देती है।
फिजी में हिंदी का विकास इस दृष्टि से और अधिक विशिष्ट है। भारतीय मूल के लोगों की ऐतिहासिक उपस्थिति के कारण वहाँ हिंदी की विभिन्न बोलियों ने अपना स्वतंत्र भाषिक रूप विकसित किया। फिजी हिंदी को केवल भारत की हिंदी का स्थानीय संस्करण मानना पर्याप्त नहीं होगा, इसके अपने भाषिक और सामाजिक अनुभव हैं। हिंदी जहाँ-जहाँ पहुँची, वहाँ उसने स्थानीय समाज और संस्कृति के साथ संवाद स्थापित किया। इस प्रकार हिंदी का वैश्विक विस्तार केवल हिंदी को विदेशों तक पहुँचाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि विभिन्न समाजों के अनुभवों को हिंदी के व्यापक संसार में शामिल करने की प्रक्रिया भी है।
नेपाल में हिंदी के प्रसार की प्रकृति ऐतिहासिक और सांस्कृतिक निकटता के कारण अलग है। भारत-नेपाल के बीच आवागमन, व्यापार, पर्यटन, धार्मिक संपर्क और सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने हिंदी के लिए सहज वातावरण बनाया है। हिंदी फिल्मों, टेलीविजन, संगीत, साहित्य और डिजिटल माध्यमों ने भी इसकी समझ को विस्तार दिया है। नालंदा के संदर्भ में नेपाल का उल्लेख विशेष अर्थ ग्रहण करता है। प्राचीन भारत और हिमालयी क्षेत्र के बीच बौद्धिक तथा सांस्कृतिक संपर्कों की लंबी परंपरा रही है। ब्रिटेन में हिंदी का विकास भारतीय प्रवासी समुदाय, सामुदायिक संस्थाओं, सांस्कृतिक संगठनों, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों से जुड़ा है। विश्वविद्यालयी स्तर पर हिंदी दक्षिण एशियाई अध्ययन, भारतीय संस्कृति और तुलनात्मक साहित्य से जुड़ती है। जर्मनी में हिंदी का विकास मुख्यतः विश्वविद्यालयी अध्ययन, इंडोलॉजी, भाषाविज्ञान, साहित्य और शोध से जुड़ा है। हिंदी को भारतीय संस्कृति, इतिहास और दक्षिण एशियाई अध्ययन के संदर्भ में पढ़ाया और शोधित किया जाता है। विदेशों में हिंदी के विस्तार को नालंदा की परंपरा से जोड़ने का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार ज्ञान का मुक्त और अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान है। नालंदा का महत्व केवल इस बात में नहीं था कि वहाँ शिक्षा दी जाती थी, बल्कि इस बात में भी था कि वह विभिन्न क्षेत्रों और संस्कृतियों के विद्वानों के बीच संवाद का केंद्र था। आज हिंदी विश्वविद्यालयों, साहित्यिक संस्थाओं, विश्व हिंदी सम्मेलनों, अनुवाद परियोजनाओं और डिजिटल मंचों के माध्यम से इसी प्रकार का अंतरराष्ट्रीय संवाद निर्मित कर रही है।
प्रवासी हिंदी साहित्य ने हिंदी की विषय-वस्तु को भी व्यापक बनाया है। अब हिंदी साहित्य में केवल भारत के गाँव, शहर और भारतीय सामाजिक संरचना ही नहीं, बल्कि लंदन, न्यूयॉर्क, टोरंटो, मॉरीशस, फिजी और यूरोप के विभिन्न समाजों के अनुभव भी प्रवेश कर रहे हैं। जिस भारत ने कभी नालंदा के माध्यम से ज्ञान को विश्व के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचाया था, वही भारत आज हिंदी के माध्यम से अपनी साहित्यिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना को वैश्विक समाज से जोड़ रहा है।
इंटरनेट ने हिंदी के अंतरराष्ट्रीय प्रसार को नई गति दी है। ऑनलाइन पत्रिकाएँ, ई-पुस्तकें, ब्लॉग, पॉडकास्ट, वीडियो व्याख्यान, सोशल मीडिया और डिजिटल साहित्यिक मंच विश्व के विभिन्न हिस्सों में नए हिंदी पाठक तैयार कर रहे हैं। विशेष रूप से प्रवासी युवाओं के लिए डिजिटल माध्यम हिंदी से जुड़ने का महत्त्वपूर्ण साधन बन गया है। इस डिजिटल युग में नालंदा की ऐतिहासिक पहचान को हिंदी के आधुनिक वैश्विक अभियान से जोड़कर एक नए सांस्कृतिक विमर्श की संभावना बनती है। इसलिए हिंदी के अंतरराष्ट्रीय भविष्य की योजना बनाते समय नालंदा को केवल अतीत की स्मृति के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान-संवाद, अंतरराष्ट्रीयता, बहुभाषिकता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। विदेशों में हिंदी के आधुनिक और रोजगारपरक पाठ्यक्रम, डिजिटल हिंदी सामग्री, अनुवाद, प्रवासी हिंदी साहित्य का दस्तावेजीकरण और विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ शैक्षिक सहयोग इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम हैं। अंततः भारत के बाहर हिंदी का विस्तार केवल भाषा के भौगोलिक विस्तार की कहानी नहीं है। यह भारतीय संस्कृति, स्मृति, पहचान, साहित्य और ज्ञान-परंपरा के वैश्विक प्रसार की कहानी है। अमेरिका, मॉरीशस, फिजी, नेपाल, ब्रिटेन और जर्मनी में हिंदी अलग-अलग सामाजिक और अकादमिक संदर्भों में विकसित हो रही है।
नालंदा प्राचीन भारत की उस विश्वदृष्टि का प्रतीक है जिसमें ज्ञान को किसी एक भूगोल की संपत्ति न मानकर व्यापक मानव समाज के लिए उपयोगी माना गया। नालंदा विश्वविद्यालय जैसे अंतरराष्ट्रीय शिक्षण संस्थान में हिंदी की भूमिका केवल एक भारतीय भाषा तक सीमित नहीं है, अपितु हिंदी भारतीय संस्कृति, साहित्य और ज्ञान-परंपरा को विश्व के विद्यार्थियों से जोड़ने वाली भाषा के रूप में है। विदेशों में हिंदी का विस्तार भी अब केवल प्रवासी समुदाय तक सीमित नहीं है, विश्वविद्यालय, शोध-संस्थान, अनुवाद और डिजिटल माध्यम इसके प्रमुख आधार बन रहे हैं। इसलिए नालंदा विश्वविद्यालय में हिंदी के विकास की अपार संभावनाएँ हैं।

डॉ. सुषमा देवी
असिस्टेंट प्रोफेसर, भाषा, साहित्य व् मानविकी संकाय, नालंदा विश्वविद्यालय, राजगीर-803116, बिहार, भारत,
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