Sunday, May 3, 2026
होमकवितासंतोष चौधरी की दस कविताएं

संतोष चौधरी की दस कविताएं

 (1)मेरा मौन

मेरा मौन
सालता है
तुम्हें
गाहे-बगाहे
शिकायत है
कि कुछ
नहीं बोलती हो
कैसी हो तुम
सोचा कभी
क्यूँ हुई ऐसी
चुप सी
खामोश सी
जिसका बोलना ही
उसका श्वांस था
जीवन प्राण था
आनंद था
सोचो कभी
उसी से नाता
क्यूँ छूटा
या छुड़वा दिया
नहीं समझोगे
क्या कह रहीं हूं
या शायद समझना
ही नहीं चाहोगे
इसके लिये
उतरना पड़ेगा
मेरे मौन के भीतर
गहरे तक
जो जम गया है
शिराओं में
अन्तस में
मन प्राण में
किसी भी
हलचल से
घबरा जाता है
मेरा मौन
दुबका रहना चाहता
वह सदैव ही
इसी आवरण में
छुप कर, छिप कर
मौन के कारण
करेंगे तुम्हारे
पुरुषत्व पर
गहरे घाव
और नकारेंगे
उसके कारणों को
सहन नहीं होंगे
तुम से किसी भी हाल
नियति समझ
स्वीकार चुका हैं
मेरा मौन
अपने भीतर
उतरे मौन को…
(2) मेरी स्त्री 
मेरी स्त्री
तुम्हारी
सोच से
अलहदा है
तुम्हारी नज़रो में शायद
अनपढ, गंवार है
गांव की है,
बोल कर ,मुंह बिचका देती हो
तुम
तुम्हें समझ आती है
सिल्क और कोटन कलफ से
भरी भरी प्रिन्ट वाली
बनारसी या वरली डिजायन में
सजी सजी स्त्रियां,
जो अन्याय और अत्याचार के
विरोध में
धरनों , सम्मेलनो या सेमिनारों में
गला गला फाड फाड के
टी. वी. और सोशल मीडिया पर बहस करती है
और ए. सी. जरा तेज करना
ये हिदायते देती है,
पर मेरी स्त्री
चोटी से ऐडी तक
पसीने से भरी
घर, बाडे का काम सलटा कर
लहंगे की लावण में फंसे
भरुंट निकालती निकालती
सूरज के उगने के साथ साथ
पंहुच जाती है
खेत में,
नरेगा में
कमठे पर, या केर तोडने
नही फुर्सत उसे
पल की, क्षण की
ये भी नही सोचने की
कि क्या कर रही है वो
वो बस एक तार से बन्धी ज्यूं
अपने घर, बच्चे
बाडे, धावों और
खेतों की फसलों में
अपना कल देखती है,
मूंग की फलियों का
पीलापन
उसे चिन्ता में डालता है
खुद के नाखूनों की पिलास
उसे नहीं दिखती,
पशुओ के लगे
चिचंडो को अपने हाथों से
हटाती है, उसे खुद को
मच्छर कभी नही खाते
पाणत से गळी
पति की हांथो पैरो की उंगलियों को देख
उसकी आंख पनीली होती है
खुद की बैवइंया पडी ऐडीया
नहीं महसूसती,
बच्चों को चूरमा खिला
खुद चटनी रोटी में सन्तुष्ट है,
उसके लिये महत्वपूर्ण है
बच्चों का बस्ता
धावों का चारा
पति की चिलम
इस सब के बीच
खुद की महावारी की चिन्ता
या पेढू का दरद
वह भुला देती है
समय नहीं उसें
बहस कर, अपने अधिकारों का ढिंढोरा पिटे,
अपने कन्धे पर रखी
कस्सी के बल पर
वह उसे मिले हुये है,
वह सिर्फ एक स्त्री नहीं
एक पूरी स्त्री है,
मेरी स्त्री तुमसे
अलहदा है…
(3) संजो लूं
रुक जाये
ये बीतता वक्त
बांध लूं
ओढणी के
पल्ले में
समय के
दाने अनमोल
ताउम्र संजो लूं
कुछ यादों के मोती
तेरी सीपी से निकाल
हथेलियों में
महसूस करुं तेरी
गरमाहट
जिंदगी की गहरी
असीम रात आने तक…
(4) मन
समझ नारी मन को
तभी समझ पायेगा
उसकी चाहना को
प्रेम करता है उसे
ये ओर बात है पर
सिर्फ प्रेम नहीं पर्याप्त
कामनाओं को उसकी समझो
तो कोई बात है
उसके कहने पर समझे
तो क्या समझे
समझे उसके मौन को
तो कोई बात है
मौन को समझ कर ही
समझ पायेगा मन को…
(5) रंगो का साथ 
रंगो का साथ भाता है उसे
हर रंग को सजाना चाहती है वो
हर तरफ बस रंग ही रंग चाहिये
चटक, चमकीले, फैलते हुये
सोचती है सारा दिन
बस रंगो की दुनिया में बस जिये
इनमें खो जाये
इन्हें पहने, ओढे और अपने
जीवन के कैनवास पर
ये चटक रंग भर दे
सारी दुनिया की रंगत
उसकी मांग से होते हुए
बिछिया की आखरी पोर
तक समा जाये
मन भर गया है उसका
इस गहरे कत्थई रंग को
ओढ़ते,पहनते, हर समय
खुद को इस रंग में छुपाते
पर जहाँ जीने के अधिकार
पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा हो रहा
वहाँ ये ऊँचे घराने की
बाल विधवा कैसे
रंगो को सहेज पाये…
(6) नि: शब्द
रीते बरसों में
मौन को धारण कर लिया है!
कुछ पीड़ाओं के लिये
कोई शब्द नहीं बनते…
कुछ पीड़ाएं नि:शब्द रहने को ही अभिशप्त हैं !!
(7) अलविदा
 जाते समय
हल्के से मेरे हाथ पर
अपना हाथ धर कर
आंखों से
अलविदा कह गये तुम
तुम्हारी मौन मुस्कान के पीछे
बिछड़ने की पीड़ ने
स्पर्श किया था
मेरी हथेली को
तब से
अब तलक
उस हथेली में
तुम्हारी हथेली की गरमास संग
गीलापन भी महसूस कर रही हूं…
(8) जीवन भ्रम
 जब कभी भी चाहा कि बस यही तक कि तलाश थी
वो और दूर तलक होता गया
कोई भ्रम नहीं पाला कभी
अगर हुआ भी कोई भ्रम तो वो समय की परतों संग किरचों में बिखरा बिस्तर की सलवटों के नीचे दबा कुचला मिला
सुक्षुप्त अभिलाषाएं अपने प्रारब्ध तक जा जा कर लौट आई
कठोरता के आवरण से ढका रहता है मन का वो कमजोर कोना जो गाहे-बगाहे बहते पानी में नमकीनियत घोलता रहता है
एक कोने की तलाश की जहां आवाज के शोर को भी पूरा सुन ले
लगे नहीं की पल्लू को ठोंस कर दांतों के बीच कब तलक दबा कर रखना होगा
और कलेजे में धंसे गुब्बार को उखड़ी हिचकियों संग शांति मिले
हर समय अनजान की अदृश्य उपस्थिति कलेजे में फांस की तरह अटकी रही
हंसी की फुहारों संग उड़ा दिया सारा विषाद
पीड़ की प्रतिछाया को नहीं छितरने दिया आस पास
उद्भ्रांत चित्त को मौन की गगरी में
उड़ेलकर
चाहा कि अंतस की ज्वालाओं के ओर छोर को
मौन की गगरी से शीतल रख सकूं
भ्रम मिथ्या होते है
जीवन भ्रमों का मकड़जाल है….
(9) लौटना तुम्हारा
लौटते हुये तुम नहीं सोचते हो
कुछ भी
बस
लौट जाते हो,
कोई क्षण, कोई अहसास
कोई पल, कोई स्पर्श
नहीं रखते हो
अपनी स्मृतियों में
लौटने के साथ
दे जाते हो
सारी पीडायें,
बिखेर आते हो
कोमल स्पर्श को,
झंझौड आते हो
हर पल को,
खुरच आते हो
हर अहसास को,
पर तुम,
फिर से,
फिर से, लौटते हो
लौटना तुम्हारें लिये
होता है
एक स्फूर्तित अवसर
लेकिन, तुम्हारें लौटने पर
वो,
पाती है
दग्ध ह्दय में
पहले के ही छोडे हुये घावों को,
कुरेदे हुये अहसासो को,
लिजलिजे स्पर्श का भान होता है उसे,
चाह कर भी वो
तुम्हारा लौटना
स्वीकार नहीं कर पाती है।
(10) मन के खाली बर्तन
मन के खाली बर्तन
बजते है
सावनी बरसातों में
ज्यूं बजती थी
काँसे की तसली
पर टप्प से गिरती
पहली सावनी बूँद
इंतजार का घरौंदा
घनघोर बारिश में
टूट कर बिखर जाता
पत्ते कहीं, मेड कही
वैसे ही
मन की
मेड बह जाती है
बरसती बूँदो संग
होठों पर आता है
नमकीन स्वाद
बीच बीच में
भिगते हुये…..
  • संतोष चौधरी
एम ए हिंदी साहित्य, बी एड, जोधपुर, राजस्थान।
हिन्दी और राजस्थानी में लेखन।
कृतियां–“मेरा मौन” काव्य संग्रह हिन्दी कवितायें, “रात पछै परभात” राजस्थानी उपन्यास, “काया री कळझळ” राजस्थानी कहानी संग्रह।
RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest