Wednesday, October 7, 2026
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विचारों की दुनिया में बढ़ती असहिष्णुता : जब असहमति अपराध बन जाए

डॉ. सुशील शर्मा

सोशल मीडिया ने मनुष्य को अभिव्यक्ति का ऐसा विस्तृत मंच दिया है, जिसकी कल्पना कुछ दशक पहले तक कठिन थी। अब किसी छोटे से नगर में बैठा व्यक्ति भी अपने विचार कुछ ही क्षणों में हजारों लोगों तक पहुँचा सकता है। यह लोकतांत्रिक संवाद की दृष्टि से एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इसी सुविधा के साथ एक चिंताजनक प्रवृत्ति भी तेजी से उभरी है। लोग अपने विचारों, आस्थाओं और राजनीतिक मान्यताओं को केवल व्यक्त ही नहीं करना चाहते, बल्कि दूसरे से भी उसी रूप में स्वीकार करवाना चाहते हैं। असहमति सामने आते ही संवाद का स्थान आक्रोश ले लेता है और तर्क की जगह आरोप, उपहास, गाली तथा बहिष्कार दिखाई देने लगता है।

समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब व्यक्ति यह मानने लगता है कि जो मैं मानता हूँ, वही अंतिम सत्य है और जो मुझसे सहमत नहीं है, वह गलत ही नहीं बल्कि मेरा विरोधी है। आस्था व्यक्तिगत हो सकती है, विचारधारा व्यक्तिगत हो सकती है, राजनीतिक पसंद व्यक्तिगत हो सकती है, किंतु किसी दूसरे मनुष्य को अपनी मान्यता स्वीकार करने के लिए बाध्य करना सामाजिक जीवन की स्वस्थ परंपरा नहीं है।

आस्था से आग्रह तक और आग्रह से आक्रामकता तक

किसी व्यक्ति का अपनी आस्था के प्रति गहरा अनुराग स्वाभाविक है। वह चाहता है कि दूसरे लोग भी उसके विश्वास की सुंदरता और महत्ता को समझें। समस्या तब शुरू होती है जब यह इच्छा आग्रह में बदलती है और आग्रह धीरे धीरे अधिकारबोध में परिवर्तित हो जाता है।

फिर मन में एक अदृश्य रेखा खिंच जाती है।जो मेरे साथ है, वह अपना है और जो मेरे विचार से अलग है, वह विरोधी है।

यहीं से संवाद का अवसान आरंभ होता है। धर्म, दर्शन, राजनीति, साहित्य और सामाजिक प्रश्नों पर मतभेद मनुष्य की बौद्धिक यात्रा का स्वाभाविक हिस्सा हैं। भारतीय चिंतन परंपरा तो प्रश्न करने और तर्क करने की समृद्ध परंपरा रही है। उपनिषदों से लेकर शास्त्रार्थ की परंपरा तक, विचारों का परीक्षण संवाद के माध्यम से होता रहा है। वहाँ मतभेद को शत्रुता नहीं माना गया। आज विडंबना यह है कि हाथ में ज्ञान के सबसे बड़े साधन होने के बावजूद हम कई बार विचारों के स्तर पर अधिक असहिष्णु होते जा रहे हैं।

सोशल मीडिया और मनोवैज्ञानिक समूहबंदी

इस प्रवृत्ति के पीछे केवल व्यक्ति का स्वभाव जिम्मेदार नहीं है। सोशल मीडिया की संरचना भी इसमें भूमिका निभाती है। डिजिटल मंचों पर व्यक्ति प्रायः उन्हीं विचारों, लोगों और सामग्री के बीच अधिक समय बिताता है जो उसके पूर्व विश्वासों से मेल खाते हैं। धीरे धीरे उसे ऐसा लगने लगता है कि दुनिया का अधिकांश हिस्सा उसी की तरह सोचता है। जब कोई विपरीत विचार सामने आता है तो वह केवल एक अलग मत नहीं लगता, बल्कि अपने पूरे विश्वास पर हमला प्रतीत होता है।

मनोविज्ञान की भाषा में इसे पहचान आधारित समूहबंदी और पुष्टिकरण पूर्वाग्रह जैसी प्रक्रियाओं से समझा जा सकता है। मनुष्य स्वाभाविक रूप से ऐसी सूचनाओं को अधिक आसानी से स्वीकार करता है जो उसके पहले से बने विश्वासों के अनुकूल हों। विपरीत सूचना उसके भीतर मानसिक असुविधा पैदा कर सकती है। तब वह तथ्य की जाँच करने के बजाय उस व्यक्ति को ही गलत सिद्ध करने लगता है जिसने विपरीत बात कही है। यही कारण है कि बहस कभी कभी विषय से हटकर व्यक्ति पर आ जाती है।

विचार पर प्रश्न उठाने के बजाय व्यक्ति को अंधभक्त, चमचा, देशद्रोही, पाखंडी, कट्टर अथवा किसी अन्य अपमानजनक विशेषण से संबोधित किया जाता है। यह तर्क नहीं है। यह तर्क से पलायन है।

अपमान क्यों आसान लगता है?

जब किसी व्यक्ति के पास अपने मत के समर्थन में पर्याप्त तर्क नहीं होते, तब उसके सामने सामान्यतः दो रास्ते होते हैं। वह या तो अपने मत की समीक्षा करे अथवा सामने वाले व्यक्ति की विश्वसनीयता पर हमला करे। दूसरा रास्ता मनोवैज्ञानिक रूप से आसान होता है। किसी को गाली देना क्षणिक रूप से व्यक्ति को शक्ति का अनुभव करा सकता है। उसे लगता है कि उसने बहस जीत ली। वास्तव में उसने बहस को समाप्त कर दिया होता है।

इसके पीछे अहम् की रक्षा भी महत्वपूर्ण तत्व है। मनुष्य अपने विचारों को कई बार अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बना लेता है। तब विचार पर किया गया प्रश्न उसे अपने ऊपर किया गया प्रश्न प्रतीत होता है। परिणामस्वरूप वह तथ्य सुनने के बजाय स्वयं की रक्षा करने लगता है।

यहीं एक महत्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए।विचार पर असहमति व्यक्ति का अपमान नहीं है।और व्यक्ति का अपमान विचार का खंडन नहीं है।

साहित्य भी क्यों खेमों में दिखाई देने लगा है

साहित्य का स्वभाव मूलतः स्वतंत्रता का है। साहित्यकार यदि अपने समय से प्रश्न नहीं करेगा, रूढ़ियों को चुनौती नहीं देगा और मनुष्य के भीतर छिपे सत्य को देखने का साहस नहीं करेगा, तो साहित्य केवल प्रशस्ति बनकर रह जाएगा।

दुर्भाग्य से साहित्यिक जगत में भी कभी कभी वैचारिक खेमेबंदी दिखाई देती है। किसी लेखक की रचना को उसकी साहित्यिक गुणवत्ता के आधार पर देखने के बजाय यह देखा जाने लगता है कि वह किस विचारधारा के निकट है, किस समूह में बैठता है और किन लोगों से उसके संबंध हैं। ऐसी स्थिति में साहित्य का मूल्यांकन रचना से हटकर लेखक की पहचान से होने लगता है।

यदि कोई लेखक किसी स्थापित खेमे के अनुरूप नहीं लिखता तो उसे उपेक्षा, उपहास अथवा अपमान का सामना करना पड़ सकता है। किसी को अंधभक्त कह देना या किसी को किसी राजनीतिक खेमे का चमचा घोषित कर देना साहित्यिक आलोचना नहीं है। साहित्य में असहमति होनी चाहिए, लेकिन असहमति में भी सौंदर्य और शालीनता होनी चाहिए।

इस प्रवृत्ति का प्रभाव

असहिष्णुता का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि धीरे धीरे लोग बोलना बंद कर देते हैं। वे सोचते बहुत हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से कहने से डरते हैं कि कहीं किसी समूह की नाराजगी न झेलनी पड़े।

इससे समाज में वास्तविक संवाद समाप्त होता है और केवल एक जैसी आवाजों का शोर बचता है।दूसरा नुकसान यह है कि युवा पीढ़ी सीखती है कि किसी तर्क का उत्तर तर्क से नहीं, बल्कि लेबल लगाकर देना चाहिए। तीसरा नुकसान यह है कि समाज में अविश्वास बढ़ता है। मित्रता, साहित्यिक संबंध और सामाजिक संवाद भी विचारधारात्मक पहचान के आधार पर निर्धारित होने लगते हैं।

सबसे गंभीर क्षति लोकतांत्रिक संस्कारों की होती है। लोकतंत्र केवल मतदान की व्यवस्था नहीं है। लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण आधार यह भी है कि हम अपने से भिन्न व्यक्ति के अस्तित्व और उसके विचार रखने के अधिकार को स्वीकार करें।

इससे निबटने का रास्ता क्या है?

सबसे पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर बहस जीतना आवश्यक नहीं है। कुछ बहसें केवल इसलिए चलती रहती हैं क्योंकि दोनों पक्ष एक दूसरे को समझना ही नहीं चाहते।

दूसरा, प्रतिक्रिया देने से पहले यह देखना चाहिए कि सामने वाला वास्तव में क्या कह रहा है। उसके कथन को उसके सबसे कमजोर रूप में प्रस्तुत करके खंडन करना आसान है, लेकिन बौद्धिक ईमानदारी यह है कि उसके तर्क को उसके वास्तविक और मजबूत रूप में समझा जाए।

तीसरा, व्यक्ति और विचार को अलग रखना चाहिए। किसी विचार की आलोचना कीजिए, लेकिन व्यक्ति की गरिमा को सुरक्षित रखिए।

चौथा, सोशल मीडिया पर हर टिप्पणी का उत्तर देना आवश्यक नहीं है। मौन भी कई बार आत्मसम्मान की भाषा होता है। यदि सामने वाला तर्क नहीं, अपमान कर रहा है तो बातचीत समाप्त कर देना पराजय नहीं है।

पाँचवाँ, अपने भीतर यह साहस विकसित करना होगा कि कभी कभी हम भी गलत हो सकते हैं। यह स्वीकार करने की क्षमता बौद्धिक परिपक्वता की पहचान है।

और छठा, अपनी आस्था को इतना मजबूत बनाइए कि दूसरे की असहमति से वह असुरक्षित महसूस न करे। जो विश्वास केवल इसलिए सुरक्षित रहना चाहता है कि कोई उसके विरुद्ध प्रश्न न पूछे, उसे अपने भीतर संवाद की जगह बनानी चाहिए।

अंततः विचारों की स्वतंत्रता ही मनुष्य की गरिमा है।

हमारा समाज एकरूप समाज नहीं है और होना भी नहीं चाहिए। यहाँ अलग अलग धर्मों, दर्शन परंपराओं, राजनीतिक विचारों, साहित्यिक दृष्टियों और जीवन मूल्यों के लोग साथ रहते हैं। विविधता को समाप्त करके एकरूपता स्थापित करना संभव भी नहीं और स्वस्थ भी नहीं।

हमें यह समझना होगा कि मेरी आस्था का सम्मान तभी सार्थक है जब मैं दूसरे की आस्था के अस्तित्व का भी सम्मान कर सकूँ। मेरी विचारधारा की स्वतंत्रता तभी सुरक्षित है जब मैं दूसरे की असहमति की स्वतंत्रता को भी स्वीकार करूँ।

साहित्यकार का दायित्व किसी खेमे की जयजयकार करना नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के भीतर छिपे प्रश्नों को शब्द देना है। राजनीति का उद्देश्य भी विरोधी को शत्रु बनाना नहीं, बल्कि मतभिन्नताओं के बीच सार्वजनिक जीवन का संचालन करना है। सोशल मीडिया को भी यदि संवाद का माध्यम बनाना है तो हमें अपनी उँगलियों से निकलने वाले प्रत्येक शब्द के पीछे एक मनुष्य की उपस्थिति याद रखनी होगी।

असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी धड़कन है।

हमें अपने-अपने विश्वासों के साथ दृढ़ रहना चाहिए, लेकिन दूसरे के विश्वास के अस्तित्व से भयभीत नहीं होना चाहिए। विचारों का संसार तब सुंदर बनता है जब उसमें केवल अपनी आवाज नहीं, दूसरे की आवाज सुनने का धैर्य भी हो।

क्योंकि अंततः विचार मनुष्य को बड़ा बनाते हैं, लेकिन विचारों के प्रति विनम्रता मनुष्य को मानवीय बनाती है।

सुशील शर्मा, (गाडरवारा – मध्य प्रदेश)
Email: [email protected]
Mobile: +91 94246 67892

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