Saturday, October 3, 2026
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प्रेम जनमेजय का व्यंग्य-कैसे हो जजमान!

आजकल मेरा अपार्टमेंट-मोहल्ला रिटायर वाला हो रहा है। जिसे देखो, रिटायर हो रहा है। ये रिटायर हैं, पर टायर नहीं। टायर हो जाने से आदमी खुद तो घिसता ही है, अपने आसपास के लोगों को भी घिसता है। हाँ साहब, हमारे यहाँ सब नौकरीपेशा लोग हैं, राजनीतिपेशा नहीं हैं, जो कभी रिटायर ही नहीं होते, इसलिए टायर नहीं होते। इन रिटायर हुए सज्जनों के कारण अल्पमत में आए मेरे जैसे नौकरीपेशा लोगों के सामने अभूतपूर्व संकट आ गया है—अल्पमत में सरकारें तो चल सकती हैं, पर जिंदगी नहीं।

हम जब चाहे इन सज्जनों के द्वारा घेर लिए जाते हैं। जैसे अपनी शालीनता में हम घर आए मेहमान का स्वागत करने को विवश होते हैं, वोट माँगने आए हर दल के नेता को—‘वोट आपको ही देंगे’—कहने को विवश होते हैं, वैसे ही रिटायर हुए इन बुजुर्गों की हर बात सुनने को विवश होते हैं। आप दफ्तर में देर होने के कारण पत्नी को लताड़ते हुए बस पकड़ने को भाग रहे हैं कि अपार्टमेंट के गेट पर कोई न कोई आपको पकड़ लेता है और लगता है, अपने कार्यालयी अनुभव के किस्से सुनाने। बोस बाबू मौसम विभाग से रिटायर हुए हैं तो विश्वमोहन जी रक्षा मंत्रालय से। इसी प्रकार जगदीश बाबू वित्त मंत्रालय से और वासल बाबू शिक्षा-विभाग से, आदि, आदि, अनादि।

उस दिन मैं बोस बाबू के घेरे में आ गया। वे मुझे अपार्टमेंट के गेट पर अति-आवश्यक मुद्रा में समझा रहे थे—इस भारत देश का विसाल होना  अच्छा  लोगता है, पर मौसम-विभाग को भीषण संकट …  कोई एक-सा मौसम हो तो भालो.. एक बार घोषणा कौर दिया। अब देखो , गोवा, मुंबई या चेन्नई जैसा रोज्य पूरा  देश हो तो भालो कि न !  हर रोज्य का अलग ही मौसम कि न। जिस मौसम में उत्तरी रोज्यों में सोर्दी पड़ता ,  गोवा मुंबई या चेन्नई का लोग आनंद करता कि नई ।

   अभी शायद वे अपने मौसम-ज्ञान से मुझे और अधिक आतंकित करते, जैसे आजकल अमेरिका आतंकित कर रहा है। (वैसे कुछ ज्ञानियों को समझ नहीं आएगा कि अमेरिका भी आतंकित कर सकता है, पर…) उसी समय राजनीति शास्त्र एवं हथकंडों के विशेषज्ञ कुलदीप आहूजा ने मुझे बचाने की मुद्रा में थाम लिया। बोले—चाहे कहीं का कैसा भी मौसम हो, यह अच्छा है कि हमारे यहाँ प्रजातंत्र है और प्रजातंत्र का एक ही मौसम होता है—चुनाव। किसी भी प्रदेश का कैसा भी भौगोलिक मौसम हो, आजकल प्रजातंत्र की बदौलत पूरे देश का एक ही मौसम बचा है—चुनाव। जैसे एक समय में अंग्रेजों के राज्य का सूर्य नहीं डूबता था, वैसे ही इस महान भारत में आजकल चुनाव का सूर्य नहीं डूबता है। या तो चुनाव आने वाले होते हैं या फिर आ गए होते हैं।चुनाव का एक दिन निश्चित है पर चुनाव प्रचार के आरम्भ का कोई दिन निश्चित नहीं। जैसे वसंत आगमन से पूर्व बसंती हवा चलने लगती है वैसे ही चुनाव पूर्व लालची घोषणाओं की ब्यार चलने लगती है।

इस बीच पुरुषों के ब्यूटी पार्लर के विशेषज्ञ (पुराने जमाने की नाई की दुकानें , आजकल ब्यूटी पार्लर की संज्ञा से सम्मानित ) से पद-मुक्त हुए स्वराज बहादुर ने कहा—इस समय भारतीय राजनीति देश की जनता का सामूहिक मुंडन कर रही है। जिसे देखो, वह अपने उल्टे-सीधे उस्तरे से मूँडने में लगा हुआ है। जिसे मूँडने का अवसर नहीं मिल रहा है, वह किसी मूँडने वाले का दामन थामे चुनाव-सागर पार करने का जुगाड़ बिछा रहा है। चुनाव का यह सागर अत्यधिक बहुमूल्य है, अनेक रत्न जो इसमें छिपे हुए हैं। इन रत्नों को पाने के लिए ज्ञानीजन चुल्लू भर सागर में भी गोते लगाने को तत्पर हैं। कुछ तो थूक जैसे पवित्र पदार्थ को चाटने और उसमें, सुअवसर मिले तो, तैरने को दिलो-जान से तैयार हैं। अनेक नारायणी नेता  मनमोहिनी रूप धारण किए सत्ता-अमृत हड़पने की शतरंज बिछाए ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, जैसे न्यायालयीय असत्य में लिपटा बदसूरत सत्य।

आर्थिक प्रगति का सेंसेक्स चाहे डाउन हो ,धर्म का सेंसेक्स हाई है।

पूरी भारतीय राजनीति की व्याख्या दो शब्दों में की जा सकती है—नाई और जजमान। नाई उसे कहते हैं, जो मूँडने में जन्मजात सिद्धहस्त होता है और जजमान उसे कहते हैं, जो यह जानते हुए भी कि वह मुंडा जा रहा है, मुंडता है। वैसे नाई की हैसियत जजमान से कम आँकी जाती है, पर वह इतनी चतुराई से मूँडता है कि दिनों-दिन उसकी हैसियत बढ़ती जा रही है। नाई का दावा होता है कि वह अपने जजमान की खूबसूरती को बढ़ाने वाला सेवक है। वह उस्तरा लिए पीछा कर रहा है और जजमान पीछा छुड़ाने को दौड़ रहा है। हमारे ऐसे सेवक हर पाँच साल बाद, और आजकल सुना है, इनके मन में इतना सेवा-भाव भर गया है कि कुछ महीने बाद ही सेवार्थ उपस्थित हो जाते हैं। आपको जरूरत हो न हो, ये आपकी सेवा में हाज़िर होकर, करबद्ध प्रार्थना-गीत गाते हैं।

लोग सावन के अंधे होते हैं, मैं इन दिनों चुनाव का अंधा हूँ, मुझे चारों ओर चुनाव ही चुनाव नजर आ रहा है। कहीं चुनाव हो रहे हैं और कहीं होने वाले हैं। वो जमाना गया, जब देशसेवक पाँच साल में एक बार चुनाव लड़ लेते थे और लंबी तानकर सो जाते थे। आजकल तो राजनीति चौबीस घंटे की नौकरी हो गई है, साहब! दम मारने की फुरसत नहीं है। किसी पर कोई भरोसा नहीं रह गया है। न जाने कोई कब अपने प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री होने की घोषणा करवा दे और आपकी बरसों की प्रतीक्षा पर पानी फेर दे।

ऐसे में कैसे हो जजमान!

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