जेल का विशाल दरवाजा बंद ही रहा। उसके दाहिने पल्ले में बने छोटे से दरवाजे से जब वह सिर झुकाकर बाहर निकला, तब सांझ ढलने को थी। स्वाधीनता दिवस के अवसर पर सर्वोत्तम आचरण के कारण उसे आजीवन कारावास की निर्धारित अवधि पूरी होने से कुछ वर्ष पहले ही जेल से मुक्त कर दिया गया था। बरसों पहले जब वह हत्या के आरोप में इस जेल में आया था, तब से बाहर निकलने का अवसर उसे केवल अदालत में पेशी के लिए ही मिला था। हाथों में हथकड़ियाँ होतीं, साथ में पुलिसकर्मी होते और कुछ घंटों के लिए खुली हवा में साँस लेने के बाद वह फिर उसी जेल की ऊँची दीवारों के भीतर लौट आता। देखते-देखते पंद्रह वर्ष से अधिक समय बीत गया था।
आज पहली बार वह उन दीवारों के बाहर था- बिना हथकड़ी, बिना पहरेदार के। वह कुछ दूर पैदल चला और मुख्य सड़क पर पहुँचा। वहाँ से ई-रिक्शा लेकर रेलवे स्टेशन चला गया। जेब में वही थोड़े-से पैसे थे, जो उसने जेल में काम करके कमाए थे। एक सप्ताह पहले पत्नी बेटे के साथ उससे मिलने आई थी। बातचीत के दौरान उसने कहा था,’तारीख निश्चित हो जाए तो मैं तुम्हें लेने जरूर आऊँगी।’
लेकिन उसने उसे मना कर दिया था।’ नहीं, तुम मत आना। बेवजह खुद को और बेटे को परेशान करोगी। पैसा अलग खर्च होगा। इतने साल यहाँ बीत गए तो क्या मैं अपना घर भूल जाऊंगा, अपने घर तक अकेला नहीं पहुँच पाऊँगा?’
दोनों चुपचाप एकदूसरे को देखते रहे। उन्हें एकदूसरे की आँखों में अपने अक्स झिलमिलाते दिख रहे थे। सजा से उत्पन्न हुई बेइंतिहा दुश्वारियों और समय ने उनके चेहरों पर अपनी गहरी लकीरें खींच दी थीं। उनके बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे। आँखों की रोशनी भी पहले जैसी नहीं रही थी। बिना चश्मे के अब उन्हें साफ दिखाई नहीं देता था। पत्नी के श्वेत केशों के बीच मांग में सुर्ख सिंदूर की चमक में वह खो ही रहा था कि तभी उसने धीमे स्वर में कहा था- ‘इतने साल बीत गए, लेकिन तुमने ढंग का चश्मा नहीं लगवाया?’
यह सुनकर उसने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा,’तुम्हारे चश्में का भी तो वही हाल है।’
पत्नी कुछ नहीं बोली। बेटा पिता के कंधे को पकड़े शांत खड़ा था। पत्नी के चेहरे को देखते हुए वह सोचता रहा- समय चाहे जितना बीत जाए, आदमी अपना घर, पत्नी, बच्चों को कैसे भूल सकता है? और वह सम्मान, जिसके लिए उसने अपनी पूरी जिंदगी, हर खुशियां दाँव पर लगा दी।
उस दिन स्टेशन पहुँचने पर उसे रात नौ बजे पैसेंजर ट्रेन मिली। ट्रेन धीरे-धीरे, हर छोटे-बड़े स्टेशन पर रुकती हुई चल रही थी। साथ ही उसके भीतर भी एक ट्रेन चल रही थी, मगर खूब तेज़- पंद्रह वर्षों से अधिक समय से जेल में बीते एक-एक दिन की ट्रेन। जेल की लंबी-लंबी रातें। कठोर सीमेंटेड कोठरी, लोहे की सलाखें। जेल कर्मचारियों का कठोर व्यवहार। कैदियों के बीच होने वाली रंजिशें। हर छोटे काम के लिए भी सुविधा शुल्क की चिंता। और उन सबके बीच पत्नी से होने वाली मुलाकातें। हर मुलाकात कुछ देर के लिए उसे दुनिया से जोड़ती और फिर उसी दुनिया से अचानक काट देती थी।
पत्नी जब लौट जाती, तो उसके भीतर एक अजीब-सा खालीपन फैल जाता था। वह देर तक उस दिशा में देखता रहता, जिधर वह गई होती। उस रात भी ट्रेन की खिड़की से बाहर अँधेरे को देखते हुए उसके मन में एक ही इच्छा थी- ट्रेन इतनी जल्दी पहुँचे कि वह रात के अँधेरे में ही स्टेशन पर उतर जाए और सुबह होने से पहले घर पहुँच जाए। कॉलोनी के लोगों की नजरों से बचना चाहता था वह। उसे लगता था, लोग उसे देखते ही पहचान जाएँगे।
‘अरे, यही है वह आदमी… जिसने हत्या की थी।’
कोई कुछ नहीं कहेगा, मगर उनकी आँखें, चेहरे के भाव सब कुछ कह देंगे। कोई डरकर रास्ता बदल लेगा। कोई घर का दरवाजा भीतर से बंद कर लेगा। कोई खिड़की की ओट से उसे देखेगा। वह इस सबका सामना नहीं करना चाहता था। लेकिन स्टेशन पहुँचने का समय समझने में उससे गलती हो गई थी। ट्रेन रात दो-ढाई बजे नहीं, सुबह नौ बजे पहुँचने वाली थी। वह अपने निर्धारित समय से भी दस मिनट देर से पहुँची। ट्रेन से उतरकर वह प्लेटफॉर्म पर खड़ा रह गया। चारों ओर वह उजाला और चमकदार हो चुका जो उसे घंटों पहले ट्रेन की खिड़कियों से दिखना शुरू हो गया था।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि जेल से बाहर निकलना जितना कठिन था, उससे कम कठिन नहीं है घर तक लौटना। बड़े असमंजस में स्टेशन पर ही फ्रेश होकर उसने बाहर एक छोटे-से रेस्टोरेंट में चाय-नाश्ता करने का निश्चय किया। बरसों बाद वह खुले आकाश के नीचे था। सुबह की तेज़ चमकीली धूप, लोगों की चहल-पहल, वाहनों का शोर- सब कुछ उसे नया-नया लग रहा था। अपने ही शहर को वह पहचानने की कोशिश कर रहा था। पंद्रह वर्षों में शहर कितना बदल गया था! नई दुकानें खुल गई थीं। नई इमारतें खड़ी हो गई थीं। सड़कें चौड़ी हो गई थीं। लोगों के पहनावे और उनके हाथों में मौजूद मोबाइल फोन तक बदल गए थे।
उसे अचानक लगा- दुनिया उसके बिना भी चलती रही। लोग आगे बढ़ते रहे। बच्चे बड़े होते रहे। शहर, दुनिया बदलती रही। और वह जेल की चारदीवारी के भीतर एक ही जगह पर खड़ा रहा, उसका समय जैसे वहीं ठहर गया था, न सूरज निकलता था, न दिन होता था, न सांझ होती थी, न रात, सब-कुछ हमेशा एक सा बना रहता था। जेल में उसे बाहर की दुनिया की बहुत कम खबर मिलती थी। वहाँ उसका संसार एक कोठरी, जेल का प्रांगण, कुछ कैदी, जेल कर्मचारी और अपनी स्मृतियों तक सीमित था। खाने-पीने की चीजों का स्वाद तक वह लगभग भूल चुका था।
रेस्टोरेंट के वेटर ने पूछा- ‘क्या लेंगे?’
वह कुछ क्षण उसे देखता रहा। उसे समझ में ही नहीं आया कि क्या माँगे। फिर उसने कहा- ‘भाई, तुम्हारे रेस्टोरेंट में जो अच्छा हो, वही ले आओ।’
वेटर कुछ देर बाद उसके सामने दो खस्ता, छोले और चाय रख गया। वह खस्ता देखता रहा। अचानक उसे याद आया- उसे खस्ता कितना पसंद था! कितने वर्षों बाद वह उसके सामने था! उसकी आँखें भर आईं। उसने खाने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि आँसू की एक बड़ी सी बून्द उसके हाथ पर टपक पड़ी। उसी समय दो ग्राहक रेस्टोरेंट में आ गए। उसने तुरंत आँखें पोंछ लीं और इस तरह खाने लगा, जैसे उसकी आँख में कोई कण पड़ गया हो। लेकिन भीतर एक ही सवाल था- घर कैसे पहुँचे? उसने सोचा, यदि सीधे ऑटो रिक्शा बुक करके घर तक चला जाए तो शायद कॉलोनी के लोगों की नजरों से बच सकेगा। गेट खुलते ही वह भीतर चला जाएगा।
ऑटो उसके घर के सामने रुका तो मकान को देखते ही उसका मन कसक उठा। उसके जाने के बाद जैसे उसका कोई पुरुषाहाल नहीं था। गेट पर जंग लगी थी। दीवारों का रंग उड़ चुका था। जगह-जगह पपड़ी उखड़ रही थी। बरसों से रंग-रोगन नहीं हुआ था। उसे लगा, जैसे मकान भी उसकी प्रतीक्षा करते-करते बूढ़ा हो गया हो। जैसे दीवारें कह रही हों- ‘मालिक तुम चले गए तो हम भी अकेले पड़ गए थे।’
उसने घंटी का स्विच दबाया, मगर खराब घंटी ने कोई आवाज नहीं की। फिर उसने गेट की कुंडी खटखटाई। कुछ ही क्षण बाद गेट खुला। पत्नी ने उसे देखा और बिना कुछ कहे उससे लिपट गई। उसे इस बात का भी ध्यान नहीं रहा कि ऑटो वाला अभी बाहर खड़ा है और सुबह के समय कॉलोनी की पतली सड़क से लोगों का आना-जाना लगा हुआ है। वह पत्नी को थामे हुए घर के भीतर चला गया। कुछ ही क्षणों बाद दोनों बेटे भी सामने आ गए। पिता को देखते ही वे उनसे लिपट गए। चारों एक-दूसरे को पकड़े देर तक खड़े रहे। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। केवल आँसू बोल रहे थे। पंद्रह वर्षों से अधिक समय से जमा हुआ दुःख, प्रतीक्षा, शिकायत, प्रेम और अकेलापन उन आँसुओं में बह रहा था। बहुत देर बाद उसने स्वयं को संभाला।
‘बस…रोओ मत, अब मैं आ गया हूँ, हमेशा के लिए।’
उसकी आवाज भर्रा गई थी। वह उसी पुराने पलंग पर जाकर बैठ गया, जो उनके विवाह के साथ ही उनके हर सुख-दुःख का साक्षी बना हुआ है। अब वह बिना रंग-रोगन के घर के एक उदास कोने में पड़ा था। पत्नी और दोनों बेटे उसके लिए खाने-पीने की व्यवस्था करने में लग गए। एक बेटा बाहर गया। माँ ने पिता के घर लौटने की खुशी में मिठाई मँगाई थी। वह अकेला बैठा घर के कोने-कोने को देखता रहा। उसे लगा, घर की हर वस्तु उससे कोई न कोई शिकायत कर रही है। पुरानी अलमारी। दीवार पर टँगी तस्वीर। आँगन का सूना कोना। वह पुराना सोफा, टीवी, सब जैसे एक ही कहानी सुना रहे थे- ‘देखो, तुम्हारे जाने के बाद हम कैसे अनाथ हो गए थे। तुम्हारे इंतजार में हम भी बूढ़े होते गए।’
कुछ ही देर में पड़ोसियों को उसके आने की खबर मिल गई। एक-एक करके कई पड़ोसी घर पर आने लगे। वे उसका हाल पूछते, उसे बधाई देते और कहते- ‘बहुत अच्छा हुआ, आप समय से पहले ही जेल से वापस आ गए।’
वह भीतर ही भीतर जिस व्यवहार की आशंका लेकर सहमा हुआ सा आया था, वैसा कुछ भी दिखाई नहीं दिया। लोगों की आँखों में उपेक्षा, घृणा, भय नहीं, अपनापन था। बातों-बातों में उसे पता चला कि घटना के समय मीडिया में उसका पक्ष भी सामने आया था और बहुत से लोगों की सहानुभूति उसके साथ थी।
एक पड़ोसी ने कहा- ‘आपने जो किया, मजबूरी में किया। उस आदमी को ऐसी ही सजा मिलनी चाहिए थी।’
दूसरे ने कहा- ‘आपको इतनी लंबी सजा मिलनी ही नहीं चाहिए थी।’
वह उन दिनों को याद नहीं करना चाहता था। लेकिन स्मृतियाँ आदमी की इच्छा से नहीं चलतीं। जितना वह भूलना चाहता, उतना ही अतीत उसके सामने आकर खड़ा हो जाता। उसे वह स्याह दिन याद आ गया। नौकरी में उसे बहुत अधिक समय नहीं हुआ था। उसकी स्थायी नियुक्ति यानी कन्फर्मेशन काफी समय से तहसीलदार ने रोक रखी थी।
उस दिन वह एक उपहार लेकर तहसीलदार के चेंबर में गया था। उसे उसके त्यौहार की बधाई देने। उसे देखकर तहसीलदार काफी प्रसन्न और आत्मीय दिखाई दिए। कुछ औपचारिक बातचीत के बाद उसने अपने कन्फर्मेशन की बात छेड़ी। तहसीलदार अचानक गंभीर हो गए। उन्होंने इधर-उधर की बातें करते हुए कहा- ‘कन्फर्मेशन तो तुम्हारे हाथ में है।’
वह उनकी बात समझ नहीं पाया।
‘जी?’
तहसीलदार मुस्कराए।
‘ हाँ, कन्फर्मेशन… प्रमोशन… इंक्रीमेंट… सब कुछ तुम्हारे हाथ में है।’
वह चौंक गया। उसने फिर विनम्रता से कहा- ‘सर, आप मेरी मदद कर दीजिए। मैं काफी समय से इंतजार कर रहा हूँ।’
तहसीलदार अपनी घूमने वाली कुर्सी पर थोड़ा पीछे झुके और फिर बाईं ओर घूमते हुए उसकी तरफ देखने लगे।
‘मैं तुम्हें यह सब आज ही गिफ्ट कर दूँगा।’
वह प्रसन्न हो उठा।
‘थैंक यू सर…’
तहसीलदार ने उसकी ओर देखते हुए कहा- ‘लेकिन तुम मुझे रिटर्न गिफ्ट क्या दोगे?’
वह सहज भाव से मुस्करा दिया।
‘सर, आप जो भी कहेंगे, मैं वह रिटर्न गिफ्ट आपको दूँगा। मुझे खुशी होगी।’
तहसीलदार कुछ क्षण चुप रहे। फिर दीवार की ओर देखते हुए बोले-‘तुम्हारी शादी को अभी पाँच वर्ष भी पूरे नहीं हुए हैं…सुना है, तुम्हारी पत्नी बहुत खूबसूरत है।’
बस इतना सुनना था कि उसकी भौंहें तन गईं। चेहरा लाल पड़ गया। उसने कुछ कहना चाहा, लेकिन तहसीलदार ने उससे पहले ही वह बात कह दी, जिसे सुनकर उसके भीतर वर्षों से संजोया हुआ आत्मसम्मान जैसे अचानक लहूलुहान हो उठा। उसके बाद उसे कुछ याद नहीं रहा। वह तहसीलदार पर झपट पड़ा। कुर्सी समेत तहसीलदार जमीन पर गिर पड़े। उनका सिर फर्श से टकराया। उन्होंने चीखने की कोशिश की। मगर उसके भीतर का क्रोध उस समय किसी ज्वालामुखी की तरह फट चुका था। वह उन्हें पीटता रहा, पीटता रहा, रुका तब जब उसे लगा तहसीलदार निश्चल हो गया है। उसके हाथ काँप रहे थे। लेकिन उसके मन में पछतावा नहीं था। वह सीधे पुलिस थाने गया था। वहाँ उसने स्वयं कहा था- ‘मैंने अपने अधिकारी की हत्या की है। उसने मेरी पत्नी को लेकर ऐसी बात कही, जिसे मैं सहन नहीं कर सका।’
मामला अखबारों में छपा। कई दिनों तक चर्चा होती रही। उसके अनेक रिश्तेदारों, दोस्तों और मोहल्ले के लोगों ने भी उससे दूरी बना ली। जब वह जेल जा रहा था, तब पत्रकारों ने उससे पूछा था-‘क्या तुम्हें अपने किए पर पछतावा है?’
उसने दृढ़ स्वर में कहा था- ‘ नहीं। मैंने अपने आत्मसम्मान के लिए यह कदम उठाया। मुझे गर्व है कि मैं उस गंदे आदमी के सामने सिर झुकाने के बजाय उसको तुरंत उचित सज़ा दे सका जो मेरे आत्मसम्मान को कुचलना चाहता था ‘
पहली पेशी के दिन पत्नी अपने भाई के साथ उससे मिलने आई थी। वह रो रही थी। उसने पत्नी को समझाते हुए कहा था-‘रोने की कोई जरूरत नहीं है। मेरे लिए मेरा सम्मान और तुम्हारा सम्मान सबसे ऊपर है। तुम्हें इस तरह कमजोर बनने की जरूरत नहीं।’
पत्नी लगातार रोती रही थी। उसने कहा था-‘बस समझ लो कि हमारा साथ इतना ही था। अब बच्चों, खुद को तुम्हें अकेले संभालना है। उन्हें दृढ़, आत्मसम्मानी और स्वाभिमानी इंसान बनाना। यही तुम्हारी जिम्मेदारी है।’ उसके बाद जेल की जिंदगी शुरू हो गई थी।
अब इतने वर्षों बाद वह अपने उसी घर में लौट आया था। शाम होते-होते घर में लोगों का आना-जाना कम हो गया। ऊंचाई में उससे भी ऊँचे हो चुके दुबले-पतले दोनों बेटे अपने-अपने काम में लग गए थे।
पत्नी ने उससे बार-बार पूछा-‘थक गए हो?’
वह केवल मुस्करा देता। उस समय पहली बार उसे लगा कि वह सचमुच घर लौट आया है। सभी के साथ खाना खाने के बाद वह पलंग पर लेटा छत को देख रहा था। नौकरी रही नहीं, कैसे चलेगा जीवन, कैसे क्या करे इसी चिंता में वह गहरे डूबता जा रहा था। बाहर की दुनिया धीरे-धीरे शांत हो रही थी। दोनों बेटे कोचिंग के लिए जा चुके थे। उसके पास उसकी पत्नी गहरी नींद में सो रही थी। वह उसकी ओर देखता रहा। इतनी गहरी नींद!
जैसे वर्षों बाद उसे सचमुच सोने का अवसर मिला हो। उसने पत्नी के सफेद बालों को धीरे से देखा। फिर आँखें बंद कर लीं। जेल की सलाखें उसके भीतर अब भी थीं। पंद्रह वर्षों की रातें अब भी उसकी स्मृति में थीं। उसे लगा कि शायद आदमी जेल से बाहर आने के बाद भी धीरे-धीरे ही मुक्त होता है। शरीर जेल से बाहर आ जाता है। मन को बाहर आने में समय लगता है। उसने करवट बदली। पत्नी नींद में उससे और सट गई। उसने आँखें बंद कर लीं। बहुत वर्षों बाद उसके चेहरे पर एक ऐसी शांति थी, जिसे किसी अदालत, किसी जेल ने नहीं दिया था।
- प्रदीप श्रीवास्तव

उत्तम कहानी
विशेषतः अंतिम पंक्ति जो जीवन में प्रगाढ़ शांति के स्थान को स्पष्ट तो करती है और साथ में जीवन की सार्थकता को भी उजागर करती है !
प्रो. वि म गाडे
मार्मिक कहानी, हार्दिक बधाई