रंग बिखरे हुए फ़िज़ा में हैं
हम मुहब्बत की इंतेहा में हैं
हम को छेड़े न कोई दुनिया में
इश्क़ की मदभरी सज़ा में हैं
महकी जाती हैं अपनी सांसें भी
खिलती कलियों की हम दुआ में हैं
ढूंढते हैं वफ़ाओं की मंज़िल
राज़ सारे तो नक़्श ए पा में हैं
आप से बस दुआएं चाहती हूं
आप शामिल मेरी दुआ में हैं
प्यार करना तो कोई जुर्म नहीं
कौन सी हम बड़ी ख़ता में हैं
कोई नफ़रत न रूबी बांट सके
हम मुहब्बत भरी फ़िज़ां में हैं


रूबी जी ,लाज़वाब ग़ज़ल कही
वाह वाह क्या बात है ।
Dr Prabha mishra
धन्यवाद प्रभा जी