Wednesday, July 24, 2024
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अश्विनी कुमार त्रिपाठी की ग़ज़लें

1
दर्द  को अश्आर  में  कहने  के  फ़न  से  राब्ता
हिज्र  की  रातों  ने  जोड़ा  है  सुख़न   से  राब्ता 
पेड़  से  दीमक  का,,, रोगों  का  बदन  से  राब्ता
यूँ  भी है कुछ सर-फिरों का,, इस वतन से  राब्ता 
दिल के साथी बन गए हैं दर्द-ओ-ग़म कुछ इस क़दर
जिस   क़दर   है   रूह   का   मेरे   बदन  से   राब्ता 
ज़िंदगी  थी ,  ज़िंदगी   में  ज़िंदगी   थी   ही   नहीं
जब   तलक  था  ज़िंदगी  की  अंजुमन  से  राब्ता 
इश्क़  में   यूँ   राब्ता   रक्खा   करो    मा’शूक़    से
ज्यूँ  चमन का गुल से,,  सूरज का किरन से  राब्ता 
गर  सुख़न-वर  इश्क़, उल्फ़त, प्यार  से  अंजान है
हो     पाएगा  सुख़न  का,,,  बाँकपन   से  राब्ता 
वक़्त-ए-रुख़्सत  तुमसे  मिलना  चाहता हूँ इस तरह
जिस  तरह  होता  है  जिस्मों का,,,  कफ़न से राब्ता 
2
सुन न पाया ख़ुद को ही, दुनिया  का डर हावी रहा
‘दिल’ पे मेरे जब तलक,  मेरा  ये  ‘सर’  हावी  रहा 
शह्र  की आब-ओ-हवा  तन  पर  तो  हावी  हो  गई
मन पे  लेकिन गाँव  का,  छोटा  सा  घर  हावी  रहा 
मंज़िलें  मिलने  की  ख़ातिर   राह   देखेंगी   तेरी
हर  सफर की मुश्किलों पर   तू  अगर  हावी  रहा 
ख़ाक में मिलने तलक भी ख़ुद से मिल पाये नहीं
जिनके सर पर दौलत-ओ-ज़र उम्र भर हावी रहा 
‘खेतिहर’,  मजदूर  में  तब्दील  हो  कर  रह  गये
गाँव  पर  कुछ  इस तरह से भी शहर हावी  रहा 
इस   बदलते  दौर  की  वे  नब्ज़  पढ़  पाये  नहीं
हाशिये  पर    गए  जिन पर  हुनर  हावी  रहा 
जिनको थी मंज़िल की चाहत मंज़िलें पा थम गये
जिनमें  थी  यायावरी उन  पर  सफ़र  हावी  रहा 
दुश्मनों  की  बद्दुआएं  , भी  दुआ  बनकर   लगीं
मुझ पे यूँ  माँ  की  दुआओं  का असर हावी  रहा 

अश्विनी कुमार त्रिपाठी
युवा शायर
“हाशिये पर आदमी” अद्यतन  ग़ज़ल संग्रह।
देश की विभिन्न पत्रिकाओं में ग़ज़लें प्रकाशित।
संप्रति – उप प्राचार्य (विद्यालयी शिक्षा)
पता –  4-P-13, दादाबाड़ी विस्तार योजना
कोटा (राजस्थान)
पिन – 324009
मोबाइल – 8890628632
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1 टिप्पणी

  1. अच्छी हैं आपकी गजलें अश्विनी जी! पहली ग़ज़ल में उदासी और मायूसी सी महसूस हुई। एक शेर जो अच्छा लगा-

    *इश्क़ में यूँ राब्ता रक्खा करो मा’शूक़ से*
    *ज्यूँ चमन का गुल से,, सूरज का किरन से इश्क़ में यूँ राब्ता*
    आपकी दूसरी ग़ज़ल काफ़ी अच्छी लगी।
    सभी शेर अच्छे लगे लेकिन सबसे आखिरी वाला एक नंबर!!

    *”दुश्मनों की बद्दुआएं भी, दुआ बनकर लगीं*
    *मुझ पे यूँ माँ की दुआओं का असर हावी रहा”*

    सुन न पाया ख़ुद को ही, दुनिया का डर हावी रहा
    ‘दिल’ पे मेरे जब तलक, मेरा ये ‘सर’ हावी रहा

    शह्र की आब-ओ-हवा तन पर तो हावी हो गई
    मन पे लेकिन गाँव का, छोटा सा घर हावी रहा

    मंज़िलें मिलने की ख़ातिर राह देखेंगी तेरी
    हर सफर की मुश्किलों पर तू अगर हावी रहा

    ख़ाक में मिलने तलक भी ख़ुद से मिल पाये नहीं
    जिनके सर पर दौलत-ओ-ज़र उम्र भर हावी रहा

    ‘खेतिहर’, मजदूर में तब्दील हो कर रह गये
    गाँव पर कुछ इस तरह से भी शहर हावी रहा

    इस बदलते दौर की वे नब्ज़ पढ़ पाये नहीं
    हाशिये पर आ गए जिन पर हुनर हावी रहा

    जिनको थी मंज़िल की चाहत मंज़िलें पा थम गये
    जिनमें थी यायावरी उन पर सफ़र हावी रहा

    दुश्मनों की बद्दुआएं , भी दुआ बनकर लगीं
    मुझ पे यूँ माँ की दुआओं का असर हावी रहा

    बधाई आपको

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