भारत का सिनेमा यहाँ की उत्सवधर्मिता को प्रतिबिंबित करता है - विजय शर्मा 3

वरिष्ठ लेखिका, समीक्षक विजय शर्मा से युवा लेखक पीयूष द्विवेदी की बातचीत

सवाल –.विजय जी आप कहानीकार भी हैं, आलोचक भी और सिनेमा विशेषज्ञ भी। अपने किस किरदार से आपको  सबसे अधिक संतुष्टि मिलती है ?
विजय शर्मा: इंटरेस्टिंग प्रश्न है। यह सही है कि मैंने कुछ कहानियाँ लिखी हैं, भविष्य में भी शायद लिखूँ। क्योंकि कुछ कहानियाँ अपना दबाव बनाए हुए हैं, काफ़ीसमय सेदस्तक देरही हैं। इसके बावजूद मैं खुद को कहानीकार के रूप में नहीं देखती हूँ। हाँ, पाठकों ने मुझे आलोचक के रूप में स्वीकार किया है।
मेरी खुद की भी अधिक रूचि विषय विश्लेषण में है। एक छवि सिनेमा विशेषज्ञ की भी है, वहाँ भी मैं सिनेमा का विश्लेषण करती हूँ। सिनेमा की  भाषा का अध्ययन किया है, फ़िल्म एप्रिसियेशन का कोर्स किया है, सिनेमा देखने में रूचि है, जो फ़िल्में जँचती हैं, चाहती हूँ उन्हें दूसरे भी देखें अत: उनके बारे में लिख कर दूसरों को बताती हूँ।
मुझे अध्ययन, चिंतन-मनन करना अच्छा लगता है, चाहे वह साहित्य हो अथवा फ़िल्म देखना। पढ़ना-देखना-सोचना-समझना-चिंतन-मनन साथ-साथ सदा चलता रहता है। हाँ, साहित्य में मैं सिर्फ़ गद्य और उसकी सारी शाखाओं पर काम करती हूँ। दशकों हो गए लिखते-पढ़ते पर मेरा सीखना अभी जारी है। इसमें कोई शक नहीं कि लिख कर संतुष्टि मिलती है, चाहे वह कहानी हो, आलोचना हो अथवा फ़िल्म समीक्षा। मुझे गाना नहीं आता है लेकिन जिस दिन लिख कर कुछ पूरा होता है, गुनगुनाती हूँ और घर में सबको पता चल जाता है कि मैंने कुछ लिख लिया है और खुश हूँ।
सवाल – आपका कहना है कि लिखना पागलपन है। आप हमारे पाठकों को बताना चाहेंगी कि आप ऐसा क्यों सोचती हैं ?
विजय शर्मा: हाँ, लिखना पागलपन है। ऐसा मैं मानती हूँ और बहुत सारे दूसरे लोग ऐसा मानते हैं। आपको अच्छी तरह मालूम है लिख कर जीवनोपार्जन नहीं किया जा सकता है। उसके लिए आपको कुछ और करना पड़ता है। मैंने भी किया, एक इंग्लिश मीडियम कॉलेज में 35 साल एजूकेशन पढ़ाया।
18-20 पुस्तकें लिख कर, गंभीर काम करके भी आपको इतनी रॉयल्टी प्रकाशक नहीं देता है कि आपकी दाल-रोटी नहीं चल सके जबकि आप नामचीन प्रकाशकों के यहाँ से प्रकाशित हुए हैं। पत्र-पत्रिकाएँ दे नहीं सकती हैं, ऐसा उनका कहना है। जो एकाध पत्रिकाएँ देती हैं, वह इतना कम, नाममात्र का होता है कि बताने में शर्म आए। धन आवश्यक है लेकिन प्रश्न है आप किस लिए जी रहे हैं? धन के लिए अथवा जीवन के लिए, साहित्य के लिए।
यह सही है कि अब मुझे आर्थिक असुरक्षा नहीं है। जब थी तब भी बहुत परवाह नहीं की। अब सोच कर आश्चर्य होता है और हँसी आती है कि जब पास में फ़ूटी कौड़ी नहीं होती थी तब भी मैं मस्ती से जी रही थी। लिख-पढ़ रही थी। मैंने भयंकर आर्थिक परेशानी झेली है और खूब समृद्ध जीवन भी बिताया है। इंग्लिश में जिसे ‘डेंजरस लिविंग’ कहते हैं उस दौर से गुजरी हूँ। पर मेरी जिजीविषा बड़ी मजबूत और मस्त है और मैं फ़ाइटर हूँ। यह भी अजीब पागलपन है न!
मैं वृहतर समाज से जुड़ने के लिए लिखती हूँ। हर व्यक्ति स्वीकृति चाहता है मेरे मन में भी इसकी आकांक्षा है। लेखक पाठक को दृष्टि देना चाहता है, देता है, यही मैं भी करती हूँ और यह मेरी एक उपलब्धि है। अपनी रचना से मैं लोगों को संवेदनशील बनाने का प्रयास करती हूँ। कितना सफ़ल-असफ़ल हूँ दूसरे निर्णय करें।
आप पलायन के लिए लिखते हैं, समय काटने के लिए लिखते हैं, मजबूरी में लिखते हैं, मजे के लिए लिखते हैं, मनोरंजन के लिए लिखते हैं, लिखते हैं क्योंकि और कुछ करना नहीं आता है, करना नहीं चाहते हैं, करना अच्छा नहीं लगता है। लिखे बिना रह नहीं सकते हैं। तो यह पागलपन ही हुआ न! सच में लिखना, कम-से-कम मेरे लिए लिखना पागलपन ही है। मजे की बात है, यह पागलपन मुझे पागल होने से, हताशा-निराशा, अवसाद से बचाए रखता है।      
कितने लोग पढ़ते हैं आपको? प्रकाशक के लिए आप स्टार राइटर नहीं हैं। वो आपको प्रमोट नहीं करता है, आपकी पुस्तकों की शायद ही कहीं समीक्षा होती है। ज्यादा चिंता नहीं, फ़िर भी आप लिखते जाते हैं, यह पागलपन नहीं तो और क्या है? लिखें नहीं तो खाना न पचे, नींद न आए, चिड़चिड़ापन लगे, यह पागलपन नहीं है तो और क्या है? अपना समय, अपनी ऊर्जा, अपना धन (बिजली, कम्प्यूटर सबके पैसे लगते हैं) लिख कर खर्च करने में खुशी मिले यह पागलपन ही तो है।
भीतर आंतरिक दबाव के तहत लिखती हूँ। मुझे मालूम है मैं जिन विषयों पर काम करती हूँ उसे बहुत कम लोग पढ़ेंगे, उसमें कम लोगों की रूचि होगी फ़िर भी लिखती हूँ क्योंकि यह मुझे अच्छा लगता है, रुचता है।
जिस लिखने-पढ़ने की दुनिया में प्रवेश के बाद आप बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाएँ। आपको किसी से मिलना, किसी से बात करना, कहीं आना-जाना, किसी का आना-जाना न भाए, खाना बनाना, खाना-पीना, नहाना-धोना-सोना कुछ अच्छा न लगे। दिन-रात का ध्यान न रहे। इसी दुनिया में आप मगन रहते हों तो यह पागलपन है न। 
तमाम परेशानियों के बावजूद आप लिखने से बाज नहीं आएँ, तो यह पागलपन ही है न!
सवाल – जब मैं आप द्वारा रचित ग्रन्थों एवं लेखों की ओर निगाह डालता हूं तो साफ़ दिखाई देता है कि आपकी रुचि विश्व सिनेमा में अधिक दिखाई देती है। भारत की मुख्यधारा के हिन्दी सिनेमा से विश्व सिनेमा किन मामलों में अलग है ?
विजय शर्मा: जी, सिनेमा पर मेरी चार पुस्तकें आ चुकी हैं और यह लॉकडाउन न हुआ होता तो अब तक तीन और आ गई होतीं। यानि सिनेमा पर सात पुस्तकें। इसमें से एक पुस्तक सत्यजित राय पर है मतलब भारतीय सिनेमा पर। एक और भारतीय फ़िल्म निर्देशक पर एक पुस्तक की पाण्डुलिपि तैयार है। हाँ, यह सही है कि मेरा अधिक कार्य विश्व सिनेमा पर है। साल भर में हमारे यहाँ, भारत में दुनिया के किसी भी देश से अधिक फ़िल्में बनती हैं। बहुत थोड़ी-सी अच्छी, बहुत सारी औसत और बहुत सारी बहुत बेकार की फ़िल्में यहाँ बनती हैं। भारत के सिनेमा की अपनी विशेषताएँ हैं, गीत-संगीत उसकी अपनी खासियत है।
अक्सर हमारी फ़िल्में बहुत लाउड होती हैं। शायद अक्सर निर्देशक दर्शक को बहुत कमतर करके आँकते हैं। वे दर्शकों के सोचने-समझने के लिए कुछ छोड़ना नहीं चाहते हैं, खुद ही सब कह डालते हैं। भारत का सिनेमा यहाँ की उत्सवधर्मिता को प्रतिबिंबित करता है।
यहाँ की विभिन्नताओं में एकता को दिखाता है। यहाँ कहानियों में अनुभूति पर ज़ोर दिया जाता है। हिन्दी सिनेमा में संवाद अदायगी की खास शैली है अपनी विशिष्ट शैली का नाच-गान होता है जिसके करोड़ों दीवाने हैं, बहुत बार मुझे भी अच्छा लगता है। अधिकाँश हिन्दी फ़िल्मों में तर्क ता मनोविज्ञान बहुत मायने नहीं रखता है। हमारी मनोवृति नहीं है इसकी। हम भावुकता से संचालित होने वाले लोग हैं।
जब हम विश्व सिनेमा कहते हैं तो वह किसी एक प्रकार का सिनेमा नहीं है। चीन का सिनेमा जापान के सिनेमा से भिन्न है। ऑस्ट्रिया का सिनेमा वही नहीं है जो हॉलीवुड का सिनेमा है। अफ़्रो-अमेरिकन सिनेमा अमेरिकन सिनेमा नहीं है। यहाँ तक कि मलयालम सिनेमा भी भिन्न है। कोरिया का सिनेमा ऑस्ट्रेलिया के सिनेमा से अलग है। इनमें से किसी में गीत-संगीत की वैसी भरमार नहीं होती है जैसी भारत के सिनेमा में होती है, जब तक कि फ़िल्म म्युजिकल जॉनर की न हो।
इनमें से किसी देश के सिनेमा में वैसी सामाजिक, जातिगत, वर्गगत, धार्मिक, सांस्कृतिक विविधता के दर्शन नहीं होते हैं जैसी भारत के सिनेमा में होते हैं। मेरे लेखन में भारत की फ़िल्मों के साथ ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, चिली, रूसी सिनेमा पर काम है। मेरी एक पुस्तक नाजी यातना शिविरों पर बनी फ़िल्मों पर है, ‘सिनेमा और साहित्य: नाजी यातना शिविरों की त्रासद गाथा’।
अलग-अलग देशों में अलग-अलग भाषाओं में इसी एक विषय, द्वितीय विश्वयुद्ध पर तमाम फ़िल्में बनी हैं। ये सब विशिष्ट फ़िल्में हैं, एक कालखंड के इतिहास को परदे पर दर्ज करती हुई फ़िल्में। आप देखेंगे तो पाएँगे ये भारत में बनी फ़िल्मों से बहुत अलग हैं। इनका कथानक अलग है, इनकी पोशाक, लोकेशन भिन्न है, संवाद और अभिनय भिन्न है, इनकी त्रासदी भिन्न है। इनमें से अधिकाँश में भावुकता और मेलोड्रामा नहीं है।
सवाल – आपने शेक्सपीयर के नाटकों पर आधारित फ़िल्मों पर भी लिखा है। क्या आपको शेक्सपीयर के लिखे नाटकों को देखने का भी अवसर मिला है ? यदि हाँ तो आपको नाटकों और फ़िल्म में से बेहतर क्या लगा ? या यूं कहा जाए कि क्या फ़िल्में नाटकों के साथ न्याय कर पाई हैं?
विजय शर्मा: एक पुस्तक ‘विश्व सिनेमा: कुछ अनमोल रत्न’ में मैंने शेक्सपीयर के नाटकों पर बनी फ़िल्मों पर लिखा है, इसमें उसके नाटको पर भारत में बनी फ़िल्मों की बात भी आई है। उसके नाटकों का मंचन बहुत कम देखा है। हाँ, यूट्यूब, नेट पर उनकी रिकॉर्डिंग देखी है। नाटक और फ़िल्म में बेसिक अंतर है। नाटक सजीव होता है, हर बार मंचन में फ़र्क होता है, यह फ़र्क नाटक-निर्देशक की सोच, उसके नजरिए, उसकी अप्रोच का होता है, अभिनेताओं के अभिनय का होता है।
एक ही कलाकार जब एक ही भूमिका दो बार मंचित करता है तो उसमें भी फ़र्क होता है, नाटक में रिटेक नहीं होता है। जबकि फ़िल्म में कभी-कभी कई रिटेक के बाद शॉट फ़ाइनल होता है और जो एक बार फ़ाइनल हो गया वह हो गया। अब चाहें वह कहीं दिखाया जाए, कितनी बार दिखाया जाए, किसी को दिखाया जाए उसमें कोई हेरफ़ेर नहीं होगा, एक्टर और एक्टिंग वही रहेगी, संवाद डिलवरी का अंदाज वही रहेगा, पोशाक वही होगी, लोकेशन नहीं बदलेगा, नजरिया नहीं बदलेगा।
यहाँ एक बात और कहना चाहूँगी शेक्सपीयर के नाटकों पर दुनिया भर के निर्देशकों ने फ़िल्म बनाई हैं। उसके नाटकों को जिस तरह से कुरोसावा ने फ़िल्माया है वैसा विशाल भारद्वाज ने नहीं  दिखाया है। ऑर्सन वेल्स का ओथेलो मलयालम के फ़िल्म निर्देशक सदानम बालकृष्णन के ओथेलो से विलग है, मलयालम के ही जयराज के ‘कलीयाट्टम’ का ओथेलो सदानम बालकृष्ण के ओथेलो से अलग नजर आता है। ऐसे ही केनेथ ब्रानह के ‘हेमलेट’ और विशाल भारद्वाज के ‘हैदर’ में जमीन-आसमान का फ़र्क है। क्या आपको ‘मकबूल (विशाल भारद्वाज) और ‘मैकबेथ’ (ऑर्सन वेल्स) एक लगते हैं?
शेक्सपीयर के नाटकों को अनगिनत नाटक निर्देशकों और अनगिनत फ़िल्म निर्देशकों के अपनाया है। वह निर्देशकों का लाडला रहा है, चुनौती भी। किस निर्देशक की फ़िल्म की किस नाटक निर्देशक के नाटक से तुलना करेंगे? तुलना नरक होती है, इसमें किसी को ऊपर, किसी को नीचे सिद्ध करना होता है। इन सबने अपनी ओर से बेहतरीन प्रयास किया है, इनकी मेहनत की प्रशंसा होनी चाहिए।
मंचन के समय दर्शकों में से यदि एक बच्चा रो दे या कुछ कह दे तो पूरा नाटक बिखर जा सकता है, जबकि फ़िल्म के साथ ऐसा कुछ नहीं होता है। सिने दर्शक फ़ब्तियाँ कसते रह सकते हैं और हेमलेट अपनी सोलीलॉकी डिलिवर करता जाएगा. क्या मंचन के समय ऐसा संभव है? न्याय-अन्याय का पता नहीं हाँ, यह अवश्य देखूँगी फ़िल्म कैसी बनी है,  दर्शक पर कैसा प्रभाव डालती है। फ़िल्म और नाटक दोनों दो भिन्न विधाएँ हैं उन्हें एक तराजू पर नहीं तौला जा सकता है, नहीं तौला जाना चाहिए, दोनों की कसौटी भिन्न है, भिन्न होनी चाहिए।
सवाल – आपने स्त्री पर बहुत गंभीर काम किया है। अफ़्रो-अमेरिकन स्त्री साहित्य, विश्व सिनेमा में स्त्री – क्या पुरुषों के लेखन और सिनेमा ने आपको आकर्षित नहीं किया?
विजय शर्मा: आपने बिल्कुल सही कहा, मैंने स्त्री रचनाकारों पर बहुत गंभीर काम किया है। टोनी मॉरीसन, एलिस वॉकर, सोजर्नर ट्रुथ, माया एंजेलो आदि पर मेरा काम बहुत गंभीर है ऐसा सिर्फ़ मैं नहीं कह रही हूँ, पाठक और शोधार्थियों ने मुझे बताया है। नैथेनियल हॉथर्न, इब्सन, चेखव, पाब्लो नेरुदा और भी कई लोगों पर मेरा काम इतना ही गंभीर है और जहाँ तक मुझे लगता है, ये सारे पुरुष लेखक हैं। मुझे स्त्री-लेखन, स्त्री द्वारा निर्मित सिनेमा तथा पुरुष लेखन और पुरुष निर्मित सिनेमा दोनों बहुत आकर्षित करता है, बहुत भाता है, बशर्ते वह मेरी रूचि का हो। सवाल स्त्री-पुरुष का नहीं है, सवाल गुणवत्ता का है। पढ़ने या देखने से पहले कभी यह नहीं देखती हूँ कि यह पुरुष द्वारा रचा गया है अथवा स्त्री द्वारा। अत: आपका आरोप सही नहीं है।
मेरे फ़िल्म लेखन की बात करें तो शेक्सपीयर के नाटक मेरा ख्याल है एक पुरुष ने लिखे हैं और उन पर अधिकाँश फ़िल्में भी पुरुष निर्देशकों (ऑर्सन वेल्स, विशाल भारद्वाज, जयराज, केनेथ ब्रानह, अकीरा कुरोसावा) ने बनाई हैं, जिन पर मेरा काम है। ऋतुपर्ण घोष, श्याम बेनेगल, स्टेन्ले क्युबरिक (‘स्पार्कटस’), टॉम टाइकवर (‘परफ़्यूम: स्टोरी ऑफ़ ए मर्डरर’), मार्टिन स्कॉर्सेसि (‘ह्यूगो’) आदि जिनकी फ़िल्मों पर मेरा काम है, मेरे ख्याल से ये पुरुष हैं और इन पर भी मैंने गंभीरता से काम किया है। 
साहित्य की बात एक बार फ़िर से करूँ तो तेजेंद्र शर्मा, कृष्ण बिहारी, सत्यनारायण पटेल, ओमा शर्मा, अज्ञेय, अमृतलाल नागर, रवींद्रनाथ टैगोर, गैब्रियल गार्षिया मार्केस, ओरहान पामुक, यासुनारी कावाबाता, इमरे कर्तीज, मो यान, जोजे सारामागो, मारियो वर्गास लोसा, केनजाबुरो ओए आदि जिन पर मैंने काम किया है, मुझे लगता है ये सारे-के-सारे पुरुष ही हैं। कोई शक?
सवाल – आपकी रुचि तो एनिमेशन फ़िल्मों में भी रही हैं। एक ज़माना था एनिमेशन फ़िल्में बनाना ख़ासा कठिन काम होता था। कलाकार को अनगिनत स्केच बनाने पड़ते थे। वॉल्ट डिज़्नी की शुरूआती एनिमेशन फ़िल्मों से लेकर आज की मॉडर्न एनिमेशन फ़िल्मो की यात्रा के बारे में कुछ बताना चाहेंगी?
विजय शर्मा: जी हाँ, मैंने वॉल्ट डिज़्नी की जीवनी लिखी है जो वाणी प्रकाशन से ‘वॉल्ट डिज़्नी: ऐनीमेशन का बादशाह’ नाम से प्रकाशित है। पहले सच में ऐनीमेशन फ़िल्म बनाना खासा कठिनाई भरा परिश्रम का काम होता था। एक फ़िल्म बनाने के लिए सैंकड़ों-हजारों स्केच बनाने होते थे। शुरुआती ऐनीमेटर विंसर मैके को दो मिनट की फ़िल्म बनाने के लिए करीब चार हजार चित्र बनाने होते थे। उसे अलग पेपर शीट पर चित्र और पृष्ठभूमि बनानी होती थी। फ़िर वह उनकी फ़ोटो लेता था। यह विधि बहुत मेहनत की माँग करती थी और बहुत खर्चीली भी होती थी। अब समय बहुत बदल गया है, समय के साथ तकनीक बदल गई है। अब ऐनीमेशन का सारा काम कम्प्यूटर और डिजिटल तकनीक से होता है। हर काम के लिए सॉफ़्टवेयर उपलब्ध हैं। यह तकनीक अपेक्षाकृत सस्ती है और कम मेहनत, कम समय में अधिक प्रभावशाली परिणाम देती है। अब गलती होने पर बरबादी या नुकसान भी कम होता है। सिनेमा और ऐनीमेशन में तकनीक ने क्राँति ला दी है। पहले इक्का-दुक्का लोग इसमें निष्णात होते थे, अब यह बच्चों का खेल हो गया है।
सवाल – भारत की मुख्यधारा का सिनेमा अरबों रुपये की इंडस्ट्री है। यहां महबूब ख़ान, राज कपूर, शांताराम, गुरूदत्त, बिमल राय, बी.आर.चोपड़ा, शशि कपूर, सुभाष घई, हृषिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी, गुलज़ार, विधु विनोद चोपड़ा और राजकुमार हीरानी जैसे बेहतरीन फ़िल्म मेकर अद्भुत फ़िल्में बनाते रहे हैं। आपको उन पर कलम चलाने की ज़रूरत क्यों महसूस नहीं हुई?
विजय शर्मा: जी हाँ, इसमें दो राय नहीं है कि इन फ़िल्म निर्देशकों ने उत्तम फ़िल्में बनाई हैं। इन पर खूब लिखा भी जाता है और अधिक लिखा जाना चाहिए। बहुत लोग इन पर लिख रहे हैं। जरूरी नहीं सब काम एक व्यक्ति करे। हरेक की सीमा होती है, आदमी को अपनी विशेषताओं और सीमाओं का ज्ञान-भान होना चाहिए। अपने लिए मैं इस पर बराबर विचार करती रहती हूँ। मुझे लगता है हिन्दी भाषा के पाठकों को भारत की अन्य भाषाओं और बाहर की अच्छी फ़िल्म की जानकारी भी होनी चाहिए। प्रश्न कलम चलाने की जरूरत के महसूस होने का नहीं है। वैसे आपकी जानकारी के लिए यह बताती चलूँ कि मैंने सोहराब मोदी, श्याम बेनेगल, मृणाल सेन, ऋतुपर्ण घोष, मधुर भंडारकर पर भी लिखा है। 
जो काम मैं कर रही हूँ वह बहुत महत्वपूर्ण है, इस काम को भी होना चाहिए। और वैसे अभी मैंने लिखना बंद नहीं किया है, क्या जाने इन निर्देशकों पर भी मेरा कीबोर्ड-कलम चले। गंभीर सिने-लेखन बहुत बड़ा क्षेत्र है, एक बहुत बड़ा यज्ञ है जिसमें बहुत लोगों को मिल कर आहूति डालनी है, मेरा भी इसमें थोड़ा-सा योगदान है। और बहुत सारे लोगों को इसमें हाथ बँटाना चाहिए। मैं सिने-लेखकों की एक नई पौध तैयार करने का प्रयास कर रही हूँ, भविष्य में वे केवल भारत की या बाहर की फ़िल्मों पर लिखेंगे ऐसा अभी नहीं बताया जा सकता है। उसमें से कितने लिखते रहेंगे, इस दायित्व को गंभीरता से लेंगे यह भी अभी तय नहीं है। जो लोग इन निर्देशकों पर गंभीरतापूर्वक लेखन कर रहे हैं या भविष्य में इन पर काम करेंगे उनके साथ मेरी शुभकामनाएँ हैं।
सवाल – कुछ फ़िल्मों ही की तर्ज़ पर आपकी रुचि साहित्य के क्षेत्र में भी या तो भारत से बाहर बसे हुये प्रवासी लेखकों में है या फिर सीधे साहित्य के नोबल प्राईज़ विजेता लेखकों में। आपको उनके लेखन में क्या विशेष दिखाई देता है?
विजय शर्मा: मेरा मानना है हम कुछ संस्कारों के साथ पैदा होते हैं और अनुकूल परिस्थितियों में ये संस्कार विकसित हो कर आपकी रूचि निर्मित करते हैं। अच्छा लगना, रुचना व्यक्तिगत रूचि पर निर्भर करता है। एक पाठक के रूप में आपको विकसित-प्रशिक्षित होना होता है। रुचियाँ भिन्न होती हैं और होनी चाहिए। दुनिया रंग रंगीली बाबा…। समय के साथ आप विकसित होते हैं, आपकी रूचियाँ परिवर्तित होती जाती हैं। जरूरी नहीं जो पढ़ना-देखना एक समय अच्छा लगता था अब भी वही अच्छा लगे। जरूरी नहीं जो मुझे अच्छा लगे वह दूसरों को भी जँचे। मैं दिन-रात साहित्य पढ़ती हूँ, खूब फ़िल्में देखती हूँ। कुछ अच्छा लगता है, कुछ रुचता नहीं है और कुछ बहुत अच्छा लगता है। जो बहुत अच्छा लगता है, पसंद आता है, मेरी इच्छा होती है इसे दूसरे भी पढ़ें, जाने-समझे अत: उन पर लिखती हूँ। 
यह सही है नोबेल पुरस्कृत रचनाकारों में से कुछ मेरे पसंददीदा लेखक हैं। वहाँ भी सब मुझे अच्छे नहीं लगे, सब अच्छे नहीं लगते हैं, लग भी नहीं सकते हैं। जरूरी नहीं कि एक लेखक का सारा काम अच्छा लगे। सब काम उत्तम होगा यह अपेक्षा नहीं है। सबको पढ़ा भी नहीं है, न ही संभव है। मेरी इस विषय पर भी अब तक चार पुस्तकें आ चुकी हैं। पाँचवीं की पाण्डुलिपि तैयार कर रही हूँ।
मेरी पहली पुस्तक ‘अपनी धरती, अपना आकाश: नोबेल के मंच से’ (संवाद प्रकाशन) पंद्रह उन नोबेल पुरस्कृत साहित्यकारों के जीवन और कार्य पर है जिन्होंने नोबेल सम्मान ग्रहण करने के दौरान नोबेल भाषण भी दिया है। और इस विषय पर चौथी पुस्तक, ‘नोबेल पुरस्कार: एशियाई संदर्भ’ (आधार प्रकाशन) एशिया के छ: नोबेल प्राप्त (अभी तक मात्र छ: को ही यह सम्मान मिला है) के कार्य पर आधारित है।
‘नोबेल पुरस्कार: स्त्री स्वर’ तथा ‘क्षितिज के उस पार से’ (भारतीय ज्ञानपीठ) दो और पुस्तकें इसी विषय पर हैं। प्रवासी लेखकों पर कभी, एक समय खूब काम किया था। उनके काम पर मेरी एक पुस्तक, ‘सात समुंदर पार से…’ है। अभी भी कुछ अपील करता है तो पढ़ती हूँ। समय के साथ पसंद बदल जाती है।
कोई कृति यदि संवेदना के स्तर पर खुद को संप्रेषित कर पा रही है तो मुझे वह अच्छी लगती है। यदि आप अपनी विधा योग्य भाषा में खुद को अभिव्यक्त कर पा रहे हैं, जो कहना चाह रहे हैं, कह पाते हैं तो रचना बेहरत बन पड़ती है और मेरी संवेदना को अपील करती है। अभिव्यक्ति का सटीक तरीका भी मायने रखता है। कुछ नोबेल लेखकों का यह तरीका अपील करता है अत: वे मुझे अच्छे लगते हैं।
पहले जो हाथ लगता था सब पढ़ डालती थी, अब मैं कदाचित ही टाइमपास के लिए पढ़ती हूँ, अब बहुत समय नहीं है, रूचि भी तय हो गई है। मैंने खूब पढ़ा है, सब तरह का पढ़ा है। कोई मेंटर न था खुद ही जंगल छाना और राह निकाली। अच्छे-बुरे की पहचान पैदा हुई। जो फ़िल्म-लेखन देखने-पढ़ने के बाद भी एक लंबे समय तक आपके साथ रहे, आपको हॉन्ट करे, लौट-लौट कर सोचने-विचारने पर मजबूर करे वह मुझे विशिष्ट लगता है। जिसका कंटेंट और नरेशन मजबूत होता है वो साहित्य और फ़िल्म मुझे रुचती है। जिससे गुजरने के बाद आप में तनिक बदलाव आए उसे मैं विशिष्ट साहित्य मानती हूँ। अच्छा साहित्य आपमें कुछ जोड़ता है, आपको थोड़ा समृद्ध करता है। जो किताबें और फ़िल्में बार-बार आपको बुलाएँ, दूसरी-तीसरी बार पढ़ने-देखने का न्योता दें वे मुझे अपील करती हैं।
विशिष्ट साहित्य आपको एक जीवन में कई जीवनानुभव से गुजरने का अवसर प्रदान करता है। आपमें जीवन की समझ उत्पन्न करता है। मैं शुष्क ज्ञान, कोरे ज्ञान की बात नहीं कह रही हूँ। वह तो आपको प्रतियोगिता दर्पण, कम्पटीशन सक्सेस पढ़ने से भी प्राप्त होता है। अच्छा साहित्य आपको कठिन परिस्थितियों से जूझने का माद्दा देता है। जीवन संघर्ष में आपकी सहायता करता है। यह जरूरी नहीं कि यह सब आपको नोबेल पुरस्कृत साहित्य में ही मिले। यह निराला में भी मिलता, अज्ञेय में भी एवं ओ वी विजयन में भी मिलता है और इनको नोबेल पुरस्कार नहीं मिले हैं।
सवाल – गिरमिटिया हिन्दी साहित्य एवं पश्चिमी देशों के प्रवासी साहित्य में आप कैसा अन्तर महसूस करती हैं ?
विजय शर्मा: गिरमिटिया हिन्दी साहित्य और पश्चिमी देशों के प्रवासी हिन्दी साहित्य में काफ़ी अंतर है। शर्तबंदी के मजदूरों और अपनी इच्छा से गए प्रवासियों के लेखन में मूलभूत अंतर है। एक को धोखे से ले जा कर गुलाम बनाया गया, जबरदस्ती क्रूरता के साथ उनसे मजदूरी करवाई गई। दूसरा अपनी मर्जी से बेहतर भविष्य के लिए गया। गिरमिटिया के पास देश वापसी का विकल्प नहीं था, उसकी पीड़ा दूसरी थी। दोनों के अनुभव भिन्न है, अत: उनका साहित्य भिन्न है। वे पढ़े-लिखे नहीं थे ये अक्सर उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, लिखना-पढ़ना जानते हैं। उन्हें लिखना-पढ़ना सीखने के लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ा, साहित्य प्रकाशित करवाने में भी उन्हें तमाम दिक्कतें आई। जबकि पश्चिम जाने वाले भारतीय उस युग में गए जब संचार क्राँति दस्तक दे रही थी। कुछ भारत छोड़ने के पूर्व से साहित्य रच रहे थे। उनके लिए आवागमन उतना कठिन न था। अब तो और आसान हो गया है, आना-जाना, लिखना-प्रकाशित होना। इनका रचा कथा साहित्य संचार-क्राँति के कारण आसानी से उपलब्ध है।  
कथा साहित्य में परिवेश का स्थान महत्वपूर्ण होता है। परिवेश इसका एक प्रमुख तत्व होता है। परिवेश बदलने से कहानी बदल जाती है, उसकी तासीर बदल जाती है। अत: दोनों प्रवासियों का लेखन भिन्न तासीर ले कर आया, इसीलिए दोनों का साहित्य अलग है। गिरमिटिया के लेखन में खेती-किसानी की बात आती है जो बाद में प्रवास पर जाने और लिखने वालों में सिरे से नदारत है। लेखन में उस समाज का संकट, समस्याएँ, संघर्ष, उनके सुख-दु:ख उपस्थित होते हैं जो आपको वृहतर समाज से जोड़ते हैं। कौन-कौन-सी चुनौतियाँ आती हैं, उन्हें किन-किन मुसीबतों का सामना करना पड़ता है? किन वैचारिक तथा मूल्यगत संघर्ष से होकर वे गुजरते हैं? उनकी खुशियाँ, उनके दु:ख कैसे और किन कारणों से हैं? उनकी आकांक्षाएँ, अपेक्षाएँ क्या है? वे अपने अपनाए गए समाज में कैसे समायोजन करते हैं? यह सब साहित्य में आता है। साहित्य सृजन में देश-काल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ‘इपोक’ इसमें महत्व रखता है। रचनाकार का परिवेश उसकी रचना को प्रभावित करता है। रचना का अध्ययन उस परिवेश से परिचय का एक बहुत अच्छा माध्यम है। गिरमिटिया साहित्य में मैंने केवल और केवल अभिमन्यु अनत का ‘लाल पसीना’ पढ़ा है अत: दोनों का विस्तार से अंतर बताना मेरे लिए कठिन होगा, उचित भी नहीं होगा।
सवाल – अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा, युरोप आदि के प्रवासी साहित्य का भविष्य आपको कैसा दिखाई देता है ?
विजय शर्मा: यदि अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और अन्य यूरोपीय देशों के प्रवासी साहित्य की बात करें तो वह विभिन्न भाषा में आ रहा है। यह इंग्लिश, बाँग्ला, गुजराती, मलयालम, तमिल में आ रहा है। यह हिन्दी में भी आ रहा है। इसमें शक नहीं कि विभिन्न देशों में रह रहे भारतीयों द्वारा प्रवास में रचा जा रहा इंग्लिश साहित्य दूर तक जाएगा। यदि हिन्दी के प्रवासी साहित्य की बात करें तो विचार करना होगा। असल में पूरे हिन्दी साहित्य के विषय में ही विचार करना होगा। क्योंकि नई पीढ़ी पढ़ती है, मगर हिन्दी साहित्य शायद ही पढ़ती है। हाँ, ओडियो बुक्स के रूप में हिन्दी साहित्य/हिन्दी प्रवासी साहित्य अधिक लोगों तक पहुँचेगा, चूँकि लोग हिन्दी भले न पढ़ें, बोलते-सुनते अवश्य हैं और यह आगे भी चलेगा। हिन्दी पुस्तकों की बिक्री के सही आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। विरोधाभास है, एक ओर हिन्दी प्रकाशक किताबें न बिकने का रोना रोते हैं दूसरी ओर नित नए प्रकाशन गृह खुलते जा रहे हैं, प्रकाशकों की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। वैसे मैं बहुत आशावादी हूँ। हिन्दी बोलने वालों की संख्या बहुत अधिक है और मध्य वर्ग अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम में पढ़ा रहा है लेकिन निम्न वर्ग के बच्चे अभी भी हिन्दी माध्यम से ही पढ़ रहे हैं। शायद भविष्य में ये ही हिन्दी के पाठक होंगे, इनमें से कुछ लेखक भी होंगे और यह एक बहुत बड़ी जनसंख्या है अत: हिन्दी साहित्य जीवित रहेगा, उसी के साथ प्रवासी हिन्दी साहित्य भी पढ़ा जाएगा, जीवित रहेगा। प्रवासी हिन्दी साहित्य लिखा जाएगा कि नहीं, ये बात प्रवासी और प्रवासी लेखक बेहतर तरीके से बता सकते हैं।
सवाल – इन दिनों क्या कुछ पढ़ व लिख रही हैं?
विजय शर्मा: शुरु से मेरी आदत है एक साथ कई काम शुरु करती हूँ, कई किताबें एक साथ पढ़ती हूँ, पढ़ने के साथ फ़िल्म देखती हूँ, घर के काम करती हूँ, लोगों से मिलती-जुलती हूँ। ‘सृजन संवाद’ के विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करती हूँ। कई योजनाएँ एक साथ बनाती रहती हूँ। ‘यू नो मल्टिटास्किंग!’ आजकल ऋतुपर्ण घोष की फ़िल्मों और उनके जीवन पर एक पुस्तक लगभग समाप्ति पर है। नोबेल उपन्यासों में वर्जित संबंध पर काम करीब-करीब आधा हो चुका है। एक काम विश्व की प्रसिद्ध स्त्री फ़िल्म निर्देशकों पर शुरु कर रखा है जिसमें भारत की कई निर्देशक हैं, क्योंकि यहाँ शायद अन्य किसी देश की बनिस्बत सबसे अधिक स्त्री निर्देशक हैं। एक पुस्तक हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों पर संपादित करने का मन है, उनकी शताब्दी आ रही है। नोबेल पुरस्कार भाषण के अनुवाद की एक पाण्डुलिपि तैयार है, प्रकाशकों से बात चल रही है।
पता नहीं कितनी योजनाएँ पूरी हो पाएँगी और कितनी धरी रह जाएँगी, उम्र के उस मोड़ पर हूँ कभी भी सब छोड़ कर चल देना होगा।
आपके प्रश्नों ने मुझे खूब सोच-विचार का, इंट्रोस्पेक्शन का अवसर दिया। पहली बार अपने लिखे-पढ़े पर इतने विस्तार से विचार का मौका मिला। देख कर संतुष्टि हो रही है, लग रहा है जीवन व्यर्थ नहीं गया। अनुभव हो रहा है कि कुछ सार्थक किया है। इसके लिए आपका और आपकी पत्रिका ‘पुरवाई’ का धन्यवाद!
पीयूष – आपका बहुत बहुत धन्यवाद

3 टिप्पणी

  1. आपका साक्षात्कार प्रेरक और उत्साह बढ़ाने वाला है । एक साथ कई पुस्तकों पर काम करते हुए आपने कई बेहतरीन किताबें लिखी हैं और संपादित किया है।
    आपके विचार उर्जस्वित करते हैं। आपको बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।
    डा.उषारानी राव

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