दिव्या विजय की कहानी : स्केटिंग रिंक 1
लेखिका की ये तस्वीर उसी शहर की है, जिस शहर की ये कहानी है
आज एक सुनहला दिन है। ऐसा कि जिसके सुनहले को किसी मर्तबान में भरकर पिया जा सके। बहुत देर हुई सूरज कहीं जा छिपा है किंतु यह रंग अभी डूबा नहीं है। रंग आसमान में नहीं, मन के किसी कोने में छिपे होते हैं। वहीं से निकल कर वे आसमान में छितरा जाते हैं। उस रंग के अक्स में दुनिया कभी चमकती हुई दीख पड़ती है, कभी बुझती हुई। जैसे आज उदासियों की तमाम वजहों के बाद भी आरुष का दिन इंतज़ार के गाढ़े रंग में डूब कर सुनहरी हो गया है। 
सर, सरलाल वाले स्केट्स मैं लूँगा।विचारों के समुद्र में इस आवाज़ ने नन्हा सा पत्थर फेंका। आरुष ने देखा सफ़ेद स्कर्ट वाली लड़की को पछाड़ते हुए हुआ वह छरहरा लड़का जूतों को स्केट्स की तरह घसीटते हुए उसके आगे खड़ा हुआ। पीछे मुँह बिसूरती वह लड़की धीरेधीरे रही थी। आरुष हँसा और दो जोड़ी लाल स्केट्स निकाल कर रख दिए जिन्हें देखते ही लड़की खिल गयी। लड़के ने देखा तो जल्दीजल्दी स्केट्स पहनने लगा।आज भी मैं फ़र्स्ट आऊँगा।वह लड़की को फिर चिढ़ाने लगा। आरुष ने उसे हल्कीसी चपत लगायी। देखकर लड़की खिलखिलाने लगी। थोड़ी देर बाद हाथ पकड़े हुए वे दोनों स्केटिंग रिंक में थे। देखकर आरुष मुस्कुराने लगा। वह जानता है कुछ देर बाद दोनों का फिर झगड़ा होगा। दोनों गुत्थमगुत्था हो जाएँगे और उसे रिंक में जाकर दोनों को अलग करना पड़ेगा। सब कुछ रोज़ की तरह है पर उसके भीतर कुछ है जो इन दिनों अलग हो चला है। 
भरे हुए बादल गढ़वाल टेरेस के ऊपर बह रहे हैं। दूर देवदार और चीड़ के वृक्ष हवा में डोल रहे हैं। कटोरेसा देहरादून सामने नज़र रहा है। कुछ ही घंटों बाद जब सुनहरापन डूबने लगेगा तब वहाँ बत्तियाँ जल उठेंगी। बत्तियाँ यहाँ से लहरों की तरह दिखती हैं। हिलतीतैरती हुईं। समंदर में पाल वाली नाव जैसे डगमगाती है, कुछकुछ वैसी। अगर वह इस वक़्त नीचे उतरे और सचमुच रोशनियाँ उसे ऐसी ही मिलें, लपझप करती हुईं! तो वह क्या करेगा? उसे मालूम है इसका जवाब। वह ज़रूर उन्हें हाथों में भर लाएगा और रोप देगा, उसके बालों में। वही जिसके बाल उसे रपंज़ेल की याद दिलाते हैं। इतने लम्बे बाल इन दिनों उसने नहीं देखे। माँ के बाल इतने ही लम्बे हुआ करते थे। माँ जिस रोज़ गुज़री उस दिन उसने अपने हाथों से उनकी चोटी की थी। माँ की त्वचा बुढ़ा गयी थी पर बाल आख़िरी समय तक युवा थे। आरुष को यक़ीन है रपंज़ेल के बाल भी कभी बूढ़े नहीं होंगे। लेकिन वह तो घूमने आयी है। जल्द ही यह शहर छोड़ देगी। वह कभी नहीं जान पाएगा उसके बाल बूढ़े हुए या नहीं। हो सकता है वह फिर यहाँ लौटे और आरुष जान सके उसके बालों का क्या हुआ। लेकिन वह क्यों लौटेगी! यहाँ लौटने जैसा है ही क्या!  
रात ग्यारह बजे के बाद जब भीड़ छँट जाती है तब कभी-कभी वे दोनों एक साथ स्केटिंग करते हैं। रूही का हाथ आरुष की कमर के इर्द-गिर्द लिपटा रहता है। ठंड से भीगी रात में कमर का वह एक भाग गर्म रहता है। आरुष को यह गर्माहट भली लगती है।
इतनी भीड़ में कभीकभी एक ही चेहरा सालदरसाल साल दिखाई देता है तब उसे हैरानी होती है कि हर साल कोई एक ही जगह क्योंकर आता है? वह भी मसूरी! पहाड़ों को काट कर बनायी गयी इमारतों के हुज़ूम ने इस शहर  का बहुत कुछ हड़प लिया है। हर साल यहाँ सैलानियों की संख्या कम होती जा रही है। लेकिन कुछ चीज़ें ख़त्म होने के बाद भी साँस लेती रहती हैं। इसीलिए बहुत कुछ निगले जा चुकने के बाद भी यहाँ का पहाड़ीपन बचा हुआ है। शायद इसी बचे हुए को देखने लोग दूरदूर से यहाँ चले आते हैं। हैरान तो वह तब भी होता है जब एक ही चेहरा तीन दिन से ज़्यादा दिखाई पड़ता है। अमूमन दोतीन दिन में यह शहर निबटा कर लोग आगे चल पड़ते हैं। इतने दिनों में मसूरी आसानी से घूमा जा सकता है। घूमने के नाम पर वही कम्पनी बाग़, केम्पटी फ़ॉल, लाल टिब्बा जैसे दोचार स्थान जहाँ जाना उसे ज़रा भी अच्छा नहीं लगता। उसके अपने ठिकाने हैं, दबेछिपे, जिन्हें सिर्फ़ वही जान पाते हैं जो किसी स्थान से दोस्ती गाँठ लेते हैं। 
जिस दिन कॉलेज की छुट्टी होती है वह उन जगहों पर चला जाता है, अकेले या रूही के साथ। सुबह से दोपहर तक का वक़्त वहाँ बिताता है। चार बजते बजते यहाँ लौट आना होता है। यहाँ कभी छुट्टी नहीं होती क्योंकि सैलानी सदा बने रहते हैं। किसी को पहाड़ों की ठंडी हवा में स्केटिंग का लुत्फ़ लेना होता है, तो किसी को ख़ूबसूरत पृष्ठभूमि के साथ पहियों पर तैरता वीडियो बनवाना होता  है। किसी रोज़ अगर कोई ज़रूरी काम आन पड़े या तबियत ख़राब हो जाए उस रोज़ रूही उसकी मदद करती है। रूही का बड़ा सहारा है उसे। वह होती तो कॉलेज और नौकरी दोनों एक साथ नहीं चल पाते। स्केटिंग भी तो वह ग़ज़ब की करती है। लगता है जैसे स्केटिंग रिंक में कोई बेले डान्सर उतर आयी हो। यूँ वह अक्सर वहाँ आती है लेकिन जिस दिन वह रिंक में उतरती है उस दिन भीड़ जुट जाती है। वह स्केटिंग करती है तो लगता है जैसे आसमान से सीढ़ी लगाकर सितारे फिसलते हुए रहे हैं। 
रात ग्यारह बजे के बाद जब भीड़ छँट जाती है तब कभीकभी वे दोनों एक साथ स्केटिंग करते हैं। रूही का हाथ आरुष की कमर के इर्दगिर्द लिपटा रहता है। ठंड से भीगी रात में कमर का वह एक भाग गर्म रहता है। आरुष को यह गर्माहट भली लगती है। ख़ाली मॉल रोड पर मद्धम संगीत गूँजता है। ऊँचेलम्बे पेड़ जिन्हें काटना सख़्त मना है, जिनमें  से कुछ के तने रेस्तराँ के भीतर का हिस्सा बन चुके हैं, झूमझूम कर नाचते हैं। ठीक उस तरह जैसे वे तब नाचते थे जब रेस्तराँ की दीवारों ने उन्हें क़ैद नहीं किया था। उन की पत्तियों के बीच लटके लट्टू चमक से भर उठते हैं। पेड़ों के नीचे से अपनी दुकान समेटते ग़ुब्बारे वाले, खिलौने वाले, सब ठहर कर उनकी ओर देखकर मुस्कुरा देते हैं। कभी बहुत ऊपर से, कोई बहकी हुई धुन चली आती है जिसका उस मद्धम धुन से कोई मेल नहीं बैठता लेकिन दोनों धुनें मिलकर जुगलबंदी साध लेती हैं।  रिंक में वे दोनों होते हैं और बाहर कुर्सियों पर पसरे उनके दोस्त..उनींदी हो चुकी रात में उन्हें मंत्रमुग्ध हो देखते हुए। दोनों के बीच अचानक शर्त लगती है और वे ख़ाली मॉल रोड पर उतर आते हैं। दोनों में से कोई किसी को नहीं पछाड़ पाएगा, यह दोनों जानते हैं फिर भी दोनों यह खेल नहीं छोड़ते। इस प्रतियोगिता का अंत क्लॉक टावर पर संग पहुँचकर एक लम्बेगहरे चुम्बन के साथ होता है। जब तक वे लौटते हैं तब तक सब जा चुके होते हैं। वह रूही को घर छोड़ता है। उसकी माँ की परछाईं परदे के पीछे से हाथ हिलाती है। बदले में वह भी हाथ हिला कर अपने घर चला आता है जहाँ सब सो चुके होते हैं। बस ठंडी रातों का उजला चाँद उसकी प्रतीक्षा में रहता है।  इन दिनों रूही नहीं है। वह स्केटिंग की किसी प्रतियोगिता में चंडीगढ़ गयी है। इन दिनों ओस में भीग कर चाँद भी पनीला रहने लगा है। 
वह रूही से प्रेम करता है फिर क्यों किसी अपरिचित स्त्री को देख वह इस तरह बेचैनी से घिर गया है। किसी को एक बार देख लेने भर से उसका वजूद इस तरह हावी हो जाए कि उसके अलावा कुछ भी सोचना मुमकिन न रहे, यह बात अजीब थी पर उसके साथ घट रही थी।
आरुष ने कलाई घड़ी पर निगाह डाली। छः बजने वाले हैं। लगभग आधा घंटा और। दिन भर भटकने के बाद लौटते वक़्त रपंज़ेल यहाँ आती है। कुछ देर यहाँ ठहर कर खाना खाने चली जाती है। तीन ही दिनों में आरुष को उसके बारे में बहुत कुछ मालूम हो गया है। मसलन उसका पसंदीदा रेस्तराँ, उसके पसंदीदा गाने और उसके पसंदीदा रंग भी। वह तीनों दिन उसी रेस्तराँ में गयी जो सबसे अच्छा शाकाहारी भोजन देने का दावा करता है। कुछ दुकानों पर रुक कर उसने खाने की सूची पढ़ी लेकिन वह वहाँ गयी नहीं। नहीं, वह उसका पीछा नहीं कर रहा था। मॉल रोड के बीचोंबीच स्थित इस जगह से दोनों ओर की सड़क दिखाई पड़ती हैबग़ैर कोशिश किए। उसने तीनों दिन हिंदी गानों पर अपनी गर्दन मटकायी और पैरों से थाप दी। तीनों दिन उसके कपड़ों में पीले रंग का हिस्सा रहा है जैसे मैदानों का पतझड़ अपने संग लिए चलती हो।
जब वह पहली रात आयी थी तब यूँ ही आयी थी..एक पता पूछते हुए।  उसे देखते ही फ़ैज़ान ने आरुष को बुला लिया था। फ़ैज़ान को मालूम था कि यह वही है जिसे मॉल रोड पर टहलक़दमी करते देखने के लिए आरुष आज दिन भर रेलिंग के पास खड़ा रहा था। हाँ, उस दिन उसने कहीं भी जाना स्थगित कर, नियम तोड़ कर बहुत जल्दी स्केटिंग रिंक खोल दिया था। उस रोज़ सुबह आरुष ने उसे पुरुष और तीन-चार साल के बच्चे के साथ रिक्शे से सामान उतरवाते देखा था और वह कॉलेज जाने की बजाय यहाँ गया था। फ़ैज़ान से उसने कुछ कहा नहीं था लेकिन वह जान गया था। तभी तो उसके आने पर ख़ुशी से लबलबाते हुए उसने आरुष को आवाज़ दी थी। दोस्त आँखें पढ़ लेते हैं तिस पर फ़ैज़ान तो उसका पक्का वाला दोस्त है। 
जब वह आयी तो आरुष कमरे के भीतर था। उस दिन वह रिंक में नहीं उतरा था। शाम से कमरे के भीतर चुप बैठा था। सब समझ रहे थे कि रूही के होने से वह उदास है पर वह उदास नहीं था। वह ट्रान्स में था। वह रूही से प्रेम करता है फिर क्यों किसी अपरिचित स्त्री को देख वह इस तरह बेचैनी से घिर गया है। किसी को एक बार देख लेने भर से उसका वजूद इस तरह हावी हो जाए कि उसके अलावा कुछ भी सोचना मुमकिन रहे, यह बात अजीब थी पर उसके साथ घट रही थी।
वह बाहर आया तो उसने देखा वह खड़ी थी। रात के दस बज रहे थे। इस वक़्त! वह तो शाम को जा चुकी थी। उसे मालूम तो नहीं हो गया वह आज पूरा दिन उसे देखता रहा है। उसके गाल सुर्ख़ हो गए। वह उसके पास आकर खड़ा हो गया। मीठी,भीनी ख़ुश्बू का भँवर वहाँ डेरा डाले हुआ था। शायद वह अभी नहा कर आयी थी। उसके बालों की नमी वह महसूस कर रहा था। उसने एक बार फिर पता पूछा। आरुष को पता मालूम नहीं था। उसे यहाँ के बारे में सब पता है फिर इस जगह का नाम उसने क्यों नहीं सुना। अपनी हैरानी छिपाते हुए वह बोला, “आपको स्केटिंग करनी है तो आप यहाँ भी कर सकती हैं।
नहीं। दरअसल…” कहकर वह चुप हो गयी। उसकी चुप्पी शुष्क थी। उसके चेहरे की तरलता के उलट। उसने अपना मोबाइल निकाला और तस्वीरों के फ़ोल्डर में कुछ खोजने लगी। वह एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर थी।   
मैं यह ढूँढ रही हूँ। आप स्केटिंग सिखाते हैं तो सोचा आपको मालूम होगा।” 
वह जगह नहीं पहचान पाया और ना में गर्दन हिला दी। वह अट्ठारहवीं सदी की कोई तस्वीर थी जिसमें लोग बर्फ़ पर स्केटिंग कर रहे थे।यह तस्वीर मैंने किसी जर्नल में देखी थी।” 
आरुष उसके बालों की नमी देख रहा था। वह शुक्रिया कह कर पलटने को हुई कि फ़ैज़ान कनखियों से उसके साथ वाले आदमी की ओर देखता हुआ बोला, “आप स्केटिंग करने आइएगा।आदमी कुछ दूर खड़ा सिगरेट फूँक रहा था। बच्चा प्रैम में सो रहा था।  आदमी की चेहरे पर कुछ नागवारी थी। यह बात इतनी दूर से भी सबने महसूस की।
उसने स्केटिंग के लिए हाँ नहीं कहा था। लेकिन उसने शुक्रिया कहा था। उसका शुक्रिया देर तक हवा में गूँजता रहा।
अब तो रिंक में आजा।फ़ैज़ान पूरे जोश में चिल्लाया और म्यूज़िक सिस्टम की आवाज़ बढ़ा दी। फ़ैज़ान को इंतज़ार था कि वह पलट कर एक बार देखेगी। इंतज़ार उसे भी था लेकिन उसने नहीं देखा। वह कॉफ़ी शॉप की तरफ़ चली गयी और वह रिंक में।  उस रात वह पहली बार रूही के बिना देर रात तक स्केटिंग करता रहा। तब तक, जब तक वह कॉफ़ी पीकर लौटते हुए नहीं दिखी। वह स्केटिंग रिंक की बत्तियाँ बंद करके अँधेरे में खड़ा हो गया जहाँ से वह उसको देख सकता था पर रपंज़ेल उसे नहीं देख सकती थी।  लौटते हुए उसकी आँखें नींद से बोझिल थीं। अपना शॉल उसने सिर के चारों ओर कस कर लपेटा हुआ था। उसके लम्बे बाल उसकी स्कर्ट की किनारी तक पहुँच रहे थे। बच्चा अब भी सो रहा था। उसने देखा आदमी ने अपनी बाँहें उसके कंधे पर रखीं जिसे उसने चुपचाप इस तरह हटा दिया जैसे रास्ते में पड़ा पत्थर किसी को चोट लगने के डर से ठोकर मारकर हटाने की बजाय धीरे से उठाकर रख दिया जाए। ऐसा करने के तुरंत बाद उसने पलट कर देखा था। अँधेरे के उसी वृत्त को, जहाँ वह खड़ा था। वह अपराधबोध से जड़ हो गया ज्यों किसी की निजता को उसने चोरी से भंग कर दिया हो। वह उसे तब तक देखे गयी थी जब तक सड़क के सर्पीलेपन की वजह से उसको दिखना बंद नहीं हो गया होगा।   
धीरे-धीरे उसके चेहरे की परत उघड़ने लगी। वहाँ कई सारे मिले-जुले भाव गुँथे हुए थे। वह उन्हें हाथ से छूकर देखना चाहता था। फिर उसे ख़याल आया वे किसी नवजात जैसे कोमल होंगे। उनकी कोमलता हाथों से नष्ट हो जाएगी। उन्हें सिर्फ़ होंठों से छुआ जा सकता है।   
लेकिन वह दिन, वह पहला दिन दोनों के बीच लौटा ही नहीं। अब लगता ही नहीं, दोनों के बीच उस रोज़ कोई बात हुई। कि वे दोनों वही लोग हैं जिनके बीच कभी कुछ शब्दों का आदानप्रदान हुआ था। उस दिन के बाद वह दोनों दिन, शाम को यहाँ आयी पर कुछ नहीं बोली सिवा एक और अस्फुट शुक्रिया के। जब वह सुबह यहाँ से गुज़र कर जाती है, न उसकी आँखों में पहचान कौंधती है होंठों पर मुस्कुराहट। लेकिन वह उसे देखती हैइस तरह जैसे यह देखना ही अंतिम सत्य है। इस देखने के अलावा संसार में हर बात आधारहीन है। वह इस देखे जाने के हर क्षण को पीता है। उसे मालूम है वह जल्द ही चली जाएगी। फिर कोई उसे यूँ नहीं देखेगा। रूही भी नहीं।
शहीद स्मारक की ओर से कुछ युवाओं का हुल्लड़ हवा के संग यहाँ बह आया। उसे  ख़याल आया कि रपंज़ेल को यहाँ आए तीन दिन पूरे हो गए हैं। आज चौथा दिन है। अगर वह आज नहीं आयी तो? हो सकता है जाने से पहले उसे सामान बाँधना हो या ऐसी जगहें देखनी हों जो उसने अभी तक देखी हों और आज वह सब देख लेना चाहती हो। लेकिन तब भी वह सब नहीं देख पाएगी। सोचकर उसे दुःख हुआ। वह रपंज़ेल को बिनोंग पहाड़ी पर स्थित ज्वाला मंदिर ले जा सकता था। उसने वह निश्चित तौर पर नहीं देखा होगा। कहीं वह भी गिनीचुनी जगह देखकर चली जाए। आज वह आएगी तो आरुष उस से पूछेगा कि वे लोग कहाँ घूमे। फिर वह उसे बताएगा कि उसे कहाँ घूमना चाहिए।  लेकिन वह बात कैसे शुरू करेगा? सोचा तो उसने कल भी यही था कि उस से बात करेगा। 
कल रपंज़ेल ने पीला दुपट्टा ओढ़ा था। दुपट्टा जो बारबार उसके कंधे पर से उतर रहा था। दुपट्टे का आधा भाग उसने बेंच पर फैलाया और अपने बेटे को बिठा दिया उसने सोचा होगा कि बेंच गरम है या शायद बच्चे को चुभेगी। आरुष ने अपनी कुर्सी से गद्दी हटा कर उसे पकड़ा दी। उसने धीरे से कुछ कहा जिसका अर्थ शुक्रिया हो सकता था या हो सकता है उसने कहा हो इसकी क्या ज़रूरत थी। आरुष उसे पास से देखकर हड़बड़ा गया था इसलिए ठीक से सुन नहीं सका। यहाँ बात शुरू की जा सकती थी किंतु वह तुरंत स्केटिंग रिंक में चला गया और बहुत देर तक उसकी ओर नहीं देखा। बाद में उसने देखा बच्चा गद्दी पर बैठे हुए आराम से सो गया। बच्चे का सिर उसकी गोद में था और वह एकटक स्केटिंग रिंक के पार घाटी देख रही थी।  कल वह गर्दन नहीं हिला रही थी, पैरों को थपक रही थी। वह बहुत थकी हुई थी या बहुत उदास थी या शायद वह दोनों में से कुछ भी नहीं थी। उसने जाने क्या सोच कर म्यूज़िक सिस्टम पर गाना बदल दिया। 
बोल दो ज़रा, दिल में जो है छिपा, मैं किसी से कहूँगा नहीं…’
उसने ऐसी हरकत पहले कभी नहीं की थी पर कल वह ख़ुद को रोक नहीं सका। रूही होती तो नाराज़ होती। नहीं, वह उसको चिढ़ाती और तब तक हँसती जब तक उसकी आँखों से आँसू बहने लगते। लेकिन अगर रूही  होती तो यह होने पाता! वह रपंज़ेल को इस तरह देख पाता या वही उसको इस तरह देखतीहाँ, पिछले तीन दिनों से एकदूसरे को देखना उनके अस्तित्व का इतना बड़ा सच हो चला है कि कोई और सच उसे ढक नहीं पाता। भले ही वह रूही हो या वह आदमी जो अभी आता होगा। 
गाने के बोल बदलते ही रपंज़ेल ने गर्दन उठायी। उसके गर्दन उठाते ही रूही खो गयी।  रपंज़ेल की नज़रें कमरे के दरवाज़े पर आकर टिक गयीं। दोनों ने क्षण भर एक दूसरे को देखा। रपंज़ेल की आँखों का वह अजाना भाव गहरा गया। इतना गहरा कि वह सदा के लिए उसके भीतर खो सकता था। तभी वह आदमी गया था जो रोज़ उनके साथ होता है। उसने बच्चे को गोद में उठाया तो वह जाग गया। पिता को देखते ही वह पुलक उठा। बच्चे को हँसता देख रपंज़ेल भी मुस्कुरा उठी। मुस्कुराने के ठीक बीच उसने एक बार फिर उसकी ओर देखा था। आरुष को महसूस हुआ ऐसे गानों के साथ वह ज़्यादा सुंदर लगती है। उसने तय किया कि जब तक वह यहाँ है वह ऐसे ही गाने बजाएगा। रूही के अंग्रेज़ी गानों की पेन ड्राइव उसने दराज़ में रख दी।  
उसने घड़ी देखी। समय हो चला है। वह रेलिंग पर झुक कर खड़ा हो गया है। कल से या परसों से उसका आना, अतीत हो जाएगा।  वह तब भी इंतज़ार करेगा। किसी का इंतज़ार करें तो उसका अंत ज़रूर होता है। वह इस इंतज़ार के अंत का इंतज़ार करेगा। वह रही थी।  उसका आँचल दिख रहा था। एक कंधे से होकर दूसरे कंधे को चूमकर, फहराता हुआ नीला आँचल। उसने आसमान देखा। सुनहरापन, ठंडे नीले में बदल रहा था। बारिश आयी तो वह नहीं रुकेगी। हो सकता है वह रुकना चाहे पर बच्चे की वजह से उसे जाना पड़े। उसने प्रार्थना की कि बारिश हो। उसी प्रार्थना के बीच एक लड़का आया और उस से स्केट्स माँगे। लड़के का आना उसे प्रार्थना क़ुबूल होने जैसा लगा। उसने उसके पैर देखकर अंदाज़ से उसकी नाप के स्केट्स निकाले और उसके गाल थपथपा दिए। लड़का ख़ुश होकर स्केट्स पहनने लगा और वह खड़ा होकर वह फिर उधर देखने लगा जिधर से वह रही थी। अब उसका चेहरा दिखने लगा था। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह कुछ नहीं था, यहाँ तक कि ख़ालीपन भी नहीं। बच्चा उसकी गर्दन में मुँह छिपाए चिपटा हुआ था। वह आदमी उसके साथ नहीं था। रोज़ की तरह वह कहीं रुका होगा और थोड़ी देर बाद उन दोनों को ले जाने आएगा। उसने आरुष को देख लिया था। अब वह उसको वैसे ही देख रही थी जैसे उसके अतिरिक्त देखने को वहाँ कुछ नहीं है। इस बार आरुष ने नज़रें नहीं फेरीं। देखने का प्रत्युत्तर देखना ही हो सकता है इसलिए वह देखता रहा..घूँटघूँट। 
वह भीतर आयी तो उसकी रोज़ की जगह पर एक स्त्री बैठी थी। वह बच्चे को लेकर खड़ी रही, जगह खाली होने के इंतज़ार में। वह कहीं और नहीं बैठना चाहती। वह जानता है क्यों। यह जगह कमरे के और रिंक के सबसे नज़दीक है। आरुष दोनों में से किसी भी जगह रहे, यहाँ बैठने से वह उसके पास रहेगी, उसे देख सकेगी। आरुष भी यही चाहता है कि वह यहीं बैठे। उसके जाने के बाद वह इस जगह से कुर्सी हटा देगा। वह कभी लौटेगी तो अपनी जगह ख़ाली पाएगी। 
कुर्सी पर बैठी औरत उठी तो वह बैठ गयी। आरुष ने गाना बदल दिया।  ‘इश्क़ दी बाज़ियाँपहले लफ़्ज़ पर उसकी पलकें हल्कासा काँपी और स्थिर हो गयीं। जैसे बर्फ़ ने फूल की किसी पंखुड़ी को ढक लिया हो वैसे यह एक शब्द उसके पूरे वजूद पर छा गया। उसकी देह को किसी सुख ने घेर लिया। धीरेधीरे उसके चेहरे की परत उघड़ने लगी। वहाँ कई सारे मिलेजुले भाव गुँथे हुए थे। वह उन्हें हाथ से छूकर देखना चाहता था। फिर उसे ख़याल आया वे किसी नवजात जैसे कोमल होंगे। उनकी कोमलता हाथों से नष्ट हो जाएगी। उन्हें सिर्फ़ होंठों से छुआ जा सकता है।   
वह स्केटिंग रिंक में गया। आज सप्ताहांत पर बहुत भीड़ थी। रोज़ आने वाले बच्चों को उसने कुछ टिप्स दिए। स्केटिंग रिंक के भीतर उसे एक ही ख़याल रहा था कि आज उसे कुछ बात ज़रूर करनी चाहिए। तभी उसे सड़क पर चलते आदमी के घुंघराले बाल दिखे। वह शायद यहीं रहा था। अब वह उसकी रपंज़ेल को ले जाएगा। वह रिंक से बाहर गया। वह उसके पास जाना चाहता था लेकिन कमरे में चला गया। रपंज़ेल ने भी शायद आदमी को देख लिया था। वह बच्चे की उँगली थामे खड़ी हो गयी। उसने बच्चे के कान में धीरे से कुछ कहा। 
बच्चा उस तक आया और अटकते हुए पूछा,
आप स्केटिंग सिखाते हैं?”
उसने रपंज़ेल की ओर देखते हुए हाँ कहा। बच्चा वापस उस तक गया। उसने फिर कान में कुछ कहा। बच्चा आरुष के पास आया और कहा,
हम अगले साल फिर आएँगे। आप हमें स्केटिंग सिखाना।” 
हाँ, ज़रूर। तब तक आप भी कुछ बड़े हो जाएँगे।उसने उसकी छोटी उँगली थामते हुए कहा। यह वही उँगली थी जिसे थाम कर वह खड़ी हुई थी। उसे यह स्पर्श बहुत अच्छा लगा। वह इस नन्हें हाथ को छोड़ना नहीं चाहता था। 
वह बाहर खड़े होकर मुस्कुरा रही थी। उसने पहली बार उसे मुस्कुराते देखा है। , दूसरी बार।  मुस्कुराने से उसके गालों में गढ़े बनते हैं।  उसने देखा आदमी उन्हीं की ओर बढ़ रहा था। उसने एक काग़ज़ पर जल्दी से एक सूरज बनाया, एक फूल उकेरा और नीचे लिखा, इंतज़ार यह काग़ज़ का टुकड़ा उसने बच्चे की मुट्ठी में खोंस दिया। तब तक बच्चे ने आदमी को देख लिया था। बच्चा अपनी माँ के पास लपक कर गया और उसके हाथ में काग़ज़ का टुकड़ा थमा कर किलकता हुआ आदमी के पास दौड़ गया। उसने देखा रपंज़ेल ने काग़ज़ का टुकड़ा हाथ में पकड़ी किताब के हवाले किया और मुड़ गयी। वह रपंज़ेल की पीठ देख रहा था। उसकी पीठ सर्पिल नदी थी। लम्बे बाल हवा में उड़ रहे था। उसने सोचा किसी दिन वह उन बालों को छुएगा।  
अब वह किसी चेहरे को यहाँ दोबारा देखेगा तो उसे हैरानी नहीं होगी। लोगों के लौट आने का एक कारण अब उसे मालूम हो गया है। बारबार लौट आने वाले अपने इंतज़ार की जड़ यहाँ रोप जाते हैं।  अब वह इंतज़ार करेगा कि अगले साल, या किसी और साल की गर्मियों में रपंज़ेल अपने बच्चे के साथ आएगी और वह उनको स्केटिंग सिखाएगा। 
दिव्या विजय
दिव्या विजय हिंदी की चर्चित युवा कहानीकार हैं. हंस, नया ज्ञानोदय, कथादेश आदि हिंदी की सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में इनकी कहानियाँ प्रकाशित होती रही हैं. दो कहानी संग्रह 'अलगोज़े की धुन पर' और 'सगबग मन' प्रकाशित हो चुके हैं. संपर्क - divya_vijay2011@yahoo.com

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