होम कविता आशीष मिश्रा की कविता – मैं दीवार हूँ उसके घर की

आशीष मिश्रा की कविता – मैं दीवार हूँ उसके घर की

2
65
मैं दीवार हूँ उसके उसके घर की
खड़ी-खड़ी देखती रहती हूँ उसे
उसकी हरकतों को
उसकी चाल-ढाल को
उसकी बेहाल ज़िंदगी को
उसे पल-पल हारता
उसे अपने आप से भागता।
लेकिन कुछ महीने
पहले तक वो ऐसा नहीं था
शीशे में देख कर ख़ूब मटकता था
जब भी किसी से मिलता
वो ख़ूब चहकता था।
पता नहीं कुछ महीनों से
सोता ही नहीं
थोड़ा मुस्कुरा दे
ऐसा होता ही नहीं।
जैसे उसने अपने हाथ में
बहुत सारी हवा दबा रखी है,
पता नहीं कहाँ से पकड़ लाया
मानों एक सज़ा दबा रखी है।
दीवार हूँ सब देखती हूँ।
उसके पास केवल कुछ
जंगल वाले बगीचे बचे हैं,
जैसे ही चलता है
गलीचे में काँटे लगते हैं
और फिर दौड़ कर अपने सोफ़े
पर बैठ जाता है,
पता नहीं कहाँ से इतनी रेत लाता है।
चुप रहना, बेमन होना
भीड़ में अकेला होना
अकेलेपन में और अकेला
दर्द बग़ैर नासूर के
गहरा होना।
ये सब उसमें पनपता है
मन उदास है बस यही लगता है।
ये सब क्या है? क्यूँ नींद हवा है
अब हवा में वो नशा-सा नहीं लगता उसे।
एक दो दोस्त आये थे पिछले हफ़्ते
उसके साथ बालकोनी में सिगरेट पी,
मेरे हाथ होते तो रोक देती
कहती ये धुआँ तुझे और जलाता है,
तू कमज़ोर है इसका हर कश बताता है।
वो बहुत प्यारा है हमेशा से
मेरी बराबर वाली नीली दीवार
उसे बहुत पसंद थी
पिछले साल उसने मेरे पर भी
पीला-सा वॉलपेपर लगाया था
अब ना वो नौजवान रहा, ना ही वैसा रंगीन
उसका मन बूढ़ा होता जा रहा है
वो धीरे धीरे चलता है
बोझिल होता जा रहा है
लगता नहीं कोई उसके पास है
साँस लेने की कहाँ कोई आस है
आस है कि कोई समझेगा
मिलेगा, बात करेगा।
पूरे तीन महीने से
हँसता है, मुस्कुराता नहीं।
हृदय में एक भय-सा है
अपने आप को भी बताता नहीं।
रात भर जागता रहता है
उँगलियों में जैसे धागा हो
उसमें उलझता उलझाता रहता है।
यूँ तो सूरज आता है खिड़की से
सभी के लिये शायद पूरा
इस घर में आधा दिन ही बना पाता है।
मन, मन उदासी में सना है
सना है अकेलेपन के मेले में
इतने सारे लोग दिखाई देते हैं
लेकिन वो बस अकेला है अकेले में।
रोज़ कल से ज़्यादा
ज़्यादा निकम्मा हो रहा है
बेचारे का कुछ करने का दिल नहीं करता
कुछ कहने का दिल नहीं करता 
डॉक्टर साहब आये थे
बोले तुम बीमार हो रहे हो
क्यूँ ख़ुद से इतनी
जल्दी हार रहे हो
लो ये नयी दवाई है
ख़ास मँगवाई है
कल से तुम्हारी coffee बंद
भई कैफ़ीन होता है it won’t help
कल बहन आयी थी
सर की मालिश की उसने
कुछ क्षण तो अच्छा लगा
फिर शिकन होने लगी माथे पर
दीदी आप रहने दो, I am good
और वो अंदर वाले कमरे में चला गया।
मम्मी, भाई वे सब फुसफुसाते रहे
परेशान है – ऐसा बताते रहे।
कल सुबह फिर डॉक्टर साहब मिलने वाले हैं
कैसे जीवन में झांकना है बताने वाले हैं
मेरा दोस्त भी उनसे मिलकर
कुछ दिनों से थोड़ा बेहतर हो जाता है 
काश! मैं उसे अपनी गोद में बिठा पाती
थपकियों के साथ सुला पाती
मेरी ज़ुबान होती तो बात करती उससे
थोड़ा हँसती और हँसाती उसे।
सुनों आप मेरे घर आओ ना
एक बार बैठो बात करो उससे
हो सके तो बाहर समुंदर किनारे ले जाओ
इस नौजवान को नयी लहर दिखाओ,
इस नौजवान को नयी लहर दिखाओ।

2 टिप्पणी

  1. कविता बहुत अच्छी है, पर डॉक्टर की diagnosis भी बता देते तो अच्छा लगता, ऐसे तो depression का case लगता है

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.