आज बस्ती में अन्य दिनों की अपेक्षा चहल-पहल कुछ ज्यादा बढ़ गई है। सड़कें साफ हो रही है।नई नालियाँ बनी है और अचानक ही नए- नए चेहरों का आना-जाना भी बढ़ गया है। गरीबों की बस्ती में दो जून की रोटी की तलाश में जुटे लोगों की जिंदगी में एक -एक पल की जद्दोजहद से जूझते परिवारों के बीच खुशियों के पल कभी-कभी ही आ पाते हैं।बस्ती के सारे बच्चे आपस का लड़ाई -झगड़ा भूल,एक जगह एकत्र हो अपनी अलग चौपाल लगाते हैं।बीनू भी नीम वाले चबूतरे पर खड़ा होकर चुपचाप उनकी बातें सुनता रहता है।अभी कुछ ही दिन पहले तो वह अपनी माँ और बाबूजी के साथ उत्तरी बिहार के एक छोटे- से गाँव से यहाँ आया है। वह यहाँ किसी को जानता भी तो नहीं। बीनू को अक्सर अपना गाँव  बहुत याद आता है।
खेतों के बीच दौड़ते- भागते तितलियाँ पकड़ते,खिलखिलाते दिन।धान की भूसी के ऊँचे-ऊँचे ढेरों पर चढ़कर फिसलना। नई मटर की फलियाँ तोड़ आँगन में बैठ दोनों भाई -बहन खाते रहते थे।पर अचानक आई बाढ़ ने सब कुछ छीन लिया। एक दिन,जब वह सोकर उठा तो चारों तरफ पानी ही पानी भरा था। वह घबराकर जोर- जोर से चीखने लगा, तो माँ उसे जबरदस्ती उठाकर बाहर ले आई थी। मुखिया जी की दालान में पूरा गाँव  इकट्ठा हो गया था।बाबूजी अन्य लोगों के साथ सिर झुकाए बैठे थे और माँ की आँखों के आँसू थम नहीं रहे थे। बाढ़ ने  सब कुछ तो छीन लिया था, कपड़े,रूपए -पैसे, अनाज,उसकी लकड़ी की गाड़ी और नैना की गुड़िया भी। कुछ दिनों तक मुखिया जी की ओर से खिचड़ी बनती थी, पूरे गाँव के लिए और रोज उसे ही खाना मजबूरी थी।तब उसका बाल -मन यह नहीं समझ पाया था कि ऐसा क्या हुआ?कहाँ से आया इतना सारा पानी? नैना माँ की गोद से में दुबकी हुई दूध के लिए रोती रहती थी। पर माँ की सुनी भीगी आँखें देखकर सहम कर चुप भी हो जाती थी। मुखिया जी के यहाँ पूरे गाँव की भोजन व्यवस्था का यह वैकल्पिक प्रबंध आखिर कब तक उन भूखे लाचार, हताश किसानों की जीवन रक्षा कर पाता? रोजी -रोटी की चिंता ने उन्हें निरुपाय  तो किया ही, उम्मीद की एक किरण भी नहीं दिखाई दे रही थी। बाबूजी भी अन्य गाँव वालों के साथ खेतों की ओर जाते, वहाँ की तबाही और टूटे-फूटे घरों को देख उदास हो लौट आते। गाँव में जीवन का एकमात्र अवलंबन या जीवन रेखा खेत ही थे। बाढ़ ने पूरे गाँव की लहराती फसल को निगल लिया था। पर भूख से बिलखते बच्चों एवं उनके भविष्य की चिंता उन्हें खाए जा रही थी बाढ़ के गुजर जाने के बाद खेत तो सूख कर बंजर हो चुके थे और दुबारा उन्हें उपजाऊ बना पाना संभव नहीं था। कुछ दिन तक घर के सामान,बर्तन आदि बिकते रहे और पेट की आग बुझती रही ; पर कब तक? एक दिन बाबूजी और दूसरे लोगों ने बुझे मन से शहर चलने का फैसला किया बाकी वहाँ कुछ मेहनत-मजदूरी कर परिवार का पेट भरने लायक कमा सके। कल के संपन्न किसान आज भुखमरी की कगार पर खड़े हो,कंगाल और असहाय हो गए थे।वे लोग शहर आ तो गए थे, पर गाँव से कुछ नहीं ला पाए थे।सिर्फ थोड़े से बचे -खुचे कपड़े और बर्तन।
तब तो उमस और गर्मी के दिन थे, बिछावन की विशेष जरूरत नहीं थी, पर अब तो सर्दियाँ आ गई है,ठंड भी बढ़ गई है. माँ बाबूजी से रोज कहती है, “इस जाड़े में रजाई बनवा पाना तो संभव ही नहीं है, पर यहाँ सबके पास एक कंबल तो है,   इसलिए एक कंबल तो लेना ही पड़ेगा। बच्चों को ठंड लगती है, कहीं बीमार ही ना पड़ जाए।”और बाबूजी माँ को रोज़ समझाते हैं, “अगली पगार मिलने पर खरीद दूँगा।”
फिर कंबल तो नहीं आ सका पर बाबूजी की मजबूरियाँ रोज नए-नए रूप बदलकर आती गई। और कंबल अभी तक नहीं खरीदा जा सका था। काम की तलाश में भटकते हुए बाबू जी का चेहरा बीनू कभी भूल नहीं पाता। पहले तो काम देने वाले उन्हें गवार, नौसिखिया समझकर उस पर विश्वास ही नहीं करते थे या कभी कोई जान- पहचान ढूंढते थे जो उनकी जमानत दे सके। पर वे लोग यहां अनजान थे, कौन उनकी बात पर भरोसा करता? जब कई दिनों तक कोई काम नहीं मिला तब बाबूजी पहली बार दोनों बच्चों का चेहरा देख जार -जार रोए थे।फिर एक निर्माणाधीन इमारत में मजदूरी का काम मिला। उस दिन पहली बार घर में चूल्हा जलाकर भात पका था और नैना और बीनू ने कई दिनों बाद भरपेट खाना खाया था……
इन दिनों बीनू अपने गाँव की खुशहाली और थोड़े ही में खुश रहने वाली जिंदगी को बहुत पसंद करता था।जाड़े के दिनों में अलाव जलाकर पुआल के मोटे बिस्तर पर भी ऐसी नींद आती जैसे मखमली  गद्दे पर सोए हो।पर यहाँ तो ठंड इतनी पड़ती है कि बिना कंबल के गुजारा ही नहीं होता। पर उसके पास तो पहनने के ढंग के कपड़े भी नहीं थे, कंबल कहां से आता ? बस्ती के सारे घरों में कंबल है, सुबह की धूप में सबके कंबल दरवाजे पर सूखने को टंग जाते हैं, यह उन्हें छू- छूकर देखता है और उसका भोला मन जाने कब इस लालसा को पाल बैठा कि एक दिन उसके पास भी कंबल होगा और नैना के साथ कंबल ओढ़ कर सोएगा।बच्चे शोर मचाकर लंगडी- छू का खेल खेल रहे हैं, वे उसे भी बुलाते हैं, “आ जा बीनू!हम साथ खेलेंगे।” पर बीनू इंकार कर वहां से घर आ गया। बीनू को अभाव और संघर्षो ने समय के पहले ही बड़ा बना दिया है। अब उसे खेल- खिलौने नहीं याद आते, बस माँ की भीगी आँखें और बाबूजी की बेबसी को दूर कर पाने की इच्छा ही मन में रहती थी। उसका कोमल मन तो न गरीबी की परिभाषा समझता था, न सामाजिक विषमता की बड़ी-बड़ी बातों को ही। वह अक्सर एक प्रश्न खुद से पूछता था, “बाबू जी इतने बेबस क्यों हैं? वे सबकी तरह आसानी से कंबल या जरूरत की चीजें क्यों नहीं खरीद सकते? पर उसके पास इसका कोई जवाब नहीं था।नैना अक्सर पूछती,” भैया,नरम गुनगुना कंबल कितना अच्छा होता होगा ना? ” वह उसे हमेशा फुसलाकर चुप करा देता था, ” हां शायद!.”….
तभी माँ ने अंदर से पुकारा, “बीनू!”
“आया माँ!”कहता हुआ बीनू घर में आ जाता है।माँ चूल्हे के पास बैठी रोटियां पका रही है और बाबूजी आलू का चोखा नमक- मिर्च के साथ थाली में लेकर खाने बैठे हैं।बच्चों को खाना परोस माँ एक बार फिर कंबल की बात छेड़ देती है।बाबूजी ने इस बार पक्का वादा किया कि अगली पगार में कंबल जरूर ला देंगे।बीनू को कोई खुशी नहीं होती।ऐसा तो बाबूजी कहते ही रहते हैं।अगली बार भी पैसे खर्च हो जाएंगे या मालिक कम पगार देगा और कंबल लेना अगली बार  के लिए टल जाएग। सोचता हुआ बीनू न जाने कब माँ के बनाए धोतियों को  ओढ़ने में लिपट कर सो जाता है।
सुबह होते ही उसका पड़ोसी दोस्त रुंचू दौड़ कर आया,” अरे बीनू! बड़े घर वाले सेठ जी आएंगे कंबल बांटने, नेताजी के साथ! वे हर साल आते हैं,बच्चों को टॉफियाँ देते हैं और फोटो खिंचवाते हैं।”
बीनू खुश हो गया। उसे अचानक आज की सुबह बहुत प्यारी लगने लगती है।उसके सपनों में,विचारों में, कल्पनाओं में बस कंबल ही कंबल थे,… रंग-बिरंगे, नरम,मुलायम कंबल।
बस्ती में हो रही साफ- सफाई कर रहस्य उसे अब समझ आता है।सुबह होते बस्ती के सारे  बूढ़े -बुजुर्ग दीपन चाचा के चबूतरे पर एकत्र हो गए हैं।वही चौकी पर चादर बिछाकर माइक और कुछ कुर्सियाँ लगा दी गई है।बीनू खुश था कि यहाँ के लोग कितने अच्छे हैं,गरीबों का भी कितना ख्याल रखते हैं। सभी के नाम लिखे जा रहे थे…..बूढ़े लंगड़े रामदीन, अंधी  सबीना दादी, यहां तक कि उसकी पड़ोसन नब्बे वर्षीय बसंती दादी को भी गोद में उठाकर वहाँ पहुँचा दिया गया था। बीनू भी उचक -उचक कर अपना नाम लिखवाना चाहता था, पर कद छोटा होने की वजह से बार-बार पीछे धकेल दिया जाता। एक बार तो धक्का-मुक्की के बावजूद वहाँ तक पहुँचा भी तो तुरंत टोक दिया गया, “अरे बीनू! तू यहाँ कैसे? जा भाग?ये कंबल गरीबों के लिए है, तुम्हें कंबल देंगे तो तुम्हारे बाबूजी नाराज हो होंगे….जा भाग। “
बीनू को गुस्सा आ गया, “भला क्यों नहीं मिलेगा कंबल?क्या मुझे ठंड नहीं लगती?”  पर उसे जवाब नहीं मिला।बीनू हताश हो गया। पर कंबल पाने की कोई नई तरकीब सोचता रहा।तभी कमलों से भरा एक टेंपो वहाँ आ लगा।उसके पीछे कारों से कुछ लोग उतरे,कुछ के हाथों में बड़े-बड़े कैमरे थे। इनके पीछे सेठ जी अपनी चमचमाती कार से नेताजी के साथ उतरे और बिना किसी की ओर देखे सीधे मंच की ओर चले गए।
मंच से उद्घोषणा हो रही थी, “सभी लोग कतार में आ जाएं। सब को कंबल मिलेगा। “
बीनू दौड़ कर कभी इधर जाता, कभी उधर,कभी मंच की दूसरी ओर से कतार में घुसने की नाकाम कोशिश करता। बूढ़ों की पंक्तियाँ अलग और लाचार,अपंगो की अलग थी।बच्चे बिना वजह शोर मचा रहे थे। एक बीमार को तो उसके परिजन खाट पर लिटा कर लाए थे।जो चलने में असमर्थ थे उन्हें जबरन खड़ा करने का प्रयत्न किया जा रहा था, भले ही उन्हें कितनी ही तकलीफ क्यों ना हो!वहाँ युवाओं और बच्चों को कोई पूछ ही नहीं रहा था,क्योंकिवे देखने वालों के मन में कोई करुणा नहीं उपजा सकते थे। धीरे-धीरे कंबल बांटने की प्रक्रिया शुरू हुई। सेठ जी और नेताजी एक- एक करके उन लाचार लोगों के हाथों में कंबल थमाते हुए एक  जैसी मशीनी मुस्कुराहटओढ़कर तब तक मुस्कुराते रहते जब तक तस्वीर नहीं खिच जाती थी।  जब बसंती दादी की बारी आई तो वह ठीक से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी,लाठी टेकते -टेकते जब बेटे के साथ, मंच तक पहुँची तो कंबल थाम कर फोटो खिंचवाने तक खड़े रहने की मजबूरी में उसके पाँव लड़खड़ा गए और चकरा कर वहीं गिर पड़ी। हल्ला मच गया। किसी ने पानी का गिलास उठाया ही था कि नेताजी ने छीन कर पानी का गिलास थाम लिया और उसके मुंह पर छींटे मारने लगे।कैमरे की फ्लैश लाइटें चमक उठी और नेताजी की दया और करुणा का या दृश्य भी कैमरे में कैद हो गया। दादी अभी होश में नहीं आयी थी लेकिन नेताजी वापस अपनी जगह पर पहुँच गए।दादी को किनारे कर दिया गया। अकेले बीनू ही उन्हें अखबार से हवा करता रहा। उनका कंबल लेकर उनका लड़का घर जा चुका था।
कंबल बांटने की प्रक्रिया समाप्त हुई. थोड़ी देर के बाद जलसा भी खत्म हो गया और मजमा भी।सभी वहाँ से चले गए। बीनू रुआँसा,और उदास था।
आज रुंचू  बड़ा खुश था।उसने बीनू को बताया कि रात को उसके बाबा काम से लौटते समय खूब शराब पी आए थे और बेसुध होकर वही चबूतरे पर रात भर पड़े रहे थे।कंबल बाँटने वालों ने जाते समय तरस खाकर एक कंबल उन पर भी डाल दिया था। ” बाबा को सुबह जब होश आया तो वह कंबल को अपने साथ लेते आए। बहुत ही अच्छा मुलायम कंबल है।”रुंचू ने ही उसे यह भी बताया कि “आधी रात को भूतों के राजा रोज बस्ती में आते हैं और गरीबों की मदद करते हैं,जिनके पास खाना नहीं होता उन्हें खाना खिलाते है, वे कपड़े और कंबल भी बांटते हैं।”
रुंचू की बात सुनकर बीनू के मन में ईर्ष्या तो हुई पर कंबल पाने का  एक रास्ता भी सूझ गया।बीनू अब सोच रहा था कि शराब जैसी गंदी चीज पीने वाले को भी कंबल मिल गया,सिर्फ बेहोश होने के कारण!कल वह लोग फिर आने वाले हैं, दूसरी बस्ती में कंबल बाँटने।वह भी रात में बेहोश होने का नाटक कर चबूतरे पर पड़ा रहेगा…..हो सकता है कि दया करके एकाध कंबल उसे भी मिल जाए। या क्या पता भूतों के राजा को उस पर दया आ जाए और कोई बढ़िया सा कंबल उसके हाथ लग जाए।
वह बेसब्री से आधी रात होने की प्रतीक्षा करने लगा। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। बगल में लेटी छोटी बहन के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए उसके इरादे और बुलंद हो जाते हैं।
रात अधिक बीत चुकी थी। बाबूजी, माँ, नैना सभी सो चुके थे। वह चुपके से उठा और बाहर आकर धीरे से दरवाजा बंद कर दिया।बाहर ठंड थी। पाँव कांप रहे थे। पर बीनू के बाल मन में कंबल पाने की लालसा इतनी प्रबल थी कि उसे ठंड या कपकपी का मानो एहसास ही नहीं था। वह नीम की बगल वाली सड़क पर लेट गया जैसे बर्फ की सतह पर लेटा हो।पर परवाह नहीं। ठंड काफी बढ़ चुकी थी. कुछ देर तक करवटें बदल- बदल कर शरीर के तापमान ने बाहर के तापमान से लड़ने की कोशिश की, पर अंततः प्रकृति के सम्मुख मानव शरीर हार गया। तीखी, बहती हुई ठंडी हवा के झोंके उसके कोमल शरीर को बेध रहे थे। उसके हाथ -पाँव सुन्न होने लगे थे। शरीर शिथिल होता जा रहा था।पर उसके बावजूद कान पूरी तरह सजग थे।
कहीं किसी गाड़ी की आवाज या आहट पर वह चौकन्ना हो जाता कि शायद वे लोग आ गए।पर गाड़ी के गुजर जाने के बाद वह निराश हो जाता और गहरे अंधकार में डूब जाता। कई बार हिम्मत टूटने को होती और वहाँ से उठकर भाग जाने की इच्छा होती पर नैना का मासूम चेहरा याद आते ही उसके हौसले बुलंद हो जाते। आज तो वह नन्हा सा दस वर्षीय अबोध बीनू नहीं था बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति वाला कोई हठयोगी बन गया था, जो ईश्वर और प्रकृति के सम्मुख अपनी बात मनवाने के लिए अड़ा हुआ था। हवा के सायँ -सायँ तथा दूर से आती कुत्तों के भौंकने की आवाजें भय  पैदा कर रही थी।वह मन ही मन भूत राजा से मिन्नतें कर रहा था अपनी मदद के लिए।वह सुन्न हो गए हाथ पैरों को हिला भी नहीं सकता था। मानो शरीर का पूरा खून ही निचोड़ लिया हो किसी ने। आखिर वह प्रकृति से कब तक लड़ सकता  था? धीरे-धीरे पूरी तरह संज्ञाशून्य हो गया। अब तो बची -खुची चेतना भी विलीन हो गई थी। अपनी चेतना खो चुका था। शेष रह गई थी निःस्तब्ध रात्रि कि अंधकार भरी कालिमा।
भोर हो रही थी पर रात का  कुहासा अभी छटा नहीं था। लोग अपने घरों से निकल काम पर जाने की तैयारियों में व्यस्त थे। नींद से  ऊंघती आँखें  अचानक जाग उठी,जब एक जोरदार चीख की आवाज सुनाई दी।बीनू की माँ दहाड़े मार कर रो रही थी। बीनू नीम के चबूतरे वाली सड़क पर मृतप्राय सा बेहोश पड़ा हुआ था। रात भर कीठंड ने उसके कोमल शरीर को ठिठुरा दिया था। पड़ोस की दादी ने बताया कि जब वह लाठी टेकते हुए शौच के लिए जा रही थी तो किसी चीज से टकराई और वहीं बैठ गई। टटोल कर पहचाना कि “अरे यह तो वीनू है,पड़ोसी रामआसरे का बेटा।उस दिन कंबल के लिए कितना परेशान था बेचारा कि उसे नैना के लिए कंबल चाहिए,पर मरो ने उसकी एक नहीं सुनी। क्या हो जाता अगर, उसे एक कंबल दे देते।….पर अब क्या हो गया मेरे बच्चे!” वह घबराकर जोर- जोर से चिल्लाने लगी थी,तो सभी दौड़कर आए थे। उसका दोस्त रुंचू वहीं पर था और बीनू को आवाजें देता हुआ रो रहा था।उसी ने बताया कल उसने अपने बाबा को कंबल मिलने की बात उसे बताई थी तो पूछ रहा था कि क्या रात भर बाहर पड़े रहो तो कोई उसके ऊपर भी कंबल डाल जाएगा? रुंचू ने  ‘हाँ ‘कहा था,पर उसे क्या पता था कि वह सचमुच ऐसा कुछ कर गुजरेगा।एक कंबल के लिए वह मासूम बचपन अपनी मौत को गले लगाने चला था। दादी ने अपना कंबल उसके ऊपर डाल दिया था।चारों और आग जलाकर उसके शरीर को गर्म कर रखने की  कोशिशे हो रही थी। पर जीवन के चिन्ह तो बस कुछ साँसो पर ही टिके हुए थे, उन्हीं को थामने की कोशिश जारी थी और नैना भैया से लिपट कर रोए जा रही थी।

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