1- एक साहित्यिक गोष्ठी का सारांश

शहर के तमाम बुद्धिजीवियों
कथाकारों और कवियों ने
हिन्दुस्तान की समस्याओं
को लेकर संगोष्ठी की
मंच पर हिन्दुस्तान का
नक्शा लगा हुआ था
किसी ने बताया कि नक्शे के
इस भाग पर भुखमरी की समस्या
तो किसी ने बताया इस भाग पर
बेरोजगारी है कोई किसी हिस्से पर
हुए बलात्कार की घटना से
परेशान था तो किसी का
किसी स्थान पर हुए आत्महत्या और
मानवाधिकारों के उल्लंघन से
हुआ बुरा हाल था
संगोष्ठी के बाद खानपान
और पीने का दौर चला
और बुद्धिजीवियों ने पी-पीकर
अनेक बोतलों को खाली कर
सभी समस्याओं को उन्हीं बोतलों में बंद कर दिया।
और इस बीच हिन्दुस्तान का
नक्शा अब जमीन पर गिरकर फड़फड़ा रहा था।

2- बचपन

याद आता है मुझे
याद आता है मुझे
बचपन का गांव
आंगन में दौड़ना
घंटो खेलना
पेड़ों पर चढ़ना
चिड़ियों के साथ चहकना
याद आता है दादा-दादी का दुलार
नाना-नारी का प्यार
मां की फटकार
और मास्टर साहब की लताड़
याद आता है
गिल्ली और डंडा
खो-खो कबड्डी
साइकिल की दौड़
दिनभर की मौज
याद आता है
वो गरमी की छुट्टी
वो रिश्तों का जुड़ना
वो दिलों का मिलना
वो खिलखिलाकर हंसना।
धीरे-धीरे बचपन
बदल गया
पुराने सूट की तरह
बचपन दब गया भारी
बस्ते के बोझ से
वह खिसकता रहा
होमवर्क की लाड़ से।
कभी वह दिखाई देता
बहुमंजिली इमारत की
बालकनी से लटका हुआ
या फिर प्ले स्टेशन से
चिपका हुआ।
चश्मे से झांकता हुआ बचपन
आज आम बात है
क्रच में दम तोड़ता बचपन
इस नए युग की पहचान है।
वर्तमान के संवारने के प्रयास ने
बच्चे का बचपना छीन लिया
भौतिकता की इस अंधी दौड़ ने
उसका हंसना छीन लिया।

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