मातृ दिवस पर विशेष : शैलजा सिंह की कविता 3
माँ…
याद तुम्हारी आई जब जब
आंख मेरी भर आई तब तब
जो दीप जलाए संस्कार के
उसको मैंने जगमग रखा।
अंधकार को किया तिरस्कृत
उजियारे में हर पग रखा।
अल्हड़ जीवन के वसंत सब
पार किए और बड़ी हो गई।
डगमग कदमों से चल चल अब
अपने पैरों पर खड़ी हो गई।
मां तुमने ही तो सिखलाया
रिश्तों को कैसे सीना है।
राई राई पर्वत पर्वत
दुनिया में कैसे जीना है।
मां बस तू ही मेरी कमाई।
बेटी हूं तो क्या हुआ मुझको
अब न समझ पराई।।
बेटी ही तो होती है
माँ की निकट सहेली
जहां कहीं हो बेटे केवल
उस घर में मां रहे अकेली।।

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