तरुण कुमार
अताशे (हिंदी व संस्कृति)
भारत का उच्चायोग, लंदन

पुरवाई के हाल के अंक के संपादकीय में आपने सही लिखा है कि आज कोरोना महामारी के कारण चारों ओर हाहाकार मचा है। मौत का मेला लग रहा है। लेकिन सभी धार्मिक प्रतिष्ठान- मंदिर, मस्जिद, चर्च, आदि बंद हैं। आपने धार्मिक गतिविधियों को लेकर यह आशंका भी व्यक्त की है कि कोरोना महामारी के बाद इनमें कमी आएगी अथवा तेजी से बढ़ोतरी होगी?
दरअसल धर्म और नशा कभी भी खत्म नहीं होते। परिस्थितियां चाहे कैसी भी रहें। ज्ञात इतिहास में दूसरी सदी से लेकर आज तक महामारियां तो कई आईं हैं लेकिन धर्म के कारोबार पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। इसमें बढ़ोतरी ही हुई है, कमी नहीं देखी गई। चौदहवीं सदी की बबोनिक प्लेग के नाम से मशहूर महामारी  में यूरोप की आधी आबादी समाप्त हो गई लेकिन इससे ईसाई धर्म पर कोई असर नहीं देखा गया। इसलिए इस महामारी के बाद भी सभी धर्मों का कारोबार चलता रहेगा। इसके कई कारण हैं।
पहला, बेशक अभी मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, चर्च, आदि बंद हैं, लेकिन ये बंद हैं अलग अलग देशों की सरकारों के दबाव में। वरना अभी भी ऐसे नियतिवादियों की कमी नहीं है जो मानते हैं कि ईश्वर जो चाहेगा वही होगा, कोरोना उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उदाहरण के लिए कुछ दिनों पूर्व ही दक्षिण भारत में एक मंत्री लॉकडाउन तोड़कर किसी मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचे, मस्जिदों के उदाहरण पहले ही आ चुके हैं। गिरिजाघरों में भी महामारी के दौरान धार्मिक कर्मकांड जारी रहे हैं और कन्फेशन एवं अन्य अनुष्ठानों के तरीके ढूंढ लिए गए हैं। बेशक इनमें आम लोगों की भीड़ नहीं दिखाई दे रही है।
दूसरा, सृष्टि के आरंभ काल से ही, जब से मनुष्य ने ईश्वर की कल्पना की, तब से लेकर आज तक धर्म के नाम पर जितने रक्तपात हुए हैं शायद ही किसी अन्य बात को लेकर उतना खून बहा होगा। लेकिन फिर भी धर्म/ईश्वर में लोगों का विश्वास बरकरार है क्योंकि इसके पीछे सत्ताओं का खेल चलता रहता है। धर्म निजी आस्था का विषय नहीं होकर अस्मिता का प्रश्न बन जाता है।
तीसरा, धर्म को नकारने के पहले धर्म के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है। धर्म या ईश्वर को मानने के पीछे तीन मुख्य कारण हैं – डर, अज्ञानता और लोभ। जब तक ये तीनों कारक इनसान के अंदर हैं वह किसी न किसी रूप में किसी न किसी ईश्वर को मानता रहेगा। इसे यों समझा जा सकता है। सभ्यता के आरंभ में जब मनुष्य जंगलों में रहता था। उसे प्राकृतिक शक्तियों की जानकारी नहीं रही होगी। तुफान क्यों आते हैं, बारिश क्यों होती है, बाढ़ क्यों आती है, आग क्यों लगती है, ऐसी तमाम बातें उसके लिए अनजानी रहीं होंगी। इन प्राकृतिक शक्तियों के प्रकोप से बचने के लिए या इनसे होने वाले फायदे को देखते हुए इन्हें खुश करने की उसने कोशिश की होगी जिससे संभवतया विभिन्न प्रकार की पूजा पद्धतियों का विकास हुआ होगा।
आदिम जनजातियों के नानाविध धर्मों और कर्मकांडों के जरिए इसे समझा जा सकता है। आज भी छोटानागपुर की जनजातियों में बोंगाइज्म एक धर्म है जिसमें ऐसी वस्तुओं की पूजा की जाती है जिनमें कोई शक्ति होती है या जिनसे लाभ होता है। उदाहरण के लिए रिक्शा छोटा बोंगा है और हवाई जहाज बड़ा बोंगा। अज्ञानता और डर धर्म की जड़ में है। गांवों में आज भी कोई अगर किसी मिट्टी के ढेर पर पांच लाल रंग का टीका करके उस पर थोड़ा फूल और चावल छिड़क दे तो वह किसी न किसी देवता का रूप ले लेता है। लोग उस मिटटी के ढेर की पूजा करने लगते हैं या कुछ अनिष्ट न हो जाय इस डर से उस पर पैर रखने से डरते हैं।
कुछ पाने के लोभ या लालच की वजह से भी इनसान धार्मिक कर्मकांडों में लग जाता है। इसलिए धर्म का मनोविज्ञान बहुत जटिल है। धर्म एक प्रकार का आलंब है जिस पर इनसान बुरे वक्त में आश्रित होना चाहता है। वास्तव में इससे कोई फायदा हो या नहीं हो, लेकिन उसे लगता है शायद यहां उसकी समस्याओं का हल मिल जाए। इसलिए कोरोना काल के बाद धर्म भी अपनी पुरानी अवस्था में लौट आएगा। हाँ, अभी कुछ समय के लिए धार्मिक संस्थाओं की कमाई थोड़ी कम जरूर हो जाएगी लेकिन कुछ समय बाद अन्य करोबारों की तरह ये भी चल निकलेगा।

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