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सुनीता खोखा की कविता – बोलना ज़रूरी है

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सुनो
विकल्प ढूंढ़ने का
प्रयास  मत बन्द  करो..
केवल एक ही  विकल्प हो
ये संभावना नहीं है..
सम्भावनाओं से इन्कार करना
बिल्कुल वैसा है
जैसा
हार जाने से पहले
हार मान लेना
खुल कर जीना  हो तो …
जान लो ये
कि
नई राहें
मुश्किलों  से भरी हुई ही होती है
जग की निगाह में बुरी ही होती हैं
पगडंडियों पर
चलने का स्वाद
राजमार्गों पर चलने वाले नहीं चखते
तयशुदा रास्ते
कामगारों का मुक्कदर नहीं होते
मुख़ालफ़त बुरी नहीं होती
यदि सही के लिए हो
बेशक
आसान नहीं होता
बचाये रखना ..जिंदा  ज़मीर
ठंडा  दिमाग…खुद में  विश्वास
कुछ भी हो
सच के लिए बोलना जरूर
चुप मत  हो जाना
बोलना जरूरी है …..
बेआवाज़ तो मुर्दे होते हैं
याद रखना
आँसू भरी आँखें,
जब सपनों से भरने लगे
तो
निज़ाम घबराते हैं
इतिहास बदलने वालों के
हाथ बंधते नहीं हैं
वो
मुट्ठी बन हवा में लहराते  हैं
जय/ पराजय महत्व नहीं  रखती
महत्वपूर्ण होते है संघर्ष
चूंकि बेमानी नहीं होते
संघर्ष
क्रान्तिबीज बन
काल की छाती पर लिखे जाते हैं
 नया क्या है इस बार…
आज़ादी की कीमत
सदा से लहू  ही होती है
इसलिए
बोलना, चलना,
करना ये स्वीकार
कि संघर्ष नियति है
वक्त
जय दे हमें
या हिस्से में आये प्रतिकर हार

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