मुकेश प्रत्यूष द्वारा अनिता रश्मि की पुस्तक 'अब ख्‍वाब नये हैं' की समीक्षा 3
समीक्षक – मुकेश प्रत्यूष
झरने, बिखरने से पहले
जी भर जी लेना चाहती रही। 
घर-परिवार को अपना जीवन और उसका लक्ष्‍य समझने वाली एक आम स्‍त्री की यह अदम्‍य इच्‍छा अक्‍सर अतृप्त रह जाती है। अनिता रश्मि ने अपने नये काव्‍य-संग्रह ‘अब ख्‍वाब नये हैं’  में हर दिन बदलती दुनिया में एक आम स्‍त्री के सुख-दुख को पूरी शिद्दत से उभारने की कोशिश की है। क्‍योंकि एक स्‍त्री होने के नाते उन अनुभवों से वे खुद को बड़ी सहजता से जोड़ लेती हैं और यह कहते हुए एक रागात्‍मक संबंध बना लेती हैं –
प्रतीक्षा में है समय
कब खुल कर हंँसोगी तुम
सारी कायनात को
अपनी मुट्ठी में
कस कर बांँधे हुए
निर्द्वंद, भयमुक्‍त।   
मांँ बनना एक स्‍त्री के जीवन का सबसे गौरवशाली क्षण होता है। बच्‍चे के साथ वह केवल अपना ममत्‍व नहीं, अपना भविष्‍य जोड़ देती है।  शवह अपने बच्‍चे के साथ जुड़ी हर घटना को संजोना चाहती है। अनिता रश्मि के शब्‍दों में कहें तो  –
अँचरा में बांँधकर रख लेती है मांँ
बच्‍चे की हंँसी-खुशी,
स्‍नेह, प्‍यार-दुलार, गम-खार,
डगमगाती चाल
रतजगे की सौगात। 
अपने बच्‍चे के लिए मांँ केवल मांँ नहीं रहती
कभी वह बहती नदी तो
कभी सागर में बदल जाती है
मांँ तालाब नहीं
मांँ पोखर नहीं 
क्‍योंकि तालाब या पोखर एक दायरे में बंँधे होते हैं और अपने बच्‍चे के सुखद और सुरक्षित भविष्‍य के लिए मांँ किसी बंधन को स्‍वीकार करने को तैयार नहीं होती । वह समुद्र की तरह विशाल और नदी की तरह सतत प्रवाहमान मीठे जल का स्रोत होना चा‍हती है। अपने बच्‍चे के‍ लिए –
वह वृक्ष नहीं, जड़ है
पहाड़ नहीं, मिट्टी है। 
वह जानती है कि जड़ जितनी मजबूत होगी, वृक्ष उतना ही विशाल होगा और मिट्टी जितनी मुलायम होगी, प्रतिमा उतनी ही खूबसूरत बनेगी। अपने बच्‍चे की खातिर वह अपना अस्तित्‍व मिटा देने को सदैव तत्‍पर रहती है। इसी क्रम में बच्‍चे कब बड़े हो जाते हैं इसका पता उसे तब चलता है जब –
उड़ जाते हैं बच्‍चे
कभी नहीं लौटने के लिए। 
 उनकी प्रतीक्षा में मांँ जीवन के शेष दिन बिताने को विवश हो जाती है क्‍योंकि मांँ तो बस मांँ है। अनिता रश्मि की कविताओं में परिदृश्‍य से ओझल जीवन, रीति-रिवाज, चीजें बार-बार आती हैं क्‍योंकि  वे अपने आसपास को देखना  और उसे उसकी तमाम विसंगतियों के साथ  दिखाना  चाहती हैं। क्‍योंकि वे मानती हैं कि –
जहांँ कोई रास्‍ता उगता नहीं
वहाँ उग आती है
लचीली-लचीली
टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी
चौड़ी-चिकनी सड़क के
घमंड को तोड़ती हुई। 
उनकी रचना की जद में सब कुछ आता है। बैलून बेचने वाले लड़के का सुख जो उसे आाधी जली रोटी से मिलती है –
बैलून के चटख रंगों का
मोहताज नहीं वह
सादी, आधी अधजली रोटी से ही
चेहरे पर उसके
रंगों के इंद्रधनुष खिल उठते हैं 
तो वह अबोध बच्‍चा भी, जो पढ़ने-लिखने की उम्र में काम पर जाता है बैलों की तरह बैलों के साथ काम करने के लिए । एक ही अच्‍छी बात है कि उसका बालपन उसमें मौजूद है –
उतर आया है वह भी
बैलों के साथ
हंसी-ठिठोली करता हुआ
बैल बनकर।    
यह जीवन का वह खुरदुरा सच है जिसे अक्‍सर देखकर भी अनदेखा करने की कोशिश की जाती है। ऐसा ही एक और सच है साइकिल पर कोयला ढोने वाले मजदूरों का। कोयलांचल की सड़कों से गुजरते वक्‍त सड़कों पर उन्‍हें देखा जा सकता है
कतारबद्ध चिट्टियों की भांति
सरकता जत्‍था आगे बढ़ता जाता है
चिटियों के श्रम को
मात करता हुआ है । 
बेशक, यह कोयला अवैध उत्‍खनन का होता है, जिसके संबंध में अनेक अन्‍य प्रश्‍न उठाए जा सकते हैं लेकिन इससे उनके श्रम का मूल्‍य कम नहीं हो जाता। क्‍योंकि वे वाहक मात्र होते हैं, व्‍यापार तो काई और करता है।  काले रक्‍तहीन शरीर कोयले को तकिया बनाने वाले
ये न जाने किस बेबसी में इस पुश्‍तैनी कार्य को करने के लिए बाध्‍य हो जाते हैं। बंधुआ मजदूर की तरह बिना किसी स्‍वप्निल आकांक्षा या उम्‍मीद के।
और उन्‍हें सिर्फ देखते हुए
बढ़ जाते
तुम भी
हम भी।
ध्‍यान देने की बात है कि यह श्रम का शोकगीत नहीं बल्कि उसके प्रति रागात्‍मकता का परिचायक है। इस भेद-भाव पूर्ण समाज के प्रति अनिता के मन में गहरा क्षोभ है। वे कहती हैं –
न हो कोई धर्म
न संप्रदाय
न जात-पात
और न कोई वर्ण-व्‍यवस्‍था
सब हों
बस हों
एक जनक-जननी की
निश्‍छल, मासूम, प्‍यारी संतानें । 
वे जानती हैं कि मनु और श्रद्धा प्रलय के तत्‍काल बाद आए थे, तब प्रकृति के उपहारों का विनाश के कगार तक नहीं पहुंँचाया गया था। प्रकृति और पुरूष दोनों का अस्तित्‍व बराबर का था। इसलिए वे बड़ी साफगोई से पूछती हैं कि
क्‍या एक और प्रलय
जरूरी नहीं है आज (सभ्‍यता और नदियांँ) । 
लेकिन वे विनाश की हिमायती नहीं। छोटी-छोटी चीजें उन्‍हें जीवन के प्रति आकर्षित करती हैं जैसे ओस की बूंँदों को देखकर वे कहती हैं –
इस भयानक होते जाते समय में भी
ओस की नन्‍हीं बूंदों में
नीला सागर सम आकर्षण
बचा रह गया है
यह अपने समय की
बड़ी बात है।
  ऐसे ही वनवासियों के सबसे बड़े त्‍यौहार सरहुल की चर्चा करते हुए वे लिखती हैं –
सूरज बाबा और धरा के ब्याह का
यह परब कितना अजूबा है
सरहुल ने रंग डाले
सारे वनवासियों के मन। 
अनिता की कविताओं में भावनाओं की एक ऐसी दुनिया है जिसका कोई आकार नहीं है और  जिसकी तलाश वो  खामोशी से किसी बच्‍चे की हँसी में करती दिखाई देती हैं –
उसकी दुधिया हंँसी
और फेनिल बातों में
छिपी है बसंत की 
मीठी गुनगुनाहट। 
और, इस तरह
कभी चुपके से
कभी खुलकर
उसके आंगन में 
उतर आता है
अनगिन बसंत। 
कहें तो अपनी कविताओं में वो ठूंठ को जिलाने की कोशिश करती दिखाई देती हैं क्‍योंकि वे मानती हैं कि
सपनों की दुनिया में खोए रहना
आज किसी को शोभा नहीं देता।
पुस्तक : अब ख्‍वाब नये हैं ( काव्य संग्रह )
कवयित्री : अनिता रश्मि
प्रकाशक : रवीना प्रकाशन, दिल्ली – 110094
पेपरबैक मूल्य – 370/- रूपये, 
 

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