Wednesday, October 7, 2026
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दिव्या माथुर से खुदेजा ख़ान की बातचीत

प्रवासी भारतीय और वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित लेखिका दिव्या माथुर लंदन ( यूके) में चालीस वर्षों से अधिक समय से निवासरत हैं। ये ‘वातायन – यूरोप’ की संस्थापक/ सम्पादक, राॅयल सोसाइटी ऑफ़ आर्ट्स की फ़ैलो,अनेक पुरस्कारों/सम्मानों से सम्मानित लंदन के नेहरू केन्द्र में कला, साहित्य, सांस्कृतिक कार्यक्रमों की आयोजक ( इम्प्रेसारियो) रहीं। नौ कहानी संग्रह,आठ कविता संग्रह,चार उपन्यास और सात सम्पादित कहानी तथा काव्य संग्रह प्रकाशित हैं।इतना ही नहीं इनका नाम ‘इक्कीसवीं सदी की प्रेरणादायक महिलाओं’ में शामिल हैं।और अब ये ‘ पुरुष – विमर्श ‘ को केन्द्र में लाना चाहती हैं।इसी मुद्दे को ध्यान में रखते हुए इन्होंने उपन्यास ‘तिलिस्म ‘ की रचना की।मेरा लंदन आना हुआ तब मेरी उनसे मुलाक़ात हुई ,उन्होंने अपनी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक “क्लाइडोस्कोप: संतरगी स्मृतियां” (आत्मकथातमक संस्मरण) मुझे भेंट की। मैंने पुस्तक भी पढ़ी और उनके अब तक के रचनात्मक अवदान पर एक विस्तृत साक्षात्कार भी लिया। अवश्य ही ये बातचीत पाठकों के लिए रुचि पूर्ण और जानकारी वर्धक साबित होगी। साक्षात्कार प्रस्तुत है।- खुदेजा ख़ान

प्र:-उम्र के किस पड़ाव पर आपने लिखना शुरू किया और क्यों लगा कि आपको लिखना चाहिए?

उ:-बचपन में अम्मा (दादी) मुझे बताया करती थीं कि जब मैं पैदा हुई तो बाबा (मेरे दादा एक मशहूर मुगल पेंटर और शायर थे – बिशन दयाल शाद) ने एक बहुत बड़ी दावत दी। मै घर में चौथी संतान थी और तीसरी बेटी; फिर भी बाबा ने बैंड-बाजे बजवाए, हिजड़े नचवाए और पकवान बँटवाए – इन्हीं सबका बखान थी वह कविता, जो मैंने शायद नौ-दस बरस की उम्र में लिखी थी, जो अब मुझे याद नहीं सिवा इसके कि गरीब लोगों को भोजन पत्तलों पर परोसा गया था, जिसे वे चपड़-चपड़ करते हुए सपड़-सपड़ खा रहे थे। एक दूसरी कविता जो मुझे याद है, वह मैंने बाबा की एक मशहूर बालकविता ‘एक चिड़िया के बच्चे चार’ से प्रभावित हो कर लिखी थी, ‘काश कि मैं एक पंछी होती, स्वछन्द विचरती नील गगन में, काश कि मैं पेड़ों पर सोती, ठुमकती फिरती बन उपबन में’।

प्र:- प्रिय विधा कौन सी है? शुरूआत कविता से हुई फिर कहानियों की उपज कैसे हुई?

उ:-45 साल के दौरान अपनी पूर्णकालिक नौकरियों के दौरान कवितायेँ ही लिखना संभव हो पाता था, जिसके चलते आठ कविता संग्रह प्रकाशित हो गए, पाँच कविता संग्रहों का सम्पादन भी किया किन्तु एक दिन आकाशवाणी हुई कि कहानियों पर ध्यान दो और मैंने कविता लिखना लगभग छोड़ दिया। मुझे कहानी सदैव से ही आकर्षित करती आई है; उपन्यास भी लंबी कहानियाँ ही होते हैं और मेरी कहानियाँ काफ़ी लंबी होती हैं।

1967 में मैंने अपनी एक कहानी, ‘सदा सुहागन’, कॉलेज की पत्रिका के लिए भेज दी, जो भारत-पाक युद्ध के समय एक गुमशुदा सैनिक के परिवार द्वारा उसकी पत्नी पर अत्याचार ढाने की कहानी है। जब वह प्रकाशित हो गई मेरी सहपाठियों ने तारीफ़ की। बी.ए (अंग्रेज़ी) के पाठ्यक्रम में मुझे एक पेपर हिंदी का भी पास करना था; जिसकी प्राघ्यापिका थीं डॉ सूषम बेदी, उन्होंने मेरी एक कहानी, ‘वह काली’ अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय कहानी प्रतियोगिता में भेज दी, जिसे पुरस्कृत करते वक़्त स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने उसकी प्रशंसा की। कहानी की श्याम-वर्ण नायिका की मनोव्यथा ने उन्हें इस भ्रम में डाले रखा कि वह कहानी मेरी अपनी थी। ख़ैर, मैं उस पुरस्कार-समारोह में शामिल नहीं हुई थी; सूषम जी के माध्यम से मुझे इस बात की जानकारी मिली। दो दिन बाद ही हमारी प्रिंसिपल हमारी क्लास में आईं और मेरे पुरस्कार के साथ सर्वेश्वर जी की दो पुस्तकें भेंट कीं तो न केवल मेरा रुतबा बढ़ा अपितु  लिखते रहने की प्रेरणा भी मिली।

1971 में एम्स-दिल्ली में लिपिक की नौकरी मिलते ही विवाह हो गया, लेखन ठप्प।

प्र:-अब तक की आपकी साहित्यिक यात्रा कैसी रही,अपनी रचनात्मकता से आप संतुष्ट हैं?

उ:-संतुष्टि हो जाएं तो समझो जीवनलीला समाप्त, इंप्रेसारियो के पेशे की वजह से, मैं सदा दूसरों के प्रचार-प्रसार में जुड़ी रही; अपनी खुद की साहित्यिक धारा गौण रही किन्तु कछुए की तरह धीमी गति से सदा बढ़ती रही। सेवा निवृत्ति के बाद मैं जब विश्व भ्रमण पर निकली तो मेरा लेखन ही मेरे साथ निकला – मूल्यांकन के साथ-साथ आत्मालोचन बढ़ा, लगा कि जैसे मैं ‘मेहराब से लटकी एक बूँद’ हूँ। ख़ैर, ज़िंदगी में पहली बार हिम्मत करके अपने निजी जीवन के बारे में कुछ संस्मरण लिखे जो ‘क्लाइडोस्कोप’ के रूप में बहुत पसंद किए गए; आत्मकथा को पूरा करने की हिम्मत बढ़ी। फ़िलहाल, तीन और उपन्यास अधर में लटके हैं, उन्हें पूरा कर पाऊँ तो शायद क़रार आए।

प्र:-जिस तरह जिजीविषा और इच्छा शक्ति के बल पर जीवन को आपने विजित किया। उपन्यास भी लिखे जायेंगे। वैसे आपके पसंदीदा कवि, लेखक कौन हैं?

उ:-वृन्दावन वर्मा के उपन्यास ‘मृगनयनी’ और जयशंकर प्रसाद की ‘ध्रुवस्वामिनी’ – जो बचपन में न जाने कहाँ से मेरे हाथ लग गये थे, से मैं बहुत प्रभावित हुई थी। स्कूल के दौरान, तुलसीदास, सूरदास, कबीर और मीरा के अलावा कुछ आधुनिक कवियों, महादेवी वर्मा, मैथिली शरण गुप्त और निराला आदि को भी पढ़ा। बी.ए में शेक्सपीयर, चार्ल्स डिकिंस,ऑस्कर वाइल्ड, ब्रौंटे-सिस्टर्स, ईडिथ नेसबिट, जेन ऑस्टिन, अलैक्ज़ैंडर पोप, कीट्स, वर्ड्सवर्थ और मिल्टन इत्यादि मेरे कोर्स में थे; ऑस्कर वाइल्ड का ‘इम्पोर्टैन्स ऑफ़ बीइंग अर्नेस्ट’, और जॉन मिल्टन की ‘पैराडाइस लॉस्ट’ मैं कई दफ़ा पढ़ चुकी हूँ।लंदन आने के बाद, प्रवासी लेखकों के अतिरिक्त मैं अंतर्राष्ट्रीय लेखकों को भी पढ़ती रही हूँ। हमारे एक स्थानीय क्लब ‘फ़ैब’ (फ़िल्म्स एंड बुक्स) में हर एक सदस्य को हर महीने एक नई पुस्तक पर चर्चा करनी होती है, इसके चलते मुझे अलिफ़ शफ़क़, पाओलो कोलहो, विलियम डैलरिम्पल, मार्खेज़ जैसे बड़े लेखकों की पुस्तकें पढ़ने का मौका मिला। मैं ब्राज़ीलियन और तुर्की लेखकों के चौंकाने वाले विषयों के साथ-साथ उनके स्थानीय जीवंत विवरणों से बहुत प्रभावित हूं। कहानी संग्रह ‘नामर्द’ के सम्पादन के दौरान मैं हिंदी के बहुत से युवा लेखकों के संपर्क में आई हूँ, कह सकती हूँ कि हिंदी का भविष्य सशक्त हाथों में है।

प्र:-कहते हैं लिखने के लिए पढ़ना बहुत ज़रूरी है और आपने ये काम बख़ूबी किया।आप कभी भी लिख लेती हैं या ख़ास वक़्त या कोई विषय दिमाग़ में उधेड़बुन मचाए रखता है तब लिखने का सोचती हैं।अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बताइये ? पाठकों को ये जानने की विशेष उत्सुकता रहती है।

उ:-कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा – लिखते वक्त मेरे साथ कुछ-कुछ ऐसा ही होता है – कोशिश रहती है कि जो भी लिखूँ अलग क़िस्म का हो, लीक से हट कर हो।अत्यधिक व्यस्तता और अनुशासनहीनता की वजह से मैं योजनाबद्ध तरीक़े से नहीं लिख पाती किन्तु इस दौरान मेरे दिमाग़ में कहानी और उसके चरित्र खदबदाते रहते हैं; आधी रात को कोई ऐसा ग़ुल खिलाता है कि कहानी सरपट दौड़ने लगती है। हर रोज़ मेरे सपनों में एक या दो कहानियाँ रील्स की तरह घूमती हैं – ‘साँप-सीढ़ी’, ‘अंतिम तीन दिन’, ‘स्वर्ग@हिंदी.कॉम’, ‘2050’, ‘3000’, ‘गूगल’, ‘पुरु और प्राची’ – सपनों पर आधारित हैं। तीन दिन में मेरी मृत्यु वाला सपना इतना सजीव था कि मैं कई दिन अपनी मौत के इंतज़ार में बैठी रही; इसका अंत पटना के गुंडों द्वारा एक ग़रीब को सताए जाने के एक समाचार को पढ़ कर मिला। कभी-कभी, मेरा दिमाग़ हफ़्तों एक ही पटरी पर चलता है, इसीलिए मेरे कई कविता संग्रह – ‘रेत का लिखा’, ‘खयाल तेरा’, ‘चंदन पानी’, ’11 सितम्बर’, ‘झूठ, झूठ और झूठ’ और ‘जीवन मृत्यु’ – सब एक ही भाव पर लिखी कविताओं पर आधारित हैं। समाचार, क़िस्से, दृश्य और बातचीत के टुकड़े मेरे दिमाग़ में निठल्ले घूमा करते हैं, जो बिन बुलाए मेहमान की तरह वक़्त-बेवक़्त मेरे प्लाॅट में घुसपैठ करने लगते हैं, जैसे कि मेरे दूसरे उपन्यास ‘तिलिस्म’ का नायक, जो महीनों मुझ जैसी जन्मजात पुरुष-विरोधी स्त्री के पीछे हाथ धो कर पड़ गया – पुरुषों के शारीरिक और मानसिक विकास पर मैं कई महीने शोधरत रही। अच्छी बात यह हुई कि इस नायक ने पुरुषों के प्रति मेरा कलुष धो दिया।

प्र:- पितृ सत्तात्मक समाज में पुरूषों के प्रति सकारात्मक बदलाव पर ,कुछ तत्थ परक प्रकाश डालें कि प्रचलित धारणा से अलग एक दृष्टि विकसित हो।

 उ:-बढ़िया और प्रासंगिक प्रश्न, इस विषय पर मैं करीब चार वर्षों से शोध कर रही हूँ और मेरे द्वारा संपादित एक कहानी संग्रह ‘नामर्द’ प्रकाशनाधीन है। पिछले तीन वर्षों में मैं भारत के प्रतिष्ठित महाविद्यालयों के विद्यार्थियों के संपर्क में आई, वार्तालाप इकतरफ़ा रहा, अधिकतर युवतियाँ अपना ही रोना रोती रहीं, युवक खामोश रहे। हाल ही भारत में हुई पुरुषों की हत्याओं और आत्महत्याओं ने समाज की चेतना को झकझोर कर रख दिया है, किन्तु मीडिया में केवल युवतियों के नाम ही उछाले गए, युवकों की बेवकूफ़ी और नासमझी पर विमर्श नहीं हुआ; जबकि कम से कम सोशल मीडिया पर पितृत्व, कमज़ोरी या संवेदनशीलता पर बात करने में आज शर्मिंदगी महसूस नहीं की जानी चाहिए थी – किसी कीमत पर पुरुषों की कमज़ोरी का पर्दाफ़ाश नहीं होना चाहिए। जबकि Domestic Violence Act 2005 के तहत ‘पुरुष भी पीड़ित हो सकते हैं’ को मान्यता मिली है। न्याय की बात अब ‘लिंग’ के स्थान पर ‘व्यक्ति’ के आधार पर होने लगी है।

सकारात्मक पहलुओं पर बात को सीमित रखती हूँ, पिछले 20-25 वर्षों में समाज में बहुत से सकारात्मक बदलाव आए हैं। प्रचलित धारणा से अलग एक नई दृष्टि हमारे सम्मुख है – पुरुष को भी रोने, डरने, मदद मांगने का हक है, पिता का काम केवल नौकरी, पैसा और प्यार नहीं है, न ही स्त्री की जिम्मेदारी घर संभालना है। स्कूल-कॉलेज, दफ़्तर और सेना में ‘पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य’ पर बात होती है, पुरुषों के लिए भी हेल्पलाइन और काउंसलिंग सेंटर बढ़े हैं। असल में पुरुष अब ‘मज़बूत दिखने’ के बोझ से थोड़ा मुक्त हो रहे हैं। पितृत्व अवकाश, एकल पिता, घर संभालने वाले पिता – को मान्यता मिली है। कोर्ट अब ‘कस्टडी के मामलों में ‘माँ ही बेहतर’ वाली सोच से हटकर ‘बच्चे के हित’ को देखता है यूके में चालीस प्रतिशत से ज़्यादा पुरुष पार्ट-टाइम या फ़लैक्सी जॉब्स करते हैं ताकि परिवार को समय दे सकें। काम की इज़्ज़त यहाँ अब सिर्फ वेतन से नहीं नापी जाती। शिक्षा और पेशे में लचीलापन आ जाने के कारण पुरुष अब नर्सिंग, शिक्षक, बच्चों की देखभाल, मनोविज्ञान, डिज़ाइन जैसे महिला प्रधान क्षेत्रों को अपना रहे हैं। भारत में पुरुषों की आत्महत्या दर महिलाओं से 2.5 गुना ज़्यादा है (NCRB डेटा) इसीलिए पुरुषों को भी ‘देखभाल चाहिए’ – ये बदलाव नारीवाद के खिलाफ़ नहीं, मानवतावाद के पक्ष में है।

प्र:-भारतीय हिन्दी साहित्य में स्वतंत्रता के पश्चात् “स्त्री विमर्श” एक स्वतंत्र आंदोलन के रूप में उभरा जो आज भी साहित्यिक धारा में प्रमुखता से विद्यमान है ऐसे में ‘पुरूष विमर्श ‘ की बात करना एक नया किंतु सुचिंतित विचार है। आपके अनुसार –

” ये बदलाव नारीवाद के ख़िलाफ़ नहीं, मानवतावाद के पक्ष में है” इस कथन से मेरी भी सहमति है।इस संदर्भ में आपका एक उपन्यास “तिलिस्म” आया है। इस कथानक का सार संक्षेप बता सकें तो क्या ही अच्छा हो। ।

उ:-जी अवश्य, ‘तिलिस्म’ (वाणी प्रकाशन) पितृसत्तात्मक समाज में आर्थिक विषमताओं के मध्य एक ऐसे आत्मकेंद्रित पिता का अमानवीय रूप उपस्थित करता है, जो अधिकारपूर्वक पत्नी व बच्चों का शोषण करता है। यह समाज के भीतर निहित मानवीय कुरूपता, सच्चाईयों की खोल में गँधाता समाज, परंपराओं के नाम पर पलते ढकोसलों की फेहरिस्त के बरक्स दिल्ली स्थित झुग्गी-झोंपड़पट्टियों की मानसिकता को दर्शाता है। इसमें युवाओं की सेक्स के प्रति रुचि, खुलापन, मानसिकता, बढ़ती इच्छा के मनोवैज्ञानिक कारण, सेक्स की शक्ति बढ़ाने के लिए ली जाती दवाइयाँ, उनके साइड इफ़ेक्ट्स, वाइफ़-स्वाप्पिंग, मिक्स्ड सैक्स पार्टीज़, एलफ़ा और बीटा प्रकार के मर्द जैसी समस्याओं को उकेरा गया है। ‘थाइलेंड की जेल में ड्रग के केस में मृत्यु-दंड के तौर पर लीथल-इंजेक्शन की प्रतीक्षा में सुन्न बैठे उपेन्द्र के जीवन से पाठक जुड़ता है तो अंत तक उत्सुकता से जुड़ा ही रहता है।’- प्रो जितेंद्र श्रीवास्तव

‘तिलिस्म’ (वाणी प्रकाशन) पितृसत्तात्मक समाज में आर्थिक विषमताओं के मध्य एक आत्मकेंद्रित अमानवीय पिता से प्रताड़ित और पीडोफ़ाइल अध्यापक के दुराचार से पीड़ित बालक उपेन्द्र घर से भाग कर सड़कों पर रहने के लिए मजबूर हो जाता है, एक कसाई वाले की दुकान पर माँस काटने में माहिर हो जाने के बावजूद उसका शरीर और ह्रदय कोमल ही रहता है, जिसे सौभाग्यवश अम्मी-अब्बा गोद ले लेते हैं और बड़े लाड़प्यार से पालते हैं। बालकों के शारीरिक और मानसिक विकास का चित्रण इस उपन्यास की ख़ासियत है, भयभीत और भावुक उपेन्द्र अपने फ़ैसले खुद नहीं ले सकता – दूसरे क्या सोचेंगे, उन्हें बुरा न लग जाए – जैसी भावनाओं से जूझते वह युवा हो जाता है और एक कमज़ोर और भावुक मोड़ पर स्किगज़ोफ्रेनिया से ग्रसित एक अमीर युवती से विवाह के लिए राज़ी हो जाता है, जो अम्मी -अब्बा के साथ रहना नहीं चाहती, उसे अपनी पूरी तवज्जो देने के बावजूद वह खुदखुशी कर लेती है, पीडोफ़ाइल अध्यापक की मृत्यु की श्रंखला में एक और प्रसंग भी जुड़ जाता है। दोनों के लिए उपेन्द्र अपने को दोषी मानता है। लंबी मनोचिकित्सा के बाद भी वह अवसाद से पार नहीं पाता तो अम्मी-अब्बा उसे लंदन भेज देते हैं। जहाँ एशियन समाज के भीतर निहित मानवीय कुरूपता, परंपराओं के नाम पर पलते ढकोसलों, मिक्स्ड सैक्स पार्टीज़ के बीच तन्हा उपेन्द्र एक सफल व्यापारी के रूप में प्रतिष्ठित तो हो जाता है, किन्तु यहाँ भी उसकी कमज़ोरियों का भरपूर फ़ायदा उठाया जाता है। इसी के चलते, उसका दूसरा विवाह होता है, अत्यधिक कामुक पत्नी को वह संतुष्ट नहीं कर पाता – युवाओं की सेक्स के प्रति रुचि, खुलापन, सेक्स की शक्ति बढ़ाने के लिए ली जाती दवाइयाँ, उनके साइड-इफ़ेक्ट्स, वाइफ़-स्वाप्पिंग के किस्सों से गुज़रते हुए उपेन्द्र एक बार फिर मनोचिकित्सक की शरण में पहुंच जाता है, जहाँ एक बात तो साफ़ हो जाती है कि वह एलफ़ा किस्म का पुरुष है, जिन्हें शारीरिक संबंधों में रुचि नहीं होती, जो रूहानी प्यार के लिए भटक रहे हैं जो मिलना संभव नहीं।

प्र:- लिखते समय लेखक की मन: स्थिति कैसी रहती है। वो समाज से,जीवन से, परिवेश से किस प्रकार विचार ग्रहण करता है?

उ:-मैं मानती हूँ कि देश-विदेश की यात्राओं का मेरे लेखन पर अप्रतिम प्रभाव पड़ा है। हाथ कंगन को आरसी क्या – आप मेरे लंदन पहुंचने के पहले और बाद की रचनाएं पढ़ें तो आपको यह अंतर साफ़ नज़र आएगा। दृष्टि का विस्तार स्व से पर की ओर जाता है, दिल्ली में थी तो वहीं का समाज ‘सामान्य’ लगता था पर बहुत से देशों की यात्रा करने के बाद जाना कि सामान्य कुछ नहीं होता। दिल्ली और मुंबई की झुग्गियाँ देखने के बाद सिंगापुर की विकसित कॉलोनीज़ देखें तो आपको गरीबी केवल व्यक्तिगत किस्मत नहीं, बल्कि शहरी नियोजन का अभ्युदय दिखेगी। थाईलैंड की जेल देखने पर अपराध केवल नैतिक पतन नहीं, बल्कि कानून, गरीबी और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का जटिल मुद्दा बन जाता है – जिसका ज़िक्र मैंने अपने उपन्यास ‘तिलिस्म’ में किया है कि लंदन में रहने वाले एक भोले भाले भारतीय युवक को अपराध-तंत्र में कैसे फँसा दिया जाता है। कथानक स्थानीय ही रहता है पर उसकी व्याख्या वैश्विक हो जाती है।

अरे, यह तो एक अच्छा उदाहरण है – दिल्ली, लंदन और सिंगापुर का तुलनात्मक साहित्य अध्ययन तो हो ही रहा है, साथ ही साथ भाषा और बिंबों में भी पाठक को नयापन देखने को मिल रहा है तो यात्रा लेखक को नए शब्द और नए रूपक देती है, जैसे प्रेमचंद के पास खेत के बिंब थे तो अज्ञेय के पास यूरोप के एकाकीपन के। लंदन में जब मैं अपने पड़ोस के एक पिता को अपनी बेटी को कंधे पर उठाए नाचते देखती तो मेरे मन में एक भारतीय पिता की कठोर छवि तैर जाती। इसी टूटन ने मेरे ‘पुरुष-विमर्श’ को नया आयाम दिया।बड़ी बात यह है कि यात्रा लेखक को क्लिशेज़ से बचाती है, जिससे मैं अपने को भरसक बचाती हूँ। एक अनजान देश में एक अजनबी की तरह रहना अजब-ग़जब होता है – अपनों और अपनी संस्कृति से दूर रहते अपनी ख़ामियाँ और दूसरों की अच्छाइयाँ ज़्यादा साफ़ दीखती हैं। कहते हैं न कि दूर के ढोल सुहावने लगते हैं – इसीलिए नए समाज को परखते हुए प्रवासी अपनी ज़मीन की याद में कलपते हैं। यही परख लेखन को सनसनी से उठाकर समाजशास्त्र की ओर ले जाती है। मेरी बहुत सी रचनाओं में आपको लंदन और डेनमार्क (जहां मैं अधिक दिनों तक ठहरी) के अतिरिक्त, नॉर्वे, डेनमार्क, स्वीडन, फीजी, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, सिंगापुर, अमेरिका आदि का ज़िक्र मिलेगा।

प्र:-हाल ही में आपकी पुस्तक ‘क्लाईडोस्कोप: सतरंगी सपने’ प्रकाशित हुई है। आत्मकथात्मक संस्मरण की इस कृति को मैंने पढ़ा। अपने निजत्व को अधिक महत्व न देते हुए, सार्वजनीन अनुभवों को आपने तरजीह दी है। इसकी कोई ख़ास वजह?

उ:-जैसा कि मैंने अपनी प्रस्तावना में लिखा है कि आत्मकथात्मक संस्मरण लिखना बिना एनीस्थिया के दिलों दिमाग की चीड़फ़ाड़ करना है। इस पुस्तक में जो भी आत्मकथात्मक है, उसमें बहुत कुछ छिपाया गया है, क्योंकि मैं उन्हें भी दुखी नहीं करना  चाहती, जिन्होंने मुझे दुख दिए – फिर मुझ में और उनमें क्या फ़र्क रहा। फिर भी इतना मानती हूँ कि मेरे अनुभवों से दूसरे बहुत कुछ सीख सकते हैं इसलिए लिखना ज़रूरी है पर वह सब मेरी कहानियों, कविताओं, उपन्यासों और व्यंग्यों में प्रखर है।

प्र:-आजकल पुस्तक प्रकाशन पहले की तरह जटिल नहीं रहा। बहुतायत में छप रही पुस्तकों के सामने, पाठकों के संकट को आप किस प्रकार देखती हैं?

उ:-जी हाँ, आजकल पुस्तकें अब बहुतायत में छप रही हैं क्योंकि लेखक पांडुलिपि टाइप और संपादित करके भेजता है – कवर और आगे-पीछे के फ्लैप्स सहित – प्रकाशकों का काम और भी सरल हो गया; प्रिंटिंग के आधुनिकीकरण की वजह से वे मांग के अनुसार प्रिंट करते हैं।

मेरे शोधार्थी हमेशा शिकायत करते रहते हैं कि उन्हें बाज़ार में मेरी पुस्तकें नहीं मिल रहीं। दो तीन बार शिकायत करने के बाद कुछ प्रतियां और प्रकाशित कर दी जाती हैं। इस ‘माँग’ का कोई हिसाब तो रखा नहीं जाता। आप चाहे कुछ भी लिखिए, यही सुनने को मिलता है – कविता नहीं बिकती, कहानी नहीं बिकती, उपन्यास नहीं बिकता, कथेतर नहीं बिकता – बिकता नहीं तो प्रकाशित क्यों किया जा रहा है? पाठक हैं तभी तो! बेचारा लेखक हर तरफ़ से नुकसान में रहता है। क्या करे, लिखना उसकी मजबूरी है। जैसे मैं कहती हूँ कि लेखन एक्ज़ीमा (चर्मरोग) की तरह है, बिना खुजाए चैन जो नहीं मिलता।

प्र:- लेखक को अपनी सभी रचनाएं प्रिय होती हैं क्योंकि वो उन्हें बहुत मनोयोग से लिखता है। फिर भी मैं आपकी कुछ चर्चित और चुनिंदा कहानियों के बारे में जानना चाहूंगी, जिनका उल्लेख करना आप ज़रूरी समझती हैं।

उ:-भली कही, हाल ही में राइटर्स गिल्ड-कनाडा की संस्थापक और संयोजक डॉ शैलजा सक्सेना ने मुझसे अपनी एक पसंदीदा कहानी भेजने को कहा, यकीन मानिए मेरा दिमाग भन्ना गया, एक- एक कर के मैंने बहुत सी कहानियां दोबारा पढ़ डालीं – हर एक में ख़ामियाँ नज़र आईं। उन्होंने दुखी होकर खुद ही एक कहानी चुन ली – ‘अंतिम तीन दिन’ – जो मुझे भी पसंद है। निजी तौर पर मुझे हर पल पैंतरे बदलती और रहस्यमयी कहानियाँ अधिक पसंद आती हैं – ठुल्ला किलब, कारनामा, राधा राधा, ‘स्पेयर ए थॉट प्लीज़’, ‘एक था मुर्गा’, ‘कथा सत्यनारायण की’, ‘सौ सुनार की’ अथवा ‘बचाव’, जो विदेश में संघर्षरत एक सकारात्मक युवती की कहानी है, इसका नाटकीय अंत मुझे एक अफ़्रीकन कथा के माध्यम से सूझा; वहाँ की स्त्रियां अपने पथभ्रष्ट पतियों के लिंग तक काट देती हैं। मंगल ग्रह की यात्रा के विषय में एक समाचार मैट्रो में पढ़ने को मिला किन्तु विज्ञान के सिलसिले में मैं ज़ीरो थी इसलिए मैंने ‘पुरू और प्राची’ को व्यंग्यात्मक बना दिया और इसे बीकानेरी शैली में लिखा – यह स्पेस-टूरिज़म के पाखंड पर आधारित है, जहाँ अनुभव से ज़्यादा इश्तेहार मायने रखते हैं। नेत्रविज्ञान केन्द्र में नौकरी के दौरान मैं कई अक्षम लोगों के संपर्क में आई तो ‘अपूर्व दिशा’, ‘अक्षम’ ‘दान’ और ‘आँखें’ जैसी रचनाएं लिखीं। मैंने बहुत सी भविष्यवादी कहानियाँ भी लिखी हैं – 2050, 3000, 1041, 3050 – शीर्षक आने वाले वर्षों में क्या हो सकता है से संबंधित हैं।

प्र:-आपने काफ़ी बड़े-बड़े साहित्यिक आयोजनों और समारोहों में हिस्सा लिया है। लेकिन ये आम लेखकों की पंहुच से दूर होते हैं। ऐसे में अच्छा लिखने वाला भी अक्सर पीछे रह जाता है। इस बारे में आपका क्या सोचना है?

उ:-आपको आश्चर्य होगा कि लंदन में बसने के बाद मैं दस बरसों तक भारत नहीं गई, भारतीय उच्चायोग और नेहरू केंद्र में पंद्रह सोलह घंटों की नौकरी बजाने के बाद घरबार संभालते किसी सम्मेलन में प्रतिभागिता नहीं की। मुझे दुनिया इंप्रेसारियो के रूप में जानती थी – दुनिया की बड़ी-बड़ी हस्तियों को मंच दिया – लेखक के रूप में मेरी अपनी पहचान बहुत सीमित थी इसलिए कोई आमंत्रित भी नहीं करता था। 1999 में लंदन में आयजित विश्व हिंदी सम्मेलन में मैं बहुत से प्रतिष्ठित लेखकों के संपर्क में आई तो अन्य समारोहों के विषय में जानने को मिला पर कभी समय नहीं मिला, बच्चे अभी छोटे थे और अवसर सीमित। सेवानिवृति के बाद मैंने तय किया कि वातायन के साथ- साथ अब मुझे अपने लेखन को भी तवज्जो देनी चाहिए, बतौर लेखिका, कार्यक्रमों में भाग लेना शुरू किया – देर आयद दुरुस्त आयद –  पिछले पाँच-सात वर्षों से ही मुझे आमंत्रण मिलने शुरू हुए, पहले छोटेमोटे फिर प्रतिष्ठित संगठनों और विश्वविद्यालयों से भी।

आपके सवाल का जवाब मेरे उपर्युक्तकथन में समाहित है – केवल लिखना ही काफ़ी नहीं होता, पहुँच बनानी पड़ती है, जिसमें ख़ासा वक़्त लगता है – मैंने बड़े- बड़े लेखकों को प्रतिष्ठित सम्मेलनों में आम श्रोताओं की तरह भाग लेते देखा है। मेरी खुशकिस्मती है कि जीते जी मेरी कुछ पहचान बन गई, संभवतः मुझे प्रवासी होने का लाभ भी मिला। जो भी हो, मेरी सत्तर सालों की मुसलसल जद्दोजहद के हवाले ‘क्लाइडोस्कोप’ में शामिल हैं मेरी कुछ याददाश्तें, मुझे खुशी है कि आपने इन्हें पढ़ा। आपकी इसलिए भी शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने मुझे और मेरे लेखन को अपने पाठकों के समक्ष रखा।

खुदेजा ख़ान

+91 73896 42591

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3 टिप्पणी

  1. सादर नमस्कार आदरणीय खुदेजा खान जी एवं आदरणीया दिव्या दी।खुदेजा जी स्वयम एक कवयित्री कथाकार और वरिष्ठ साहित्यकार हैं ।उनको द्वारा दिव्या दी का साक्षात्कार अविस्मरणीय और प्रेरक है। कैसे और किन परिस्थितियों में एक कथाकार जन्म लेता है? कविता कैसी मानसिक अनुभूतियों के बीच लिखी जाती है जहां कवि मन चिंतन के गहन अनुभवों से गुजर कर यथार्थ को साकार कर पाता है। दिव्या माथुर दी.ने बाल उम्र में ही कविता रची जो उनका मौलिक सृजन था।45 वर्ष की उम्र कहानियों के नाम रही और अनेक कृतियां प्रकाश में आईं जो हिन्दी साहित्य आकाश में छा गई। आदरणीय खुदेजा जी के प्रश्न और दिव्या दी के उत्तर मानो एक ऐतिहासिक दास्तान की तरह लगे जिसको संजो लेने की इच्छा होती है।जयशंकर प्रसाद की ध्रुव स्वामिनी को पसंद करने वाला भाषा के प्रति कितना समर्पित होगा यह स्पष्ट है। हार्दिक बधाई व अशेष शुभ कामनाए खुदेजा जी इस सुन्दर अद्भुत साक्षात्कार के लिए। सादर प्रणाम अभिनन्दन आपका दिव्या दी ! सृजन रत रहें यशस्वी हों।बहुत बहुत बधाई।

  2. आदरणीय खुदेजा जी!

    अपने दिव्या माथुर जी का जो साक्षात्कार लिया उसे हमने दो बार पढ़ा।
    हमें अच्छे से याद है कि इसके पूर्व पुरवाई समूह में हमने पहला साक्षात्कार पुरवाई की उपसंपादक नीलिमा शर्मा जी का पढ़ा था, जो उन्होंने सीहोर से पंकज सुबीर जी का लिया था।
    वह भी काफी रोचक और महत्वपूर्ण था उसे पढ़कर समृद्ध होना स्वाभाविक था।
    नौकरी के लिये साक्षात्कार एक अलग बात है। लेकिन साहित्यिक व्यक्तित्व का साक्षात्कार काफी मायने रखता है।

    तब पहली बार हमारे मन में यह विचार आया था कि साहित्य की एक विधा के अंतर्गत साक्षात्कार क्यों नहीं? साहित्यिक साक्षात्कार के बारे में हमने गूगल में सर्च करके पढ़ा और साक्षात्कार के महत्व को समझा।

    तब हमारे मन में यह विचार आया था कि साक्षात्कार के भी प्रकार होते हैं।और महसूस हुआ कि संभवतः साहित्यिक साक्षात्कार में साक्षात्कार देने वाले से लेने वाला कसौटी पर अधिक परीक्षित होता है।
    आखिर प्रश्न-पत्र तो उसे ही बनाना होता है जिन समाधानों की अपेक्षाएँ होती हैं कि
    साहित्यकार की रचना-प्रक्रिया, आंतरिक जीवन, सृजन के उद्देश्यों और उनके युग-बोध की गहराई को समझने का उद्देश्य सार्थक हो।

    हाँ और ना के जवाब से परे प्रश्न ऐसे हों कि साहित्यकार के विचारों, प्रेरणा स्रोतों और साहित्यिक दर्शन पर विस्तार से प्रकाश पड़े।

    बातचीत के केंद्र में लेखक की कृतियों के पीछे छिपी सोच, उनकी सृजनात्मक चुनौतियों और लेखन शैली के विकास को समझना।

    साहित्यकार के व्यक्तिगत अनुभवों के साथ-साथ उनके समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवेश के बारे में भी पता चले।
    यह थोड़ा बहुत हमने जाना।

    वास्तव में आपने दिव्या माथुर जी के साक्षात्कार के लिये प्रश्नों का संयोजन इतने अच्छे से किया कि दिव्या माथुर जी का व्यक्तित्व,उनका रचनात्मक विकास, प्रवास का अनुभव, स्त्री और पुरुष- विमर्श, लेखकीय आत्मसंघर्ष तथा साहित्यिक दृष्टि को समझने के लिये यह साक्षात्कार एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बनकर हमेशा के लिए पुरवाई पत्रिका में दर्ज हो गया ।

    आपके द्वारा लिया गया दिव्या माथुर जी का यह विस्तृत साक्षात्कार हिंदी के समकालीन प्रवासी साहित्यिक दुनिया के एक महत्त्वपूर्ण रचनात्मक व्यक्तित्व को अनेक कोणों से देखने का अवसर देता है।

    दिव्या माथुर जी की उपलब्धियों की एक लंबी फेहरिस्त है और उन्होंने इस साक्षात्कार में अपने लेखन की प्रक्रिया, उसकी सीमाओं, प्रेरणाओं, यात्राओं, अनुभवों और वैचारिक बदलावों पर खुलकर बात की; इसीलिए यह बातचीत एक दीर्घ साहित्यिक जीवन की आत्मस्वीकृतियों और आत्ममंथन का रूप में नज़र आती हैं ।

    साक्षात्कार का आरंभ ही लेखिका के बचपन और लेखन के आरंभ से होता है। यह आरंभ अत्यंत स्वाभाविक और आत्मीय है। दादा बिशन दयाल शाद की साहित्यिक- सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और उनके जन्म के अवसर पर आयोजित दावत का संस्मरण यह बताता है कि साहित्य के प्रति उनकी पृष्ठभूमि पारिवारिक वातावरण में ही तैयार हो चुकी थी।

    नौ-दस वर्ष की उम्र में लिखी कविता और दादा की बालकविता से प्रभावित होकर लिखी गई पंक्तियाँ उनके भीतर मौजूद बाल-सर्जक की पहचान कराती हैं। यहाँ यह भी महत्त्वपूर्ण है कि लेखिका ने अपने साहित्यिक आरंभ को बचपन की सहज संवेदना और कल्पनाशीलता से जोड़ा है।

    ‘सदा सुहागन’ और ‘वह काली’ के प्रसंग से उनकी प्रारंभिक रचनात्मक प्रतिभा के साथ-साथ बाहरी प्रोत्साहन की भूमिका भी सामने आती है। विशेष रूप से डॉ. सुषम बेदी और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना से जुड़ा प्रसंग यह बताता है कि एक शुरुआती लेखक के लिए किसी वरिष्ठ साहित्यकार की स्वीकृति किस प्रकार आत्मविश्वास का आधार बन सकती है।

    दिव्या माथुर जी का यह कथन कि नौकरी के दौरान कविता लिखना अपेक्षाकृत संभव था, लेकिन बाद में कहानी ने उन्हें अधिक आकर्षित किया, उनकी रचनात्मक प्राथमिकताओं को समझने में मदद करता है। आठ कविता-संग्रहों और अनेक संपादित पुस्तकों के बावजूद कहानी की ओर उनका झुकाव यह संकेत देता है कि उनके लिए कहानी केवल मनोरंजन की विधा नहीं, बल्कि जीवन की जटिलताओं को विस्तार से देखने का माध्यम है।
    उनका यह कहना कि
    “उपन्यास भी लंबी कहानियाँ ही होते हैं और मेरी कहानियाँ आपके काफी लंबी होती हैं।”
    उनकी कथा-दृष्टि का संकेत देता है। वे घटनाओं की सतह से अधिक उनके मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विस्तार में रुचि रखती दिखाई देती हैं।

    उनका कथन जो काबिलेगौर लगा-

    “संतुष्टि हो जाए तो समझो जीवनलीला समाप्त।”

    वृंदावनलाल वर्मा, जयशंकर प्रसाद, तुलसी, सूर, कबीर, मीरा, महादेवी वर्मा, निराला और मैथिलीशरण गुप्त से लेकर शेक्सपीयर, डिकिंस, ऑस्कर वाइल्ड, ब्रॉन्टे बहनों, जेन ऑस्टिन और मिल्टन तक का अध्ययन उनकी पठनीयता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

    उनकी यह स्वीकारोक्ति उल्लेखनीय है कि ब्राज़ीलियन और तुर्की लेखकों के स्थानीय जीवन के जीवंत चित्रण ने उन्हें प्रभावित किया। इससे पता चलता है कि उनके लिए साहित्य केवल कथानक नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति को देखने की एक दृष्टि है।

    “कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा” लोकोक्ति का प्रयोग करके उनकाअपने लेखन की प्रक्रिया को सहज और विनोदी ढंग से व्यक्त करना अच्छा लगा।

    उनके अनुसार कहानी के पात्र और घटनाएँ लंबे समय तक उनके भीतर चलते रहते हैं। सपनों, समाचारों, बातचीत, दृश्यों और जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों से उनकी कथाएँ आकार ग्रहण करती हैं। ‘साँप-सीढ़ी’, ‘अंतिम तीन दिन’, ‘स्वर्ग@हिंदी.कॉम’, ‘2050’, ‘3000’ और ‘गूगल’ जैसी रचनाओं को सपनों से जोड़ना उनकी कल्पनाशीलता की विशिष्टता को सामने लाता है।पढ़ते हुए प्रयोगशाला सा अनुभव हुआ।

    जिस सामाजिक परिवेश को सामान्य मानती थीं, विदेश यात्राओं के बाद उसी को अलग दृष्टि से देखना भी एक विरोधाभास सा अनुभव रहा होगा।

    प्रवासी अनुभव लेखकीय दृष्टि को दो संस्कृतियों के बीच खड़ा कर देता है। वह अपनी संस्कृति को बाहर से भी देख सकता है और दूसरी संस्कृति को भीतर से समझने का प्रयास भी कर सकता है।

    संभवतः यह किसी महिला साहित्यकार के लिए कठिन हो किन्तु फिर भी दिव्या माथुर जी का यह प्रयास उल्लेखनीय है कि वे लैंगिक विमर्श को केवल स्त्री के अनुभव तक सीमित न रखकर पुरुष के अनुभव, दबाव, भावनात्मक कमजोरियों और सामाजिक अपेक्षाओं के संदर्भ में भी देखना चाहती हैं।जिससे पता चलता है कि “ये बदलाव नारीवाद के खिलाफ नहीं, मानवतावाद के पक्ष में है।”

    फिर यह पूरे विमर्श का केंद्रीय अवधारणा बन नज़र आता है।
    पुरुष-विमर्श को स्त्री-विमर्श के विरोध में खड़ा करने के बजाय दोनों को मानवीय अनुभवों के व्यापक संदर्भ में समझना सकारात्मक है।

    साक्षात्कार में भी यह बात कही गई है कि पुरुष को रोने, डरने और सहायता माँगने का अधिकार होना चाहिए।

    ‘तिलिस्म’ के बारे में लेखिका द्वारा दी गई जानकारी से स्पष्ट होता है कि उपन्यास का केंद्र उपेन्द्र का जीवन और उसका मनोवैज्ञानिक संघर्ष है। परिवार, पितृसत्ता, बचपन का शोषण, दत्तक जीवन, विवाह, अपराध-बोध, मानसिक संकट, प्रवासी जीवन और संबंधों की जटिलताएँ उसके जीवन में क्रमशः जुड़ती जाती हैं।

    इस प्रकार ‘तिलिस्म’ के माध्यम से लेखिका पुरुष को केवल सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि परिस्थितियों और सामाजिक अपेक्षाओं से प्रभावित उसे एक संवेदनशील मनुष्य के रूप में प्रस्तुत किया है।

    औरज्ञ एक महत्वपूर्ण बात जिसकी और हमारा ध्यान आकर्षित हुआ कि साक्षात्कार में लेखिका का अपने को “जन्मजात पुरुष-विरोधी स्त्री” कहना और आगे यह स्वीकार करना कि ‘तिलिस्म’ के नायक ने “पुरुषों के प्रति मेरा कलुष धो दिया”, उनके वैचारिक परिवर्तन का रोचक उदाहरण है।

    महसूस हुआ कि वैसे तो रचनाकार अपने पात्र को नियंत्रित करता है, लेकिन कुछ रचनाएँ ऐसी होती हैं जहाँ पात्र लेखक की अपनी पूर्वधारणाओं को चुनौती देने लगता है।

    लेखिका का लेखन को “एक्जीमा” की तरह बताना रोचक किंतु सत्य लगा।

    साहित्यिक प्रतिष्ठा और ‘पहुँच’ का प्रश्न
    साक्षात्कार का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सामाजिक पक्ष साहित्यिक आयोजनों में पहुँच और अवसरों से जुड़ा है। दिव्या माथुर जी स्वयं स्वीकार करती हैं कि वर्षों तक वे एक आयोजक और इम्प्रेसारियो के रूप में अधिक पहचानी गईं, लेखिका के रूप में कम।
    उनका अनुभव यह प्रश्न उठाता है कि साहित्यिक प्रतिभा के साथ साहित्यिक मंचों तक पहुँच भी कितनी महत्त्वपूर्ण हो गई है। “केवल लिखना ही काफी नहीं होता, पहुँच बनानी पड़ती है”—यह कथन साहित्यिक संस्थाओं, आयोजनों और नेटवर्क की भूमिका पर प्रश्न खड़े करता है।

    खुदेजा जी!आपके प्रश्न खुले हुए हैं और प्रश्नों ने लेखिका को विस्तार से बोलने का अवसर दिया।
    आपके साक्षात्कार ने दिव्या माथुर जी की मानो आत्मकथा से परिचय करवाया जिसने जीवन यात्रा के हर महत्वपूर्ण चरणों को बखूबी समझाया।
    बेहतरीन व्यक्तित्व का बेहतरीन साक्षात्कार लेने के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई। आपके साक्षात्कार के माध्यम से साहित्य से संबंधित कई जानकारियों से अवगत हुए।

    आपके लंदन आने का साहित्यिक लाभ आपको कितना मिल रहा है यह तो आप जानें, लेकिन हम पाठकों को तो आपके
    लंदन पहुंचने से बहुत कुछ जानने और सीखने को मिल रहा है।
    बहुत-बहुत बधाई आपको इस महत्वपूर्ण लेख के लिए एक साहित्यिक व्यक्तित्व की साहित्यिक उपलब्धि से परिचय करवाने के लिये।

  3. वाह खुदेजा।
    तुम्हारे विषय में कितना कुछ जाना…!
    तुमसे केवल परिचय था.. जाना तो अब है..!!!
    जो कि वास्तव में बहुत ही सुखद है..

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