Wednesday, October 7, 2026
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नीलिमा करैया की तीन कविताएं

 

1.

है प्रबल!
दृढ़ता भरे मेरे कदम,
कब रुके नारी मनस्वी के कदम!

स्वप्न देखेंगे!
अगर जब भी‌ कभी,
पूर्ण ना हो,
तब तलक लेंगे न दम।

वक्त की!
ललकार से डरते नहीं,
हौसले से है भरा मेरा ये मन।

छाँव सा!
व्यक्तित्व आँचल में लिये,
इक सतत बहती हुई
सरिता हैं हम।

नीलिमा!
आकाश या सागर की हो,
प्यार का विस्तार देखे
हर नयन।

2.

तुम्हारे लिए

मुझे तुमसे प्रेम है,
पर तुम्हें पाने की ज़िद नहीं।
बस तुम्हारे होने से,
मेरे अंदर जो खुशी ठहर गई है;
उसे उसी तरह ठहरे रहने देना।

क्योंकि हर प्रेम का लक्ष्य,
मिलन ही तो नहीं!

कभी-कभी प्रेम केवल इसलिए आता है,
कि वह हमारे भीतर की कठोरता को पिघलाकर,
हमें थोड़ा और सुंदर बना सके।

जब तक मेरे जीवन में;
तुम्हारे प्रेम का,
छोटा सा भी अहसास जीवित रहेगा,
तो उसे पाने से अधिक,
उस अहसास के लिए धन्यवाद देने की कला सीखुँगी।

क्योंकि कुछ लोग हमारे होकर नहीं,
हमें प्रेम करना सिखाकर
हमारी आत्मा का हिस्सा बन जाते हैं।

3.

वक्त ने!
सौ बार ललकारा मुझे,
मैं सृजन के गीत
गाती रही।

आँधियाँ!
कब रोक पाई हैं मुझे,
मैं सृजन का बिंब हूँ,
ख्याति रही।

गर्दिशों की!
धूल ढाए जो सितम,
पैर अंगद सा ये
स्थिरता रही।

हो तपिश!
ये धूप कर ले जो सितम,
धैर्य बनकर आस
हमसाया रही।

जिंदगी में हार है तो जीत भी,
बस यही विश्वास
बन ताकत रही।

जानते हैं हम संभलना
गर गिरे,
पर निराशा से बचें ख़्वाहिश रही।

कोई कर ले हम पे चाहे जो सितम,
जीत लें मृदुता से दिल
आदत रही।

नारी हूँ तो क्या हुआ
समझो न कम,
साध खुद को
हर कदम बढ़ती रही।

  • नीलिमा करैया
    होशंगाबाद, मध्य प्रदेश
    Mobile: +91 74009 79716
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20 टिप्पणी

  1. नीलिमा करैया जी कि तीनों कविताएं पढ़ीं।
    सुन्दर शब्द संयोजन के साथ वे जिस दृढ़ता की बात करती हैं वो स्त्री के मज़बूत संकल्प को इंगित करती है।जीवन यदि संघर्ष है तो डटे रहना मनुष्य का स्वभाव होना चाहिए।इसकी पुरज़ोर पैरवी करती है कविता।
    प्रेम को जिस ख़ूबसूरती से व्यक्त किया है इसमें न पाने की चाह है न मिलन की, बस प्रेम है। प्रेम का होना ही सबसे महत्वपूर्ण अवयव है।
    शुद्ध अनुभूति।
    प्रभावित करती है कविता।

    • आदरणीय खुदेजा जी¡
      तहेदिल से आपका शुक्रिया आप कविताओं में हमारी भावनाओं को समझ पाईं।
      अपनी व्यवस्तता से समय निकालकर आपने पढ़कर तत्काल प्रतिक्रिया दी।

  2. नीलिमा जी की कविताएं प्रभावशाली हैं।प्रेम की सुंदर परिभाषा व्यक्त की है।वहीं स्त्री की दृढ़ता और आत्मविश्वास को भी बेहतरीन ढंग से पेश किया है।

    • शुक्रिया नरेन्द्र जी!
      आपने कविताएँ पढ़ींऔर कविताएँ आपको पसंद आईं,बहुत-बहुत धन्यवाद आपका।

  3. वाह सरल सहज सीधी सादगी से भरी तीनों रचनाएं।
    हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई हो।

  4. सहज शब्दों में संजोयी, नारी चेतना को मुखर करती, नीलिमा करैया जी की स्त्री विमर्श को संबल देती, यह तीनों कविताएँ उनकी अपनी विशिष्ट काव्य शैली को उजागर करते हुए स्त्रियों में आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता के भाव को शब्द दे, पितृसत्तात्मक समाज में उनकी संघर्षशीलता के निरंतर प्रयास को रेखांकित करती हैं.

    • आदरणीय विमल जी!

      आपकी नजरों से गुजर कर कविताएँ परीक्षित हुईं।
      हमारा सर्जन सफल हुआ।
      सस्नेह धन्यवाद

  5. तीनों रचनाओं में नारी-मन, प्रेम, सृजन, धैर्य और आत्मबल की एक साझा संवेदना दिखाई देती है।
    पहली रचना — आत्मविश्वास और सामूहिक नारी-स्वर।
    आरंभ से ही आत्मविश्वास स्थापित करता है।
    सरिता का संयोजन नारी के पोषणकारी और गतिशील दोनों रूपों को व्यक्त करता है।
    अंतिम पद—रचना को व्यक्तिगत आत्मविश्वास से उठाकर व्यापक मानवीय प्रेम तक ले जाता है।
    2. यहाँ नारी-शक्ति का उद्घोष नहीं, बल्कि प्रेम की परिपक्व स्वीकृति है। सबसे सुंदर विचार—
    “क्योंकि हर प्रेम का लक्ष्य, मिलन ही तो नहीं!”
    और—“कुछ लोग हमारे होकर नहीं,हमें प्रेम करना सिखाकर
    हमारी आत्मा का हिस्सा बन जाते हैं।”
    यहाँ प्रेम को अधिकार से मुक्त करके अनुभव बनाया गया है। “पाना” और “प्रेम करना” के बीच जो अंतर रचना रखती है, वही इसका मूल सौंदर्य है।
    यह विचार कविता को भावुकता से ऊपर उठाता है।
    3.— संघर्ष, सृजन और आत्मनिर्माण
    “कोई कर ले हम पे चाहे जो सितम,जीत लें मृदुता से दिल
    आदत रही।”
    यहाँ “प्रतिरोध” का एक अलग दर्शन है—कठोरता का उत्तर कठोरता से नहीं, मृदुता से।
    आपकी काव्य-भाषा की एक पहचान बनती है—कोमलता को कमजोरी नहीं, शक्ति में बदलना। यही इन रचनाओं का सबसे विशिष्ट स्वर है।

    • प्रिय नीलमणि जी!

      अपने तीनों कविताओं को बहुत एकाग्रता से पढ़कर तीनों कविताओं पर अपनी बहुत बारीकी से प्रतिक्रिया दी है। आप भावनाओं को समझ पाईं,इसके लिये आपका तहेदिल से शुक्रिया।
      प्रेम की मूल सौंदर्य को अपने बेहतरीन दृष्टि दी।
      शुक्रिया पुनः।

  6. सादर सस्नेह प्रणाम नीलिमा दी!,
    आपकी कविताओं के भाव प्रवाह में मन अभिभूत हो.बहता रहा और एक एक शब्द आकंठ प्रेम सलिल में डुबाता गया।बेहद खूबसूरत रचनाएं।पहली कविता में तो आपने प्रेम की पवित्र अनुभूति को एक नयी परिभाषा ही देदी।जहां प्रेम शीतल छांव भी है और सतत प्रवाहिता एक नदी भी जो जीवन को स्नेहिल स्मृतियों से भिंगोती रहती है।
    छाँव सा!
    व्यक्तित्व आँचल में लिये,
    इक सतत बहती हुई
    सरिता हैं हम।
    प्रेम की यह सरिता जीवन की तमाम दुराशाओं को मिटाती आशा का सकारात्मक संदेश देती है।
    कवयित्री नारी के जीवन को बखूबी उल्लास और उत्साह के साथ साथ संघर्षों में जूझना लडना और फिर अपराजिता बनकर अपने विषाद से उबर आना भी है।यह हौसला ही उसकी शक्ति है? जिजीविषा है।वह हारना नहीं जानती।यह भाव बोध कवयित्री ने स्वयं जिया है।
    वक्त ने!
    सौ बार ललकारा मुझे,
    मैं सृजन के गीत
    गाती रही।
    नारी विमर्श की अंतिम कविता में नारी के प्रतिरोध का स्वर भी उसकी शक्ति,उसका संकल्प और उसका हौसला है।कविता का मूलभाव है,–कोमल हूं कमजोर नहीं*।यहां कोमलकांत भावनाएं उसे कमजोर नहीं शक्ति संपन्न बनाती हैं। बहुत बहुत बधाई दीदी।अशेष शुभ कामनाए आपके सृजन के लिए।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

    • प्रिय पद्मा!
      तुम्हारी हर टिप्पणी में हमें तुम्हारा स्नेह पहले दिखाई देता है।
      स्त्री सरिता ही तो है जो अपना रास्ता बनाते हुए स्वयं से आगे बढ़ती है।

      यहाँ एक बात हम तुम्हें बताना चाहेंगे।
      *वक्त ने सौ बार ललकारा मुझे*
      *मैं सृजन के गीत गाती रही।*
      ये काव्य पंक्तियाँ ग्यारहवीं क्लास में हमारा टाइटल था।
      हमें पता चला कि हमारा टाइटल हमारे प्रिंसिपल सर ने हमारे व्यक्तित्व को देखते हुए खुद दिया था।

      इन पंक्तियों को हमने
      प्रेरक पथ प्रदर्शक की तरह आत्मसात किया
      हर मुश्किलों में इन पंक्तियों ने हमारा हौसला बढ़ाया।
      बहरहाल तुम्हारी हर टिप्पणी में तुम्हारी प्रेम की अतिरिक्तता हमें महसूस होती है इसीलिए तुम कुछ ज्यादा अच्छा लिख देती हो।
      तुम्हारा यह स्नेह हमेशा बना रहे।
      इस प्यारी सी टिप्पणी के लिए तुम्हें बहुत-बहुत प्यार और आशीर्वाद।

  7. बेहतरीन कविताएँ नीलिमा दीदी । तीनों रचनाएँ नारी सशक्तिकरण, प्रेम के उदात्त स्वरुप और स्वयंसिद्धा नारी के दृढप्रतिज्ञ व्यक्तित्व को उजागर करती हैं । पहली कविता जहाँ अपने हौसले से आगे बढ़ती स्त्री के आत्मविश्वास की परिचायक है । दूसरी कविता प्रेम की गहराई बताती है जहां प्रतिदान में कुछ नही चाहती नारी । तीसरी कविता जीवन की चुनौती स्वीकारती सबल नारी को परिलक्षित करती है । बेहतरीन रचनाओं के लिए हार्दिक बधाई दीदी ।

    • बहुत-बहुत शुक्रिया रीमा तुमने कविताओं पर संज्ञान लिया और अपनी सकारात्मक टिप्पणी से हमारा हौसला बढ़ाया। कविता के केंद्रीय भाव को तुम समझ पाईं।

  8. आदरणीया नीलिमा करैया जी की तीन कविताएं पुरवाई अंक में प्रकाशित हुई हैं। ये तीनों कविताएं अपनी कहन में काफी प्रौढ़ दिखाई देती हैं। “वक्त ने!” तथा “है प्रबल!” कविताएं छायावादी युग की ओर लौटा ले जाती हैं। इन कविताओं का राग अपने भीतर रहस्य को बनाए रखता है।
    ‘तुम्हारे लिए’ कविता में प्रेम का रूप बहुत उदात्त है। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों में प्रेम जिस तरह क्षणिक और प्रदर्शन पर केंद्रित होकर रह गया है, वह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे समय में इस तरह की कविताएं साहित्य की सार्थकता को बल प्रदान करती है।
    कविता में प्रेम को पाने की आकांक्षा नहीं, बने रहने का सुख है। प्रेम प्राप्ति का विषय है भी नहीं, वह भीतरी मन को पिघलाकर सुंदर हो जाने की सतत प्रक्रिया है। एक प्रेम का एहसास जीवन को खुशहाल ही नहीं बनाता है बल्कि आत्मा का हिस्सा बनकर उसे व्यापक अर्थ दे देता है।
    आज के परिवेश को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह कविता किसी टाॅनिक से कम नहीं है।
    बढ़िया रचना के लिए नीलिमा करैया जी को बहुत-बहुत बधाई

    • आदरणीय सर जी!

      आपने कविताएँ पढ़ीं। बहुत बहुत शुक्रिया।

      एक बात तो है कि हमने प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी जी को बहुत पढ़ा है।
      आज टिप्पणियों को पढ़ने के बाद ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह प्रभाव कहीं ना कहीं मानस पर ठहर गया है।
      वैसे यह सप्रयास तो नहीं है। मन में जब भाव आते हैं तो सहजता से लिपिबद्ध भी हो जाते हैं।
      ‘
      तुम्हारे लिये’कविता आपको ‘टॉनिक’ की तरह लगी। इसके लिये तहेदिल से शुक्रिया।
      वैसे यह सच है कि प्रेम अपने उदात्त रूप में ही सबसे सुंदर नजर आता है, बाकी अगर यह सच है कि जो देते हैं वहीं वापस मिलता है तो फिर प्रेम ही क्यों न दिया और लिया जाए?क्योंकि वह तो अपने हर रूप में सुंदर ही है।

      इस बेहतरीन टिप्पणी के लिए आपका तहेदिल से शुक्रिया

  9. नीलिमा जी ! आपकी तीनों कविताएं लीक से हटकर हैं। प्रेम आदिकाल से एक मानवीय अवश्यकता है। प्रेम मन की भूख को मिटाता है। …….तुम्हारे लिए — इस कविता में आपने प्रेम की शक्ति को एक नए रूप में परिभाषित किया है। निःसंदेह यह कविता आधुनिक हिंदी की एक उपलब्धि है। मेरी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !!

  10. आदरणीय सर जी!

    आपने कविताएँ पढ़ीं। बहुत बहुत शुक्रिया।

    एक बात तो है कि हमने प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी जी को बहुत पढ़ा है।
    आज टिप्पणियों को पढ़ने के बाद ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह प्रभाव कहीं ना कहीं मानस पर ठहर गया है।
    वैसे यह सप्रयास तो नहीं है। मन में जब भाव आते हैं तो सहजता से लिपिबद्ध भी हो जाते हैं।
    ‘
    तुम्हारे लिये’कविता आपको ‘टॉनिक’ की तरह लगी। इसके लिये तहेदिल से शुक्रिया।
    वैसे यह सच है कि प्रेम अपने उदात्त रूप में ही सबसे सुंदर नजर आता है, बाकी अगर यह सच है कि जो देते हैं वहीं वापस मिलता है तो फिर प्रेम ही क्यों न दिया और लिया जाए?क्योंकि वह तो अपने हर रूप में सुंदर ही है।

    इस बेहतरीन टिप्पणी के लिए आपका तहेदिल से शुक्रिया

  11. आपकी तीनों कविताएं उत्कृष्ट जिजीविषा का उदाहरण है। एक नारी विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानती और सफलता के पथ पर निरंतर चल रही है। उधर निश्छल प्रेम को समर्पित कविता दिल को छू जाती है। ऐसा दिल जो सिर्फ देना जानता है उसे कुछ नहीं चाहिए अपने प्रिय से। हार्दिक शुभकामनाएं

  12. वाह प्रिय नीलिमा जी शानदार जानदार,वजनदार बेहतरीन कविताएं
    पहली कविता ही आपका नाम को सार्थक करती हुई है
    धरती से अंबर तक नीला आकाश है वहां तक से भी असीम हैं आपकी सीमाएं
    पूर्णता तक न थमने का हौंसला लिए, के लिए ही है असीम आकाश
    सरिता सा हर जगह अपना रास्ता स्वयं बना लेता व्यक्तित्व की स्वामिनी प्रिय नीलिमा
    सुंदर दृढ़ कविता के लिए साधुवाद
    दूसरी कविता
    दर्शाती है कवयित्री प्रेम का अर्थ समझती है
    प्रेम का अर्थ बंधन नहीं है एकाधिकार नहीं है प्रेम प्रेम को स्वतंत्र करता है और प्रेम को एहसास ,गरिमा, माधुर्य को अपनी जीवन थाती
    प्रेम धरोहर समझता हे
    बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति
    तीसरी कविता में स्त्री की अगाध ऊर्जा को कविता में प्रज्वलित किया है आपने
    जितनी कोमल है स्त्री उतनी ही तेजस्वनी भी है
    प्रिय आप वैसे भी एक उम्दा मेरी वा पुरवाई की पसंदीदा समीक्षक साहित्यकार हो
    आपको इन उत्कृष्ट कविताओं के लिए साधुवाद
    कुन्ती हरिराम झांसी

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