Wednesday, October 7, 2026
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अनुरंजिनी : स्मृति, समाज, साहित्य और जीवन-बोध का अनुरागपूर्ण काव्य-संसार

पंडित डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र के काव्य-संग्रह पर एक समीक्षा

कुछ पुस्तकें अपने समय में लिखी जाती हैं, पर समय बीतने के साथ उनका महत्त्व और बढ़ जाता है। वे केवल साहित्यिक कृतियाँ नहीं रह जातीं, बल्कि अपने युग की सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक स्मृतियों और मानवीय संवेदनाओं का प्रलेख बन जाती हैं। डॉ॰ कृष्ण बिहारी मिश्र का काव्य-संग्रह ‘अनुरंजिनी’ ऐसी ही कृति है। वर्ष 2001 में पहली बार प्रकाशित यह संग्रह अब 2026 में पुनर्प्रकाशित होकर एक नई पीढ़ी के सामने उपस्थित है। इस नए संस्करण में उनकी पुत्री डॉ. गौरी मिश्रा की प्रस्तावना और भूमिका जुड़ने से पुस्तक का साहित्यिक महत्त्व एक अतिरिक्त आयाम ग्रहण करता है—यह अब केवल एक कवि की कृति नहीं, बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होती साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत भी है।

‘अनुरंजिनी’ का रचनात्मक संसार मुख्यतः 1950 से 1980 के दशक के भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि से निर्मित है। स्वतंत्रता के बाद का वह भारत आशाओं, आदर्शों, संघर्षों और परिवर्तन का भारत था। परंपरा और आधुनिकता के बीच द्वंद्व था, सामाजिक विषमताएँ थीं, बदलते जीवन-मूल्य थे और साहित्य अपने समय के प्रश्नों से गहरे रूप में जुड़ रहा था। मिश्र जी की कविताएँ इसी परिवेश को बाहर से देखने के बजाय उसमें सहभागी होकर महसूस करती हैं। यही कारण है कि उनके यहाँ इतिहास केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन में घटित अनुभव है।

‘अनुरंजिनी’ शीर्षक भी अपने आप में अर्थपूर्ण है। ‘अनुरंजन’ में मन को रंगने, प्रभावित करने और भावों को स्पंदित करने का भाव निहित है। संग्रह में सामाजिक यथार्थ के साथ स्मृति, प्रकृति, मित्रता, साहित्यिक अनुराग, मृत्यु-बोध, व्यंग्य और आशा—जीवन के अनेक रंग उपस्थित हैं। कवि का संसार इसलिए एकांगी नहीं है। उसमें आलोचक की सजग दृष्टि भी है और जीवन के छोटे-छोटे सुखों को सहेजने वाला संवेदनशील मन भी।

इसका सुंदर उदाहरण ‘मुझे प्रिय है’ कविता है। कवि को प्रिय हैं सुलगती शामें और धुँधले सवेरे; किसी पुराने मित्र के कंधे पर बाँह डालकर चलना; बेकार हँसना, फ़िज़ूल की बातें करना और जीवन को एक मस्त, स्वच्छंद ढंग से जीना। आगे परिवार, अपनापन, बीती हुई स्मृतियाँ और गाँव-देहात के दृश्य आते हैं—खेतों में भरपेट साग खाना, नहर के पुल पर बैठना और रोज़ गुजरती रेल को देखना। इन साधारण-से लगने वाले दृश्यों में एक पूरे जीवन-लोक की आत्मीयता बसती है। यहाँ कवि हमें याद दिलाते हैं कि जीवन की सुंदरता केवल बड़ी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि साझे अनुभवों, संबंधों और स्मृतियों की छोटी-छोटी रोशनियों में भी होती है।

इसके विपरीत ‘एक अनुभव’ जीवन के एक गंभीर और मार्मिक पक्ष से हमारा सामना कराती है। बीमारी और मृत्यु की अनिश्चितता, ज्योतिषी की भविष्यवाणी और उसी के बाद अपनी हथेली की लकीरों को गौर से देखता मनुष्य—इन प्रसंगों में एक सूक्ष्म विडंबना है। अस्पताल का वातावरण—ई.सी.जी., एक्स-रे, खाली होती ग्लूकोज़ की बोतलें, गंभीर डॉक्टर और नर्सें तथा रोग की पहचान के लिए चलती जद्दोजहद—कविता को अत्यंत वास्तविक धरातल देता है। एक हल्के-से सूत्र के सहारे कवि अँधेरे से निकलकर ‘रोशनी के दरवाज़े’ तक पहुँचते हैं; लेकिन व्यक्तिगत अनुभव वहीं समाप्त नहीं होता। अस्पताल के वार्ड में पड़े असहाय रोगियों, उनके साथ आए परिजनों और जीवन के लिए संघर्ष करते मनुष्यों का चित्र कवि की निजी पीड़ा को सामूहिक मानवीय करुणा में बदल देता है। इसीलिए ‘एक अनुभव’ केवल एक बीमारी की कविता नहीं, बल्कि मृत्यु के साक्षात्कार के बीच जीवन के प्रति गहरी जिजीविषा की कविता है।

संग्रह का एक महत्वपूर्ण पक्ष है हिंदी साहित्य के प्रमुख रचनाकारों के प्रति कवि का अनुराग। ‘प्रेमचंद के प्रति’ कविता में प्रेमचंद के साहित्य की सामाजिक शक्ति को रेखांकित किया गया है। होरी, गोबर और धनिया जैसे पात्रों का स्मरण करते हुए कवि बताते हैं कि प्रेमचंद ने लेखक की सीमित दुनिया को कितना व्यापक बनाया। ‘सेवासदन’ और ‘प्रेमाश्रम’ जैसे संदर्भों के माध्यम से वे प्रेमचंद की उस रचनात्मक शक्ति को पहचानते हैं जो सामाजिक यथार्थ को साहित्य का विषय बनाती है। कविता में प्रेमचंद अंततः केवल एक महान कथाकार ही नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना, स्वाभिमान और सामाजिक चेतना के प्रतीक बनकर उभरते हैं।

इसी परंपरा का अधिक तीखा और प्रश्नाकुल रूप ‘मुक्तिबोध के प्रति’ में दिखाई देता है। ‘कलम की स्वाधीनता के पक्षधर’ मुक्तिबोध को संबोधित करते हुए कवि साहित्यकार की स्वतंत्रता और वैचारिक निर्भीकता का प्रश्न उठाते हैं। सम्मान, पदवी और स्वार्थ के दबावों के बीच सत्य कहने वाली कलम की आवश्यकता पर कविता बल देती है। ‘बात को दो-टूक कहने की कला निर्भीक’ जैसे भावों में साहित्य के नैतिक दायित्व की स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनाई देती है। इस कविता के माध्यम से मुक्तिबोध एक साहित्यिक व्यक्तित्व भर नहीं रहते; वे स्वतंत्र चिंतन और सत्य के पक्ष में खड़े रचनाकार की प्रतीकात्मक उपस्थिति बन जाते हैं।

‘युग और मैं’ में यही सामाजिक चेतना सीधे समकालीन जीवन पर प्रहार करती है। बाजार की भीड़, हर वस्तु का मोल-भाव, मनुष्य की बुद्धि और भाषा तक का मूल्यांकन तथा सुविधा के लिए विवेक और निर्भीकता से समझौता करने की प्रवृत्ति—कवि आधुनिक समाज की विडंबनाओं को व्यंग्यात्मक ढंग से सामने रखते हैं। ‘विवेक, निर्भीकता और सत्य कथन’ की माँग के सामने केवल सहमति में सिर हिलाने वाली मानसिकता पर उनका प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है। यह कविता बताती है कि समय बदलता है, लेकिन मनुष्य और मूल्य के बीच संघर्ष बना रहता है।

इसके साथ ‘नई डगर’ एक नई आशा और पुनर्निर्माण का स्वर लेकर आती है। अतीत के कष्टों और निराशाओं को स्वीकार करने के बाद भी कवि नई राह की ओर बढ़ना चाहता है। ‘जीवन की श्रृंखला को चाहिए नवयोग भी’ का भाव परिवर्तन को जीवन का एक आवश्यक अंग मानता है। यहाँ आशावाद भोला या पलायनवादी नहीं है; वह संघर्ष से गुजरकर प्राप्त हुआ विश्वास है। नई डगर अंततः नवीनता, आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की मानवीय आकांक्षा का रूपक बन जाती है।

इन कविताओं को साथ पढ़ने पर ‘अनुरंजिनी’ की मूल संवेदना अधिक स्पष्ट होती है। प्रेमचंद में सामाजिक प्रतिबद्धता, मुक्तिबोध में वैचारिक स्वतंत्रता, ‘युग और मैं’ में सामाजिक आलोचना, ‘एक अनुभव’ में करुणा और जिजीविषा, ‘मुझे प्रिय है’ में जीवन की सहज आत्मीयता और ‘नई डगर’ में भविष्य के प्रति आशा—ये सभी अलग-अलग स्वर अंततः एक ही मानवीय दृष्टि से जुड़ते हैं।

सांस्कृतिक स्मृति का महत्त्व

आज अनुरंजिनी को पढ़ने का शायद सबसे प्रभावशाली कारण उसका स्मृति से गहरा संबंध है।

हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ दस्तावेज़ीकरण अभूतपूर्व स्तर पर पहुँच चुका है। आज लगभग हर क्षण को चित्रों, ध्वनि-रिकॉर्डिंग और डिजिटल माध्यमों में सुरक्षित किया जा सकता है। किंतु दस्तावेज़ीकरण और स्मृति एक ही बात नहीं हैं। एक तस्वीर हमें यह बता सकती है कि कोई दृश्य कैसा दिखाई देता था, लेकिन साहित्य हमें यह अनुभव करा सकता है कि उस संसार में जीना कैसा था।

यहीं कविता का महत्त्व और अधिक गहरा हो जाता है।

मिश्र जी की कविताओं के माध्यम से हम किसी बीते हुए युग के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश को केवल तथ्यों अथवा सूचनाओं के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभूति और जीवन्त अनुभव के रूप में महसूस कर सकते हैं। उनकी कविताएँ उस समय की संवेदनाओं, जीवन-मूल्यों, संबंधों और सामाजिक वातावरण को इस तरह सहेजती हैं कि अतीत हमारे सामने केवल इतिहास बनकर नहीं, बल्कि अनुभव बनकर उपस्थित होता है।

इस दृष्टि से अनुरंजिनी केवल कविताओं का संग्रह नहीं रह जाती; वह हमारी सांस्कृतिक स्मृति का एक महत्त्वपूर्ण भंडार बन जाती है—एक ऐसा साहित्यिक दस्तावेज़, जिसमें बीते समय की धड़कन, संवेदना और जीवन-गंध आज भी सुरक्षित है।

यही ‘अनुरंजिनी’ की सबसे बड़ी विशेषता है। यह अतीत को केवल याद ही नहीं करती; उससे वर्तमान के लिए प्रश्न और अर्थ ग्रहण करती है। 1950–80 के दशक का भारत आज बदल चुका है, पर जिन प्रश्नों से कवि जूझते हैं, जैसे मानवीय गरिमा, सामाजिक न्याय, सत्य, विवेक, संवेदना, संबंध और बदलते मूल्य—वे आज भी हमारे सामने हैं।

2026 में इसका पुनर्प्रकाशन इसीलिए एक विशेष अर्थ रखता है। लगभग पच्चीस वर्ष बाद पुस्तक फिर पाठकों के हाथ में है और डॉ. गौरी मिश्र की भूमिका तथा प्रस्तावना उसके अतीत को वर्तमान से जोड़ती हैं। इस तरह पिता की रचना बेटी की दृष्टि से नई पीढ़ी तक पहुँचती है और निजी साहित्यिक विरासत सार्वजनिक सांस्कृतिक स्मृति में रूपांतरित होती है।

अंततः, ‘अनुरंजिनी’ को केवल कविताओं का संग्रह कहना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित करना होगा। यह स्मृति और वर्तमान, व्यक्ति और समाज, साहित्य और जीवन के बीच संवाद रचने वाली कृति है। इसमें एक ऐसे कवि का मन दिखाई देता है जो अपने समय को देखता है, उससे असहमत होने का साहस रखता है, साहित्यिक परंपरा को सम्मान देता है, जीवन की छोटी खुशियों को सहेजता है और कठिन अनुभवों के बाद भी नई राह की ओर देखने का विश्वास बनाए रखता है।

इस अर्थ में ‘अनुरंजिनी’ एक बीते हुए युग की कविताओं का पुनर्प्रकाशन मात्र नहीं, बल्कि उस युग की संवेदना को आज के समय तक जीवित रखने वाला साहित्यिक सेतु है—एक ऐसी विरासत, जो स्मृति के रंगों से अनुरंजित होकर वर्तमान से संवाद करती रहती है।

डॉ.अंशु शर्मा 

नई दिल्ली 

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