हाल ही में कस्तूरी द्वारा आयोजित कार्यक्रम किताबें बोलती हैं: सौ लेखक, सौ रचना में कथाकार वंदना यादव जी की क़िताब “सैनिक पत्नियों की डायरी” पर चर्चा हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार सच्चिदानंद जोशी ने की।
मुख्य वक्ता के रूप में शिक्षाविद प्रो. संध्या वात्स्यायन का तथा वक्ता रूप में कवि एवं गज़लकार लक्ष्मी शंकर वाजपेई जी का सान्निध्य मिला।

सर्वप्रथम लक्ष्मी शंकर वाजपेई ने अपने वक्तव्य में पुस्तक की समीक्षा करते हुए कहा, “साहित्य जगत में यह पहली पुस्तक है जो सेना में तैनात अधिकारियों की पत्नियों पर द्वारा लिखी गई है। इस किताब में उनके संघर्ष, उनके साहस, उनकी निडरता और परिवार को सहेजने की ताकत दिखाई देती है। इस पुस्तक को इसलिए भी पढ़ना जरूरी है क्योंकि स्त्री सशक्तिकरण की एक मिसाल आपको यहां देखने को मिलेगी”
मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. संध्या वात्स्यायन ने पुस्तक के सभी आलेखों पर प्रकाश डाला और बताया, “सैनिक जीवन को पास से देखने की उनकी बहुत इच्छा थी, इस पुस्तक के माध्यम से उन्हें बहुत सारी जानकारियां मिलीं। उन्होंने सैनिक पत्नियों के जांबाजी के अनेक किस्से सांझा किए और उन किस्सों से सीख लेने के लिए भी कहा। जीवन में आने वाली अनेक कठिनाइयों को जिससे हम हार मान लेते हैं सैनिक की पत्नियों के लिए वह एक दैनिक समस्या की तरह होती है।”
पुस्तक की संपादक कथाकार, वंदना यादव ने एक कर्नल की पत्नी के रूप में जिस तरह का जीवन जिया, उसे हमसे सांझा किया और कुछ दिलचस्प किस्से भी सुनाए। वंदना जी ने बताया इस किताब की शुरुआत ही हमारे जीवन के पहलुओं को सामने लाने की सोच से हुई, फिर सब का साथ मिला और किताब आज आप सभी के हाथ में है।

