कहानी संग्रह – अधजले ठुड्डे लेखक – हंसा दीप प्रकाशक – वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली प्रकाशन वर्ष – जनवरी, 2025 मूल्य – 399 रुपए
डॉ. हंसा दीप एक प्रमुख अप्रवासी साहित्यकार हैं जो कई दशकों से विदेश में रहते हुए हिंदी साहित्य की अलख जगा रही हैं। वर्तमान में, वह कनाडा के टोरंटो विश्वविद्यालय में लेक्चरर हैं। उन्होंने यॉर्क विश्वविद्यालय, टोरंटो में हिंदी कोर्स डायरेक्टर और भारत के भोपाल एवं विक्रम विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक के रूप में भी कार्य किया है। उनके चार उपन्यास और आठ कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इसमें से उपन्यास ‘कुबेर’ एवमं ‘केसरिया बालम’ तथा कहानी संग्रह ‘टूटी पेंसिल’, ‘उम्र के शिखर पर खड़े लोग’ और ‘छोड़ आए वो गलियाँ’ काफी लोकप्रिय हुए हैं। उनकी कई रचनाएँ गुजराती, मराठी, बांग्ला, अंग्रेजी और पंजाबी भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं।
हाल ही में वाणी प्रकाशन द्वारा हंसा दीप का नया कहानी संग्रह ‘अधजले ठुड्डे ‘ प्रकाशित किया गया है। यह संग्रह केवल कहानियों का संकलन मात्र नहीं है, बल्कि एक सामाजिक दर्पण है, जिसमें समकालीन समाज की जटिलताओं, संघर्षों और अंतर्द्वंद्वों की झलक मिलती है। इस संग्रह में कुल 17 कहानियाँ हैं, जो विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत मुद्दों को अत्यंत संवेदनशीलता और यथार्थवादी दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करती हैं। इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता विषयों की विविधता है। जीवन में 16 का अंक महत्वपूर्ण होता है किंतु हंसा दीप ने 17 कहानियों का चुनाव क्यों किया यह तो वही जानती होंगी लेकिन यह कहा जा सकता है इन कहानियों के माध्यम से उन्होंने प्रेम, परिवार, प्रवासन, सामाजिक भेदभाव, स्त्री-पुरुष संबंधों, पीढ़ियों के टकराव, और मानवीय संवेदनाओं के विभिन्न पहलुओं को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। कहानियाँ काफी हद तक यथार्थवादी हैं लेकिन कल्पना के संतुलित सम्मिश्रण ने उनकी पठनीयता बढ़ा दी है।
संग्रह की शीर्षक कहानी ‘अधजले ठुड्डे’ नस्लभेद, श्रमिक वर्ग की समस्याओं और आंतरिक संघर्षों की पड़ताल बिल्कुल अलग तरीके से करती है। कहानी का नायक लीवी एक अश्वेत श्रमिक है, जो कहानी के नायिका के घर काम करने आता है। वह मेहनतकश और ईमानदार है, लेकिन समाज में व्याप्त नस्लभेद और पूर्वाग्रहों से उसे दिन प्रति दिन जूझना पड़ता है। एक जगह वह कहता है ‘डोंट लुक एट मी, लुक एट माइ वर्क’। लेखिका ने इस कहानी में हर पल रोमांच बनाए रखा है। हर पृष्ठ के पश्चात लगता है कि कुछ अनहोनी होने वाली है और यही उत्सुकता पाठकों को कहानी के अंत तक बांधे रहती है। कहानी सुखांत है लेकिन यह हमारे भीतर छुपे पूर्वाग्रहों को अत्यंत सशक्तता के साथ उजागर करने में सफल रहती है।
कहानी ‘एक बटे तीन’ रेखांकित करती है कि भौगोलिक दूरी केवल शारीरिक नहीं होती, बल्कि भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक रूप से भी लोगों को अलग कर देती है। कहानी प्रवासी जीवन, पारिवारिक संबंधों और संपत्ति विवाद की विषमताओं को अत्यंत मार्मिक ढंग से उजागर करती है। कहानी का नायक विदेश में बस गया है, उसे यह जानकर गहरा आघात लगता है कि उसकी स्वर्गवासी माँ अपनी संपत्ति का बंटवारा उसके तीन नकारा भाइयो में कर गई हैं और वह जो माँ का सबसे लाड़ला व योग्य था उसे कोई हिस्सा नहीं मिला है। हालांकि नायक को माँ के धन दौलत की कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन वंचित कर दिए जाने का दुख उसे सालता रहता है। कहानी में नायक के द्वंद्व और उसकी आहत भावनाओं को अत्यंत मार्मिकता के साथ उकेरा गया है।
कहानी ‘अम्मी और मम्मी’ भारत-पाकिस्तान विभाजन के बीच एक हिंदुस्तानी और एक पाकिस्तानी लड़की की दोस्ती को दर्शाती है। दोनों लड़कियाँ न्यूयॉर्क में पढ़ाई कर रही हैं और धीरे-धीरे उनकी दोस्ती गहरी हो जाती है। उनके रिश्तों, परिवेश, खानपान, संस्कृति और नागरिकता को लेकर जो तीखे बाण चलते हैं वह दोनों देशों के नागरिको को आत्मावलोकन करने के लिए मजबूर कर देते हैं। कहानी इस संदेश को बड़े ही संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करने में सफल होती है कि सीमाएँ केवल देशों के बीच होती हैं, दिलों के बीच नहीं। यह एक भावनात्मक कहानी है, जो सांस्कृतिक समन्वय और मानवीय रिश्तों की ताकत को दर्शाती है।
कहानी ‘काठ की हांडी’ जीवन, मृत्यु और आत्मनिर्णय के जटिल सवालों से जूझती है। रोज़ा नामक पात्र अपनी मृत्यु को खुद चुनने का निर्णय लेती है, क्योंकि उसे लगता है कि अब जीवन में कुछ भी नया नहीं बचा है। यह कहानी आत्महत्या जैसे गंभीर विषय पर एक गहरी संवेदनशीलता के साथ प्रकाश डालती है और पाठक को सोचने पर मजबूर करती है।
कहानी ‘बैटरी’ एक अलग तेवर की कहानी है। यह हंसा दीप जी के लेखन का कौशल है कि घटना विहीन इस कहानी में वह इतनी उत्सुकता जागृत कर देती है कि हर पल यही लगता है कि अब कोई अनपेक्षित घटना घटित होने वाली है। इस कहानी की नायिका अपनी कार से कनाडा से अमेरिका जा रही होती है। रास्ते में भयंकर बर्फबारी और तूफान के बीच उसकी कार की बैटरी के साथ-साथ मोबाइल की बैटरी भी डिस्चार्ज हो जाती है। ऐसा लगता है कि भयानक ठंड में ठिठुरकर रात्रि में नायिका की मौत हो जाएगी लेकिन तभी एक अनजान मददगार आता है। किन्तु हर कदम पर नायिका को भय सताता रहता है वह उसके साथ कोई दुर्व्यवहार कर सकता है। नायिका के खौफ का जो चित्रण हंसा दीप ने किया है वह रौंगटे खड़े कर देने वाला है। कहानी की विशेषता है कि वह मददगार नायिका को एक सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के पश्चात अपने पथ पर चला जाता है लेकिन वह कौन था, उसका नाम क्या था, यह उजागर नहीं होता है। यह कहानी जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय मुद्दों को एक रोचक तरीके से प्रस्तुत करने के साथ-साथ तकनीक के बढ़ते प्रभाव और प्रकृति की जटिलताओं के बीच आधुनिक जीवन की सच्चाइयों को उजागर करती है।
कहानी ‘शून्य के भीतर’ का प्रस्तुतीकरण और शैली मन मस्तिष्क पर एक अमिट छाप छोड़ जाती है। कहानी में कुछ पर्यटक एक पक्षी विहार जाते हैं वहाँ बोर्ड पर लिखा है “पशु-पक्षियों को कुछ भी न खिलाया जाए। प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है यदि आप स्वयं दान के इच्छुक हूँ तो करिए मगर इस पशु पक्षी विहार की कहानी पढिए या सुन लीजिए”। उसके पश्चात् शुरू होती है एक मार्मिक कहानी जो एक अकेली महिला की मानसिक यात्रा को दर्शाती है, जो अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में अकेलेपन और समाज की उपेक्षा से जूझ रही है। कहानी में यह गहरी संवेदनशीलता के साथ दिखाया गया है कि कैसे वृद्ध लोग समाज से कटते चले जाते हैं और उनकी पहचान धीरे-धीरे धुंधली हो जाती है। लेखिका ने “शून्य” का प्रतीकात्मक प्रयोग करते हुए उस रिक्तता को दर्शाया है, जो जीवन के उत्तरार्ध में आ जाती है।
कहानी ‘पुआल की आग’ एक परिवार के भीतर गहरी दबी हुई कड़वाहट और ग़ुस्से की धीमी आँच को दर्शाती है, जो वर्षों से भीतर ही भीतर जल रही होती है और कभी भी एक छोटी-सी घटना से भड़क उठती है। कहानी पारिवारिक संबंधों में पनप रहे असंतोष और उसकी परिणति को दर्शाती है। हंसा दीप ने इस कथा के माध्यम से पारिवारिक तनाव और उसमें धीरे-धीरे पनपते ग़ुस्से को “पुआल की आग” के रूप में प्रस्तुत किया है, जो अंदर ही अंदर सुलगती रहती है। लेखिका इस कहानी का समापन एक सूत्र वाक्य से करती है जिसमे पूरी कहानी का निहितार्थ समाया हुआ है “दो प्राणी, एक दूसरे से बहुत दूर, मगर फिर भी बहुत पास।”
संग्रह में शामिल अन्य कहानियाँ घुसपैठ, भर दोपहर, लाइलाज, मैटरनिटी लीव, कॉफी में क्रीम, स्ट्राइक और दो स्त्रियों के बीच इत्यादि भी सामयिक रचनाएँ हैं और अपने विषय वस्तु के साथ न्याय करती दिखाई पड़ती है। इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रत्येक कहानी किसी सामाजिक या व्यक्तिगत समस्या की ओर संकेत करती है और पाठक को आत्मलोकन करने के लिए मजबूर करती है। यह विशेषता ही किसी कृति की उत्कृष्टता की निशानी होती है।
इन कहानियों को पढ़ने के पश्चात कहा जा सकता है की हंसा दीप का दृष्टिकोण बहुत ही व्यापक और संवेदनशील है। वे कहानियों में यथार्थ को सहजता से प्रस्तुत करती हैं और उसे कल्पनाशीलता का रंग देकर और भी प्रभावशाली बना देती हैं। उनकी भाषा प्रवाहमयी, सहज और भावनात्मक रूप से प्रभावशाली है। उनकी कहानियाँ पाठक के अंतर्मन को छूती हैं और उसमें गहरी छाप छोड़ती हैं। यह संग्रह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक जागरूकता का भी गहरा तत्व समाहित है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि‘अधजले ठुड्डे ‘ केवल कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि समाज का एक प्रतिबिंब है। हंसा दीप की लेखनी में एक विशेष प्रकार की संवेदनशीलता है, जो पाठक को अपने साथ बाँधकर रखती है। उनकी कहानियाँ न केवल हमारे चारों ओर की दुनिया को समझने में मदद करती हैं, बल्कि हमारे भीतर छिपे विचारों और पूर्वाग्रहों को भी उजागर करती हैं।
यह संग्रह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो सामाजिक मुद्दों पर गंभीरता से विचार करना पसंद करते हैं और साहित्य के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं की गहराई को समझना चाहते हैं। यदि आप समकालीन हिंदी साहित्य और सामाजिक यथार्थ पर आधारित कहानियाँ पढ़ना पसंद करते हैं, तो यह पुस्तक आपके लिए अवश्य पठनीय है।
बहुत शानदार समीक्षा
बहुत सुंदर, सटीक समीक्षा। लेखिका एवं समीक्षक को हार्दिक बधाई।