Sunday, July 21, 2024
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पुरवाई के सम्पादकीय ‘श्रद्धा की हत्या और कानूनी पेचीदगी’ पर प्राप्त पाठकीय प्रतिक्रियाएं

20 नवम्बर, 2022 को प्रकाशित पुरवाई के सम्पादकीय ‘श्रद्धा की हत्या और कानूनी पेचीदगी’ पर निजी संदेशों के माध्यम से प्राप्त पाठकीय प्रतिक्रियाएं…!

शोभना शाम
तेजेन्द्र जी, हमारे देश की अदालतों में सच की हत्या कैसे होती है यह कल ही अपनी आंखों से देखा।
प्रतिपक्ष का वकील साफ़ झूठ पर झूठ बोल रहा था, मेरा वकील मुझे सच बोलने नही दे रहा था और जज साहब मुझे बड़े व्यंग्य से देखकर हंस रहे थे… और वकीलों से पूरी तरह सहमत थे।
मेरे वकील ने मुझे ही धमकी दे डाली कि आप कुछ बोलीं तो आपका केस छोड़ दूंगा।
जब ज़िंदा व्यक्ति सच नहीं बोल सकता तो मरा हुआ कैसे सच बताने आयेगा?
प्रो. सुमित्रा कुलकर्णी
तेजेन्द्र जी,
बिल्कुल सही लिखा है आपने। इतने घटनाक्रम के बावजूद आज भी भारत में सबूत ढूंढे जाते हैं।
सरकमस्टेंशियल एविडेंसेस को यहां महत्व नहीं दिया जाता। जबकि अन्य विकसित राष्ट्रों में इसी के आधार पर निर्णय होते हैं और कोई भी अपराधी छूट नहीं पाता।
Congratulations for a balanced article..
सुधाकर अदीब
तेजेन्द्र भाई, आपका कहना कानूनन सत्य है। अच्छा हो कि कानून इसे छोड़ दे और कहीं किसी जगह भीड़ इस हत्यारे रोमियो को ‘लिंच’ कर दे। तब देखें ‘लेफ़्ट-लिबरल्स’ क्या और कैसा हो-हल्ला करते हैं?
वकील तो ज़्यादा से ज़्यादा कोर्ट परिसर में इसे आते-जाते जुतिया-लतिया भर सकते हैं। दिल्ली पुलिस इसे किसी तरह बचा के निकाल ले जाएगी।
जूही समर्पिता
संपादक जी,
बहुत ही घिनौनी मानसिकता का परिचायक आफ़ताब …उफ्फ़ किस दौर से गुजर रहें हैं हमलोग… ऐसे अपराधियों को भी फांसी की सज़ा देने के लिए अदालत को सोचने का समय चाहिए?
अब समय आ गया है भारत में त्वरित न्याय और सख़्त सजा देने का… वर्ना अपराधी खुले आम घूमते रहेंगे। बलात्कारियों पर सख्त कार्यवाही नहीं की जाती इसलिए वारदातें बढ़ती जा रही हैं।
न्यायिक प्रक्रिया लंबी चलती है अपराधी बेखौफ रह्ते हैँ… नेताओं की सिफ़ारिश से अपराधी बच जाते है।
कब तक चुप रहा जाए????
स्मृति शुक्ला
तेजेन्द्र जी,
इस पूरे मामले की पड़ताल आपने बड़ी गंभीरता और सूक्ष्मता से की है। लव जिहाद को आपने एकदम सटीक तरह से परिभाषित किया है। आपकी लेखनी की कायल हूँ।
शुभम राय त्रिपाठी
संपादक जी,
विशेष रूप से भारत में महिलाओं के प्रति घटित होने वाले अपराध में यह केस अत्यधिक भयावह, जघन्य व क्रूर है। न्यायालय व्यवस्था की दोहरी व्यवस्था उपलब्ध है। केस सरकारी कोर्ट रूम से लेकर मीडिया हाउस की प्राइम टेबल तक चलता है।
अपराध घटित हो चुका है अपराधी भी मौजूद है पर न्यायालय सुबूत पर काम करता है। न्यायलय की कार्यशैली की गति जटिल है यह भी अपने आप में भयावह है।
ऐसी घटनाएं पहले भी घटित हो चुकी हैं। जरूरत है कि समाज में नई युवा पीढ़ी ऐसी घटनाओं से सबक लेकर सही ग़लत का फर्क समझे। अपनी निजी जिंदगी को इतना भी उन्मुक्त – उन्मादी न बना दे कि अंत में शरीर के साथ, रिश्ते, विश्वास, मानवता,प्रेम, परिवार भी टुकड़ों में बांटा नजर आए।
अपराधी को उसके अपराध की सजा समय रहते मिलनी चाहिए, पर अफसोस यह समय अवधि हर नए केस में क्या रहती है यह आज तक समझ से परे है।
विनोद पांडेय
समसामयिक घटना पर विस्तार से कलम चलाई आपने… कुछ नए तरीक़े से आपने इस घटना की विवेचना की हैl
अपराध आफ़ताब ने किया है जिसकी बड़ी सज़ा मिलनी चाहिए… ऐसी सज़ा जो ऐसे मानसिकता वाले अपराधियों में दहशत पैदा कर दे l बाक़ी लिव-इन रिलेशनशिप,कपल के बीच लड़ाई झगड़ा, परिवार का रूठना, लड़की लड़के का अलग-थलग पड़ना चलता रहेगा l
लेकिन किसी की जान ले लेना, इसकी छूट नहीं होनी चाहिए l
बढ़िया लिखा है सर आपने 🙏
कुसुम पालीवाल
तेजेन्द्र जी, संपादकीय पढ़ा।
मालूम नहीं कि जो लड़की लिव-इन में रहने का निर्णय खुद ले सकती है वो मार -पीट करने पर अपने लिविंग पार्टनर को क्यों न छोड़ सकी …?

शिक्षा हमें आत्मविश्वास से भरती है न कि कायर बनाती है । अगर उसको भय था कि आफताब उसको ब्लैकमेल कर सकता है तो भी वो भाग जाती और उसके ख़िलाफ़ एफ़ आई आर दर्ज करती। जो व्यक्ति एक बार हाथ उठा सकता है वो ही फिर दुबारा से उठा सकता है ये बात न समझ सकी जबकि इतनी बोल्ड थी 🤔

प्रो. राम भट्ट, हैंबर्ग (जर्मनी)
तेजेन्द्र जी,
सूचनाप्रद, तर्कसंगत एवं ज्ञानवर्धक संपादकीय।
संभवतः भारतीय क़ानून और ख़ासकर सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट की कार्य-प्रणाली पर भी विचार किया जाना चाहिए।
भारत में कई बार न्यायपालिका कार्यपालिका का काम करती हुई दिखाई देती है।
आशुतोष कुमार, लंदन
शत प्रतिशत सहमत हूँ सर। यह लव जिहाद का मामला बिल्कुल नहीं लगता। 👍👍
निष्पक्ष तटस्थ संपादकीय 🙏💐
उषा साहू
सम्पादक जी, नमस्कार l
वैसे तो समाचारों में इस कांड की बहुत कुछ जानकारी मिल चुकी थी l फिर भीआपने पूरे कांड को, पूर्ण जानकारी के साथ प्रस्तुत किया है l धन्यवाद l
इस हत्याकांड ‘लव जिहाद’ तो नही कहा जा सकता l इसमें लव को तो कोई अंश है ही नहीं l जरा सा भी लव का अंश होता तो अंततः यही होता कि वह दरिन्दा, लड़की को अपने से अलग कर देता या बाकायदा उसे उसके गृहनगर vasai भेज देता l
अब अगर उस बहसी को चौराहे पर टांगकर फांसी दे भी जाय तो क्या होगा, किस-किस को फ़ांसी देंगे l फिर हमारी कानून व्यवस्था ऐसी है कि गवाहों, सबूतों के चक्करों में एकाध दशक निकल जाए l निर्भया कांड को देख लो या मुंबई बम विस्फोट के एक मात्र जिंदा पकड़े गए कसाब को ही देख लो, सजा होते होते 10 वर्ष निकल गए l लोग इसे एक खबर समझ कर भूल भी गए l
इस कांड से कुछ बातेँ सामने आई हैं:
# यह जघन्य अपराध, एक मनोरोगी द्वारा किया गया अपराध हैl
# बच्चों में बचपन से ही अच्छे और खराब में फर्क़ समझाया जायl संस्कारों का महत्व बताया जाए l ये तो हम जानते ही हैं कि बचपन में सिखाई गई बातों का असर, उम्र भर होता है l
#आजकल लव एंड रिलेशनशिप का जो राक्षस खडा है, उसे दूर करने का प्रयत्न किया जाय l फसाद की जड़ वही है, श्रद्धां हत्याकांड उसी का दुष्परिणाम है l कोई जिम्मेदारी नहीं, कोई सामाजिक बंधन नहीं l निरंकुश l इसे रोकना बहुत जरूरी है l हालाकि ऐसा कोई कानून नहीं है, सामाजिक तौर पर या पारिवारिक तौर पर ही इस पर नियंत्रण किया जा सकता है l भगवान से यही प्रार्थना है, राम-कृष्ण की इस पवित्र भूमि को पवित्र बनाए रखे !
रश्मि रविजा
आपका कहना बिल्कुल सही है कि शायद इस जघन्य अपराधी को सजा न मिल पाए। तीन युवा एक लड़की को किडनैप कर ,तीन दिन तक रेप और टॉर्चर करने के बाद उसकी हत्या कर देते हैं। निचली अदालत और हाई कोर्ट ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई।हाल में ही सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया क्योंकि मजबूत साक्ष्य मौजूद नहीं थे। यह लव जेहाद का मामला बिल्कुल भी नहीं है, कई हिन्दू अपराधी भी ऐसे जघन्य कृत्य कर चुके हैं।
अंजू शर्मा
बढ़िया लिखा आपने सर। लव जिहाद तो नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि ये मामला धर्म से नहीं जुड़ा। पर अभी तक ये मालूम नहीं चला कि श्रद्धा खुद क्या करती थी। माँ की मृत्यु और पिता से अलगाव के बाद वह आफ़ताब पर भावनात्मक रूप से निर्भर थी पर क्या वह आर्थिक रूप से भी आफ़ताब पर निर्भर करती थी जो मार पिटाई सहन करके भी उसे झेल रही थी। फेसबुक पर स्टॉकहोम सिंड्रोम की बात पढ़ी पर मुझे ये कुछ अलग किस्म का मामला लगा। ये भी लगा कि अभी तक सारे पत्ते खुले नहीं है। जैसा कि आपने लिखा भी कि पुलिस केवल उतना जानती है जितना आफ़ताब ने बताया। ये तय है कि अपराधी मानसिक से रूप से बहुत ही अधिक मजबूत और शातिर है इसीलिये उसे कोई ग्लानि तक नहीं हुई अपने इस दुर्दांत अपराध पर। कानून सुबूतों पर चलता है। लड़का अगर मजबूत बना रहा और उसका वकील कामयाब रहा तो सुबूतों के अभाव में पूरा मामला उलट भी सकता है।
किरण खन्ना
सज़ा सिर्फ आफताब को ही क्यों मि ले… … सारी श्रद्धाओं के पालनहारों को भी कटघरे में खड़ा क्यों नहीं करते हम जो अपनी बच्चियों को अपने धर्म के ,मजहब के ,संस्कृति के, तहज़ीब के शिष्टाचार के रास्ते चलना नहीं सिखा पाते और उनमें नीर क्षीर विवेक भरने में असमर्थ हैं । आज बी टी एस सिंगर ग्रुप, माईकल जैक्सन के अंध भक्त तो हमारे बच्चे शैशव काल से ही हो ते है लेकिन हनुमान चालीसा, गणेश वंदना, रामायण की चौपाई हम उन्हें वय संधि तक नहीं सिखा पाते … उन्हें क्या हम स्वयं अपने दर्शन आध्यात्म और धर्म से अनभिज्ञ हैं। सुबह टाटा स्काई या यू ट्यूब आरतियां गाता है और चाईनीज एल डी की लड़ियां मंदिर में जग बुझ रही होती है … सिर ज़मीन से लगा कर माथा टेकना हमारे बच्चे तौहीन समझते हैं और हम उन्हें माडर्न कह कर उनके नैतिक गुनाहों को नजरंदाज कर देते हैं .. ऐसे में उनका मस्तिष्क अपहृत कर,उन्हें अपने सम्मोहन से भर कोई विधर्मी अपने षड्यंत्र में कामयाब हो जाते हैं तो फिर पछताना क्यों … अपनी पंड (गठरी) संभाली नहीं जाती तो चोर की नैतिकता पर आरोप तय करने का किसी को क्या अधिकार ????
नीलिमा शर्मा
कोई पेरेंट्स अपने बच्चों को संस्कारहीन नही बनाना चाहते। आसपास के माहौल परिस्थितियों से आखिर कब तक बचाया जा सकता है। यहाँ कसूरवार किसी के पेरेंट्स नही है लड़का है उसकी मानसिकता है और लड़कीं भी कि क्यों नही उस रिश्ते से बाहर निकल कर आयी। प्रेममें कोई धर्म नही देखता लेकिन हिंसा भी बर्दाश्त नही करनी चाहिए।
डॉ यास्मीन मूमल
विचारणीय आलेख ज़िंदाबाद।
लव जिहाद से हर चीज़ जोड़ना बड़ा सरल हो गया है इस युग में। जहाँ ये शब्द आया वहीं लोगों की प्रज्ञा एक वर्ग विशेष के विरुद्ध भड़क जाती है। अपराध किसी भी व्यक्ति द्वारा किया जाए वो अक्षम्य ही होता है। घरेलू हिंसा हो,दहेज के लिए हत्या हो या ऑनर किलिंग सबमें मरती तो इंसानियत ही है और सम्वेदनाएँ घट रही हैं निरंतर। कारण बहुत सारे हैं एकल परिवार से लेकर पेरेंट्स के पास समय की कमी बहुत सी कुंठाए पनपी ग्रन्थियां भी मानव को दानव बनाए जा रही हैं। लव से जिहाद का कोई लेना देना देखा नहीं मैंने तो कभी। मुस्लिम कभी नहीं चाहते कि कोई ग़ैर मुस्लिम लड़की उनके घर में ब्याह कर आ जाए
मगर जब लड़के प्रेम के वशीभूत होकर शादी कर लेते हैं तब कुछ लोग मजबूरी वश बेटा बहु को रख लेते हैं घर में। आजीवन उनके मन में फिर भी मलाल रहता है अपने मज़हब वाली आती तो आने वाली संतान को संस्कार ,बेहतर दे पाती क्योंकि जो संस्कार व्यक्ति को घुटटी मे मिलते हैं वो मरने तक भूल ही नहीं सकता है। लव जिहाद शब्द दुष्प्रचार के लिए गढ़ा गया झुंझना है जिसे बजवाते हैं मुस्लिम के विरुद्ध। जो कोई भी क़त्ल,डरावनी हिंसा करता वो घृणा का पात्र है फिर चाहे वो किसी भी समुदाय का हो।
डॉ तबस्सुम जहां
लिव इन रिलेशनशिप जैसी आधुनिक सोच वाली मान्यताएं मुझे केवल शारिरिक उपभोग का एक साधन मात्र लगती हैं जो युवा पीढ़ी को आपस की ज़िम्मेदारी, रिश्तेनाते तथा घरेलू उत्तरदायित्व से मुँह मोड़ना सिखाती है। यह घरेलू हिंसा को और भी बढ़ावा देती है। घरेलू हिंसा होने पर लड़की माँ बाप की शरण नहीं ले पाती।
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