पुस्तक: तुम न आए लौटकर: महेंद्र वर्मा (काव्य संग्रह), प्रकाशक: आस्था प्रकाशन गृह, जालंधर (पंजाब); पृष्ठ संख्या – 152; मूल्य : ₹325/- मात्र
समीक्षक– डॉ. अरुणा अजितसरिया
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:
यत् क्रौंच मिथुनादेकम् अवधी: काममोहितम्।
संवेदना से उपजे और शोक से जन्मे इस छंद को संस्कृत की प्रथम छंद बद्ध रचना माना जाता है। यह कथा ऐतिहासिक है या प्रतीकात्मक, पर सच यह है कि साहित्य में संवेदना का यही महत्व है – संवेदन शील हृदय के बिना सृजन संभव नहीं। कविता का जन्म स्वानुभूति से होता है। संवेदना जब हृदय को उद्वेलित करती है, कविता के रूप में प्रस्फुटित होती है। ‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान’ और ‘जो घनीभूत पीड़ा थी, मस्तक में स्मृति सी छाई, दुर्दिन में आँसू बन कर, वह आज बरसने आई’ में जयशंकर प्रसाद ने अपनी कालजयी रचना ‘आँसू’ में वेदना को कविता के स्रोत और उसकी रचना प्रक्रिया को परिभाषित किया है। व्यक्ति की वेदना में जब समष्टि की वेदना प्रतिबिंबित कर पाठक को जोड़ती है तब साधारणीकरण होता है। पाठक उसमें अपनी भावनाओं की छाया देख कर कवि की संवेदना से तादात्म्य स्थापित कर लेता है। और यही श्रेष्ठ कविता का निकष होता है कि पाठक को कवि की संवेदना ‘अपनी’ सी लगने लगे।
जीवन के कठिन क्षणों में जब समस्याओं के अंधेरे में प्रकाश की किरण किसी सेंध से भी प्रवेश न करे उस समय भाव-प्रवणता तरल होकर कविता के रूप में प्रवाहित होती है। वर्मा जी का काव्य संग्रह, ‘तुम न आए लौटकर’ की रचना अपनी संवेदना के उबाल को शब्दों में बाँधने की प्रक्रिया का परिणाम है।
बचपन में अपने पिता के साथ कालिदास की अमर कृति मेघदूत, तुलसीदास के भजन, दिनकर की राष्ट्रीयता से ओतप्रोत और निराला की ओजस्वी कविताओं तथा परिवार के साहित्यिक और धार्मिक वातावरण से मिले हिंदी साहित्य से प्रेम और भारतीयता के संस्कार, शेक्सपियर, वर्ड्स्वर्थ, मिल्टन, यीट्स आदि श्रेष्ठ कवियों के अध्ययन से उपजे अंग्रेज़ी साहित्य से लगाव और प्रवास काल में मिले अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व को समृद्ध किया। हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा पर समान अधिकार ने उनकी अभिव्यक्ति की संप्रेषणीयता को तीव्रता प्रदान की। यह उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को समान रूप से परिभाषित करती है। अपनी सांस्कृतिक विरासत को कवि ने कृतज्ञता से स्मरण किया है:
‘हमारी संस्कृति
है हमारी विरासत
श्रद्धा, सहिष्णुता औ’ आदर,
मिला दर्शन’वसुधैव कुटुंबकम’
कवि रामायण और गीता की विरासत के प्रति नतमस्तक है।
संग्रह की 80 कविताएँ अलग-अलग मनोदशा को उकेर कर भावना का एक मनोरम कलाईडोस्कोप निर्मित करती हैं। प्रथम भाग में अपना देश छोड़कर प्रवास में बसेरा बनाने के अनुभव नौस्टैल्जिया मिश्रित पीड़ा की अभिव्यक्ति है। अक्तूबर के एक खुशनुमा दिन प्रियजनों से दूर यॉर्क शहर में तीन वर्ष के लिए आए, पर देखते-देखते कब तीन वर्ष तीस वर्ष और उसके भी आगे चले गए यह न जाने कितने प्रवासियों की कहानी है। कवि इसे एक दार्शनिक की तरह स्वीकारता है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना ही पड़ता है:
‘इतना कुछ
विधि में
मिलता नहीं सदा
सब कुछ
कुछ खोया, कुछ पाया।
‘इंतज़ार’ शीर्षक की तीन कविताओं में संवेदना के अलग-अलग भाव चित्र हैं। जीवन निष्फल प्रतीक्षा की एक लम्बी शृंखला है। हर किसी को किसी न किसी की प्रतीक्षा है जो प्रायः अधूरी ही रहती है। एक माँ को युद्ध में गये अपने बेटे के लौटने की प्रतीक्षा रही। बेटा लौटा ज़रूर, ‘पर, अंतिम संस्कार के लिए!’
‘मन की पीड़ा’ कविता में किसी नितांत ‘अपने’ की आँखों में पहचान धूमिल होने पर यादों का पिटारा खो जाने की वेदना का स्वर है। जीवन के रंगमंच पर नाटक की समाप्ति पर पटाक्षेप के बाद सब कुछ पर्दे के पीछे खो जाता है, स्मृतियों की संपत्ति का पिटारा खोने के बाद कवि का आहत मन पूछता है: ‘मुझे क्यों?’ पर यह प्रश्न, प्रश्न बन कर ही रह जाता है, क्योंकि इसका ‘उत्तर नहीं है पास हमारे।’ व्यक्तिगत संवेदना से जुड़ी कविताओं में भीड़ में रहते हुए अकेलेपन की अनुभूति कदाचित हर उस व्यक्ति के अकेलेपन का अनुभव है जो जीवन के चतुर्थ प्रहर में सालता है। अकेलेपन के दंश को कवि ने स्वानुभूति की प्रमाणिकता से संप्रेषित किया है:
‘खड़ा हूँ अंतिम पड़ाव पर अकेला
एकाकीपन का जीवन यह
जी रहा हूँ वीराने में’
कविता पढ़ कर निराला की ‘ मैं अकेला , देखता हूँ आ रही मेरे दिवस की सांध्य बेला…’ कविता का स्मरण हो आया।
इस अकेलेपन की अनुभूति के भीतर से ही जिजीविषा करवट लेती है और कवि जैसे स्वयं को ही विश्वास दिलाता है:‘
रंग लाती है हिना
पत्थर पर
घिस जाने के बाद’
कुछ कविताओं में ब्रिटेन के प्राकृतिक परिदृश्य अंकित हैं। शीत ऋतु में सुषुप्त प्रकृति के जागने का स्वागत ‘ट्यूलिप के फूल’ संबोधन गीत में किया है। शीत ऋतु के वीराने के बाद वसंत के आगमन की सूचना देता हुआ ट्यूलिप का फूल कवि के मन में नई आशा का संचार करता है:
‘औ’ पुलक उठता है
मेरा जीवन
आगमन से तुम्हारे।’
‘फुदक उठता है मेरा नीरस जीवन’ जैसी अभिव्यक्ति अनुभव प्रसूत है, उसमें शब्दों का आडम्बर नहीं, केवल विशुद्ध, अमिश्रित आह्लाद है जिसका अनुभव शीत ऋतु के बाद प्रकृति में पहले फूल को खिलते देखकर होता है। कविता के अंत में कवि जीवन की नश्वरता की बात कर उसे दार्शनिकता का पुट देता है।
‘चिट्ठी’ शीर्षक से लिखी आठ कविताओं में कवि ने इतिहास के अध्यायों में विचरण कर इतिहास को आज की दृष्टि से देख कर पात्रों के व्यवहार के औचित्य पर प्रश्न किए हैं। प्रवासी मन की एक सार्वभौमिक चिंता अंग्रेज़ी की वरीयता के सामने अपनी मातृभाषा का धीरे-धीरे लुप्त होने वाला स्वरूप है। कुछ कविताएँ इसे रेखांकित करती हैं:
‘अपनी-अपनी भाषा पर
है सब का
जन्म सिद्ध अधिकार।
लूटो मत,जीते जी दफ़नाओ मत
निर्बल की भाषाओं को।’
अंत में कवि विश्व कल्याण की भावना से प्रेरित होकर सृष्टिकर्ता का अह्वान करता है कि वह अहं ग्रस्त मानव को ज्ञान का प्रकाश दे।
एक लंबी अवधि में लिखी कविताओं की विशेषता संवेदना की गहराई, भाव प्रवणता और विषयों की विविधता को समाहित करना है।

समीक्षक- डॉ अरुणा अजितसरिया एम बी ई, लंदन
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