“इमली का चटकारा” कहानी संग्रह की समीक्षा 3
समय के अनुसार समाज में नईनई समस्याएँ उजागर होती हैं और उन समस्याओं को कवि लेखक अपनी रचनाओं के माध्यम से जनमानस के ध्यान में लाते हैं। चाहे वे प्रेमचंद द्वारा रचितनिर्मलाहो या जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखितकामयाबीया महादेवी वर्मा द्वारा रचितयामा’—सभी में समकालीन विषयों, समस्याओं को उजागर करती हुई कहानियाँ थीं। 
इमली का चटकाराजर्मनी निवासी डॉ. योजना साह जैन द्वारा रचित उनका पहला कहानी संग्रह है जो वाक़ई कथा जगत में अपनी अमित छाप छोड़ता है इस बारह कहानियों के लघु कथासंग्रह की सभी कहानियाँ विषयवस्तु से भरपूर हैं।  ज़्यादातर कहानियाँ महिलाओं के जीवन की मूलभूत समस्याओं को उजागर करती हैं। सभी कहानियों में किसीकिसी ऐसी समस्या को चित्रित किया गया है जो आज आज़ादी के ७० से अधिक वर्षों के बाद भी समाधान की बाट जोह रही हैं। 
इमली का चटकाराको हाथ में लेते ही सर्वप्रथम तो यही समझ में आया कि संभवतः सभी कहानियाँ की केंद्र बिंदु नारी ही है, क्योंकि पुस्तक का कवर स्वयं में इतना आकर्षक आत्मव्याख्यात्मक है। अधिकतर कहानियाँ दिल को छू जाने वाली हैं, जैसे— “आंदोलनजिस में योजना ने आंदोलन के संबंध में अपने शब्दों की जो बाज़ीगरी दिखाई है वो क़ाबिलेतारीफ़ है। इतने सधे हुए शब्दों का चयन किया है इस कहानी में कि क्या कहनाइस कहानी में योजना ने आंदोलनों पर बहुत ही तीखा व्यंग्य किया है और वह हक़ीक़त भी है। ज़रा ध्यान दीजिए इन सटीक पंक्तियों पर
बहुत अच्छा है, यही तो तरीक़ा है, जब तक तलवार नहीं चलेगी, कोई लहूलुहान नहीं होगा, आग नहीं लगेगी, घर नहीं जलेंगे, किसी के सपने नहीं टूटेंगे, ग़रीबों की जान नहीं जाएगी, तब तक कैसा आंदोलन! थू!!! शांति से किया जाने वाला कोई आंदोलन होता है?” 
ऐसा कटाक्ष किया है योजना ने क‌ि जितनी भी प्रशंसा उनके शब्दों के चयन और वाक्य विन्यास की जाए, वह कम है। बहुत ही कम लघुकथाओं में यह दिखता है। इसी कहानी में ग़रीबों के सपनों की भी बड़ी सुंदर व्याख्या की है:  “पहले गाँव में बाढ़ आई थी और यहाँ लोगों के पागलपन की बाढ़, जो एक बार फिर उसका सब कुछ खा गई।
ऐसा ही दुर्लभ शब्द विन्यास हमें लगभग हर एक कहानी में पढ़ने को मिलता है चाहे आंदोलित करती हुई कहानीआंदोलनहो या एक ज़रूरत का बखान करती हुई सशक्त कहानीलेडीज बाथरूमहो।वही पुरानी चिट्ठीआज भी एक पुराने समय की व्यथा कहती प्रतीत होती है।
लेडीज़ बाथरूम’: यह झकझोर कर रख देने वाली एक सशक्त कहानी है। शीर्षक को पढ़कर ऐसा बिल्कुल नहीं लगा था कि कहानी ऐसे भी लिखी जा सकती है। दरअसल यह समस्या कहानी की नायिका कविता की ही नहीं अपितु निम्न श्रेणी में काम करने वाली हज़ारोंलाखों महिलाओं की है। लेकिन क्या इस समस्या की तरफ़ इतनी गहराई से किसी का ध्यान गया है। कहानीलेडीज़ बाथरूमयह सोचने के लिए मज़बूर कर देती है  
योजना ने समाज की इस बुराई की भर्त्सना करते हुए इतनी ख़ूबसूरती से एक कहानी के रूप में इस समस्या को चित्रित करने का अथक प्रयास किया है। वाक़ई इस बोल्ड कथ्य के लिए योजना बधाई के साथसाथ शाबाशी की हक़दार भी हैं।
तीसरी बेटीमें डॉ. योजना की प्रभावशाली लेखनी के दीदार करने का मौक़ा मिला। समाज में फैली रीतियाँकुरीतियाँ अपनी कलम से उकेरकर रखने में सक्षम रही योजना। कहानी को तीन टुकड़ों में कहने का अद्भुत प्रयास किया है। और कहानी का अंत
और इस तरह शायना, श्रेया और दीया ने दी अपने पापा को अंतिम विदाई, साथ ही दिया आख़िरी सवाल का जवाब।बिल्कुल मौन कर देने वाला है   
गर्ल चाइल्डके बहुत ही महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील विषय कोतीसरी बेटीमें समाज को लताड़ लगाती हुई योजनाकॅरियर वुमनके रोल को भी बखूबी अदा करती हुई नज़र आती हैं। 
बोल्ड महिलाओं पर एक ब्यूटीफ़ुल कहानी कहने के लिए आप बधाई के पात्र हैं योजना!
प्रतीकात्मक कहानीइमली का चटकाराके अंतिम पड़ाव में तो ज़िंदगी ही चटकारे लेती हुई प्रतीत हुई। पारिवारिक बिंब को बखूबी प्रस्तुत करने में योजना की योजना क़ाबिलेतारीफ़ है इमली का चटकारामें चटकारा कम और अंतिम चरण में एक सार्थक बग़ावत देखने चखने को मिली।
फूल की कहानी ने झकझोर कर रख दिया तोशृंखला की अधूरी कहानीको पूरा लिखने में योजना कामयाब रहीं।
येलेना माँ बनना चाहती हैएक ऐसी त्रासदी पर केंद्रित कहानी है, जिसने हिरोशिमानागासाकी की याद दिला दी। कहानी के हर एक चरण में एक सस्पेंस देखने को मिलाऔर अब आगे क्या होगाकी उत्सुकता इस कहानी में बनी रही। अंत में जीवन के नकारात्मक पहलुओं से गुज़रते हुए सकारात्मक सुखद अंत दिया गया है, जिसकी कल्पना सिर्फ़ योजना ही कर सकती हैं।
वह बुरा नहीं थाकहने के लिए योजना की कलम एक अच्छी कहानी कह गईं औरहिमालयपढ़कर तो लगा क‌ि लेखिका ने अपनी कलम ही हिमालय के हाथ में दे दी।
विल यू बी माय वैलेंटाइन?’ आज के समय को प्रदर्शित करती हुई एक अनोखी कहानी है। बेमेल ज़िंदगी को चित्रित करती हुई एक अनमोल विशेष, उत्कृष्ट, प्रभावशाली और संदेशत्मक कहानी है।सुबह का भूला अगर शाम को घर जाए तो उसे भूला नहीं कहते।कहानी की नायिका रितु ने भी ऐसा ही किया। कहानी ऐसे भी लिखी जा सकती है, इस कहानी को पढ़ने के बाद ही सोच पाई।
सभी बारह कहानियाँ एक मँजी हुए लेखिका की तरह योजना जी ने लिखी हैं। सबसे बड़ी खूबी यह रही क‌ि हर कहानी का अंत बहुत ही सकारात्मक संदेश देते हुए किया गया है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि योजना की योजना पहले सेहैपी एंडिंगकरने की ही रही होगी।
मेरे लिए तो यह योजना का एक नया परिचय था, क्योंकि अब तक मैं इन्हें केवल कवयित्री के रूप में ही जानती थी, जो विदेश में रहते हुए भी हिंदी साहित्यसेवा में प्रयासरत हैं। परंतु एक कहानीकार के रूप में योजना का यह नया रूप मेरे लिए बिल्कुल नया तो था ही, इसके साथसाथ इस कहानीसंग्रह को पढ़ने के बाद ऐसा एक बार भी नहीं लगा क‌ि यह योजना का प्रथम प्रयास है। एकदम मँजी हुई भाषा में पिरोए हुए, हर कहानी में एक नए मुद्दे को बहुत ही सधे हुए शब्दों में उकेरी हुई कहानियाँ वास्तव में बहुत ही प्रभावशाली हैं।
किसी भी व्यक्ति के लिए जीवन पर्यंत अनेक अनुभव तो होते हैं, परंतु उन अनुभवों को कहानी या कविता के रूप में सँजोकर लिखने की कला विकसित नहीं हो पाती। जो लिख पाते हैं, वास्तव में उनकी लेखनी में वह शक्ति होती है, जो कि वे समाज के किसी भी वर्ग या व्यक्ति को झकझोर कर प्रभावित किए बिना नहीं रह पाती और तभी कहा व सुना जाता है कि अमुक की लेखनी सशक्त है। मुझे लगता है क‌ि योजना की लेखनी बहुत शक्तिशाली है जिससे वे वर्तमान की अनेक समस्याओं को अपने शब्द विन्यास से कहानी, उपन्यास के रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर सकती हैं। 
डॉ. योजना को इस प्रथम लघुकथासंग्रह के लिए मेरी हार्दिक बधाई उनके निरंतर प्रगति के लिए शुभेच्छा। वे निरंतर लिखती रहें और उनकी लेखनी सदैव सशक्त रहे तथा उनकी रचनाएँ पाठकों को प्रभावित प्रेरित करती रहें।
लेखिका: डॉ. योजना साह जैन
प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन
मूल्य – २५० रुपए
समीक्षक : श्रीमती उर्वशी अग्रवाल ‘उर्वी’ (लेखिका, कवयित्री)

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