महीने भर की मेहनत के बाद आज काॅलेज का एनुअल फंक्शन समाप्त हुआ था। घर आई तो तन से ज्यादा मन थका था । सुबह हुई समीर से मुलाकात ने मेरे दिलो दिमाग को बेचैन कर रखा था।घर पहुंचते ही मैं सबसे पहले कपड़े लेकर वाशरूम में जा घुसी और देर तक ठंढ़ा पानी सर पर डालती रही पर मन का संताप कम नहीं हुआ।वाशरूम से निकलते ही मैंने बिस्तर थाम लिया। मुझे लेटे देख कर मां ने घबड़ाते हुये पूछा “ क्या बात है बिट्टो… तेरी तबीयत तो ठीक है।”
“हां..तबीयत तो ठीक है पर काफी थक गई हूं।”
ठीक है… तेरी चाय यही भिजवा देती हूं।”
कमला चाय लेकर आई तो मैंने उसे सख्ती से ताकीद कर दिया “देख कमला मां को बोल देना की मैं सो जाऊं तो मुझे खाने के लिए न जगाये।मैं बहुत थकी हुई हूं। “
“ यह क्या बात हुई दीदी….” मैं बीच में ही उसकी बात काटते हुये बोली” अब तू जा यहां से फालतू का बकवास मत कर मुझे सोने दे।”
मन में जमा भड़ास का कुछ हिस्सा कमला पर निकाल कर मैं सोने की कोशिश करने लगी पर मेरे सोने की हर कोशिश नाकामयाब हो रही थी। सुबह का वह दृश्य बार.बार आंखों के सामने आकर खड़ा हो अतीत की परते उधेड़ने लगता । कितना अप्रत्यासित था आज समीर से मेरी मुलाकात।मैं तो हतप्रभ रह गई थी जब काॅलेज के गेट पर मैं कुछ स्टाफ के साथ चीफ गेस्ट के स्वागत के लिये खड़ी थी और चीफ गेस्ट के रूप में अचानक समीर सामने आ खड़ा हुआ था। उस पर नजर पड़ते ही मैं तो स्तब्ध रह गई थी। 50 वर्ष पहले का अतीत यूं सामने आ खड़ा होगा ऐसा तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। फिर भी किसी तरह से अपने को संभालती उसे रिसीव कर स्टाफरूम की तरफ बढ़ गई थी।
वहां पहुंचते ही प्रिंसिपल मैम ने उसके स्वागत की कमान संभाल ली और मैंने राहत की सांस ली ।आस.पास हाथ बांधे खड़े लोग समीर के एक इशारे पर बिछे जा रहे थें ,पर मेरे लिये वह सर्द सुबह भी जैसे तीखी तपन में बदलने लगी थी। समीर की उपस्थिति मुझे असहज और बेचैन बना रहा था। फिर भी मैंने अपनी भावुकता पर नियंत्रण नहीं खोया। वहां से खिसकने ही वाली थी कि मैम ने मुझे इशारे से समीर को काॅफी ऑफर करने के लिये कहा तो मैं मना नहीं कर पाई।काॅफी बढ़ाते हुये बोली “सर..काॅफी..”
अभी प्रिंसिपल मैम मेरा परिचय देने ही जा रही थी कि वह बीच में ही बोल पड़ा” मैं तुम्हारे लिये सर कब से बन गया।” “जब से तुम समीर से साहब बन गए।”
हम दोनों को बाते करते सुन मैम बुरी तरह चौंक पड़ी थी “क्या आपदोनो एक.दूसरे को जानते हैं…?”
“हां. कभी काॅलेज में साथ पढ़ते थे और अच्छे दोस्त भी हुआ करते थे।”
उसने मेरे साथ अपने संबंधों को दोस्ती के दायरे में बांधते हुये बोला।
“सच! व्हाट ए प्लेजे़ंट सरप्राइज … मैडम उत्साह से भर कर बोली “पर निशा तुमने कभी बताया नहीं।”एक उदास सी हंसी मैं अपने होठों पर चिपकाए खड़ी रही पर मन ही मन सोच रही थी कि अगर पहले से मुझे पता होता कि यहां का कलेक्टर एस सक्सेना ही समीर है तो क्या मैं खुद यहां नजर आती ।
थोड़ी देर में मैम समीर का आवभगत मेरे हवाले कर और लोगों के साथ दूसरे कामों में व्यस्त हो गईं थी।जब हम दोनों अकेले रह गए तो हम दोनों के बीच सन्नाटा सा पसर गया था। शायद हम दोनो ही बातें करने के सूत्र तलाश रहे थें।
समीर को अपने इतने करीब पाकर न चाहते हुए भी मेरा मन अतीत के पन्ने पलटने लगा था।समय गुजर जाता है पर यादे वही खड़ी रह जाती है दीवार की तरह उस उम्र की गाथा बयान करने के लिए।
कभी अपनी कुशाग्रबुद्धि के कारण समीर कालेज में सबका प्यार और सम्मान पाता था तो मैं भी पढ़ाई में अच्छी होने के साथ.साथ कालेज में होने वाले हर फंक्शन की जान थी। कोई ड्रामा प्ले करना हो कोई डिबेट हो या फिर मंच पर माइक संभालना हो हर जगह मेरा वर्चस्व था।मैने अनेको ट्राफियां हासिल की और सबका प्यार और मान.सम्मान पाया।लड़के मुझसे दोस्ती करने को ललायित रहते पर मेरी दोस्ती हुई भी तो समीर से जो अक्सर मेरे आस पास मंडराते रहता फिर तो काॅलेज के हर इवेंट में हम साथ-साथ होते जिसे देख दबे स्वर में हमदोनो के प्यार के चर्चे भी होने लगे थे जिससे हमदोनो भी अनजान नहीं थें। बिना एक.दूसरे से कुछ बोले ही प्यार का शीतल बयार बह रहा था इस विश्वास के साथ कि जैसे ही उसे नौकरी मिल जायेगी शादी जैसे जीवन के अहम फैसले भी हम ले लेंगं।
वह हमारा एमएसी फाईनल ईयर का वर्ष था जब एक दिन अचानक ही पता चला कि समीर सिविल सर्विसेज की परीक्षा पास कर आईएएस ऑफिसर के लिये सेलेक्ट हो गया था।उसने इतनी ऊंची ऊड़ान भरी थी कि विश्वास करना मुश्किल हो रहा था।
इतनी बड़ी सफलता के बाद जब वह काॅलेज में आया तो सभी ने उसका शानदार स्वागत किया। कभी वह शिक्षकों के बीच होता तो कभी स्टूडेंट्स से घिरा मिलता बड़ी मुश्किल से मैं उसे बधाई दे पाई। कई दिनों तक चाह कर भी मैं उससे पलभर के लिये भी अकेले में मिल नहीं पाई और वह ट्रेनिंग में चला गया।फोन से दो-तीन बार बातें हुई भी तो औपचारिक ही। अब मुझे भविष्य के लिए उस खास बात का इंतजार था जो मैं समीर से सुनना चाहती थी । करीब छः महीने बाद वह अपने घर आया तो काॅलेज में भी सबसे मिलने आया। उस समय मैं लैबोरेट्री का काम समाप्त कर निकलने ही वाली थी। बाकी के सारे स्टूडेंट करीब-करीब जा चुके थें। तभी वहां समीर आ गया।आते ही बोला अच्छा है तुम सब कुछ ही दिनों में पोस्ट ग्रेजुएट बन जाओगे मैं तो परीक्षा ही नहीं दे पाऊंगा।”
तभी वहां से गुजरते हुए नवीन बोला “हम सब पोस्ट ग्रेजुएट कर के भी कौन सा तुम्हारी तरह तीर मार लेंगे।”
समीर जोड़ से हंसा था। उसकी हंसी में एक उद्दंडता भऱी अभिमान की बू आ रही थी जो मुझे अच्छा नहीं लगा। जब वह मेरी तरफ मुखातिब हुआ तो मैं बोेली
मेरे लिए क्या सोचते हो?
“ तुम्हारे लिए क्या सोचना है तुम अपने आप में सिंगल पीस हो।”
“ आज मैं मजाक के मूड में नहीं हूं।मेरे पापा मेरी शादी के लिए वर तलाश रहे हैं, मैं उनसे क्या कहूं ,मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है ?”मेरी बातें सुन वह थोड़ी देर चुप रहा ,फिर बोला कहीं तुम हमारी दोस्ती को प्यार तो नहीं समझ रही हो।
” वह प्यार नहीं तो और क्या था समीर ?”
“ आर यू श्योर की वह प्यार था।नो मैडम मेरे हिसाब से वह खालिस दोस्ती थी।जिसे मैं आगे भी निभाऊंगा।बस इससे ज्यादा कुछ नहीं था हमारे बीच।”
मैं ठगी सी खड़ी रह गई थी।एक अपमान की ज्वाला में मेरा रोम.रोम धधक उठा था ।ऐसा लग रहा था जैसे वहां उपस्थित सभी लोग यहां तक कि वहां का दरो-दिवार सब मेरे अपमान पर हंस रहे थे ।सब मेरा मजाक उड़ा रहे थे।मुझे आभास भी नहीं हुआ जाने कब समीर भी वहां से जा चुका था।मैं भी किसी तरह अपने को संभालती घर आ गई थी।मुझे प्रपोज करने के बदले उसके इंकार ने मुझे पूरी तरह तोड़ दिया था । उच्च पद प्राप्त करते ही उसकी सोच बदल गई थी और उसके अंदर का प्यार नदारद हो गया था। छः महीने की अवधी में ही उसे खुद के कुछ खास होने का आभास हुआ और उसकी समझ में आ गया था कि अब निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से शादी जैसे संबंध बनाना निरा नासमझी है क्योंकि उसमें कुछ ऐसा है जो हम जैसों में नहीं था।
समीर पटना से चला गया पर मुझसे मिलना भी जरूरी नहीं समझा ।यह बात सूल की तरह मुझे चुभ रही थी। पूरे हफ्ते मैं काॅलेज नहीं जा पाई। तभी एक दिन नवीन मिलने आ गया था।
“ आजकल काॅलेज क्यों नहीं आ रही हो ,कही समीर…”
मैं चुप रही ।
“अपना किमती समय और कॅरियर एक ऐसे आदमी पर क्यो निसार कर रही हो जिसे तुम्हारी परवाह ही नहीं है ।बुलंदी पर डगमगाओगी तो तत्काल नीचे आ गिरोगी तुम क्या किसी से कम हो लाखो खड़े हैं तुम्हारा इंतजार में पलक ,पांवड़े बिछाये। एक बंदा इधर भी बैठा है।इसलिए मातम छोड़ कल से कालेज आना शुरू करो।” !वह हंस कर बोला।
मेरा शक सही था उस दिन नवीन ने हमारी बातें सुन रहा था। उसने जैसे मेरे मन की बात पढ़ ली घबराओ मतए सिर्फ मुझे ही मालूम है।काश! तुम इतना निसार मुझ पर हुई होती तो सच मैं जाने क्या कर देता ,चांद-तारे तोड़ लाता या फिर ताजमहल बनवा देता।”
उसकी बातों पर मुझे हंसी आ गई। कई दिनों से बोझिल बने मेरे मन को राहत मिली। थोड़ी देर तक ईधर.उघर की बातें करने के बाद वह जाने के लिए उठते हुए बोला कल कालेज में मिलते है। दूसरे ही दिन से मैं काॅलेज जाने लगी तो घुटन की असहसनीय वेदना से काफी राहत मिली। नवीन अब काॅलेज में मेरा सबसे अच्छा दोस्त बन गया था।परीक्षा की व्यस्तता ने अतीत की प्रवंचना को काॅफी हद तक भूला दिया।एमएसी करने के बाद ही पीएचडी में मेरा रजिश्ट्रेशन हो गया और एमएसी करने के बाद नवीन को एक्साइज इंस्पेक्टर की नौकरी मिल गई। फिर वह सिविल सर्विसेज की तैयारी में जुट गया था।
मन की गति भी कितनी विचित्र होती है सबकुछ जानते हुए अभी भी मेरा दिल उसी का इंतजार कर रहा था जिसका मेरे जीवन में लौटने की अब कोई संभावना नहीं बची थी। देखते.देखते पूरे चार वर्ष गुजर गएं पर समीर ने मेरी कोई खोज ख़बर नहीं ली। उसके लौटने की हर सोच पर पूर्णविराम लग गया। समीर की स्वार्थपरता देख मेरा मन शादी से पूरी तरह उचट गया और मैंने शादी न करने का फैसला कर मजबूती के साथ अपने नये जीवन की शुरूआत की। पीएचडी करते ही पटना के एक काॅलेज में मुझे नौकरी मिल गई । मेरी नौकरी से खुश मां और पापा को अब मेरी शादी की चिंता सताते रहती।
दो वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद नवीन भी इनकम टैक्स ऑफिसर बन गया था। ट्रेंनिंग में जाने से पहले एक दिन वह मुझे फोन कर एक काॅफी हाउस में बुलाया तो मैं मना नहीं कर सकी।कॉफी का आर्डर दे वह नजरें चुराते हुए बोला “आज मैं तुम्हे वह बताने जा रहा हूं जिसे बताने की हिम्मत मैं अब तक जुटा नहीं पाया था। मैं तुमसे प्यार करता हूं , पर आज तक इसका इजहार नहीं कर पाया, क्योंकि मैं जानता था कि मेरे जैसे मामूली से लड़के के लिए तुम नहीं बनी हो ।इसलिए अपने प्यार को तुम्हारे सामने जाहिर करने की कभी हिम्मत नहीं हुई। तुम मानो या न मानो पर यह तुम्हारे प्यार का ही कमाल था कि आज मुझसा सााधारण लड़का भी इनकम टैक्स ऑफिसर बन गया । अब यही इल्तिजा है कि अगर तुम चाहो तो हमारी दोस्ती शादी में बदल सकती है। एक बात और तुम्हारा फैसला चाहे जो हो हमारी दोस्ती बरकरार रहेगी।
मुझे लगा जैसे मैं भी यही चाहती थी पर मन में उमड़ते घुमड़ते नवीन के प्यार को कभी स्वीकार नहीं कर पाई क्योंकि समीर का प्यार खामोशी के लिबास में आज भी दिल की गहराइयों को चीर रहा था । अचानक मन में बिखरे शब्द वाक्य में बदलने को बेताब हो उठा।
मेरे चेहरे पर आते जाते रंग को देखकर वह बोला कोई जल्दी नहीं है सोच कर जवाब देना।”
मैं उससे कुछ कह पाती इसके पहले ही वह ट्रेंनिंग में चला गया। तभी समीर की आवाज ने मुझे चैंका दिया, मैं तुमसे झूठ बोला था कि मैं तुम्हें प्यार नहीं करता। हमेशा अपनी झूठी शान शौकत और ऊंचे पद के अहम् में मन को मारता रहा पर इतने दिनों तक तुमसे दूर रहने के बाद अब अच्छी तरह जान गया हूं कि मैं तुम्हारे बगैर नहीं रह सकता। अब तक चाह कर भी किसी दूसरी लड़की से शादी की बात तक नहीं कर पाया । मेरे दिल दिमाग पर तुम ही छाई रही ।तुम साथ रहोगी तो मुझे कुछ नहीं चाहिए। हर हाल में तुम्हारे साथ जी लूंगा।
अपने सफलता के जुनून में जो व्यवहार मैंने तुम्हारे साथ किया उसके लिए बहुत शर्मिंदा था इसलिए तुम्हें बताने से कतराता रहा। आज तुम मिल गई हो तो लगता है शायद नियति की भी यही मर्जी है क्यों कि तुमने भी अब तक शादी नहीं की।”
मेरा चीर प्रतीक्षित प्यार अचानक मुझे इतनी आसानी से मिल जाएगा यह तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।फिर भी समीर की बातों से खुश होने के बदले मन उसके प्रति वितृष्णा से भरने लगा था।
“ तुमने यह कैसे सोच लिया कि मैं अब तक पलक पांवड़े बिछाए तुम्हारा ही इंतजार कर रही हूं कि कब तुम मेरे जीवन में लौट कर आओगे और मेरा जीवन धन्य हो जायगा।इतने बरसों में क्या तुमने कभी यह जानने की कोशिश भी की कि तुम्हारे जाने के बाद मैं किस मानसिक प्रताड़ना से गुजर रही थी।”
“कुछ देर नहीं हुआ है, जब जागो तभी सवेरा। मैं हमेशा तुम्हारी पूरी खोज-खबर रखता था।”
“मैं कर क्या रही हूं यह जानकरी तुम्हें जरूर रही होगी पर क्या तुम यह भी जान पाए थे कि जब तुम मेरे प्यार कोे ठोकर मार मेरे जीवन से पलायन कर गये,मैं किस तरह टूट कर बिखर गई थी।यह जानते हुए भी कि अब तुम नहीं लौटोगे फिर भी मेरा तृष्णातुर मन चातक पंक्षी सा पल-पल तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था। मैं डिप्रेशन में जाने लगी थी।लोगों के तरह.तरह के व्यंग्यबाण मुझे आहत कर रहें थे। तब एक सच्चे दोस्त की तरह नवीन मेरे साथ आ खड़ा हुआ था।वह नवीन ही था जिसके कारण मैं आज कुछ बन पाई।
यह जानते हुए भी कि मैं तुमसे प्यार करती थी फिर भी उसने हर कदम पर मेरा साथ दिया।जीवन के सब कठिन दौर में उसने मुझे कभी अकेला नहीं पड़ने दिया।क्यों कि वह मुझे इस दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करता है ।मेरा दिल भी आज उसी के लिए धड़कता है,उस बेगैरत इंसान के लिए नहीं जो जीवन के सबसे नाजुक मोड़ पर मुझे अकेला कर गया था। शादी की बात तो दूर अब तुमसे दोस्त भी गवारा नहीं है क्यों कि दोस्ती के लिए भी आपस में प्यार और विश्वास का होना बहुत जरूरी है।”
“ नासमझ मत बनो इस शादी से तुम सुखी नहीं रह पाओगी, जो कहना है कह लो,जितनी गालियां देनी है दे लो पर मुझे ठुकरा कर मत जाओ मैं तुम्हारे बिना बिल्कुल अकेला हूं , बेसहारा हूं, सच पूछो तो कुछ भी नहीं हूं।”
उसने व्यग्रता से उसका हाथ थाम लिया। वह झटके से हाथ छुराते हुए बोली, “ जब कोई लड़की एक बार किसी को अपना पति चुन लेती है तो अपने रास्ते पर चलने के लिए अडिग रहती है । कोई प्रलोभन उसे अपने रास्ते से टस से मस नहीं कर सकता ।अब मेरे तेरे प्यार की बात नहीं रही। अब तो यह मेरे और नवीन के प्यार और मान सम्मान की बात बन गई है। तुम तो उसी दिन मेरे दिल से निकल गए थे जब तुमने अपने पद प्रतिष्ठा के सामने मुझे हल्का कर दिया था। बस अब मैं यही कहूंगी कि तू अपने स्तर की लड़की चुनकर शादी कर लो और खुश रहो।”
मैं अब और वहां नहीं रुक सकती थी। उठकर कमरे से बाहर जाने लगी तो पत्थर की तरह खड़ा वह मुझे जाते हुए देखता रहा।तभी प्रिंसिपल मैम आकर स्टेज पर दीप प्रज्वलित करने के लिए समीर को ले गई। दीप प्रज्वलन और उसके एक छोटे से भाषण के बाद जब प्रोग्राम शुरू हुआ ।कोई जरूरी काम आ जाने के कारण वहां से वह चला गया और मैंने चैन की सांस ली । प्रोग्राम समाप्त होते ही मैंने भी घर का रुख किया।
जब से मैं काॅलेज से लौटी थी मन में भले ही उथल-पुथल मची थी, पर मन को एक अजीब सा सुकून मिल रहा था।प्यार के बदले मिले अपमान की ज्वाला बुझ गई थी। तभी एक कोमल स्पर्श ने मुझे चैंका दिया ,मां थी ।मां भी क्या चीज होती है ,बच्चों के मन की बात भी बड़ी आसानी से पढ़ लेती है।मैंने उनके गोद में सर रख दिया।सारी उलझन जैसे सुलझ गए और जाने कब मुझे नींद आ गई।दूसरे दिन काॅलेज में छुट्टी थी।मैं देर तक सोती रही उठी तो सबसे पहले नवीन को फोन लगाया। उधर से आवाज आई “ आज सुबह-सुबह मैं कैसे याद आ गया।”
“अब मैं यह कहने में देर नहीं करना चाहती कि मैं तुमसे प्यार करती हूं और तुम्हारे साथ जीवन बिताना चाहती हूं इसलिए कृपया दर्शन दीजिए।”
“आपने इस सत्य को स्वीकार करने में विलंब करने की सारी सीमा लांघ दी मैडम, फिर भी मैं दरवाजे पर ही खडा हूं दरवाजा तो खोलिए।”
मेरे दरवाजा खोलते ही नवीन के साथ एक ठंडी बयार का झोंका हम दोनो को स्पर्श करता निकल गया जैसे एहसास दिला रहा हो कि यह मिलन ही हमारी नैसर्गिक नियति थी।
- रीता कुमारी
लगभग 24 वर्षों से लेखन से जुड़ी हुई हैं। साहित्य के विभिन्न विधाओं कहानी, कविता, लेख ,हास्य व्यंग्य आदि में लेखन, तीन कहानी संग्रह 1)अंतिम गुजारिश 2)पूर्ण विराम से आगे और 3) प्रेम प्रवंचना, एवृं एक उपन्यास” एक सफर अधूरा सा ..प्रकाशित।
पता– नाम- रीता कुमारी, c/o श्री एस के श्रीवास्तव ,
D-111,पी सी काॅलोनी, कंकड़बाग, पटना, (बिहार) -800020
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