Wednesday, May 22, 2024
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डॉ रेनू सिंह की दो लघुकथाएँ

1- माँ का प्रतिशोध                                                   
पीछे वाले भीटा पर शाम होते वे झुंड के झुंड  मांद से निकलते  खपरैल ,भुसैला के आस -पास दिखायी पड़ जाते थे।इनकी हुंआं , हुंआं रात भर सुनाई देती रहती ।
भूरिया ने सूँघ-साँघ  कर,जाँच-परख कर उसी भुसैला के कोने में बच्चों को जन्म दे दिया। पता तब चला जब, बच्चों की कुकुआहट सुन जाकर देखा तो भुरिया अपने पाँच बच्चों को समेटे बैठी पूँछ हिला रही थी। उसे दूध-रोटी लाकर दिया, वह भूखी थी, उसने जल्दी-जल्दी सब खा लिया।
भूरिया जब भूखी होती तभी थोड़ी देर के लिए बच्चों को छोड़ बाहर निकलती थी।
बच्चों की गंध सियारिन के नथुने तक पहुँच रही थी। वह बस घात लगाये बैठी रहती।
ज्यों ही भूरिया, भुसैला से बाहर आती, उसका एक बच्चा कम हो जाता।
कितनी ही बार भूरिया को भाग कर माँद की तरफ  जाते देखा गया।
आखिर एक दिन भूरिया बिना बच्चे के हो गयी।उसके सभी बच्चे खो गये।
वो  कूँ कुऊँ  रोती, भीटा के मांद तक पहुँच गयी थी।
भूरिया उदास बैठी रहती, उसकी छातियों से दूध टपकता रहता।
एक रोज़ भूरिया मुँह में सियार का बच्चा दबा कर सबके सामने दरवाजे पर रख दिया। बच्चा मर गया था, निश्चय ही भूरिया ने ही मारा था।
अगले दिन फिर वह माँद के पास देखी गयी। उसदिन भी वो एक बच्चा दबा लायी थी।
उसने सियारिन के सारे बच्चे उठा लिये थे। उसका प्रतिशोध पूरा हो गया था।
अब सियारिन बिना बच्चे के छटपटाती हुँआं-हुँआं कर बेचैन थी।
2 – अम्मी
शगुफ़्ता  परसों ही तो तीसरे बेटे की माँ बनी है। घर पर ही रूबीना  आ गई थी मदद के लिये। कल उसी ने शाहिद और वाहिद को अपने घर ले जाकर  खाना खिला दिया  साथ ही दो खुराक  खाना दे गई थी।
शगुफ़्ता  से  रुबीना ने कहा था  कि कुछ नही तो थोड़ा गुड़ और सोठ पका कर खा लेना ,।जमील दुकान से आते वक्त सोंठ और गुड़ ले आया था। सुबह हमेशा की तरह खाना पका लिया, साथ ही गुड़ सोठ भी। जमील दुकान चला गया था। बच्चे भी बाहर खेल रहे थे।
शगुफ़्ता नवजात बच्चे के साथ लेटी थी।
अचानक माैसम बदला, दिन में ही  रात सा अँधेरा  होने लगा। थोड़ी ही देर में बहुत ज़ोर की बारिश होने लगी, मानों बादल फट पड़े हों। दोनों बच्चे भाग कर अंदर आ गये।
दरवाज़े से दस कदम की दूरी पर ही नाला है, जो अभी हाल ही चाैड़ा, गहरा और पक्का हुआ है, वह उफन कर बह रहा था।
बारिश थम गई, बच्चे फिर बाहर चले गये। थोडी़ देर बाद ही शाहिद माँ को ज़ोर-ज़ोर से पुकारने लगा। शगुफ़्ता जब उठ कर बाहर देखने गई तो घबराए शाहिद ने नाले की तरफ इशारा कर बोला, वाहिद। शगुफ़्ता को समझते देर न लगी दाैड़ पड़ी नाले के बहाव की तरफ़। बेतहाशा उफनता हुआ नाला, किनारे बदहवास भागती शगुफ़्ता। उँगलियां दिख गई शगुफ़्ता को। आगे बढ़कर छलाँग लगा दी, दोनों हाथ फैला चट्टान सी बन गई उस तेज बहाव में, वाहिद उसकी पकड़ मे था। लोग भी किनारे आ चुके थे। शगुफ़्ता  ने वाहिद को उन्हें थमाया फिर ख़ुद लोगो की मदद से बाहर निकली। वाहिद अचेत था; लोग उसे डाक्टर के पास ले गये, शगुफ़्ता  भागती हुई घर आई। नहा कर कपड़े पहने काँप रही थी वो। नन्हा शिशु रो रहा था भूख लग गई थी उसे ।
डॉ रेनू सिंह
ग्रेटर नोएडा,गौतमबुद्ध नगर 
उच्च-शिक्षा-इलाहाबाद-विश्वविद्यालय,प्रयागराज , बी.ए,एम.ए,(दर्शनशास्त्र) पी एच. डी. (विषय-रवींद्र नाथ टैगोर एवं मानवेन्द्र नाथ राय का मानवतावाद)
संगीत -प्रभाकर ,प्रयाग संगीत समिति
अध्यापन -कार्य  ( स्वतः निवृत्ति)
स्वतंत्र लेखन
विधा-कहानी, लघुकथा,कविता ,संस्मरण,एवम लेख    
प्रकाशित -पुस्तक- एकल   संग्रह  ‘ह्रस्व से दीर्घ तक(एक लघुकथा-यात्रा)’  व कविता -‘ ड्योढी के पार ‘ 
ई मेल- 70@.
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1 टिप्पणी

  1. आपकी दोनों ही लघु कथाएँ पढ़ीं रेणू जी! प्रसंग मदर्स डे का है तो पहली कहानी,”माँ का प्रतिशोध “के विषय में तो यही कहेंगे कि माँ तो फिर माँ ही है, चाहे वह जानवर की ही क्यों ना हो,पक्षियों की हो, चाहे किसी की भी हो। चींटी भी अपने अंडे को लेकर चलती है और उसकी सुरक्षा का ध्यान रखती है।
    दूसरी लघु कथा में गरीबी व लाचारी के दर्द की अपनी व्यथा कथा महसूस हुई।माँ तो फिर माँ ही है।
    इस लघु कथा में एक बात खटकी।दरवाजे से 10 कदम दूर नाला…. दस कदम कुछ ज्यादा ही पास नहीं हो गया?
    “घर से नाला बहुत पास था” हमारे ख्याल से यह लिखना पर्याप्त था!
    वैसे आपकी रचना है आप जैसा उचित समझेंं।
    अच्छे लघु कथाएँ हैं, बधाई आपको।

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