Sunday, July 21, 2024
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यशोधरा भटनागर की तीन लघुकथाएँ

1 – कम्मो
काली घटाओं का घटाटोप, उमड़ते- घुमड़ते बादलों का हृदय-कंपित स्वर । माटी की सौंधी गंध ,बूंदों का संगीत और बूंदों के मृदु प्रहार से नर्तन करते हरित पत्र! ज्येष्ठ जेता गुलमोहर के रक्तिम पुष्पों का जल बूंदों संग झरना! सूखे चरमराते पत्तों का डाल विलग हो,अँगना में बतियाना ! सामने पेड़ की शाख पर गीले पंख सुखाती,फुदकती पीली चोंच वाली काली चिड़िया। अहा ! वर्षा का आगमन ! वर्षा ऋतु का  मंगलकारी ! शुभ सूचक आगमन !
शीघ्र ही पकौड़ों की सुगंध वातावरण में रच-बस गई और नथुनों के रास्ते उतर जिह्वा को रससिक्त कर गई। यही तो सरस आनंद है ।आनंद  हृदयोदधि को प्लावित कर,अधरों पर पसर गया। टप्प-टप्प…टप…टपा-टप्प तीव्रता बढ़ती गई।
 लॉन में बढ़ता पानी का स्तर लघु पोखर का आकार ले रहा था।कागज की छोटी -छोटी नावों पर सवार  हो सद्य: जन्मे पोखर की यात्रा कर झूम उठी।
      बरसते पानी में भीगते- थिरकते,तन- मन भीग गया। तभी बर्तनों की ‘छन्न ‘की आवाज से जमीन पर लौटा लाई।
    कम्मो बर्तन साफ कर रही थी। ‘”जल्दी आ ,बाहर कितना मज़ा आ रहा है ।चल  चाय बना ला.., पोर्च में बैठ कर पिएँगे और हाँ साथ में…।” मैं बोलती चली जा रही थी प्रत्युत्तर में कम्मो चाय लेकर आ गई।
 ”घरों की छतों से झरने बन गिरता पानी कितना अच्छा लग रहा है ? अब गर्मी से थोड़ी राहत मिलेगी । देख पेड़ -पौधे कितने हरे और खुश लग रहे हैं !”
     “मैडम जी मैं घर जाऊँ ?”
 “थोड़ी देर रुक जा ।”
“मैडम जी घर में पानी भर गया होगा।अभी अपने झोपड़े को बरसाती  कहाँ पहराई है? छोरी खाना कैसे बनाएगी ?लकड़ी भी गीली हो गई होगी..चूल्हा कैसे जलेगा ?”
 “अच्छा चाय तो पीकर जा।”
वर्षा की झरती बूंदों के साथ एक-एक घूँट को कंठ में उतारते मैं पावस की पहली झड़ी का आनंद ले रही थी पर कम्मो पूरी चाय एक घूँट गटक गई। उसकी इस उद्विग्नता से मैं भी कुछ परेशान हो गई और मेरा मन कम्मो के साथ हो लिया। सामने ही बनी झोंपड़ियों में एक झोंपड़ी कम्मो की भी है।
     सिर पर दुपट्टा डाल,आप ही आप व्यथा कथा गुनती -गुनाती,चली जा रही थी। झोपड़ी के बाहर ही बिन वसन रमुआ पानी में छपा-छप्प नाच रहा था।किसको ढके ? झोपड़ी या रमुआ? उसकी मुठ्ठी भिंच गई।मुठ्ठी में कसा पसीने से गंधाता नोट तिलमिला गया। उसकी श्वास घुटती गई।सामर्थ्यहीन वह नतशिर चुपचाप झरती बूंदों संग टसकता रहा।
 कम्मो गीली -सूखी लकड़ियों को सुलगाने लगी।झोपड़ी में धुआं ही धुआं भर गया..और पावस संग उसकी आँखें भी झरने लगी।
कम्मो का चूल्हा भी बूंदों की मार संग जलता-बुझता रहा…।छन्न-छन्न, भक्क-भक्क…।
2 – एलबम
बेचैनी और घबराहट भरी खाली-खाली रात के बाद सुबह आई, अलसाई सुबह …।किसी काम में मन नहीं लग रहा था ..।बेमन से ही अपनी दिनचर्या को निभाती हुई बगीचे में लाल गुलाब ,मोगरा,हरी- हरी दूब से दो बातें करने चल दीं।जल बिंदु पुष्प पंखुड़ियों पर ,हरी दूब पर दमकने लगे ..हवा के हल्के से झोंके के साथ मन भी बहने लगा…कमर में खोंसा हुआ मोबाइल निकाल कर,चश्मा ठीक करके एक बार फिर देखा कि कोई फोन तो नहीं ….।सामने गुलमोहर पर बुलबुल अपने बच्चों को उड़ना सिखा रही थी… वे एकटक देखने लगीं…और विचारों की एक लंबी कड़ी जुड़ गई… विचार श्रृंखला में उलझा मन ।तभी गेट बजा..जरूर ‘भूरी’ होगी। तंद्रा टूटी ,विचारों का ताना- बाना विच्छिन्न हो गया ।
    अपने सींगों से गेट टनटना देती है । बिना नागा इसी समय रोटी लेने आती है यह ‘ भूरो ‘,अपने भूरे रंग से गोमाता ने यह संज्ञा पा ली थी । भूरो के पीछे- पीछे टामी भी जूली और चार बच्चों के साथ दुम हिलाते हुए पहुँच गया ।सुमी रसोई घर की ओर चल दीं।रात को ही अपनी दो रोटियों के साथ भूरो और श्वान परिवार के लिए भी रोटियाँ बना कर रख लेती हैं ।
    भूरो के सिर पर हाथ फेर ,टामी को पुचकार वे कमरे में आराम कुर्सी पर बैठ गईं..।चाय ठंडी हो गई थी …दो घूंट में गटक  लिया ..फिर मोबाइल उठा कर उसमें झांका ,कोई मिस्ड काल तो नहीं ? यूँ भी कोई कॉल मिस न हो जाए ,वे रात भर सोईं ही कहाँ ?
  नाश्ता तो बनाना ही होगा, ब्लड प्रेशर की टेबलेट जो लेनी है।उदासीनता ओढ़े हुए, बेसन का घोल तैयार कर, तवे पर दो चीले बना लिए।
इससे जल्दी और सुगमता से शायद और कुछ नहीं बन सकता था। साथ ही अदरक वाली चाय भी चढ़ा ली ।वे कभी भी चाय के बिना नाश्ता नहीं करती थी। इसी बीच फिर मोबाइल में झाँक आईं।
      पहले तो मोबाइल फोन अपने संग ही सहेजे रहती थीं , पर जब से बड़ी ने समझाया तो….। शायद मोबाइल खराब हो गया है…। ऐसा तो  हो ही नहीं सकता कि मेरे चारों बच्चों में से किसी ने भी अपनी माँ को फोन न किया हो…।
      पति के गुजर जाने के बाद बड़े-बड़े चार कमरों वाले घर में सुमी अकेली ही रहती थी। अड़ोसी-पड़ोसी दादी की खोज खबर लेते रहते थे ।उनके अपने सरल -मृदु स्वभाव के कारण वे मोहल्ले भर.की ‘दादी’, ‘अम्मा’ ,आंटी बन गईं थीं। उनकी अपनी बिटिया की उम्र की रेणु के लिए आंटी से माँ हो गईं थीं….।                 फिर भी अपनी संतान को क्षण भर भी नहीं विचार पाती बेटियाँ तो पराई होती हैं, परवश हैं …।अपना घर परिवार छोड़कर बार- बार मायके कैसे आ सकती थी बड़ी भी और छोटी दोनों समझाती हैं …दिन में दो- तीन बार फोन पर बात कर लेतीे हैं पर यह मुआ शनिवार – इतवार काम ज्यादा होता है न ,नौकरी वाली हैं दोनों …एक  इतवार ही तो मिलता है उसमें भी ढेरों काम और सब की ढेरों फरमाइश है पूरी करने में ……।
   बेटे से बात की थी आठ दिन हो गए …. खाली मन और खाली हो गया। शायद पूरी तरह उलट कर देता हो गया ।
    चाय के साथ नाश्ता गटक कर , पुरानी भूरे कवर और काले पन्नों वाली एलबम लेकर बैठ गए पहला …दूसरा.. तीसरा पृष्ठ… चारों बच्चे उनके साथ उन्हें घेरे हुए बैठे थे और ‘छोटी ‘तो गोद में ही थी बड़ा गले में बाहें डाले खड़ा था, तुनकमिजाज ‘बड़ी ‘दाहिनी ओर मुँह फुलाए बैठी थी गोलमटोल ‘छोटा ‘बलपूर्वक माँ की गोद में आने की कोशिश में थोड़ी सी जगह में है संतुष्टि पा गया था । एक मुस्कुराहट के साथ उन्होंने अपना चश्मा उतार कर साफ किया…. और निगाह झाड़ू-पोछा लगाती गुड्डो पर टिक गईं, पिछले पाँच बरस से यही सारा काम संभाल रही है पर उन्होंने उसे नौकरानी कभी न समझा। धीरे से बोली -”बेटा मेरे साथ कॉम्लेक्स चल न! मेरा मोबाइल ठीक कराना है। देख न कोई फोन ही नहीं आता इसमें।”
3 – भरी गगरिया चुपके जाय
कई दिनों की झड़ी के बाद सुबह की उजरी धूप में  बरामदे में बैठ चाय की चुस्कियों संग पेपर पढ़ना भला लग रहा था।
   “ओम् सूर्यास्त नम:,ओम् भास्कराय नमः…।” के स्वर से ध्यान सामने वाली छत की ओर गया। बाबूजी सूर्य देव को अर्घ्य दे रहे थे। सूर्योपासना कर, उन्होंने तुलसा जी को जल चढ़ाया। फिर मिट्टी के सकोरों को जल से भर दिया।
“गुटर गूं…गुटर गूं “मेरी दृष्टि बाबूजी के इर्दगिर्द इकट्ठे हो आए कबूतरों के झुंड की ओर गई।
“हाँ मेरे दोस्तों कैसे हो?दाना चाहिए?”
और बाबूजी जी ने दोनों हाथों से छत पर दाने उछाल दिए। ऊँची गर्दन किए कबूतर गुटर गूं करते मटके रहे थे। कबूतरों से बातें कर , कुछ ही देर में बाबूजी कंधे पर कपड़े का झोला टाँगें नीचे सड़क पर खड़े थे।
सड़क के श्वान पूँछ हिलाते कूंऽऽ कूंऽऽ के स्वर के साथ उनके पास आ गए। बाबूजी ने बड़े प्यार से उन्हें रोटियाँ खिलाईं।
“भूरे अब कैसे हो?और टॉमी तुम?तुम्हारा पैर कैसा है?”
प्रत्युत्तर में श्वानों की पूँछ तेजी से हिलने लगी और कूंऽऽ कूंऽऽ करते बाबूजी के पैरों के पास बैठ गए।
श्वानों को पुचकार बाबूजी तेज कदमों से सैर को चल दिए।उनका हाथ फिर झोले में गया और कुछ बीज सड़क किनारे हवा में उछाल दिए।
स्कूल में पढ़ा था “भरी गगरिया चुपके जाय।”
बाबूजी के आसपास कोई फोटोग्राफर नहीं था।
यशोधरा भटनागर
152, अलकापुरी
देवास
मध्यप्रदेश
455001
फोन नंबर-9425306554
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