होम लघुकथा बिम्मी कुँवर सिंह की लघुकथा – अपशगुनी

बिम्मी कुँवर सिंह की लघुकथा – अपशगुनी

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“अरे हट दूर हट…जब ना देखा तबे जतरे पे खड़ी होए जात हईन ,देखत ना हऊ बाबू सकूल जात हऐन “
आँख फाड़ चिल्ला के बोली माया की अम्मा ..
हर रोज के ताने उलाहने से अब वो भयभीत रहने लगी और पहले से ही सचेत हो जाती थी कि रास्ते से कब हटना है कब छुपना है। घर में फल मेवा मिठाई दूध दही सबसे पहले उसके भाई के आगे रख दिया जाता था, वो पहले जी भर के खा लेता फिर जाकर थोड़ा बहुत  माया के हाथ पर भी रख दिया जाता था,  वो अब इसको अपनी नियति मान उसी में  खुश रहती थी।
लोग बाग बताते है कि जब माया पैदा हुई थी तब घंटे भर में ही उसकी माँ चल बसी और उसी साल सूखा पड़ने की वजह से गेहूँ की काफी फसल बरबाद हो गयी थी, तब से ही गांव घर के लोग उसे अपशगुनी  मानने लगे थे। उसको देख गांव के बुजुर्ग अक्सर रास्ता बदलने लगते थे।
माया की दूसरी माँ जब ब्याह कर के आयी तो उसकी आजी(दादी ) उसे कुछ दिनो के लिए उसके ननिहाल भेज दी थी ताकि नयी बहुरिया पर माया की बुरी छाया ना पड़े। जब जब दूसरी माँ को बच्चा होने को होता माया को उसके ननिहाल पहुंचा दिया जाता फिर भी तीन बच्चे हुए तीनों बच ना पायें और जब यह भाई हुआ तब माया अपनी दूसरी माँ के ही पास थी।
सुबह सबेरे जब दिशा मैदान से लौट बाबूजी दरवाजा खटखटाते तो डर के मारे माया दरवाजे के ओट में छुप जाती थी, यदि गलती से कभी वो सुबह बाबूजी के सामने पड़ जाती थी तो सुबह की शुरुआत हिकारत और गालियो से ही होती थी ।
दिन बीतता गया, माया का भाई  पढ़ने शहर चला गया और माया की शादी सोलह साल की उमर में ही रेल के कर्मचारी से कर दिया गया । माया का पति समझदार था,उसने माया को आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और होशियार माया बीए, बीएड करके स्कूल में टीचर की नौकरी पा गयी,  इतने सालों में वो अपने मायके एकाध बार ही गयी होगी।
एक दिन स्कूल के बाहर गांव के मुखिया जी माया से मिल गये, हालचाल पूछते पूछते माया अपने अम्मा और बाबूजी के बारे में पूछ बैठी ।
उदास होकर मुखिया जी बोले –
“अरे बिटिया बहुते कष्ट में हएन तोहरे अम्मा बाबू, खेत बधारी तौ तोहरे भाई के पढ़ावे अऊर नौकरी लगावे में बिकाए गए ,अब तौ पइसा पइसा के मोहताज होए गएन दूनो जने, ओहू पर तोहरे बाबू जी चीनी के रोगी, काव कहि तोहर भयवो अपने भीरी रखे से मना कर दिहिस, शाईद ओहकर मेहरी रखे बदे राजी नाहिन हौ “
माया यह सुनकर व्यथित हो गयी और घर आकर सारी बात अपने पति को बताई ।  पति की इजाजत से दोपहर की बस से ही वो मुखिया जी के साथ अपने गाँव चली गयी, उसके आने का प्रयोजन जान उसके बाबूजी की आँखें दुख और अपराध से छलक उठी, कलेजे में एक अजीब सी टीस उठी कि अपनी ही औलाद के साथ कितना दुर्व्यवहार किया मैने, आज उसकी मां को समझ आया कि जिस बेटे के लिए  शुरू से जतरा और पतरा बनाती रही वो ही दगा दे गया और बचपन से ही जिसको अपशगुनी समझ दुत्कारते रहे आज वो ही उनके बुढ़ापा का सहारा बन कर आ गयी।
पहले तो उसके माता पिता साथ जाने से इन्कार किये परन्तु एक दो दिन रूक कर माया ने समझा बुझा कर अम्मा बाबूजी को अपने साथ लेकर शहर आने लगी, तभी पीछे से गांव की बुजुर्ग रामजी चाची की आवाज आयी-
” जा चली जा जमेजर तोहर अऊर तोहरे मेहरारू के बुढ़ापा के नैया इ “अपशगुनी बेटी” पार कर दीही “
हिन्दी भोजपुरी लेखिका. अब तक अनेको गीत, गजल, कविता और कहानियां दैनिक जागरण, साहित्य सरिता, साहित्य ऋचा, आखर और अमर उजाला मे छप चुकी है। साझां काव्य संग्रह " हाँँ! कायम हूँ मै" मे दो गजल छप चुकी है. संपर्क - sanjaybimmi@gmail.com

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