लाजपत राय गर्ग की लघुकथा - जो उचित समझा 1
  • लाजपत राय गर्ग

आम दिनों की बजाय मनोहर ज़ल्दी तैयार हो गया और नाश्ता किये बिना घर से बाहर जाने लगा तो उसकी पत्नी अर्पणा ने पूछा -‘बिना नाश्ता किये इतनी ज़ल्दी कहां जा रहे हो?’
‘मैं एक बार ‘आश्रम’  तक हो आऊं, आकर नाश्ता करूंगा।’
‘ऐसी भी क्या जल्दी है? नाश्ता तैयार है, कर लो। वहां से आते हुए लेट हो जाओगे।’
‘वहां से फोन आया था। कारण तो नहीं बताया, किन्तु जल्दी पहुंचने के लिये कहा है। एक बार हो आऊं। देखूं, क्या बात है?’
और मनोहर घर से चल पड़ा। उसके घर से ‘मिलजुल कर बितायें जीवन की संध्या आश्रम’ आधे घंटे की ड्राइव की दूरी पर एकान्त रमणीय वातावरण में बना हुआ है। ‘आश्रम’ में पहुंच कर वह सीधा ‘केयरटेकर’ जगदीश से मिला और उससे फोन करने का कारण पूछा।
जगदीश -‘सर, आपकी माता जी ने  ‘आश्रम’ के नियमों की उल्लंघना करते हुए कल रात बुजुर्ग सीताराम जी के कमरे में बिताई। मैंने यह बात अधिकारी के नोटिस में लाने से पूर्व आपको बताई है ताकि आप माता जी से बात करके उन्हें समझा दें।’
 ‘इस समय मां कहां हैं?’
‘इस समय तो अपने कमरे में हैं। रात को चौकीदार ने देखा कि आपकी माता जी अपने कमरे में नहीं हैं तो उसने मुझे जगा कर बताया। उस समय तीन-साढ़े तीन बजे होंगे। मैं उठकर गया। देखा तो माता जी सीताराम जी के कमरे में कुर्सी पर आधी नींद की अवस्था में बैठी थीं। मैंने उनसे कारण पूछा तो कहने लगीं -‘इनकी तबीयत कई दिनों से ठीक नहीं चल रही है। शाम को डॉक्टर ने देखकर दवाई दी थी और कहा था कि रात को इनके पास किसी-न-किसी आदमी को ज़रूर रहना चाहिये। दिन में तो मैं इनकी देखभाल कई दिनों से कर रही हूं, लेकिन आज  डॉक्टर के कहने पर मैंने खुद रात को इनके कमरे में रुकने का सोच लिया जबकि इन्होंने तो मना किया था।’
मनोहर -‘जगदीश जी, मां ने तो मानवता का धर्म निभाते हुए ऐसा किया, उन्होंने कुछ अनुचित काम तो नहीं किया।’
‘आपकी बात तो ठीक है, किन्तु ‘आश्रम’ के नियमों के अनुसार कोई भी महिला पुरुष के कमरे में रात को नहीं रुक सकती जब तक कि वे पति-पत्नी ने हों। आप माता जी को समझायें कि ऐसा दुबारा न हो, वरना मुझे कार्यकारी अधिकारी को बताना पड़ेगा।’
‘मैं मां से बात करता हूं।’
मनोहर की मां नहा-धोकर पूजा की तैयारी कर रही थी। मनोहर को देखकर रुक गई। मनोहर ने उन्हें प्रणाम किया, कुशलक्षेम पूछा। उन्होंने जवाब दिया – ‘मैं तो ठीक हूं। तू सुना, घर में सब ठीक हैं?’
‘घर में सब कुशलमंगल है। जगदीश ने मुझे बुलाया है। वह कह रहा है कि आप रात को सीताराम के कमरे में थीं।’
‘तो क्या हुआ? वे बीमार हैं। डाॅक्टर ने कहा था कि रात को उनके पास एक आदमी रहना चाहिये। अब उनका तो ऐसा कोई सगा-संबंधी है नहीं, जिसे बुलाया जा सकता। जब तक वे ठीक नहीं होते, मैं उनकी सेवा से मुंह नहीं मोड़ सकती।’
‘लेकिन मां, यह यहां के नियमों के विरुद्ध है। अगर तुम न मानी तो ‘आश्रम’ वाले तुम्हें यहां रहने नहीं देंगे।’
‘अगर ‘आश्रम’ वाले मुझे यहां से निकालते हैं तो मैं किसी मन्दिर-धर्मशाला में चली जाऊंगी, क्योंकि घर में तो मेरे लिये जगह पहले से ही नहीं है। जब तक यहां हूं और सीताराम जी बीमार हैं, मैं उनकी सेवा से पीछे नहीं हटूंगी।’ मनोहर सिर झुकाये बिना कुछ कहे कमरे से बाहर आ गया।

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