होम लघुकथा संगीता सिंह की लघुकथा – जिंदगी का व्यवसाय

संगीता सिंह की लघुकथा – जिंदगी का व्यवसाय

0
110
डॉक्टर साहिबा मेरी पत्नी बहुत देर से दर्द से कराह रही है आप उसे जल्दी देख लेंगी तो मेहरबानी होगी आपकी। 
डॉक्टर- सिस्टर सिस्टर ….
कौन है ये आदमी इसको अंदर किसने आने दिया ।
क्या परेशानी है इसकी वाइफ को,
सिस्टर- कुछ नहीं मैडम बस लिवर पेन हो रहे हैं,पता नहीं कैसे ये अंदर आ गया, चलो भइया बाहर निकलो..
मैडम अभी पेशेंट देख रही हैं, लेकिन.. मैडम मेरी बीबी चौबीस घंटे से कराह रही है अल्ट्रासाउंड में बच्चे को आड़ा बताया है आपसे एक विनती है मैडम जरा पेट पर हाथ रख कर देख लेती तो पता चल जाता सब ठीक तो है ।
अरे डॉक्टर तुम हो कि हम..
सब ठीक है अभी बच्चेदानी का मुंह नहीं खुला है 
एक घंटे बाद दिखा देना मैडम को
ठीक है सिस्टर..
ओ…मां….ओ.मां….दर्द से तड़पती पत्नी की आवाज सुनकर चंदन का कलेजा फटा जा रहा था।
वह बेचैन सा इधर उधर घूम रहा था, घड़ी की सुई भी इतने धीरे कभी न चली जितनी आज..
क्या करे ? कहाँ जाए? कुछ समझ नहीं आ रहा था। सरकारी अस्पताल में तो ऐसे ही सुनवाई होती है उन्हें क्या करना मरीज मरे या जिये… 
सैलरी तो उनको सरकार देती है, चंदन को बुरे बुरे ख़्याल आ रहे थे, लेकिन…..मजबूरी।
यही मैं रमा को किसी प्राइवेट अस्पताल ले गया होता तो अभी तक रमा को बच्चा हो जाता ।
पर कैसे जाता प्राइवेट अस्पताल में सीधे पचास हजार का खर्च आएगा मेरे पास तो अभी पांच हजार भी नहीं है।
एक घंटा होते ही चंदन फ़िर सिस्टर के पास पहुँच गया सिस्टर सिस्टर….
सिस्टर और कुछ वार्ड बॉय लड़के आपस में हँसी ठिठोली कर रहे थे, चंदन को देख उनकी बातों जैसे खलल पड़ गया । सिस्टर भौंह सिकोड़कर बोली…
क्या है इतनी फ़िक्र है तो अपनी पत्नी की तो बच्चा पैदा ही क्यों कर रहे हो 
क्या हो गया है इंसानों को बच्चे भी चाहिए और कष्ट भी न उठाने पड़े वाह रे वाह..
सिस्टर बड़े कष्ट के साथ उठती है चलो ..देखती हूँ 
थोड़ा देर देखा और बोली अभी तो समय है होने दो दर्द तभी तो मुँह खुलेगा बच्चेदानी का…
चंदन मायूस हो रहा था, पूरे तीस घंटे हो चुके हैं और कोई भी देखने नहीं आया रमा को।
बस!! अब और नहीं,  कुछ भी हो जाये….पर अब यहाँ और नहीं। सुबह से देख रहा हूँ  कितनी ही लाशें जिनको यूँही लावारिस कचड़े की तरह फेंक दिया जाता है
क्योंकि ये सरकारी अस्पताल है यहाँ इंसानों कद्र ही कहाँ…
चंदन ने दृण निश्चय किया। अम्मा तू रमा के पास रुक मैं अभी आता हूँ, लेकिन चन्दन तू कहाँ जा रहा है बेटा, बहु की हालत तो देख,अम्मा की बात अनसुनी करते हुए वो निकल गया। चंदन घर गया और घर में रखी अपनी अंगूठी, चैन और रमा के कुछ गहने लेकर वह सुनार पर गया, गहने गिरवीं रख कर पैसे लेकर आया ।
चल अम्मा , कहाँ बेटा? कहीं और पर इस नर्क में नहीं रहेगी रमा ।
क्या कह रहा है बेटा लेकिन पैसे कहाँ से आयेंगे ?
अम्मा मैंने सब इंतजाम कर लिया है अब बस चल यहाँ से,
ठीक है बेटा,चंदन, उसकी अम्मा और दर्द से तड़पती उसकी पत्नी  सब सामान समेट कर चल दिये कोई भी यह पूछने न आया कि आप कहाँ जा रहे हैं ?और क्यों जा रहे हो?क्योंकि वहाँ हर आदमी पेशेंट है इंसान…नहीं
चंदन रमा को लेकर प्राइवेट अस्पताल आ गया रिसेप्शन पर पहुँचकर उसने बताया मेरी पत्नी को बीते तीस  घण्टो से दर्द हो रहे हैं पर बच्चा…
ठीक हम देखते हैं काउंटर पर पच्चीस हजार रुपये जमा कर दीजिए  और ये इंजेक्शन मंगवा दीजिए 
सिस्टर रमा को तुरंत ओपीडी में ले गई ऑपरेशन चालू हो गया…
एक घंटे बाद ओपीडी का दरवाजा खुलता है और सिस्टर आकर कहती है आपकी पत्नी को ज्यादा दर्द होने की वजह से ब्लड में इंफेक्शन फैल गया है..आपको अभी के अभी ब्लड का इंतजाम करना होगा ।
चंदन भागा भागा ब्लड बैंक गया वहाँ स्टाफ ने बोला ब्लड तो मिल जाएगा पर हम ब्लड एक्सचेंज करते हैं ब्लड बेचते नहीं। चंदन सोच में पड़ गया अब क्या करूँ मैं ।
अच्छा ठीक है मैं ब्लड देने को तैयार हूँ जल्दी कीजिये मेरी पत्नी वहाँ जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है ..
ब्लड देकर जैसे ही वो चलने को हुआ कंपाउंडर बोलता है थोड़ा आराम तो कर लीजिए …
आराम, अभी नहीं…. अभी मैं आराम नहीं कर सकता । ब्लड लाकर उसने सिस्टर को थमा दिया और आँखों से अश्रु धारा बह निकली…
सोचने लगा भले हम गरीब हैं पर ऐसी अमीरी से गरीबी भली।
ओपीडी का गेट फिर खुलता है और सिस्टर बधाई देती है 
बधाई हो आपको बेटी हुई है माँ बच्ची दोनों सुरक्षित है 
चंदन ने एक लम्बी सांस ली और सोचा… कुछ पैसे ही तो खर्च हुए पर मेरी रमा की जान तो बच गयी ।
वरना सरकारी डॉक्टर तो सैलरी से, क्लिनिक से खूब पैसे वाले  होते  ही जाते हैं, उन्हें किसी की जान की क्या फ़िक्र…??
और ये प्राइवेट हॉस्पिटल वाले ज्यादा पैसा कमाना चाहते हैं बगैर पैसे के इनको किसी की जान की क्या फ़िक्र..??
हम पैसे वाले नहीं हैं इस बात का हमें कोई दुःख भी नहीं है
हाँ पर सुख जरूर है इस बात का है कि हमारी खुशियाँ किसी की मजबूरी पर नहीं टिकीं।
सहायक प्राध्यापक( हिंदी) शा. स्नातकोत्तर महाविद्यालय श्योपुर मप्र

कोई टिप्पणी नहीं है

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.