1. हंसदेह – सॉनेट
इस परिधि से पृथक प्राक पृथ्वी है नहीं
इस मयमंत समय का क्या अंत है कहीं?
नहीं.. नहीं अब नवजीवन नहीं स्वीकार
अति असह्य..अरण्यवास का अभिहार।
भविष्य की भीति भस्म में बद्ध वर्तमान
प्रत्यय एवं प्रणय में पराभूत…प्रतिमान
क्षणिक में क्यों नहीं क्षय होती क्षणदा?
जैसे प्रेम में प्रतिहत प्रत्यूष की प्रमदा!
नहीं स्वीकार नव्य नैराश्य से निविड़ता
अद्य अति असह्य है अतिशय अधीनता
उन्मुक्त-अध्वर-उन्मुक्त-अदिति उन्मुक्त
हो,शीघ्र यह शरीर सरित हो पुनः शुक्त।
हे,शब्द संवाहक! कहाँ है वह चित्रावली
हंसदेह को अविस्मृत करती पत्रावली ?
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2. काव्यकामिनी – सॉनेट 
व्यतीत होता है प्रकाश… तत्पतश्चात् अंधकार
एक गहन श्वास लिए एक पक्ष होता व्यतीत
व्यतीत होता है कष्ट..कष्ट में मग्न स्मृति अपार
नहीं आता द्वार पर….न प्रश्न…न उत्तर न अतीत।
शकुंतला की विरह वाटिका में अब होते हैं कंटक
स्वर्गपथ की अग्नि में दग्ध होती…दुष्यंत की यामा
कहाँ रही अब मधुक्षरा की सुगंध में प्रेम की गमक!!
प्रतिश्रुति का वह क्षण…अब है वृंतरहित पुष्प सा।
अप्सरा सी मैं भी होती..श्रृंगार का रस बह जाता
बह जाती अनंतता में आयु..संग मोहिनी भंगिमा
ऋषि-नृप के हृदय कुंज में कदम्ब ही पुष्पित होता
कादम्बरी सी मैं कुहुकती..घन-वन में होती मंजिमा ।
तरंगिणी तीर की तरणी सी किस दिशा में बह जाऊँ
किंवदंती सी कविता में..मैं काव्यकामिनी सी रह जाऊँ।

अनिमा दास
कटक, ओड़िशा
संपर्क – animadas341@gmail.com

2 टिप्पणी

  1. सबसे पहले कविता के सानेट स्वरूप का परिचय आपके माध्यम से ही मिला।आपका शब्दकोष काफी समृद्ध है हमें भी कुछ शब्दों के अर्थ तलाशने पड़े भाषा की साहित्यिकता‌ पढ़ने में तो नहीं पर समझने में थोड़ी दुरूह होती है।
    आपके दोनों सॉनेट अच्छे लगे ।बधाई आपको अनिमा जी।

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