Tuesday, March 10, 2026
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अजित राय का लेख : विश्व सिनेमा और इरफ़ान खान

ऑस्कर अवार्ड देने वाली संस्था द एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंस ने दिवंगत अभिनेता इरफ़ान खान (7 जनवरी 1967- 29 अप्रैल 2020)  को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा है कि ” विश्व सिनेमा में अमिट छाप छोड़ने वाले और करोड़ों लोगों के प्रेरणास्रोत, द नेमसेक, स्लमडॉग मिलिनेयर और लाइफ़ ऑफ़ पाई जैसी फिल्मों में अपनी विलक्षण प्रतिभा के धनी इरफ़ान खान को बहुत मिस करेंगे।” उनके निधन का समाचार दुनिया भर के सिनेमा प्रेमियों के लिए किसी सदमे से कम नहीं है।
अंग ली ( लाइफ ऑफ पाई)  मार्क वेब  (द अमेजिंग स्पाइडर)  मीरा नायर ( दि नेमसेक) से लेकर डैनी बॉयल (स्लमडॉग मिलिनेयर) तक ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। ऐसा कम ही देखा गया है कि किसी भारतीय अभिनेता के निधन पर ऐसी विश्व व्यापी प्रतिक्रिया मिली हो। इससे पता चलता है कि विश्व सिनेमा में इरफ़ान खान कितने लोकप्रिय थे।
इरफ़ान खान  नहीं रहे। यह एक वाक्य अंदर तक हिला देने वाला है। जिस 53-54 साल की उम्र में दुनिया भर में अभिनेता जवान होते हैं, उस उम्र में इरफ़ान खान चले गए। उपर ऑस्कर वालों  ने उन्हें जो श्रद्धांजलि अर्पित की है उससे उनका महत्व पता चलता है। उनका निधन विश्व सिनेमा में भारतीय प्रतिभा की बहुत बड़ी क्षति है। उन्हें तो अभी बहुत कुछ करना था। ओम पुरी के बाद वे संभवतः अकेले ऐसे भारतीय अभिनेता थे जिन्होंने विश्व सिनेमा में इतनी महत्वपूर्ण ख्याति अर्जित की और अपनी पहचान बनाई। ऑस्कर अवार्ड से लेकर कान फिल्म फेस्टिवल तक उनके चर्चे होते थे। 
मुंबईया सिनेमा के दलदल में जहां हजारों प्रतिभाशाली कलाकार सारी उम्र एक झूठे महानता बोध और भ्रम में पैसों की परिक्रमा करते हुए दम तोड़ देते हैं, वहां इरफ़ान खान ने विश्व सिनेमा में अपनी अमिट छाप छोड़ी।  उन्होंने जब जहां अवसर मिला, अपने काम से चमत्कृत किया। आखिर ऐसा कैसे संभव हुआ? “लाइफ ऑफ पाई ” के निर्देशक अंग ली कहते हैं- ” इरफ़ान खान एक महान कलाकार, एक सज्जन मनुष्य और एक बहादुर योद्धा थे। हम उन्हें बहुत मिस करेंगे।” 
हालीवुड के मशहूर फिल्मकार मार्क वेब ( दि अमेजिंग स्पाइडर मैन) ने कहा है कि “उन्हें देख कर पता चलता था कि शक्ति और सज्जनता साथ साथ रह सकते हैं। जब वे नेमसेक में अपनी नई नवेली पत्नी के लिए बाथरूम के दरवाजे पर गाना गाते हैं या लाइफ़ ऑफ़ पाई में अपने पिता से बात करते हैं तो उन्हें निहारते रहने का मन करता है।”
इरफ़ान खान  नहीं रहे। यह एक वाक्य अंदर तक हिला देने वाला है। जिस 53-54 साल की उम्र में दुनिया भर में अभिनेता जवान होते हैं, उस उम्र में इरफ़ान खान चले गए। उनका निधन विश्व सिनेमा में भारतीय प्रतिभा की बहुत बड़ी क्षति है। उन्हें तो अभी बहुत कुछ करना था।  ऑस्कर अवार्ड से लेकर कान फिल्म फेस्टिवल तक उनके चर्चे होते थे।
अभिनेता बनने का दीवानापन उन्हें जयपुर के पुराने टायरों की दुकान से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली ले आया। मीरा नायर की “सलाम बांबे”  (1988) में पैसा लेकर चिट्ठियां लिखने वाले युवक और तपन सिन्हा की “एक डाक्टर की मौत” (1990) में एक छोटी सी भूमिका से सिनेमा में अभिनय का सफर शुरू करते हुए इरफ़ान खान ने वाया टी वी सीरियल ( चंद्रकांता, श्रीकांत, चाणक्य, भारत एक खोज आदि)   देखते देखते ही  हालीवुड और ब्रिटिश सिनेमा में अपनी जबरदस्त पहचान बना ली। सिनेमा के इतिहास में यह परिघटना दिलचस्प इसलिए भी है कि ओम पुरी की तरह इरफ़ान खान को भी अंग्रेजी नहीं आती थी और अंत तक वे हिंदी में ही ज्यादा सहज महसूस करते थे।
उनके करियर में बड़ा मोड़ तब आया जब उन्हें लंदन के आसिफ कपाड़िया ने अपनी पहली फीचर फिल्म ” द वारियर ” में मुख्य भूमिका में कास्ट किया। यह एक हिंदी फिल्म थी जिसमें इरफ़ान खान ने पुराने सामंती राजस्थान में एक ऐसे योद्धा की भूमिका निभाई थी जो हिंसा से तंग आकर लड़ाई छोड़ना चाहता है। इरफ़ान हमेशा अपनी इस फिल्म की चर्चा करते थे क्योंकि इसी फिल्म के कारण वे अभिनय की दुनिया में टिके रह गए वरना वे सिनेमा छोड़ने का मन बना रहे थे।
इस फिल्म को आस्कर अवार्ड में ब्रिटेन की आफिशियल एंट्री के लिए शार्ट लिस्ट किया गया था पर फिल्म की भाषा हिंदी होने के कारण अंतिम दौर में यह फिल्म बाहर हो गई। इस फिल्म ने अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में हर जगह अच्छा प्रर्दशन किया। इसके बाद इरफ़ान खान ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। हालांकि भारत में ऐसा माना जाता है कि उनका करियर तिग्मांशु धूलिया की ” हासिल” और विशाल भारद्वाज की ” मकबूल ” ( 2004) से परवान चढ़ा। 
आसिफ कपाड़िया की ” द वारियर” ने इरफ़ान खान को विश्व सिनेमा में प्रवेश दिलवाया था पर उन्हें असली शोहरत मीरा नायर की ” द नेमसेक” (2006) में अमेरिका में बसे अशोक गांगुली नामक एक बंगाली इंजीनियर की मुख्य भूमिका निभाने के कारण मिली। सिनेमा की गुणवत्ता के लिहाज से यह उनकी बेस्ट फिल्म मानी जाती है। यह फिल्म पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित झुंपा लाहिड़ी की इसी नाम से प्रकाशित उपन्यास पर आधारित है।
मीरा नायर कहती हैं कि “द नेमसेक के नायक अशोक गांगुली की मृत्यु हमें विदेश में बसे अपने की मृत्यु के अवसाद तक ले जाती है। ” इस फिल्म में एक दिलचस्प प्रसंग है कि अशोक गांगुली अपने बड़े बेटे का नाम गोगोल रखता है क्योंकि एक बार ट्रेन से कलकत्ता जाते हुए भीषण दुर्घटना में वह इसलिए बच जाता है कि वह उस समय  मशहूर रूसी लेखक निकोलाई गोगोल की किताब पढ़ रहा था। 
अंग ली की “लाइफ आफ पाईं” (2012) में इरफ़ान खान पाई पटेल (पिंसीन मानीटर) बने हैं जो एक उपन्यासकार को पांडिचेरी में अपने बचपन का किस्सा सुनाते हैं कि कैसे समुद्र में एक लाइफ बोट पर उन्होंने एक बंगाल टाइगर के साथ 227 दिन गुजारे थे। यह फिल्म यान मार्टिन के उपन्यास पर बनी थी। इसे भी चार-चार आस्कर अवार्ड मिले थे।
इसके एक साल बाद ब्रिटिश फिल्मकार डैनी बॉयल की ” स्लमडाग मिलिनायर” (2008) आई और इस फिल्म ने दुनिया भर में तहलका मचा दिया। इसे कई श्रेणियों में आस्कर अवार्ड मिले। हालांकि इरफ़ान खान की इसमें एक पुलिस इंस्पेक्टर की छोटी सी भूमिका थी, पर उसे बहुत पसंद किया गया और वे आस्कर तक पहुंच गए।
इस फिल्म के निर्देशक डैनी बॉयल कहते हैं- ” इरफ़ान खान इतनी कम उम्र में चले जाएंगे, विश्वास नहीं हो रहा। वे बहुत शानदार अभिनेता थे।उनका किरदार भले ही छोटा सा था, लेकिन जिस तरह से वे अपनी मर्यादा, आकर्षण, दया, बुद्धिमत्ता और अपने शांत स्वभाव से आडिएंस का मार्गदर्शन करते थे, वह अद्भुत था। उन्होंने इस फिल्म के निर्माण में भी अहम भूमिका निभाई थी।” 
अंग ली की ” लाइफ आफ पाईं ” (2012) में इरफ़ान खान पाई पटेल ( पिंसीन मानीटर) बने हैं जो एक उपन्यासकार को पांडिचेरी में अपने बचपन का किस्सा सुनाते हैं कि कैसे समुद्र में एक लाइफ बोट पर उन्होंने एक बंगाल टाइगर के साथ 227 दिन गुजारे थे। यह फिल्म यान मार्टिन के उपन्यास पर बनी थी। इसे भी चार चार आस्कर अवार्ड मिले थे।
बाद में इरफ़ान ने हालीवुड में रोन हावर्ड की बड़े बजट की फिल्म ” इनफरनो”(2016) की जो  डान ब्राउन के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है और ” दा विंची कोड”(2006) और ” एंजिल्स एंड डेमोंस”(2009) के बाद का तीसरा और अंतिम भाग है। वैसे तो उन्होंने ” द दार्जिलिंग लिमिटेड”( वेब एंडरसन), ” न्यूयॉर्क, आई लव यू”( फतेह अकीन) और इसी तरह की कई विदेशी फिल्मों में काम किया पर ब्रिटिश फिल्मकार माइकल विंटरबाटम की  ” अ माईटी हार्ट” (2007) में पाकिस्तानी पुलिस अधिकारी की उनकी भूमिका हमेशा याद की जाएगी। यह फिल्म पाकिस्तान में वाल स्ट्रीट जर्नल के एक पत्रकार डेनियल पर्ल की नृशंस हत्या पर आधारित है। 
जेनेवा ( स्विट्जरलैंड) के फिल्मकार अनूप सिंह ने इरफ़ान खान को लेकर दो फिल्में बनाई- ” किस्सा”(2014) और ” दि साँग आफ स्कारपियोंस।” ये दोनों फ़िल्में खूब चर्चित हुई पर “किस्सा” में निभाए गए एक पंजाबी किसान के उस किरदार को भला कौन भूल सकता है जो संपत्ति बचाने के लिए अपनी बेटी को जबरदस्ती बेटा बना कर पालता है।
तिग्मांशु धूलिया की फिल्म “पान सिंह तोमर” (2011) और रितेश बत्रा की ” लंच-बॉक्स”(2013) में इरफ़ान खान के अभिनय को बहुत सराहा जाता है। “लंच-बॉक्स” तो कान फिल्म समारोह तक गई जहां भारतीय सिनेमा के सौ साल के उपलक्ष्य में उसका विशेष प्रर्दशन किया गया। 
बालीवुड से हॉलीवुड वाया ब्रिटिश सिनेमा में उन्होंने बहुत अच्छा काम किया। पर एक बात का हमेशा अफ़सोस रहेगा कि उन्हें रोमान पोलांस्की, माइकल हेनेके , पेद्रो अलमोदवार या केन लोच जैसा कोई बड़ा यूरोपीय फिल्म निर्देशक नहीं मिला। यदि ऐसा हुआ होता तो विश्व सिनेमा में इरफ़ान खान की छाप कुछ दूसरी होती। अब वे हमारे बीच नहीं हैं पर उनके द्वारा निभाए गए किरदारों की छवियां वर्षों तक हमारा पीछा करती रहेंगी।
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