फर्स्ट ईयर में कल्पना को यह एहसास हो गया कि हाइट और फिजिक अच्छी होने के बाद भी , लड़की में अदा होना चाहिये , स्टाइल होना चाहिये तभी लड़के दोस्ती करने के लिये आगे आते हैं ,अन्यथा दोस्ती नही होती  । समय के साथ साथ , कल्पना के शरीर का विकास होता गया ,  आकर्षण बढ़ने लगा, वैसे वैसे उसे अपना  शांत स्वभाव  उसे ही अधिक चुभने लगा। उसके में न तो वह स्टाइल आ पाई और न अदा । उसका स्वभाव ऐसा हो गया था कि वह वही कपड़े पहनती जो पेरेंट्स को पसंद हो ।  फैशन वाले कपड़ें नही पहनती थी  ताकि परिवार के लोग कोई बात न उठावे । वह नजर नीची करके स्कूल जाती और नजर नीची करके ही वापस आती। कंधे हर दम झुकाए रखती। अपने शरीर को दबा कर ,छिपा कर रखती ।  क्लास की अधिकतर लड़कियों की भांति न तो अपने पढ़ाई पर गर्व कर पाती , न अपने शरीर पर और न अपने पर।
              सेकंड ईयर खत्म होते होते  उसने देखा कि अधिकांश लड़कियों के बॉय फ्रेंड बने लेकिंन  उसका कोई बॉय फ्रेंड नही बना।उसकी दो करीबी सहेलियों को भी  बॉय फ्रेंड मिल गए लेकिन उसे नही मिला। जहाँ बॉय फ्रेंड होना कॉमन हो , वहाँ जिस लडक़ी का कोई बॉय फ्रेंड नही होता उसे क्लास में नॉर्मल ढंग से नही लिया जाता ।बॉय फ्रेंड होना , केवल फैशन की बात नही थी । यह कॉमन बात थी और जरूरत भी थी। बॉय फ्रेंड होने से, पिक ड्राप की  टेंशन नही रहती , इसके अतिरिक्त वह कई कामो में मददगार होता । जैसे -फोटो स्टेट कराना , प्रोजेक्ट बनाना , प्रोटेक्ट करना , घुमाने ले जाना , उसकी बातों को पूरी तन्मयता से सुनना ,भूख लगने पर खिलाना , हर मेसेज का जबाब मिलता है  ,दूसरे लड़को की छेड़खानी  से बचाना ,  आदि ।इसके एवज में  गर्ल फ्रेंड के रूप में  लड़की को अपने बॉयफ्रेंड के साथ क्लास में बैठना होता है,उसी के साथ रहना होता है , अन्य लड़को से बात करने से बचना होता है , बॉयफ्रेंड की बातें सुनना होता है। यह सब छोटी छोटी बातें ऐसी होती हैं , जिन्हें करने में किसी लड़की को कोई दिक्कत नही होती है।
                                सेकंड ईयर अर्थात बारहवीं  तक बॉय फ्रेंड से बंचित ,कल्पना ने यह ठान लिया कि विश्वविद्यालय में पहुंचते ही उसे अपने फैशन और स्टाइल  में सुधार लाना है और बॉय फ्रेंड बनाना है।उसने सोचा -पढ़ाई तो जैसे पहले चल रही थी वैसे ही होती रहेगी।अब पिजरे की तरह स्कूल के अनुशासन में नही रहना है। अब अनुशासन से आज़ादी है, स्कूल की चहारदीवारी से आजादी है , ड्रेस पहनने से आज़ादी है ,बच्ची हो – इस ताने से आज़ादी है । विश्वविद्यालय के नाम पर उसके ट्रेडिशनल व कंजूस घर वाले भी कपड़ो में व रहन सहन में सुधार की अनुमति  दे देंगे तथा इसके लिये रुपये भी देंगे। आने जाने के टोका टोकी से मुक्ति मिलेगी।
       विश्वविद्यालय के लॉ विभाग के कुछ कमरों में  इसी साल , पांच वर्षीय एम0 बी 0 ए0 का कोर्स प्रारंभ हुआ।इस कोर्स को गूगल पर बहुत हाइप मिला है क्योंकि आगे आने वाला समय व्यापार का है और यह कोर्स उसमे मदद करेगा। इसी कोर्स में कल्पना ने एडमिशन लिया।कोर्स नया नया प्रारम्भ हुआ था ,इसलिये धीरे धीरे वहाँ की प्रशासनिक व्यवस्था , फैकल्टी व क्लासेज शुरू हो रहे थे।इसलिये टाइम टेबल के अनुसार क्लासेज नही हो पा रही थीं। कई क्लासेज खाली रहते थे ।सभी स्टूडेंट के पास घूमने का पर्याप्त अवसर था और समय भी।
          राघव लॉ डिपार्टमेंट का स्टूडेंट था। 5 वर्षीय एल एल बी के दूसरे साल का विद्यार्थी।उसका इकहरा शरीर था । उसका ,कल्पना से रंग थोड़ा साफ था लेकिन दुबला था। वह भी वैसे ही सामान्य स्टूडेंट था , जैसे कल्पना ।वह गर्ल फ्रेंड से वंचित था और कल्पना बॉय फ्रेंड से वंचित। लेकिन संयोग ने दोनों को मिला दिया।
           दरअसल हुआ यह कि कल्पना के स्कूल समय की सेक्शन की सबसे तेज तर्रार लड़की निशा ने भी  5 वर्षीय एम बी ए कोर्स में एडमिशन लिया था। यहाँ पर उसे कल्पना मिली । उसने फौरन कल्पना को फ्रेंड बना लिया। कल्पना तो उसकी फैन थी ही। निशा जानती थी कि कल्पना शांत स्वभाव की है ,डैमेजिंग नही है ।उसे  अपने बॉयफ्रेंड से मिलने जुलने  , उसके रूम पर समय बिताने के लिये, पहरेदार के रूप में रखने के लिये झल्ली टाइप की वफादार लड़की चाहिए थी । इस मानक पर कल्पना आइडियल थी । निशा ने फौरन ही उसे अपना दोस्त बना लिया। इसी प्रकार निशा का बॉयफ्रेंड राघव भी अपने साथ एक सीधा साधा लड़का पहरेदार के रूप में रखता – उसका नाम था  आदित्य । सिनेमाहाल पर निशा कल्पना के साथ जाती और राघव आदित्य के साथ । पिक्चर हाल के भीतर निशा और राघव एक साथ बैठते और कल्पना तथा आदित्य एक साथ ।निशा व कल्पना राघव के रूम पर जाते। राघव के साथ पहले से आदित्य बैठा रहता। फिर आदित्य और कल्पना बाहर चले जाते। निशा व राघव रूम पर  रहते।
             शुरू शुरू में कल्पना को आदित्य के साथ मजबूरी में बैठना बुरा लगता था । धीरे धीरे वे जब पहरेदारी में होते , वे कमरे के बाहर टाइम पास कर रहे होते, उस समय को यूज करने के लिये कल्पना अपने प्रोजेक्ट के काम ,आदित्य के साथ दुकानों पर जाकर कराने लगी। धीरे धीरे कल्पना को लगने लगा कि आदित्य उसका ध्यान रखने लगा है , उसके छोटे मोटे काम साथ जाकर कराने लगा। दोनों मोबाईल पर बात भी करने लगे। निशा और राघव जितना समय एक दूसरे के पास रहने लगे उतना समय कल्पना और आदित्य को भी मिलने लगा। निशा और राघव को भो यह परिवर्तन दिख लेकिन उन्होंने सोचा कि दो पेयर जब साथ रहेंगे तो किसी का ध्यान नही जाएगा और वे  घर समाज की निगाहों  से मुक्त रहेंगे।निशा और उसके बॉयफ्रेंड राघव  ने भी दोनों कोआपस मे जुड़ने के लिये प्रोत्साहित किया कि यदि चार लोग कही जाय घूमे या रुके, तो किसी को शक नही होगा।
         हर दो दिन पर चारो की आउटिंग होने लगी। निशा और राघव के रिलेशन शिप में कब कल्पना आदित्य को लेकर सॉफ्ट हो गयी , उसे पता ही नही चला। बीच मे निशा अपनी एक रिलेटिव की शादी में दस दिन के लिए बाहर गयी ।उस समय कल्पना और आदित्य को एक दूसरे से मिलने की जरूरत महसूस हुई । दोनों मिले , घूमे टहले , और 10 दिन बाद दोनों ने एक दूसरे को बॉयफ्रेंड  और गर्लफ्रैंड मान लिया।
       कल्पना बहुत खुश हुई। फाइनली उसका भी बॉयफ्रेंड हो गया। अब वह दोस्तो के बीच अपने को अलग थलग नही महसूस करेंगी। पहले तो उसने रिलीफ महसूस किया कि अब वह अपने दोस्तों के ग्रुप में याद नही है । फिर उसे आराम मिलने लगा कि कोई है जो उसका प्रोजेक्ट बनवा सकेगा, पिक व ड्राप दे सकेगा, डिस्को ले जा सकेगा , कपल पिकनिक में ले जा सकेगा ,पब ले जा सकेगा। जरूरते  कब आदत बन जाती है , पता ही नही चलता।
आदित्य एक मिडल क्लास परिवार का लड़का था ।उसके पिता एक सरकारी नॉकरी में थे । माली हालत ठीक थी । वह भी अन्य पिताओ की तरह अपने इकलौते बेटे को लेकर बहुत सारे सपने देख रखे थे और उन्हें पूरा होता देखने के लिये ,अपने परिवार की नार्मल जरूरते काट कर , आदित्य को पैसे देते थे।
      कल्पना और आदित्य की दोस्ती विश्विद्यालय , पार्क , रेस्टोरेंट , राघव के घर से शुरू होकर फोटो स्टेट की दुकान , एकान्त रास्ते , और आदित्य के घर तक पहुंची। आदित्य ने अपने से एक वर्ष छोटी बहन को अनुनय विनय करके कल्पना से उसे रेस्टोरेंट में मिलाया और फिर उसकी बहन के मित्र के रूप में कल्पना ने आदित्य के घर मे आना जाना शुरू किया। इसी रूप में वह आदित्य की माँ व पिता से भी मिली। कल्पना ने एक कहानी भी बताई ,
– उसके माता पिता घर के बाहर काम करते हैं ,उन्हें लौटते शाम हो जाती है। घर मे वह अकेले बोर होती है। यह बात जब रश्मि (आदित्य की बहन) को बताई तो उसने कहा कि मेरे घर आ जाया करो।
-सही बात कही रश्मि ने ।
आदित्य की माँ बोली।
रश्मि यह कहानी सुनकर सोचने लगी उसका भाई इतना चालाक है या कल्पना।
कल्पना आना जाना रोज का हो गया कि लोगो को ,आदित्य के रिश्तेदार आदि को यकीन हो गया कि कल्पना रश्मि की ही  दोस्त हैं। धीरे धीरे कल्पना रश्मि की दोस्त हो गयी ।कल्पना और आदित्य खुश हो गए कि रश्मि ने कल्पना को आसानी से दोस्त बना लिया जिससे कल्पना के आदित्य के घर मे , वक्त बेवक्त आने का लाइसेंस मिल गया। कल्पना आदित्य को आपस मे मिलने के लिये पार्क , रेस्टोरेंट , निर्जन सड़क – नही भटकना पड़ता । इसके अतिरिक्त उन्हें गाहे वेगाहे एकांत के पल भी मिल जाते ।इन तीन कारणों के अतिरिक्त भी ,एक कारण से कल्पना को यह दोस्ती उसे पसंद थी। वह जानती थी कि रश्मि के माध्यम से वह आदित्य के परिवार  का दिल जीत लेगी जिससे उसे इस घर मे शादी के बाद आसानी रहेगी।
        लेकिन रश्मि का उस समय कोई एजेंडा नही था । उसने भातृ प्रेम रश्मि से दोस्ती कर ली थी।लेकिन कुछ दिनों बाद उसने पाया कि उसकी प्राइवेसी खत्म हो गयी। गाहे बगाहे कल्पना आ के उसके कमरे में बैठ जाती ।यदि वह कही जाती तो वह उसके साथ लग जाती ।कल्पना के चक्कर मे आदित्य से यदि रश्मि कोई कोई काम कहती तो वह बाहर नही जाता। यदि कभी आदित्य को कल्पना से मिलना हुआ तो उसे कमरे के बाहर निकल कर चौकीदारी करनी पड़ती।महीने  बीतते गए ।
     रश्मि की जब असहजता बढ़ी तो उसने रश्मि के माध्यम से आदित्य से अपने काम कराने लगी। फिर वह कल्पना से कहती ,
– तुम इस घर की बहू बनना चाहती जो तो चाय बनाना सीख लो, इस घर के लोग चाय बहुत पीते हैं।
कल्पना चाय बनाना सीखते सीखते , चाय बनानी उसकी ड्यूटी हो गयी। एक बार आदित्य के घर आने पर और एक बार जाने के पहले।
धीरे धीरे पोहा , आमलेट पकौड़ी आदि भी बनाने लगी। रश्मि को कही बाहर जाना हुआ तो कल्पना की स्कूटी पर बैठकर निकलने लगी। रश्मि ने कहा ,
-मम्मी के सिर में दर्द होता रहता है , कभी खाली रहा करो ,तो सिर दबा दिया करो।
कल्पना वह भी करने लगी।
बीच मे आदित्य के मम्मी पापा एक दिन बाहर गए थे ,रश्मि भी बाहर थी । उस दिन दोनो(कल्पना और आदित्य) के शारीरिक रिश्ते भी हो गए। कल्पना अभी भी सारी भूमिकाएं निभा रही थी। वह आदित्य से कहती ,
– कुछ कमाने का सोचो
– अभी यार मेरे घूमने के दिन है
                     धीरे धीरे उसे लगा कि वह बहू व बीबी के सारे कार्य कर रही है , उसे आदित्य के साथ समय गुजारने और कभी कभी एकांत में समय बीतने के अवसर मिल रहा है , लेकिन इसका लॉजिकल कॉन्क्लूजन तो शादी ही है।इस्लाम उसने अपनी कजिन दीदी को, अपने और आदित्य के बीच के रिश्ते के बारे में बताया,तो उन्होंने कहा ,
– तुम टाइम पास कर रही हो कि सीरियस हो ?
– सीरियस हूँ …तभी तोआदित्य के घर मे बहू , भाभी की सारी ड्यूटी निभा रही हूँ
-बीबी वाली ?
-..वह भी।
शर्माते हिचकते कल्पना बोली ।
-फिर दिक्कत क्या है ?
– लेकिन आदित्य तो …कुछ कर नही रह है ।
– क्यो ?
– कहता मेरी उम्र ही क्या है
-तुम क्यो नही कहती .. हम लोगो के परिवार में इस उम्र में लड़कियों की शादियां ढूंढी जाने लगती है।.. पढ़ाई के नाम पर कितना टाल पाओगी?
-वहीं तो।
-आदित्य के नाम प्रोपर्टी  है क्या ?
-हा कई एफ डी है , एन एस सी है जो उसके पापा ने उसके नाम लिए  है।
– उनको कौन देखता है ?
– अपने पापा के कहने पर आदित्य ही देखता है।
– देखो , मेरी बात को तुम अन्यथा न लो । आदित्य कुछ कर नही रहा है और  कुछ करने के मूड में नही है। तुम उसको लेकर सीरियस हो। ऐसे में तुम्हारे भविष्य के लिये आर्थिक सुरक्षा जरूरी है।
– उसके पास तो इतने पैसे तो है ही नही ।
-उसके पापा आगे जो nsc fd आदित्य के नाम खरीदेंगे उसमें अपना भी नाम जुड़वा लो
– साल में एक दो तो ही खरीदेंगे ।
-पुरानी nsc fd तो रेनीवेल होती है न । ..उसमें नाम डलवा लो।
-वह मानेगा?
-बताओ , तुम उसकी बीबी के रूप में सारे काम कर रही हो तो एन एस सी , एफ डी में आदित्य के साथ नाम जोडने में क्या बुराई है ?तुम अकेले अपने नाम तो नही करा रही हो?
-प्रयास करती हूँ।
-इससे तुम्हारे घर वाले भी कनविंस होंगे कि आदित्य तुमको लेकर सीरियस है।
         ऐसा ही हुआ । नई व नवीनीकृत एफ डी , एन एस सी  में आदित्य व कल्पना का जॉइंट नाम हो गया।
एक साल बाद कल्पना की शादी ढूंढी जाने लगी , तब कल्पना ने अपने भाई भाभी को बताया कि आदित्य उससे प्यार  करता है और दोनो आपस मे शादी करना चाहते हैं।
-वह क्या करता है ?
-वह तो कुछ करता नही है …कॉम्पटीशन दे रहा है।
-ऐसे लड़के से हम लोग तुम्हारी शादी कैसे कर सकते हैं?
-बिना आर्थिक सुरक्षा के तुम्हारी शादी नही हो सकती है।
-उसने हम दोनों  नाम से एन एस सी , एफ दी  खरीदा है ?
– दिखाना।
इसी बहाने कल्पना आदित्य को भइया भाभी से मिलाने को सोची । वह दोनों   एन एस सी , एफ डी लेकर भइया भाभी के पास आये ।
कल्पना ने  आदित्य से भइया भाभी का परिचय कराते हुए कहा ,
– भइया !मैं और आदित्य एक दूसरे को 3 साल से प्यार करते हैं और हम शादी भी करना चाह रहे हैं।
आदित्य ने उसकी बात में हाँ मिलाई।
उसके भाई ने कहा
– मैं प्रेम विवाह के खिलाफ नही हूँ , लेकिन मैं यह भी चाहता हूँ कि मेरी बहन खुश रहे।सुख से रहे।
-उसे खुश रखूंगा ।
आदित्य बोला।
-कैसे खुश रखोगे ? नौकरी तुम करते नही हो।?
– मैं नॉकरी के लिये प्रयास कर रहा हूँ।
– नौकरी मिली तो नही ?
– नही।
– फिर ?
-मैंने कल्पना के नाम एफ दी ,  एस सी   लिया है ।
-वह तो तुम्हारे पापा है । वह  तुम दोनों के नाम जॉइंट है ।
– वह कल्पना का ही  है ।
-कैसे है ?
– हम दोनों के नाम है ।मैं उसके फेवर में लिख देता हूँ ।तब पूरी तरह उसी के नाम हो जाएगा।
– चलो तुम लिख दो । फिर मैं पापा मम्मी को मनाता हूँ।हालांकि बिना नौकरी के ,कल्पना की शादी के लिये पापा का मानना बहुत मुश्किल है।
-आप प्रयास करेंगे तो वह मान जाएंगे।
-प्रयास करता हूँ…लेकिन कितने की है यह एफ डी व एन एस सी है ?..मेरे पास बताने के लिये भी कुछ हो।
– 20 लाख  की।
-ठीक है । बात करता हूँ।
           कुछ दिनों बाद भाभी कल्पना को बताती है,
-पापा नही मान रहे हैं
-आप दोनों ने तो वादा किया था कि पापा को मना लेंगे।
-तुम्हारे भइया ने तो बहुत समझाया लेकिन पापा नही माने।
-आपने नही बताया कि वह नौकरी के लिये प्रयास कर रहा है। 20 लाख की एफ डी और एन एस सी भी मेरे नाम से कर दिया है।
-बताया था…पापा कह रहे थे कि 20 लाख में , जीवन तो नही कटेगा?
-मैं भी कुछ कर लूंगी।
-पापा ने कहा है आदित्य के बिना नौकरी पाए  के मैं उससे  बात भी नही करूँगा ।
-भाभी ..मैं उसे बहुत चाहती हूँ।
-हम लोग तुम्हारे और आदित्य के खिलाफ नही है.. लेकिन हर मा बाप की तरह पापा भी यही चाहते हैं कि उनकी बेटी खुश रहे , समृद्ध रहे। हम लोग भी यही चाहते हैं।
-आप लोगो के आश्वासन पर मैंने उससे एन एस सी , एफ डी अपने नाम करा लिए।
-हम लोग इंकार थोड़े कर रहे हैं। हम लोग  पापा जी मना लेगे कि वह 6 माह तक , तुम्हारी शादी नही करेंगे।
-6 महीने में कौन नॉकरी मिल जाएगी ?इतनी जल्दी कही नॉकरी मिलती है।
-चलो एक साल ।.. एक साल में आदित्य नौकरी खोज ले नही तो ..?
-तो ?
-तुम आदित्य को बुला लो , हम लोग उसे ही बता देंगे।ताकि तुम्हारी पोजीशन साफ रहे।
            अगले दिन कल्पना आदित्य को बुला लाई। भइया ने साफ बता दिया कि ,तुम्हारे बिना नौकरी किये पापा नही मानेंगे।
– मैं प्रयास कर रहा हूँ।
-पापा कल्पना की शादी एक नौकरी वाले लड़के से करेंगे। हम लोगो ने उनसे बात कर उन्हें तैयार किया है कि वे एक साल तक हम लोग इंतज़ार करेंगे।
– यदि एक साल में इसे नौकरी नही मिली तो ?
अधीरता पूर्वक कल्पना ने पूछा ।
-जो पापा कहेंगे , हमे मानना पड़ेगा।
कल्पना के भइया बोले।
कल्पना और आदित्य का चेहरा उदास हो गया।
कल्पना के भइया ने बात आगे बढ़ाई।
-अभी एक पूरा साल है।तुम प्रयास करो ।बहुत कुछ हो सकता है।
– यदि नही हुआ ?
-तो भाग्य की लेखी को तुम लोग भी मान लेना कि तुम लोगो का मिलना नही लिखा है।
मायूस होकर आदित्य बाहर निकलने लगा।कल्पना भी पीछे पीछे बाहर आ गयी।उसने आदित्य से कहा ,
-एक बर्ष का समय है।तुम सीरियस हो जाओ।मैं भी अब रोज तुमसे मिल के तुम्हारी पढ़ाई पर जोर दूँगी ताकि तुम्हारी कहीं नौकरी लग जाय । आगे भगवान पर भरोसा रखा जाएगा।
उदास स्वर में कल्पना बोली।
          इस मीटिंग का यह असर हुआ कि कुछ दिन तो आदित्य पढ़ने लगा। नौकरी के फार्म भरे गए ।सेलेबस मेज के सामने भी चिपकाया गया। कल्पना भी पढ़ाई के लिये रोज टोकने लगी ।इस नई पढ़ाई के टाइम टेबल ने दोनों को को बॉयफ्रेंड गर्ल फ्रेंड के सुख से वंचित कर दिया। न घूमना , न टहलना ,न मूवी न मस्ती।  महीने दो महीने  बीतते बीतते नॉकरी की पढ़ाई का नियम ढीला पढ़ने लगा और चार माह बीतते बीतते नियम टूट गया।पुनः दोनो पुराने ढर्रे पर आ गए।
           एक साल बाद , कल्पना के भाई ने कल्पना से कहा ,
– नौकरी मिली ?
– नही।
-फिर ?
– प्रयास तो उसने किया , एग्जाम भी दिया है।
-अब तुम्हारी शादी पापा कर ही देंगे..इसलिये आदित्य से मिलना जुलना खत्म करो।
-जी। देखती हूँ।
– देखो मत। अब एक साल बीत गया।आदित्य को नौकरी नही मिली।
कल्पना चुपचाप उठकर कमरे में आ गयी।
बाद में उसने भाभी से बात की।
– भइया से कहकर आदित्य को थोड़ा समय दिलवा दीजिये।
– तुम्हारे भइया न तो कहेंगे, और न पापा मानेंगे।
– भइया तो कह रहे थे कि मैं आदित्य से मिलना जुलना छोड़ दूं।
– सही कह रहे हैं.. क्योंकि तुम दोनों की शादी नही हो पाएंगी।
– ठीक है जब मेरी शादी किसी दूसरे से तय हो जाएगी तो मैं आदित्य से नही मिलूँगी।
– देर सबेर तय हो हीजाएगा।
कुछ दिन बाद भाभी  ने कहा ,
– अब तुम्हारी शादी तय हो रही है। लड़के वाले तुम्हे देखने आ रहे हैं ।
-जी।
-आदित्य से अब मिलना छोड़ दो।
– एकाएक कैसे छोड़ दूँ ?
– एकाएक तो नही कहा जा रहा है। तुम्हे और आदित्य को पूरा समय दिया गया ।… आदित्य तुम्हारे प्यार पर खरा नही उतर पाया।
– प्यार पर तो वह खरा है और रहेगा। आप लोगो की नौकरी की शर्त पर खरा नही उतरा।
– चलो , तुम्हारी बात ही मान लेते हैं।
– क्या नॉकरी के बिना प्यार ,जिंदा नही रह सकता।
– बिना कमाए , जीवन कैसे चलेगा ? जीवन रहेगा और चलेगा तभी प्यार भी रहेगा ।तुम दोनों की गृहस्थी के लिये कुछ मासिक आय या नौकरी जरूरी है ।.. और यह आदित्य के पास नही है।
– मुझे आदित्य को छोड़ना ही होगा?
– क्यो नही मान लेती कि हर प्यार की उम्र होती है। और तुम्हारी प्यार की उम्र पूरी हो गयी।
उदास होते हुए दुःखी मन से कल्पना बोली,
– ठीक है …लेकिन मैं उसकी nsc fd वापस कर दूं
-क्यो ?
-जब उससे  शादी नही हो रही  तो उसके पैसे कैसे ले लू ?
-तुमने उन लोगो की कितनी सेवा की है । आदित्य व उसके परिवार की।
– हाँ… की लेकिन शादी तो नही हो रही है न ?
-आदित्य परिवार ने तुमको ड्राइवर बनाया , नौकर बनाया , बावर्ची बनाया । आदित्य   ने भी तुम्हारे साथ घूमा -टहला , एंजॉय किया न ?
– कैसी चीप बाते कर रही है भाभी ? क्या एक दूसरे को प्यार करना इन्जॉय करना है , गलत है?
तमकते हुए कल्पना बोली ।
-चीप बाते कहाँ कह रही हूँ ।तुम लोग 4 साल रिलेशन शिप में हो। तुमने अपना बेस्ट दिया , उसने अपना बेस्ट दिया।
– जी ।
– तुम दोनों की शादी आदित्य के वजह से नही हो रही है ।
-तो ?
-अब दोनो की शादी नही हो पा रही है तो दोनो मूव ऑन करो। पिछली बाते क्यो पकड़ी हो ? क्या वापस करना और क्या लेना ?
– भइया तो इसे गलत समझेंगे ?
– क्यो गलत समझेंगे ? क्या वह नही जानते कि तुम लोग पिछले चार साल से प्यार में हो , रिलेशन में हो ? तुम आदित्य के घर जाकर बहू , भाभी , बीबी का रोल निभा रही हो ।
सकुचाती हुई धीमे स्वर में कल्पना बोली ,
– जी  ।
– फिर ?..तुम्हे यह गलत क्यो लग रहा है?
कल्पना चुप रही ।
भाभी ने जोर से पूछा ,
– तुम लोग प्यार में थे या नही थे ?
-थे ।
-क्या आदित्य ने  एन एस सी , एफ डी वापस मांगा ?
– नही ।
– क्यो ?
-वह एक अच्छा लड़का है।
–  वह अच्छा लड़का है , लेकिन यह कारण नही है। वास्तव में …वह इसीलिये नही मांग रहा है क्योंकि उसने वह प्यार में दिया था ।
– लेकिन ?
– लेकिन क्या ?…फिर जो भी हुआ वह प्यार में हुआ । लेने – देने की बात कह कर तुम अपने प्यार का , आदित्य का  अपमान कर रही हो।
– बात आपकी भी … गलत नही है भाभी।
रूंधे गले से धीमे स्वर मे ,  कल्पना बोली और गहरी सांस लेते हुए मुँह घुमा कर ,अपनी बन्द आँखों से ,आदित्य के साथ के  पिछले चार साल के बेहतरीन लम्हे ,याद करने लगी।
कई काव्य-संग्रह और पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां-कविताएँ प्रकाशित. सम्पर्क - amitkumar261161@gmail.com

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