जब कोई ख़ास काम नहीं होता था तो शाकिर अपने दोस्त इज़हार के साथ यूं ही शहर के चक्कर अपनी मोटरसाइकिल पर काटने निकल जाता था। शाकिर के साथ उसका बरसों का दोस्त इज़हार हमेशा की तरह साथ रहता था। न जाने कितने साल उन्होंने अपनी दोस्ती के यूं ही साथ-साथ बिताए। लेकिन इज़हार जब से सरकारी स्कूल की नौकरी में दूसरे शहर चला गया, तब से वह उससे दूर हो गया। फिर भी जब भी वह अपने गांव लौटता है बिना शाकिर के मिले उसे चैन नहीं आता।
जब शाकिर से मिल लेता है तो लगता है सारा गांव उसके भीतर उतर आया है और फिर वह दोनों पिछले सालों की तरह शहर के चक्कर काट आते। होटलों में जाते समोसा, कचोरी खाते, चाय पीते या कभी-कभी मिठाई खाने पहुंच जाते। ये बरसों का उनका क्रम बंधा हुआ था। इज़हार गर्मियों की अपनी छुट्टियां मनाने हर साल की तरह इस साल भी अपने गांव आया था।
एक शाम यूं ही जब शहर का चक्कर काटकर वह अपने गांव की तरफ लौट रहे थे तो कुछ देर चौराहे पर रुक गए। हर बार की तरह उस चौराहे पर शाकिर और इज़हार ने कई शामे बिताई थीं, क्योंकि वहीं से उनके गांव का रास्ता कटता था। एक ही गांव में रहने वाले दोनों दोस्त एक ही चौराहे पर कई शामें बिताकर उस चौराहे के बदलते हुए नक्शा को सदा से देखते रहे हैं।
पिछले कई सालों में उस चौराहे का नक्शा बदल गया। पहले स्टेट हाईवे था तो सही, लेकिन वह फोरलेन नहीं था। लेकिन उन दोनों की दोस्ती के चलते देखते ही देखते कायापलट होना शुरू हुई और जो पुराना स्टेट हाईवे था, उसका नवीनीकरण जब किया गया तो पुराना रास्ता जहां से जाता था उस रस्ते को छोड़कर एक नया रास्ता थोड़ी दूर पर निकला। इस वजह से पुराना चौराहा उजड़ गया और सारे दुकानदारों को उस वक्त बहुत घाटा हुआ। अब नया रास्ता, नया चौराहा बस गया।
वहां पर धीरे-धीरे करके फिर से दुकानदारों ने अपना डेरा जमाना शुरू किया। कई होटल, पानी पतासे के ठेले, कुछ गैरेज खुले। हार के फूल का एक और ठेला भी वहीं शिफ्ट हो गया। मांगु दादा की चाय की दुकान भी आबाद होने लगी। अब मांगुदादा नहीं रहे, उनका नशेड़ा लड़का दुकान चलाने लगा। एक पुराना ठेला जो पिछले चौराहे पर भी उसी शक्ल में लगता था, अब वह भी नए चौराहे पर अपना ठीया जमा चुका था, जिस पर कचोरी समोसे और नमकीन बिका करता हैं।
सभी दुकानदार, ठेलेवाले अपनी पुरानी जगह छोड़कर धीरे-धीरे नए चौराहे की ओर खसक आए। एक पुराना मंजर देखते ही देखते आंखों के सामने से ओझल हो गया। कई दुकानदारों की बरबादियां भी उसमें शामिल हैं। खैर बरबादियां किसकी नहीं हुई उस वक्त के दौर में, लेकिन धीरे-धीरे बसाहट बढ़ने लगी और चौराहा धीरे-धीरे आबाद होने लगा, अलबत्ता चौराहा आबाद होने में वक़्त जरूर ज्यादा लगा, लेकिन पहले की तरह रौनक फिर भी न बन पाई। 
ऐसे ही एक शाम जब गर्मी अपने शबाब पर थी और सूरज ढलने को था। पूरा आसमान हल्दीवाले दूध की तरह फीका पीला हो रहा था, पंछी अपने घौंसलों में लौटने लगे थे। चौराहे पर ट्रकों के गुजरने का शोर अब बढ़ने लगा था। बहुत दूर तक ट्रकों के टायरों के शोर सुनाई दे रहे थे। चौराहे पर सड़क की तपिश थी, ऊपर से ट्रकों की गर्मी ने और भी माहौल को गरम कर दिया था। तब शहर का चक्कर लगाकर शाकिर और इज़हार लौट आए थे चौराहे पर और शाकिर की मोटरसाइकिल पर बैठे-बैठे बातें कर रहे थे। तब चौराहे पर फोरलेन को क्रॉस करके एक शख़्स पश्चिमम की दिशा में शाकिर और इज़हार की तरफ़ चला आया और उनसे थोड़ी दूर जाकर खड़ा हो गया। शाकिर ने फौरन ताड़ लिया कि यह शख़्स हिजड़ा है। शाकिर ने इज़हार की तरफ इशारा किया और कहा- “चलो इसके मज़े लेते हैं।” इज़हार ने अभी हामी न भरी थी इस बात की, इसलिए दोनों मोटरसाइकिल पर बैठे हुए थे। वह शख़्स समझ रहा था कि वह दोनों उसकी और घूरकर देख रहे हैं। फिर भी वह नजरें कतराकर थोड़ा सिमट कर खड़ा हो जाना चाहता था। इज़हार ने उसकी ओर देखा वह सलवार-कुर्ते में था, लेकिन वह लिबास औरतों का लिबास नहीं था, बल्कि मर्दों का लिबास वाला सलवार-कुर्ता था। सलवार-कुर्ता दर्शा रहा था कि अभी उसे पहने हुए एक या दो रोज गुजर चुके हैं, क्योंकि उनकी सलवटे और मटमेले रंग ने यह आभास इज़हार के मानस में उतार दिया था। इज़हार ने उसकी तरफ बागौर देखा तो उसने पाया कि उसका चेहरा लंबा, रंग गेहुँआ, आंखें थोड़ी नशीली, नाक नुकीली, होंठ का कटाव ऐसा जैसे किसी लड़की के होंठ हो। बाल उसके काले, सीधे लेकिन लंबेलंबे काँधों को छूने के लिए बेकरार। दाढ़ी-मूछें नहीं थी, क्लीन शेव था। पूरी काया दुबली-पतली और पैर में उसने एक फैंसी चप्पल पहन रखी थी। सीधे हाथ की पहली और तीसरी उंगली में चांदी के अंगूठी थी जिसमें से एक चांदी का छल्ला था। एक उल्टे हाथ के अंगूठे का नाखून कुछ बड़ा हुआ लेकिन करीने से उसे शेप दिया हुआ था।
शाकिर ने इज़हार से फिर कहा-  “चलो, इस मीठे का मज़ा लेते हैं।” मीठा शब्द पता नहीं लोक में कब बन गया, जिसका सीधा-सीधा अर्थ होता है, वह हिजड़े जो देह व्यापार के लिए आतुर रहते हैं। अर्थात वह देह की संतुष्टि के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं और पैसा पाते हैं। ऐसे हिजड़ों को या ऐसा शौक रखने वाले को लोक में मीठा कहने की एक रवायत चल पड़ी थी। इज़हार भी आश्चर्य से उसको देख रहा था। कुछ इंटरेस्ट इज़हार का उसमें आया और शाकिर की तरह तो नहीं, लेकिन न जाने किस संवेदना और अपनेपन से कुछ अनजानी तलाश में वह उस शख़्स की ओर शाकिर के साथ हो लिया।
 शाकिर ने कहा- “और माधुरी, कहां से आ रही है?” उन दिनों माधुरी का बड़ा क्रेज़ था। 
वह शख़्स थोड़ा सा सकुचा गया और ऐसी आवाज में बोला जिसमें हम किसी एक आवाज में दूसरी आवाज को मिला सकते हैं। न वह आवाज़ मर्द की थी और न ही वह आवाज़ औरत की थी। उन दोनों का मिला-जुला रूप था; जिसे हम अक्सर सुनते आए हैं। ऐसी आवाजें हमारे ज़हन में अब भी मौजूद हैं। उस शख़्स ने बड़ी विनम्रता से कहा- “सादाखेड़ी से।”
बस इतना कहकर वह उनसे डरा सहमा-सा खड़ा रहा, क्योंकि शाकिर के हाव-भाव, शक्ल-सूरत, डीलडोल इस तरह की है कि पहली बार में ही लोग उसे गुंडा समझ लेते हैं। लेकिन वह गुंडा नहीं, बल्कि एक रहम दिल का इंसान है। खेती-किसानी और खानदानी हड्डी होने से वह ऐसा दिखाई देता है। शाकिर ने फिर उससे पूछा- “किधर जाना है, प्यारियों?”
“कहीं नहीं, बस ऐसे ही थोड़ी अगले शहर तक जाना है।” 
शाकिर उससे चुहलबाजी करने लगा और पूछने लगा- “सच-सच बता कहां जाएगा?” 
इज़हार के मन में भी उत्सुकता थी कि वह जाने कि वह शख़्स कहां के लिए निकला है, क्योंकि इज़हार को पता था सादाखेड़ी उसके शहर के पास बीस किलोमीटर के अंदर एक गांव था, वह शख़्स वहीं से आया था। 
 इज़हार ने उससे पूछा- “क्यों, तेरा नाम क्या है?”
 उसने बताया- “सलीम।”
“अच्छा तो तू मुसलमान है?”
“हां, मुसलमान हूँ।” 
इज़हार को उसके हुलिए से ही अंदाजा हो गया था कि वह मुसलमान है। 
वह बात वहीं के वही रह गई थी, कि उससे पूछा जाए कि वह वास्तव में कहां के लिए निकला है? शाकिर को फिर से वह बात याद आई और उसने फिर जोर देकर पूछा- “सच-सच बता कहां जा रहा है?”
सलीम ने कहा- “अहमदाबाद जाना है, इसलिए हाईवे पर किसी ट्रक को हाथ देखकर वह अगले शहर तक जाऊंगा और उसके बाद ट्रेन से अहमदाबाद।” 
 इज़हार ने उससे पूछा- “क्या करेगा अहमदाबाद जाकर, तेरा कौन है वहां पर?”
 “अहमदाबाद में हमारे वाले सारे वहीं हैं और उन्होंने मुझे बुलाया है।”
 “किसने बुलाया तुझे?”
 “हमारी बिरादरी का एक पहचानवाला है, अहमदाबाद में ही है, उसी ने मुझे बुलाया है।”
“तो तू क्या पहली बार अहमदाबाद जा रहा है?”
“हां, पहली बार जा रहा हूँ।”
 “तूने घरवालों को बताया कि तू अहमदाबाद जा रहा है?”
“नहीं उनको अभी उनको पता तो नहीं, मालूम हो जाएगा घर छोड़कर आया हूं।”
“तो क्या तू अब कभी वापस घर नहीं जाएगा अब?”
“नहीं, मैं अब कभी घर वापस नहीं जाऊंगा।”
“बिना घरवालों के तू कैसे रह लेगा, कहां खाएगा, कहां सोयगा?”
“है ना वहां हमारी बिरादरी के पूरे लोग, सारा समाज हमारा ही है, वहाँ।” 
“लेकिन तू तो पहली बार वहां जा रहा है, तुझे वहां कोई दिक्कत नहीं होगी? तुझे डर नहीं लग रहा है कि कोई तुझसे कुछ गलत काम कराएगा?”
“नहीं, कोई डर नहीं! मेरी पहचानवाला वहां रहता है, बड़े मजे में रह रहा है।”
इज़हार ने कुछ भीतर से द्रवित होकर फिर उससे पूछना चाहा, कुछ देर रुका फिर पूछा-
“तेरे घरवाले तुझे ढूँढेंगे नहीं?”
 “नहीं ढूँढेंगे, क्योंकि वो लोग चाहते हैं कि मैं वहां से चला जाऊं। क्योंकि मैं उन जैसा नहीं हूं न।”
“फिर भी तू अपना घर छोड़कर क्यों चला जाना चाहता है? ऐसी कौन सी वजह है जो तू अपने घर नहीं रुक सकता?”
वह हिजड़ों वाले लहजे में फिर बोला- “मेरी वजह से मेरे घरवालों को परेशानी होती है, क्योंकि आसपास वाले मुझे न जाने क्या क्या कहकर छेड़ते हैं और मेरे जैसे लोग मेरे गांव में और भी तो नहीं हैं के मैं उनके साथ घुल-मिल जाऊं। मैं बहुत परेशान हो गया हूं उस माहौल से। मुझे छक्का-छक्का कहते हैं, मुझे गुस्सा आता है।”
“तो तेरे घरवाले उन्हें डांटते नहीं हैं या वे उन लोगों से नहीं लड़ते जो तुझे छेड़ते हैं?”
“पहले लड़ते थे, अब लड़ना बंद कर दिया है, क्योंकि उन्हें लगने लगा है कि मेरी वजह से उन्हें बहुत कुछ सहना और सुनना पड़ता है। इससे अच्छा मैंने सोचा यहां रहने से फायदा क्या है, मुझे अपनी बिरादरी में जाना चाहिए।”
“अच्छा! तेरी बिरादरी के लोग यहां पर भी तो हैं, उनके पास क्यों नहीं चला जाता?”
“गया था, लेकिन उन्होंने बोला कि यहां जगह कम है और कोई खास काम भी नहीं, इसलिए तू वहां जा जहां बहुत सारे लोग हों और काम भी हो।” 
“अच्छा! इसी वजह से तू अहमदाबाद जाना चाहता है?”
“हां!, अहमदाबाद से हमारी बिरादरी के बहुत सारे लोग आए थे, उनसे मिला था तो उन्होंने पता दिया था। वहीं अब जा रहा हूं।”
“तो फिर तू वहां जाकर क्या काम करेगा?”
“वही सब काम करूंगा, जो वो लोग करते हैं। नाचना-गाना, मांगने जाना जो भी कहेंगे करूंगा।”
“तुझे डर नहीं लगता उन लोगों के बीच जाकर, कहीं कुछ गलत-सलत काम करवाने लग गए तुझसे तो?”
सलीम फिर हिजड़ों वाले लहजे में बोला-“अरे भैया, हमारे साथ इतना तो गलत हुआ है! अब इससे जादा क्या गलत होगा?”
इज़हार बोला- “फिर भी मान ले, वो लोग तुझे धोखा दे दें और कुछ गलत तेरे साथ हो गया तो तेरे घर वालों को कौन ख़बर देगा?”
“नहीं! मुझे उन पर भरोसा है, वो लोग धोखा नहीं देते, मना जरूर कर देंगे रुकने के लिए, लेकिन किसी को धोखा नहीं देते।”
“तेरे घरवालों को पता चलेगा कि तू घर में नहीं तो वो तुझे ढूँढेंगे!”
“नहीं, वह लोग नहीं ढूँढेंगे, क्योंकि उन्हें यह महसूस हो चुका है कि मैं कहीं न कहीं जाने वाला हूं। मैंने बातों ही बातों में ऐसी बात पहले भी कह दी है और अभी दो दिन पहले भी कही थी। वो समझ गए थे मैं जाऊंगा, वो भी मुझे कभी नहीं रोकेंगे ये भी बात मुझे पता है।” 
इज़हार का मन अंदर से न जाने कैसा कड़वा पन लिए कसैला हो गया और उसे समझ नहीं आया कि वह उससे आगे क्या बात करें। बस एक विचार सुन्न उसके मस्तिष्क में कौंधने लगा और उसे वह देखता रहा शाकिर भी साथ में चुपचाप उदास -सा खड़ा था और उसकी बात सुन रहा था। मन तो उसका भी बहुत दुखी हो रहा था, लेकिन जितना इज़हार भीतर से मथ गया था, उतना शायद शाकिर नहीं मथा था या उसकी आदत भी नहीं थी इतने गहरे में उतरकर सोचने की। इज़हार के सामने केवल हिजड़े का प्रश्न नहीं था, वह एक इंसान था और इंसान के जीने के अधिकार के प्रश्न उसके दिमाग में सुई की नोक की तरह चुभने लगे। वह अंदर से न जाने किस सन्नाटे में उतरता चला जा रहा था, ऐसा सन्नाटा था जिसमें काला अंधेरा एक गुफा की तरफ ले जा रहा हो। इज़हार अनुत्तरित -सा उसके सामने देखता रहा और वह ट्रकों की तरफ जाने के लिए इशारे कर रहा था।
इज़हार ने फिर उससे पूछा- “तेरा नाम सलीम है, वहां क्या नाम होगा तेरा?”
वह फिर वही हिजड़ेवाली अदाओं में बोला- “मैं सलीम से सलमा हो जाऊंगी, अच्छा है ना ये नाम?” एक अनकही आज़ादी की ख़ुशी उसके चेहरे पर दमकने लगी और अंखे थोड़ी मुस्कराने लगीं उसकी। 
इज़हार रुँधे हुए गले में हामी देते हुए फिर बोला- “नाम तो अच्छा है, लेकिन काम अच्छा नहीं। तेरा क्या होगा यह मैं तो नहीं सोच सकता, जीना तो तुझे है उन लोगों के बीच। न जाने कौन -सी ताकत है तेरे पास जो तू अपना घर छोड़कर जा रहा है। मेरी बात मान अब भी तू अपने घर लौट जा, कोई और रास्ता निकाल लेना।”
“भैया, अब क्या रास्ता निकालें? मैं तो खुद रास्ते पर खड़ा हूं निकल जाने के लिए, अब निकल गया हूं तो लौटने की हिम्मत मेरे में। वापस जा के जाऊंगा भी कहाँ, वही उसी घर, उसी मोहल्ले, उन्हीं लोगों के बीच जहां दिन रात मुझे जलालत सहना पड़ती है और न जाने क्या-क्या सहना पड़ता है। ऊपर से घरवाले मुझे समझ नहीं पाते हैं, फिर क्यों जाऊं उन लोगों के बीच? मैं तो वहीं जाऊंगा जहां हमारी बिरादरी के लोग हैं। मुझे पता है मैं उन लोगों के बीच खुश रहूंगा। कम से कम इन बातों से छुटकारा तो मिलेगा। इतना कहते हुए सलीम उर्फ सलमा ने फिर ट्रक वाले को हाथ दिया। ट्रक ने हॉर्न जोर से बजाकर उसकी तरफ एक गंदा सा इशारा किया और ट्रक आगे निकल गया। इस बीच कुछ ट्रकों की हैडलाइट भी जलाने लगी थी, अंधेरा गहराना शुरू हो चुका था। इन सब स्थितियों को इज़हार और शाकिर निरंतर देख रहे थे। फिर शाकिर चौराहे पर रखें एक नांद से पानी पीने चला गया, क्योंकि वह दिन गर्मियों के दिन थे और शाम ढलते-ढलते सड़क बहुत तप चुकी थी, प्यास हलक में आकर अटक गई थी और दोनों के गले में कांटे से चुभ रही थी। इज़हार ने शाकिर को पानी की नांद की तरफ जाते हुए देखा तो उसने भी आवाज लगाई- “मेरे लिए भी पानी का लोटा लेते आना ।” और इज़हार फिर सलीम उर्फ़ सलमा से बातें करने लगा।
“सलीम तू क्या करेगा वहां जाकर, कुछ नहीं मिलने वाला। बेकार में लोग तुझसे गलत काम कराएंगे, तेरा क्या होगा मैं कैसे कहूं? अबे! तेरे जैसे नहीं होंगे वहाँ मुसलमान लोग, अलग धर्म को मानते हैं वो लोग।”
“नहीं भैया, अब तो जीना-मरना सब बिरादरी में होगा, मुसलमान हों या हिन्दू क्या फरक पड़ता है अपने को? जैसी जिंदगी मिली है, वैसे एक दिन मर जाएंगे, लेकिन मरने से पहले अब मैं आजाद होकर खूब जीना चाहता हूं मैं अपनी मर्ज़ी का। अब अपनी पहचान यहीं छोड़कर जा रहा हूँ और वहां नई पहचान सलमा के नाम पर बनाऊंगा?”
“सलीम तेरी पहचान तेरे गांव, तेरे घर में है, वहां अनजाने शहर में अनजाने लोगों में कैसे पहचान बना पाएगा? कौन तुझे जान पाएगा, तू कौन है? कहां से आया है? और भी बातें जो तू अपने मन में रखता होगा, वो उनको कैसे बताओगे?”
“नहीं भैया, वहां जाना है। मैं यहां घुट के जीना नहीं चाहता। वहां खुलकर मर जाऊं तो मुझे कोई अफसोस नहीं होगा। रही पहचान की बात, वह तो एक दिन बन ही जाती है। गांव में हम देखते तो हैं; बकरा-बकरी हाठ में बिकने जाते हैं और कोई उन्हें खरीद लेता है। फिर वह दूसरे घर चले जाते हैं, कुछ दिन उन्हें अटपटा लगता है और वापिस उस नई दुनिया में खो जाते हैं। ऐसे ही मैं भी तो हूं, मैं थोड़ा अलग हूं, इसीलिए ऐसे लोगों के बीच जाना चाहता हूं जो मेरे जैसे हों, मैं वहां जाकर खुश ही रहूंगा? ” 
हाइवे के उस पार शाकिर नांद में से लोटा डालकर पानी निकाल चुका था और उसे हाथ से अपने मुंह में पानी डालकर कुल्लियां कर रहा था। गर्मी के मारे उसने थोड़ा मुंह भी धोया और करीब एक लोटा पानी पिया। अगला लोटा भरकर वो इज़हार के लिए सड़क के उस पार से इधर आने के लिए कदम निकाला ही था, इधर सलीम ने ट्रक वाले को हाथ दिया, ट्रक वाला करीब सौ-डेढ सौ फीट दूर जाकर ब्रेक लगाकर रुक गया। सलीम को समझ आ गया था कि वह उसे लिफ्ट देगा। सलीम ने इज़हार की तरफ बिना देखे ही लपककर दौड़ लगाई और ट्रक वाले से कुछ कहा। ट्रक वाले ने क्लीनर वाला केबिन खोल दिया और सलीम ट्रक पर सवार हो गया। यह सारा दृश्य इतनी जल्दी से चला की इज़हार उससे आखिरी बात कहे, लेकिन मौका ही नहीं मिला। उधर शाकिर सड़क क्रॉस करके इज़हार की तरफ आया। इज़हार को लोटा दिया। इज़हार ने भी कुल्लियां कीं, मुंह धोया और पानी पिया। लेकिन जब गले के नीचे पानी उतरा तो साथ में इज़हार के आंसुओं के खारेपन को भी नीचे ले गया। न जाने वह कैसे आंसू थे जो इज़हार की पलकों तक तो आ गए थे, लेकिन वह बह नहीं सके। टीस उसके मन में उठती रही और वह बेचैन होकर गर्मी के माहौल में और भी बदहवास होने लगा। न जाने कैसी उमस उसके भीतर उठने लगी। उसका कलेजा पूरा कड़वा हो गया, पसीज गया। उसने मुंह धोकर थोड़ा आंखों में भी पानी मार लिया था तो ताज़गी उसे महसूस हो रही थी, लेकिन भीतर से मन उतना ही मुरझाए हुआ, उतना ही उदास था, उतना ही बेचैन था, जितना सलीम का रहा होगा।
डॉ. मोहसिन ख़ान
हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं शोध निर्देशक जे.एस.एम. महाविद्यालय, अलीबाग-402 201 ज़िला- रायगड़ (महाराष्ट्र) संपर्क - khanhind01@gmail.com

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