मंगलेश डबराल : पहाड़ पर लालटेन के कवि को नौ से अधिक दीया बनाने की जिम्मेवारी देनी थी! 1
मंगलेश डबराल
यही वह वक़्त था जब तथाकथित स्त्रीवादी मेरे काँधे पर बन्दूक रख कर गोली चला सकती थी, ऐसा एक लेखक-कवि के हवाले से मुझे पता चलता है! नाम लेना उचित नहीं होगा सो नहीं ले रही! यह सब इसलिए था क्योंकि मैंने कविता लिखी थी. एक ऐसे विषय पर- एक ऐसे रूपक प्रस्तुत कर जिसे समझना छद्म बुद्धिजीवियों के बूते की बात नहीं थी! फेसबुक पर एक तथाकथित स्त्रीवादी लेखिका ने तो अपने वाल पोस्ट के माध्यम से मेरी तौहीन करने की भरसक कोशिश भी की थी. 
मैं यह सब देख कर इतना व्यथित थी कि भावावेश में आकर मंगलेश डबराल जी को कविता मेल कर उनसे- उनकी राय जाननी चाही. उस वक़्त ये मेरे लिए बहुत ज़रूरी था. भरत तिवारी जी के शब्दांकन ब्लॉग पर वह कविता प्रकाशित भी हुई और कई लेखकों द्वारा सराही भी गई जिसमे मंगलेश जी का नाम सबसे पहले आएगा. आप लोगों के उत्सुकता के लिए बता दूं कि ये कविता थी “ऐश ट्रे जैश-ऐ-मुहम्मद और वैलेंटाइन डे”. ऐसा नहीं था कि ये मेरी जिंदगी की कोई पहली कविता थी, पिछले एक दशक से भी अधिक का वक़्त हुआ कविता लेखन में सक्रिय हूँ.
नौ बरस की थी तब से मेरी कवितायेँ हिन्दुस्तान जैसे पत्र से छपती आ रही है और कादम्बिनी के संपादक ने मुझे मेल कर मुझसे कवितायें मांगी थी. जाने-माने कथाकार अवधेश प्रीत जी इस बात के साक्षी हैं कि उन्होंने मेरी कविताओं को बढ़ते और बनते देखा है. २००९ में मेरा प्रथम कविता-संग्रह “हरे पत्ते पर बैठी चिड़ियाँ” जागृति साहित्य प्रकाशन पटना से प्रकाशित होकर आया और उस वक़्त मैं जिस उम्र से थी उस वक़्त कविताओं की राजनीति और साजिशों का कुछ पता न था. मैं उस वक़्त भोली बच्ची थी जो नई-नई, नई दिल्ली आई थी. वक़्त बितता रहा, कविताएँ लिखती रही और धीरे-धीरे तमाम बड़ी पत्रिकाओं ने मुझे छापना शुरू किया. मेरी शुरुआत ही पाखी और हंस जैसी स्तरीय पत्रिका से जिसमें विशिष्ट लेखकों-कवियों की रचनाओं के साथ मेरी रचनाएँ भी अपना जगह बनाने लगी!
अब भी परिचय के नाम पर मैं साहित्य की दुनिया में किसी को नहीं जानती थी, किसी से कोई राब्ता नहीं था. मैनेजमेंट की पढ़ाई और इंडस्ट्रियल विजिट से मुझे फुर्सत ही कहाँ थी. बस पाठकों कि टिप्पणीयाँ/राय जो हर कविता के प्रकाशन के बाद मुझ तक पत्रिकाओं के माध्यम से पहुँचती रही है. मेरे घर पर चिट्ठियों का अम्बार लगता था और मैं तभी सत्रह बरस की थी, एक पत्र आया था किसी पाठक का जो पटना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर थे उन्होंने लिखा था, तुम्हारी कविता पढ़ना जैसे गुफ़ाओं से निकलना है. उस पाठक जिनकी उम्र अब तकरीबन अस्सी बरस के करीब होगी अब तक मेरी कविताओं को खोज कर पढ़ते हैं. दिल से सलाम ऐसे महबूब पाठकों का! कभी-कभी जब काव्य-पाठ के लिए मेल से सूचना मिलती तो इतनी हिलोरित हो जाती कि पापा को सबसे पहले फ़ोन कर कहती, “पापा आपको पता है , मैं आज काव्य पाठ के लिए बुलाई गई हूँ”! 
तिकड़म, ढोंग, चाटूकारिता और अवसर जैसे शब्द मेरी जिंदगी के शब्दकोष में कभी से नहीं रहे. माँ कहती थी, “तुम तो पैदाइशी लेखिका हो मेरी बेटी!” तभी दूसरी कक्षा में मुझे स्कूल की तरफ से कविता लेखन के लिए पुरस्कृत किया गया था. जो है मेरे भीतर सब बाहर उम्र के हरेक बसंत पर निकलता रहा है. अब तक साहित्य अकादेमी से भी दो दफ़ा छप चुकी मगर अब भी फ़िरकापरस्ती और राजनीति नहीं समझती हूँ. लिखती हूँ और केवल लिखती हूँ. लिखती हूँ इसलिए कि जिन्दा रह सकूं कभी भी ये ख्याल भूले से भी न आ सका कि कोई महान लेखिका बनना है या कि दस किताबें अपने नाम करवा लेनी है. चाहती तो मैं भी कम-से-कम तीन-चार किताबें तो छपवा ही लेती अब तक मगर  प्रोफेशनल लाइफ ने कभी इतना कन्सेशन नहीं दिया. रोटी भी कमानी है, छत भी टिकाना है और तब जाकर कुछ कविताएं लिखनी है! अब तक जो भी किया अपने बलबूते किया. जितना मिला सब शुद्ध मिला और सबसे अच्छी बात कि हमेशा अच्छे और ज़हीन लोगों के बीच रही. साहित्य की भूमि मुजफ्फरपुर से हूँ तो मेरी कविताई बचपन को जानकीवल्लभ शास्त्री जी, रश्मिरेखा जी और अंजना वर्मा जी ने नज़दीक से देखा है. चाहे रमणिका गुप्ता जी हो, राजेन्द्र यादव जी, अवधेश प्रीत, वरिष्ठ कवयित्री अनामिका जी या फिर अर्चना वर्मा और फिर इधर उर्दू साहित्य से भी बहुत संवेदनशील और विद्वान् लोगों के संपर्क में रही. रहमान मुसव्विर जी आपसे उर्दू सीखी हूँ बहुत शुक्रिया आपका. मैं वाकई ख़ुशनसीब हूँ कि सब मठाधीशों से अलग वाक़ई में सच्चे साहित्यकारों और और अच्छे लोगों के संपर्क में रही. पहल के संपादक ज्ञानरंजन जी और परिकथा के संपादक शंकर जी की भी आभारी हूँ जिन्होंने मेरी कवितायेँ पढ़कर उसे भावपूर्ण संवेदनशील रचना कहा. महरूम मजीद अहमद जी तो हमेशा मेरी कविताओं के कायल रहें. एक दिन मंडी हाउस पर लेखकों और कवियों में बहस छिड़ी थी किसी शरारती तत्व ने कह दिया था, “प्रेमा क्या लिखती है बस प्रेम गाती है. मजीद जी ने उसे अच्छा जवाब दिया था, “सुनो, तुम अभी उसे समझने के लायक नहीं बने हो इसलिए हद में रहो !” यह सब कुछ ऐसे प्रशंग है जो हमेशा जेहन में रहेगी! 
थोड़ा भुलक्कड़ और लापरवाह हूँ कि ज्ञानरंजन जी के मांगने के बाद भी उनको अपनी कवितायेँ अब तक न दे सकी. जल्द ही भेजती हूँ सर अब याद आ गया है!
मंगलेश डबराल जी के उस मेल जिसमें उन्होंने कविता के बारे में लिखा यहाँ बताना बहुत जरूरी है, उनका लिखना था, “प्रेमा, कविता संवेदशील मन से लिखी गई एक कोमल व विचारोत्तेजक कविता एक साथ है! अतः सार में कह सकते हैं कि एक सुंदर और भाव-प्रवण कविता है.” मंगलेश जी का यह मेल मेरे पास अब तक सुरक्षित है. यह सब पढ़ कर ऐसा लगा जैसे किसी ने आबरू बचा ली हो. मैं खुश थी उनकी टिप्पणी से और चाहती थी कि यह मेल पब्लिक कर दूं मगर मंगलेश जी ने कहा, अभी नहीं! थोड़ा ठहर जाओ वक्त आने पर सबको पता चलेगा. अभी नहीं हरेक चीज का अपना समय आता है. इस बात-चीत को अभी यहीं रहने दे मैं अलग से इस पर लिख दूंगा. क्या पता था कि वो समय ऐसे आना था….काश! ये समय कभी न आता! 
मैंने उनकी बात रखते हुए उस मेल को कभी उजागर नहीं किया वरना जिन लोगों ने मुझे सरेआम बेईज्ज़त किया था उनको कब तक जोरदार तमाचा लग चुका होता. खैर! अगर वो इस संस्मरण को पढ़ रहे हैं तो मुझे पता है उन्हें थप्पड़ की आवाज़ मिल चुकी होगी. 
बस इस मेल संवाद के बाद बरसों बीत गए तकरीबन दो बरस और मेरा मंगलेश जी से कोई राब्ता नहीं हुआ. वापस से वार्तालाप शुरू हुआ मेरे सपने में देखे हुए उस मंज़र से जिसमे मंगलेश जी को मैंने दीया बनाते हुए देखा था जिसका फिर बाद में मैंने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से जिक्र भी किया था. 
आज सपना का हरेक दृश्य उपस्थित करूंगी जिसे मैंने संक्षेप में फेसबुक पोस्ट पर कहा था. हालाँकि, इस सपने के बाबत मंगलेश जी मुझे बार-बार पूछते रहे, प्रेमा सपना तफ़सील से बताओ मगर मैंने इसे छुपाना ही उचित समझा बस सपने का आधा भाग ही बताई जिसकी दीप जलने की बात पर समाप्ति कर दी. हर रचनाशील व्यक्ति खासकर कवियों का सपनों पर भरोसा होता है और शायद मंगलेश जी का भी था! हैरत है कि ठीक उसी रात उन्होंने भी एक सपना देखा था जिसमें उन्होंने खुद को होटल के एक कमरे में फंसा हुआ पाया था और घर लौटनें के लिए उनके पास पैसे नहीं थे. विदित हो कि मंगलेश जी अस्पताल से घर वापसी जल्द चाहते थे जैसा कि बाद में खबरों से पता चला. 
सपना यूं था, “मंगलेश डबराल जी यहाँ हमारी सोसाइटी में बिल्कुल मेरे फ्लैट के बाजू वाले फ्लैट में शिफ्ट हो गए हैं. चूकी लॉकडाउन लागू है उन्होंने इस बारे में  किसी को सूचित नहीं किया है. मुझे मेरे मालिक माकन के हवाले से सूचना मिलती है कि आप बहुत ख़ुशनसीब हैं, देश के सबसे चर्चित वरिष्ठ कवि अब आपके पड़ोसी है. मैं बात की सत्यता के लिए जब सामने वाला दरवाज़ा खटखटाती हूँ तो क्या देखती हूँ कि मंगलेश जी चुपचाप बैठे मिटटी का दिया बनाने में मशगूल हैं. मैं पूछती हूँ, “सर, आप ये क्या कर रहे हैं?” आप मुझे देखते हैं और कहते हैं, मैं तुमको दीया बनाना सिखाऊँगा अब कोई चिंता नहीं करो! दीया इतना सुघड़ बना है कि ऐसा दीया मैंने आज तक बाज़ार में नहीं देखा है. अचानक से चारो ओर ख़ामोशी है. आसमान उदास बदल घेरे हैं, हवा उदास-सी और ठण्ड बहुत मायूस-सी महसूस हो रही है. फ्लैट का दरवाज़ा बहार से बहुत खामोश दिखता है. अजीब-सी मनहूसियत है चारो ओर एवं मंगलेश जी बीमार-से कमरे के एक कोने में बिस्तर पर बैठे हुए ही निरंतर दीया बनाने की हर संभव कोशिश किए जा रहे हैं!
मेरे कमरे में पहुँचने पर मंगलेश जी कह पड़ते हैं, “प्रेमा, मैं आठ-नौ दीया ही बना सकूंगा आगे तुम बना लो!” मैं समझ नहीं पा रही थी कि मंगलेश जी ऐसा क्यों कह रहे हैं मगर वो बहुत कमजोर भी दिख रहे थे! सपना यहीं पर समाप्त हो जाता है. अब आगे उसके बाद की घटनाओं पर प्रकाश डालते हैं.
इस सपने के ठीक पाँच महीने बाद दिसम्बर में- जिस बाजू वाले फ्लैट में मैंने मंगलेश जी को शिफ्ट होते देखा था ठीक उसी फ्लैट में एक बुजुर्ग महिला रहती थी उसका इंतकाल हो गया. सुबह पड़ोस की आंटी ने बिल्कुल उसी अंदाज में दरवाज़े नॉक कर हालात का जायजा लेती है बिल्कुल उसी अंदाज़ में जैसे मैं अपने सपने में मंगलेश जी के बारे में जानना चाही थी. इस सपने का भी मैंने अपने फेसबुक पोस्ट पर जिक्र किया था. दिसम्बर महीने में ही मंगलेश जी भी अस्पताल में भर्ती रहे थे और ९ दिसम्बर को इस दुनिया को अलविदा कह दिया. अब सपने में आठ से नौ दीये बनाने की बात को फिर से पढ़िए ….ये सब क्या था? मंगलेश जी की मृत्यु की ख़बर के बाद यह सब दृश्य तेजी से मेरे आँखों के सामने नाचने लगे. एक-एक बातें, परिस्थिति, परिवेश, वातावरण और शब्द आगत की पूर्व सूचना थी. 
मुझे इल्म तो इस सपने के बाद से ही सब कुछ हो गया था और मैं चाहती थी कि मंगलेश जी के साथ एक फेसबुक लाइव सेशन रखूँ. मैं सब कुछ बहुत जल्दी करना चाह रही थी. मैंने मित्र राहुल झा को फ़ोन कर कहा फेसबुक पर लाइव सेशन को संभालो और उसके पास उस दिन के लिए कोई टाइम स्लॉट खाली नहीं थी. मगर मुझे क्या हुआ था कि मैं कहती हूँ, “राहुल सारे कार्यक्रम कैंसिल कर दो आज और आज ही मुझे इंटरव्यू करनी है और फिर तब जाकर पोस्टर बनवाई गई और लाइव सेशन के लिए तारीख मुकर्रर की गई.  
अब इस बात की भी तफ़सील देती हूँ- मंगलेश जी उस दिन बहुत व्यस्त थे और फेसबुक लाइव से जुड़ने की उनकी इच्छा भी कुछ खासा नहीं थी फिर भी मैंने कहा तो यह कह कर हामी भरी की प्रश्नों की संख्या सीमित रखी जाए. मैंने बात मान ली और लाइव कार्यक्रम संपन्न हुआ. उन दिनों फ़ोन पर उनसे हुई बातों से पता चलता था कि वो कोरोना की वजह से खासे चिरचिरे हो गए थे. मंगलेश जी कहते थे कि “कोरोना कुछ अतिरिक्त लम्बा चला गया है. बेटी, अल्मा भी घर से काम करती है उसे भी ज्यादा काम करना पड़ता है. मुझे अभी बहुत से काम पूरे करने हैं और चाहता हूँ कि जल्दी ही सब कर दूं!” उनके इन बातों से समझा जा सकता हैं कि वो इस महामारी की वजह से बेहद एकाकी महसूस करने लगे थें. मुझे इस बात का अफ़सोस ताउम्र रहेगा कि मैं मंगलेश जी से कभी नहीं मिल सकी थी और जब भी बात होती उनका ये कहना कि जैसे ही कोविड खत्म होता है तुमसे सबसे पहले मिलूंगा, प्रेमा! ये बातें मेरे कानों में गूंजती रहती है जब भी मैं कवि को सोचती हूँ! 
अंक पाँच को लेकर भी ख़ासा विश्लेषन किया अब देखिए कि लाइव सेशन की तारीख और उनके साथ हुए बातों एवं उनके अलविदा कहने की तारीख में कितनी समानताएं है. इंसान का अंतर्मन उसकी अंतर्चेतना और संवेदनशीलता जोकि छठी इन्द्रिय को संकेत करती है सब बातें जानता रहता है. अगर इसे जागृत कर लिया जाए तो सब कुछ जाना जा सकता है- आगत भी और विगत भी! 
लाइव सेशन के पोस्टर बनाने और मेल व फ़ोन से संवाद होने की तारीख थी 6-6-20: 6+6+2 =14 (1+4) जिसका पूर्ण योग 5 होता है. उस दिन बातों के दौरान मंगलेश जी के शब्द मेरे कानों में अब भी जैसे गूँज रहे है, प्रेमा, प्रश्नों की संख्या सीमित रखना बहुत वक़्त नहीं दे सकूंगा! 
मंगलेश जी ने जिस दिन इस दुनिया को अलविदा कहा उसका भी योग 5 आता है. मतलब 9-12-20: 9+1+2+2= 14 (1+4) और यह योग भी 5 आता है! 
और मुझे पता था उस दिन कि न जानें हमारी अगली मुलाकात अब कब हो……शायद! मैंने बेतरह लाइव सेशन को लम्बा खींचा और वो सब बातें जोड़ती रही थी जिससे वार्तालाप के समय को लम्बा किया जा सके. मुझे उस दिन बहुत कुछ पता चल गया था और मैंने कुछ भी परवाह किए बिना इस इंटरव्यू की शुरुआत इसी गीत के साथ की थी, “ऐ दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाएं काहे को तूने दुनिया बनाई…?” कई लोगों ने टिप्पणी की थी जिसमे कईयों ने कहा होगा कि मैंने बहुत बोला उस दिन और मंगलेश जी को बहुत कम बोलने दिया था! आपकी बातों से सहमत हूँ मगर मैं क्यों बोल रही और क्यों गा रही थी यह सब सिर्फ़ उस वक्त मैं ही जानती थी! 
आत्माएं नहीं मरती है इसी लोक में विचरण करती रहती है, शारीर एक माध्यम भर है यात्रा करने का! एक शारीर के नष्ट हो जाने पर आत्मा अपनी अगली यात्रा के लिए दूसरे शारीर का इंतज़ार करती है अगर कोई भी इच्छा अपूर्ण रह गई हो इसलिए मृत्यु एक उत्सव है जो नए शारीर धारण करने का पुनः संयोग देता है. रूह हमेशा जिन्दा रहती है! 
बस अभी-अभी इस संस्मरण की बातों को मेल किया ही था कि रात ख्वाब में देखती हूँ कि मंगलेश जी मुझसे मिलने आए हैं. मैंने फ़ौरन रिवर्ट मेल में संपादक से कहा कि अभी आलेख पोस्ट न करें कुछ और जोड़ना जरूरी होगा. संस्मरण मेल करने वाली रात सपने में क्या देखा ये भी आपलोगों के साथ यहाँ साझा कर रही हूँ.
मुझे सौ फीसदी इस बात का इल्म था कि मैं यह सपना ज़रूर देखूँगी और मैंने इसे देखा क्योंकि मुझे कवि से मिलना जो था! रात सपने में देखा है कि मंगलेश डबराल जी मिलने आए हैं. उन्होंने नया कोट पहन रखा था और टोपी भी लगा रखी थी. हम किसी घर की छत पर हैं. छत बहुत बड़ा था और मंगलेश जी जीने-घर के पास खड़े मुझे पुकार रहे थें. मैं देखती हूँ तो खुश होती हूँ और सामान्यत: जैसी बातें करती थी वैसी ही बातें करती हूँ. मंगलेश जी बिल्कुल स्वस्थ्य और खुश थें. मुझे सपने में यह भी दिखता है कि मंगलेश जी ने हाथों पर दास्तानें पहन रखे हैं और मुझे कहते हैं, कभी-कभी तुमसे बस बात करना चाहता हूँ. यह कह कर मंगलेश जी भावुक हो जाते हैं. मैं नहीं चाहती थी कि ऐसी कोई भी बात हो जिससे कवि और भावुक हो इसलिए कहती हूँ, “आप बस यह समझिए कि मेरी रूह से आप जो भी कहना चाहे मैं सब सपने में सुन लूंगी और वैसे भी सपने वाली बातों पर तो आपका यकीन हो ही गया था सो जो भी सन्देश देना चाहते हैं बता दें. मंगलेश जी इस बात पर खुश होते हैं और कहते हैं, “अल्मा से बात करती रहना वो बहुत संवेदनशील है!” और मैं एकदम हैरत से उठती हूँ! यह सब ऐसा था जैसे मंगलेश जी थोड़ी देर के लिए साक्षात् सामने खड़े थे और मैं सब सुन रही थी. 
विश्लेषण: नए कोट पहनने का संकेत फिर से जन्म लेने से हो सकता है, हाथों पर दास्तानें का अर्थ अभी वो उस अवस्था (शैशव) में हैं कि कलम नहीं पकड़ सकते और मुझसे बात करने की इच्छा का अर्थ यह कि कवितायेँ कवि के मन में अभी बहुत है! यह मेरा अपना विश्लेषण है बाकी तो खुदा बेहतर जानता है! 
कितना आश्चर्य !जिंदगी  आप किसी ऐसे इंसान से सपने में इस गहरी संवेदना से बतिया रहे होते हैं जिसे आप असल जिंदगी में कभी नहीं मिले थे. मैं मंगलेश जी से कभी नहीं मिली थी लेकिन अब इसका मलाल नहीं होगा क्योंकि मैं सपने में उनसे मिलकर बतिया चुकी हूँ. आत्माएं अपना काम कर जाती है वो किसी स्थूल जगत या पदार्थ पर आश्रित नहीं होती है!
अलविदा! प्रिय कवि, आप अपनी कविताओं में हमेशा ज़िन्दा रहेंगे क्योंकि कवि कभी नहीं मरते है! 
पहाड़ पर लालटेन के कवि के नवें दीये के बाद के दीये बनाने वाली कही उस सपने की बात को भी दोहराती हूँ और एक कवि होने के नाते मेरी कोशिश रहेगी मैं इस जिम्मेवारी को अपनी जिंदगी में पूरी कर सकूं! 
एक कविता दोबारा  (प्रिय कवि मंगलेश डबराल जी को समर्पित)
मैंने वक्त, मौसम, हवा और बरसात देखी
फिर शहर का नाम चुना
ये शाम अस्त होते सूरज और बादलों की गरज
एक बयान है कि
वक्त ने अभी करवट बदली है
रजनीगन्धा की सुगंध, इन्द्रधनुषी आसमान , बहुत तेज चलती हवा
और
चुपचाप एक कमरा जहाँ लालटेन समय की जेब में खो गई है
मैंने हौले से नीली लाइटों की झालर जला दी है
छत से आसमान नहीं धरती से उसकी दूरी दिख रही है
बालकनी से वृक्षों का झुरमुट
बरसों बीत जाने का पुख्ता सबूत है
शहर तुमने क्या बदला कि
मंजिल जिसे आखिरी कहते हैं बहुत पास मालूम पड़ रहे हैं!
समुद्र, किला, बरसों पुराना मकान और मजारें
सब कुछ जैसे आख़िरी है
लेकिन आख़िरी कुछ भी नहीं है!
रुको जरा! फिर से मैं एक शहर बदल लूं
फिर से चाँद की जगह आसमान पर कुछ बदला हुआ दिखाई दे
आगाज़ हो पूर्ण चन्द्रमा का
फिर से लिखूं एक प्रेम कविता
बसंत, शरद, पूर्णिमा, और मेघ
कागज़ पर ग्रहण की आशंकाओं से सहम गए हैं!
लिख लेने दो एक कविता दोबारा
जिसमें जीवन उम्मीद फिर होगी
एक दीपक फिर जलेगा
बाती हम मिल कर पिरोएँगे
यात्रा अभी बाकी है
मनाना है जश्न मुझे
अभी तुम्हारे उम्र दराज़ होने का
और तिमिर उदासियों का
आसमान के इन्द्रधनुष-सा
आगामी बरसात में धुल जाएगा!
देश की प्रतीष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कवितायेँ और कहानियाँ प्रकाशित. चर्चित रचनाओं में लव जेहाद, ककनूस, बंद दरवाज़ा, हवा महल और एक थी सारा विशेष तौर पर पाठकों द्वारा पसंद की गई. हंस में छपी कहानी “मिस लैला झूठ में क्यों जीती हैं?” खासा चर्चा में रही है. फ़िलवक्त अपने एक उपन्यास को लेकर शोधरत हैं. सम्पर्क - prema23284@gmail.com

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