Sunday, June 21, 2026
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डॉ. मुक्ति शर्मा की कहानी – पूत-कपूत

“रवि बेटा तुम क्या कर रहे हो?”
“मां, तुम जाओ अंदर मुझे मेरा काम करने दो, तुम्हें क्या पता ? मैं क्या कर रहा हूं।”
“हां- हां मैं तो अनपढ़ हूं मुझे तो कुछ भी पता नहीं, पता नहीं आज कल के बच्चों को क्या हो गया है।”
“मां देख लेना, एक दिन इतना पैसा कमाऊंगा ना कि तुम दंग रह जाओगी देखकर।”
“जा -जा ख्याली पुलाव मत बना।”
“चौबीस घंटे फोन लेकर बस  ब्लॉग वगैरा बनाता रहता है। पैसा कमाएगा, हमारे जमाने में तो पता भी नहीं था, ब्लॉग होता क्या है?”
“जब तुम्हें कुछ पता ही नहीं तो तुम जाओ यहां से मुझे मेरा काम करने दो।”
“भगवान जाने आजकल की औलाद को क्या हो गया है ? इनको तो इतनी भी तमीज नहीं कि मां-बाप से बात कैसे की जाती है! हमारे जमाने में तो मां-बाप को देखते ही हमारी बोलती बंद हो जाता थी। जवाब देना तो दूर की बात!”
“मां मैं ब्लॉग बनाने के लिए दिल्ली जा रहा हूं मुझे कुछ पैसे दे दो।”
“नहीं है मेरे पास पैसे, उलटे-सीधे मुंह बनाने के लिए।”
“जब कमा कर लाऊंगा तब देखना”
“चल भाग यहां से फिलहाल तो हमारे ही पैसे खर्च हो रहे हैं। पूरा दिन लफंगों की तरह घूमता रहता है ।आवारा लड़कों के साथ ना काम का ना काज का दुश्मन अनाज का। तुझे क्या पता कि पैसे कितनी मेहनत से कमाए जाते हैं। जा ₹1 कमा कर दिखा, मैं भी देखती हूं तुझे कौन देगा।”
“कुछ पैसे मांगे थे इस पर तुम लेक्चर देना शुरू हो गई। जाओ मुझे नहीं चाहिए तुम्हारे पैसे में खुद  कमाऊंगा, तो तब मुझसे मांगना तुम्हें ₹1 नहीं दूंगा।”
“जा-जा बड़ा आया। हमें तेरे पैसे की जरूरत नहीं है। भगवान का दिया हमारे पास सब कुछ है बस भगवान तुझे बुद्धि दे।इन ब्लॉगर दोस्तों से दूर रखें।इंटरनेट ने तो लोगों की जिंदगी खराब कर दी। जेब में ₹2 नहीं तो खुद को बादशाह समझते हैं।”
रवि ज्योति की बातें सुनकर बहुत दुखी हो गया उसे ज्योति पर बहुत गुस्सा आ रहा था।
“मेरी मां बहुत खिच -खिच करती है अभी अंदर ही अंदर बड़बड़ा रहा था”!
रात को रवि ने खाना खाया और सोने चला गया।
ज्योति भी अपने कमरे में सोने के लिए चली गई। सुबह  वाली बात रवि के दिमाग में हलचल मचा रही थी। उसे नींद नहीं आ रही थी, उसके अंदर का शैतान जाग उठा। मां बहुत बोलती है क्यों नहीं इसका काम ही तमाम कर दूं आज रात को?
चुपके से उठा और ज्योति के सिर पर एक बहुत बड़ा पत्थर दे मारा। ज्योति लहूलुहान हो गई और रवि घर से भाग गया।
रवि को घर से भागता देखकर ज्योति भी उसके पीछे भागी – “रवि , रवि रुको ,रुको, रुको। तुमको मेरी कसम है..” ज्योति के सिर  से खून बह रहा था।
जब बाकी लोग भी इकट्ठे हो गए तो वह कहने लगे – “नहीं-नहीं। कुछ नहीं हुआ सब ठीक है पर बहन तुम्हारे सिर से तो खून बह रहा है।”
“किसी ने हम पर हमला कर दिया था। उसी के पिछे भाग रहे थे मैं ओर रवि!  वह दो अनजान व्यक्ति यही से भागे हैं।”
पुलिस स्टेशन  में एफआईआर लिखवाई गई। कि अनजान व्यक्ति आए थे हमला कर दिया…
आखिर मां तो मां ही होती है…
क्या ज्योति को ऐसा करना चाहिए था?
डॉ. मुक्ति शर्मा
डॉ. मुक्ति शर्मा
संपर्क - 9797780901
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23 टिप्पणी

  1. वर्तमान परिवेश को साझा करती कहानी ।
    मॉं तो मॉं होती है।
    बाकी उत्तर अनुत्तरित…

  2. मुक्ति शर्मा जी की कहानी ‘पूत कपूत’ आज की ऐसी पीढ़ी की कहानी है जो आभासी दुनिया में इस कदर रम गई है कि वास्तविक रिश्तों का उसके लिए कोई मूल्य नहीं रहा । इच्छा पूरी न होने पर वे कुछ भी कर सकते हैं। यहां तक कि हत्या करने से भी वे गुरेज न करेंगे। यह कहानी बहुत डरावनी है।
    और मां…..यहां मां, मां होने के चक्कर में गच्चा खा गईं हैं। ऐसी ममता का कोई मोल नहीं है। जो घर नाश कर सकता है उसे दुनिया का नाश करने में कितनी देर लगेगी?

  3. कहते हैं कि साहित्य समाज का आईना होता है, साहित्यकार समाज की ही किसी घटना से प्रेरित होकर साहित्य की रचना करता है. अब सोचने वाली बात ये है कि इस डिजिटल युग में समाज जा कहाँ रहा है, ये ममता, प्यार मोहब्बत का लगता है डिजिटल की दुनिया में कोई अस्तित्व ही नहीं है…
    बचपन से बच्चों को इस डिजिटल की बीमारी से दूर रखेंगे तो ये हमारे और समाज के हित में होगा…
    मुक्ति जी बधाई की पात्र हैं, जिन्होंने समाज के इस भयावह रूप को अपने पाठकों के सामने रखा…

  4. कथा का भाव अच्छा है,पर लगता है कंप्यूटर ने कश्मीरी से हिंदी किया है, जो अनुवाद सही नहीं है।

  5. बहुत अच्छी और संवेदनशील कहानी।वर्तमान परिवेश में अधिक से अधिक अति शीघ्र हासिल कर लेने की इच्छा युवाओं को पथभ्रष्ट कर रही है।पर समाधान भी क्या है? माता पिता का टोकरा या मना करना ऐसी ही स्थितियों को जन्म देता है।कहानी का अंत चौंकाता तो है,आक्रोश भी आता है कि उसे सजा मिलनी चाहिए थी फिर, वह एक वाक्य *मां तो मां ही होती है*सारे तर्क, सारे प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं।बधाई मुक्ति जी।..पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

  6. मुक्ति जी!
    अंत तो एकदम अप्रत्याशित निकला पर असंभव नहीं लगता।
    यह बात तो सही है कि आजकल बच्चों का तो मोबाइल में सारा बंटाढार करके रखा हुआ है।
    फिर माँ तो माँ ही होती है।

  7. डा. मुक्ति शर्मा जी की गहनतम गहरी बात समाहित सृजन धर्मिता का जवाब नहीं।

    बहुत शानदार रचना।

    मां तो मां होती है।

    • हर समय सोशल मीडियामय जीवन जीने वाली पीढ़ी की कहानी है ‘पूत कपूत’। आज का युवा जो लाइक, सबस्क्राईब पाने को ही असल जीवन मान बैठा है, उनकी मानसिकता दिखाती कहानी के लिए बधाई डॉ मुक्ति।

  8. आदरणीया डा० मुक्ति शर्मा,सादर नमन.
    आप द्वारा लिखित कहानी ” पूत -कपूत” मे आधुनिक परिवेश के सापेक्ष मानसिक द्वंदात्मकता प्रकट करते हुए महाकवि नरोत्तम दास की उक्ति” पूत कपूत तो का धन संचय,और पूत सपूत तो का धन संचय” को अक्षरश: चरितार्थ करती है. १३से १९ के बीच (टीन एजर) उभरता हुआ उमंगित निरकुश नवजीवन और १९से २५ के बीच बेढंगी चाल चलता (गदहा पच्चीसा )मदहोश भरा जीवन कभी भी कुछ भी कर सकता है. यदि बचपन से माता पिता का नियंत्रण नही रहा तो बच्चे किशोरावस्था तक पहुंचते पहुंचते अपराध जगत के उन्नायक बन जाते है. ऐसे मे घरेलू नियंत्रण शून्याकिंत हो जाता है. और माता पिता अपने कर्म को रोते है. रवि द्वारा मां ज्योति की नृशंस हत्या का प्रयास इस कहानी की अंतरात्मा को झकझोर देता है. लेकिन मां की अंधी ममता फिर भी अपने बेटे के पक्ष मे खड़ी दिखती है. समस्त सुख सुविधाओं से युक्त वैभव सम्पन्न आधुनिक परिवारो को इस कहानी की मनोस्थिति पर गहनतम विचार करना चाहिए. कहानी उत्तम और शिक्षाप्रद है. आपको साधुवाद. बधाई. इति.राधेश्याम “राधे”, लखनऊ. (८.५.२०२५.)
    ***””****
    बहुत दुखद संदेश, आक्रोश भरा संदेश यह है कि भारत की नयी पीढ़ी को दिग्भ्रमित करने, और संस्कार रहित आताताई बनाने की बालग द्वारा करोड़ो रूपये देकर यूट्यबर की ओर से शिक्षा दी जा रही है. भारत की कई संस्थाएं इस काम मे संलिप्त है. जिसमे उत्तराखंड नैनीताल का सौरभ जोशी परिवार और उसी के अन्य घाघ साथी बालग बनाकर अबोध बच्चो का मन मस्तिक लडा़कू व उग्रपंथी और निरंकुश बना रहे है. जो किसी से छिपा नही है. ६-७ घंटे बच्चे टीवी मे टंगे है. माता पिता बेवश है. यह आधुनिक पीढ़ी के लिए बिगाड़ू शिक्षा है.
    दुर्भाग्य वश मुझे सपरिवार एक सगे रिश्तेदार के यहां गत छह माह पत्नी के इलाज हेतु रहना पड़ा. वहां वीभत्स दृश्य देखकर मे हतप्रभ रह गया. उनका बड़ा बेटा ११ वर्ष व छोटा बेटा ३ वर्ष का बालग देखने में इतना तल्लीन रहा कि कोई मना कर दे तो वे बालग के संवाद व मरने मारने की कला से आक्रमक हो जाते थे और अपशब्द कहते थे. पढ़ाई लिखाई से कोई सरोकार नही है. स्कूल से जो परीक्षाफल मिल रहा है वह निराशाजनक. मैने उनके माता पिता से कहा लेकिन उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिये. यही कठोर सत्य अब हर घर घर मे फैल रहा है. माता पिता यदि होश मे नही आये तो जीवन पर्यंत रोते रहेगे. इति.परिस्थिति से दुखी राधेश्याम राधे.

  9. बात सही लेकिन अगर ज्योति सत्य कहतीं तो कुछ समय पश्चात रवि सही राह अपनाता और मां का हेतु भी सिद्ध हो जाता. आदर्श को मद्देनजर रखते हुए यह कहानी अपने मुकाम तक पहुंचती है लेकिन रवि के भविष्य के संदर्भ में सवाल उपस्थित हो जाते हैं.
    फिर भी कठोर यथार्थ इस रचना के द्वारा उभरता है.
    बधाई
    सादर

  10. बहुत सुंदर प्रयास।
    लेखिका प्रो मुक्ति शर्मा जी को अशेष मंगलकामनाएं।

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