Saturday, May 9, 2026
होमकहानीलखनलाल पाल की कहानी - दस बीघा

लखनलाल पाल की कहानी – दस बीघा

आज रगबर बब्बा ने पूरे मुहल्ले को सिर पर उठा लिया। उनके मुख से थोक के भाव में गालियाँ निकल रही थीं। बिना किसी का नाम लिये बब्बा मुहल्ले भर की लौड़िया-बिटिया कर रहा था। रगबर बब्बा की इस दांदस ने मुहल्ले में कर्फ्यू-सा लगा दिया। लोगों के कान खड़े हो गए। उनके दौंथर काटने का कारण किसी को पता नहीं था। गालियों का जितना स्टॉक बब्बा के पास था, सबका सब उन्होंने खत्म कर लिया, फिर भी धिमानो डुकर कभी-कभी बरस जाता था। लोगों को बाद में पता चला कि बब्बा के पोता को किसी लड़के ने थप्पड़ मारकर दो लातें और मार दी थीं। थप्पड़ और लातों से पिटे पोता ने बब्बा को रोते-रोते सारा वाकया कह सुनाया। पोता लातों से पिटा, इसी बात से बब्बा आपे से बाहर हो गया। मुहल्ले के साथ-साथ बब्बा ने पोता को भी गरियाया- “हरामी, कुट-पिट खें टसुआ बहाउत चलो आउत। सारन खें मार तो पथरा मूंड़ पै, दही सौ फैल जातो।’ पोते को गालियों का कोई असर नहीं हुआ। उसने बब्बा को गालियों में उलझा दिया और स्वयं अपने कंचा ढूँढ़ने में लग गया। पोता अच्छी तरह से जानता है कि बब्बा सब कुछ सुलझा लेगा।
पोता एक लड़के से कंचा हार गया था। हारने के बाद भी वह कंचा नहीं देना चाहता था। लड़के ने ज़बर्दस्ती कंचा छीन लिए। इसी छीना-झपटी में उसने इसे पीट दिया। अब वह फिर से कंचा ढूढ़कर उसी लड़के के साथ खेलेगा। पोता फिर लड़- झगड़कर आएगा। पोता को बब्बा की दम पर दम है। बब्बा क्रोधी स्वभाव के हैं। क्रोध में तो वे दुर्वासा हैं, पर दुर्वासा जैसा पावर उनके पास नहीं है। यदि ऋषि जैसा पावर बब्बा के पास होता तो मुहल्ला क्या, पूरा गाँव हलकान हो जाता। वैसे भी आजकल ग्रामीणों में पलायन की प्रवृत्ति ज्यादा है। बब्बा के पावर से भयभीत पूरा गाँव भर्र से शहरों में समा जाता। गाँव में सिर्फ़ खंडहर बचते। भैयाओं से तो अभी कुछ लोग ही खफा हैं, फिर तो शहरों की स्थिति और ख़राब हो जाती। खैर अच्छा ही हुआ कि रगबर बब्बा बिन पावर के ही रहे। उनकी उखड़ने की आदत है। इस उखाड़ में यदि मुहल्ला छूट जाता है तो लड़का-बहू नहीं छूटते हैं। जब उन्हें कोई नहीं मिला, तो पोता तो डूंड़ पर डला है। पावरहीन बब्बा मुहल्ले वालों के लिए बिन पैसों का मनोरंजन है। बब्बा मुहल्ले वालों के लिए मनोरंजन का साधन तब होता है, जब वह अपने लड़का-बहू को गरियाता है। उन्हें बस हाँक भर तो लगानी है, फिर घुल्ला खूब खेलता है। गोट गाने से, सम भरने से, घुल्ला के के सिरे आने वाला ‘देव’ बहू-बेटा पर पिल पड़ता है। उस समय उसको बहू-बेटा शैतान नज़र आते हैं। लोग-बाग बब्बा को धार पर चढ़ा देते हैं। धार पर चढ़ो डुकर फिर किसी की नहीं सुनता है।
बेटा-बहू अक्सर मुहल्ले वालों से परेशान रहते हैं। बेटा हमेशा कहता है कि गिनती के चार लोग बब्बा के पास न बैठें तो घर में कभी कलह नहीं हो सकता है। ये चार-उचक्के हमेशा मौके की घात में लगे रहते हैं। बेटा-बहू इधर-उधर हुए नहीं कि ये छप्पर के नीचे बिछी बब्बा की चारपाई में जा बिराजते हैं। इनमें बब्बा के लिए इतना अपनत्व भरा होता है कि बब्बा का दिल बाग-बाग हो उठता है। यही समय होता है, जब वे बब्बा का स्विच ऑन करने में जरा भी समय नहीं लगाते। उनके भीतर तो हमेशा करेन्ट प्रवाहित होता रहता है। स्विच दबाने भर का ही तो काम है। स्विच ऑन होते ही बब्बा सीलिंग फैन की तरह अपने आप चालू हो जाते हैं। बेटा-बहू को शिकायत रहती है कि ये चार लोग अगर बब्बा को टैनी न दे, तो डुकर इतना नहीं भन्ना सकता है। पर आज बब्बा ने मुहल्ले वालों को लाद-पलांदकर अपने मन की भड़ास निकाल ली।
मुहल्ले वाले उसके कान भरते रहते हैं, इसलिए वह लरका-बहू को खरी-खोटी सुनाता है। डुकर के पीठ पीछे ये लोग खूब हँसते हैं। ये बातें डुकर बाद में समझ पाता है कि ये लोग उसे उकसाते हैं। आज बब्बा ने सारी कसर निकाल ली। सब कान दाबे सुनते रहे, किसी ने चूँ तक न की।
बब्बा का पोता चरन सींग सात वर्ष का हो गया है किन्तु वह अब भी बिना बब्बा के शौचता नहीं है। बब्बा शुच्चू करवाएगा, तभी वह शौच करेगा वरना वह ऐसे ही हाथ में चड्डी लिए खड़ा रहेगा। शर्ट उसकारे पोता को देखकर बब्बा पहले उसे खूब गरियाता है फिर शुच्चू करवाता है। चरन सींग पर गालियों का न कभी असर हुआ है और न होना है। पोता बब्बा की गालियाँ सुनना अपना हक़ समझता है। ऐसा लगता है, जैसे उसने गालियों का सुरुआ बहू के ‘सोर’ वाले चरुआ में डाल दिया हो। चरन सींग उसके पीछे ही लगा रहता है। बब्बा घर से बाहर निकला कि उसका ठुनकना चालू। पोता के ठुनकने पर बब्बा जोर से मिसमिसाता है, फिर उसको कंधे पर बैठा लेता है। रगबर बब्बा मुहल्ले के उस आदमी से ज्यादा भुकर जाता है, जिसने नया मकान बनवा लिया हो या दो-चार बीघा खेत खरीद लिया हो। इन लोगों पर वह जल-भुन जाता है। बब्बा भीतर ही भीतर आवाँ की तरह धधकने लगता है। इसी धधक में वह दो-दो दिनों तक रोटी नहीं खाता है। अपने मन की इस भड़ास को वह अपने बहू-बेटे पर उतारता है। उसे लगता है कि बहू-बेटे कुछ काम नहीं करते। पड़े-पड़े खाते हैं, वे आगे बढ़ने की कोशिश ही नहीं करते। आदमी हगता है, तो आगे को सरकता है, ये ससुरे पीछे को सरक रहे हैं। बब्बा अच्छी तरह से जानता है कि इस जमाने में दस बीघा खेत अकेले लड़के के लिए बहुत है। यही जमीन चरन सींग के हिस्से में आ जाएगी। इतनी जमीन पर्याप्त है। वैसे मुहल्ले भर में सबसे ज्यादा जमीन उसी के लड़के के हिस्से में पड़ती है। जमीन के मामले में वह सबसे आगे हैं। इसी ठसक में वह हमेशा ऊसर बरसता है। जब वह यह सोचते हुए चलता है कि सबसे ज्यादा जमीन उसके हिस्से में है, तब पूरा रास्ता उसके अकेले का हो जाता है। वह गली में झूमता हुआ… हाथ फटकारता हुआ चलता है। फिर उसके सामने कोई नहीं पड़ता है। यदि कोई व्यक्ति धोखे से उसके सामने पड़ गया, तो बेचारा कनाव काटकर निकल जाता है। कौन इस पहाड़ से टकराए। यह पहाड़ तो तब नबता है, जब कोई मुहल्लावासी जमीन खरीद कर उसके बीघों से आगे निकल जाए। बस इसी बात से वह जमीन खरीदने वाले से खुन्नस खाता है।
दो वर्ष पहले मतोले ने जमीन खरीदी थी। मतोले के हिस्से में बारह बीघा जमीन हो गई थी। जमीन के मामले में अब मतोले मुहल्ले में अव्वल हो गया। बब्बा मतोले से दशमलव आठ तीन अंक फिसलकर दूसरे पायदान पर आ गए। बब्बा का ताज छिन गया था। छिन क्या गया था, उसे तो ऐसा लगा था, मानो किसी ने लात मारकर नीचे गिरा दिया हो। बब्बा को बहुत कर्रा धक्का लगा था, पर यह रिकार्ड मतोले के नाम ज्यादा दिनों तक न रहा।
रगबर बब्बा की कुछ ऐसी हाय किलपना पड़ी कि मतोले के जुड़वाँ बच्चे पैदा हो गए। उसको एक लड़का पहले से ही था, दो और हो गए। अब मतोले के लड़कों के हिस्से में चार-चार बीघा जमीन रह गई। उसके जुड़वाँ बच्चे पैदा होने पर बब्बा ने रात भर लमटेरा गाए थे। इतनी खुशी, इतना उल्लास मतोले के घर में नहीं था, जितना उल्लास रगबर बब्बा को था। लमटेरों के बीच में वह हल्की सी टैनी लगा देता था कि मेरे चरन सींग की बराबरी कौन कर सकता है? चरन मेरा राजा बेटा है। राजन के राज्य कहीं छिन सकते हैं। बब्बा की इतनी सी सोच और इतना ही उनका संसार।
उसका लड़का सरमन व्यावहारिक है। वह गाँव के चलन-व्यवहार एवं रस- व्यवहार से अच्छी तरह वाक़िफ है। कौन बेवकूफ बना रहा है, कौन किसे किधर हाँक रहा है, वह इन बातों को समझता है। उसे अपने बाप की ये ओछी हरकतें बिल्कुल नहीं पुशाती हैं। बब्बा की बातों से लोग-बाग हँसते हैं। वे जल्दी लोगों की बातों में आ जाते हैं। इसी कारण बब्बा गाँव वालों के लिए मजाक का विषय बन जाते हैं। 
सरमन को अपने बाप का मजाक बनना अच्छा नहीं लगता है। इसी से वह बाप को समझाता है। जब वह कोई बात समझने की कोशिश नहीं करता है, तो सरमन उसे डपट भी देता है। पर बाप को डाँटना उसे अच्छा नहीं लगता है। वह सोचता है कि बाप है, जो कुछ करता है वह मेरे लिए ही तो करता है। बड़बड़ाता भर ही तो है। लोगों का क्या है, वे तो हर बात में मजाक बनाते हैं। दूसरी बात, बाहरी ताकतों से हमेशा मुझे बचाए रखता है। उसे किसी को कुछ नहीं कहना पड़ता, बाप ही सब निपटा लेता है। सरमन के लिए तो उसका बाप घर का पहरा देने वाला जिन्द है। क्या मजाल जो बब्बा की जानकारी के बिना चुहिया भी अन्दर घुस जाए।
अभी कुछ दिनों से बब्बा के स्वभाव में अचानक बदलाव दिखने लगा है। मुहल्ला वाले अगर जान-बूझ कर बब्बा से न उलझें, तो वह उनसे ज्यादा मतलब नहीं रखता है। पहले बब्बा मुँह की जंग साफ़ करने के लिए ही गालियाँ बकने लगता था। अब वह ऐसा नहीं करता है। वह मुहल्ले वालों से नहीं वरन्, बेटा-बहू से खुन्नस खा गया है। बहू ने जब से पेट गले से टाँग लिया है, तभी से बब्बा का जी मिचलाने लगा।
वह गणित लगाने में ज्यादा उलझा रहता है। गणित के पहले अध्याय में बब्बा लड़का-लड़की की गणना करता है। अगर लड़की पैदा हुई तब तो ठीक है और यदि लड़का पैदा हो गया, तो जमीन आधी रह जाएगी। चरन सींग के हिस्से में पाँच बीघा जमीन बचेगी। बेटा में इतनी सत्तिया नहीं है कि दो-चार बीघा खेत खरीद ले। बब्बा यही सोचकर खीझ उठता है- “ससुरन के पेटइ नई चलत, का जमीन खरीद हैं।’ बब्बा टूटी लालटेन सा भभका- “हरामी खें इतनौ हटकत रहो, चुदना तेऊ न मानो। मैंने हजार देर समझाई कि रे ! तै इतई मोय ढिंगै परे कर। बहन कौ भोसड़ौ दो दिना तो परो रहत, तीसरे दिना लबाई गाय सौ भागत। इन्हें चैन ई नहियाँ। ऐसें मस्का दइयाँ भग जात कि आहट तक नईं होन देत। बहुरियऊ खें तो दम नहियाँ, पानी देन आहै सो न जानै कौन सौ इसारौ कर देत कि लौंडा पगहिया कौ बाँधो नई रहत। मैं सब जानत, ये मोखें भ्वासड़ समझत।”
बब्बा चारपाई में उठकर बैठ गया- “ऊ दिना मोखें भ्यास गओ तो कि आज कछु न कछू हो है। पाँवन कौ महावर और ओंठन की लाली दिख खें मैं सब समझ गओ तो। जमीन है रबड़ थोरी है कि तान दो पसर जैहै।” वह मन ही मन ऐंठता रहा। इसी ऐंठ में उसके मुँह से भला-बुरा निकलता है- “इस लहड़ुआ में इतनी तथा (ताकत) नहीं है कि लड़कों के लिए कुछ जमीन खरीद ले। आज के ज़माने में जमीन ही सब कुछ है। जिसके पास जमीन नहीं है, वह आदमी किस काम का? कोई भटा के भाव नहीं पूछता है। मैंने कैसे जमीन खरीदी, मैं ही जानता हूँ। मेरे बाप को तो बिसवा भर जमीन नहीं थी। मरवल्ली (मारवाड़ी) की भैंसों की पाँच सालें दुहनी की, तब दस बीघा का चक खरीद पाया। रुपये तो बहुत माँगता था, पर भइया दद्दा करके रुपये कम करवा लिए थे। जेवर बेचकर रुपये चुकाए थे, शेष रुपये दुहनी करके पटा दिए। मरवल्ली की बहुत जमीन थी। उस समय खरीदना चाहता तो सौ बीघा जमीन खरीद लेता, पर दमार लगे, उस जमाने में एक-एक पैसा मोहर थी। खरीद लेता तो आज राजा बना होता। चरन सींग के हिस्सा में आज सौ बीघा जमीन होती। मेरा चरन राज करता। मुहल्ला के सब आदमी चरन सींग की जी-हजूरी करते। रगबर बब्बा के मुँह से आह निकल गई- “यौ डौरा सरमन कछू नई करत। इतै डोलत, उतै डोलत। एक भैंस खें चारौ काट ल्याउत बस हो गओ काम। एखें बहू ने बिगार दओ। वा यहाँ कौ तीना वहाँ नई धर देत, दिन भर भैंस सी पसरी रहत। एक दिना में दो-दो सारी बदलत, दोऊ देर लिपिस्टिक कौ रंग बदल जात।” बब्बा ततोश में चारपाई से उठकर खड़ा हो गया “सरमन कौ कितनौ अच्छौ शरीर हतो, सब दो कौड़ी कौ हो गओ। जब से बहू ने देहरी लात मारी, तब से ई लरका ने अखाड़े को मुँ न दिखो। गुस्सा तौ ऐसी लगत कि दो-दो डंडा दोउअन के पोंदन में मारौं।”
सरमन बाप की हरकतों से तंग आ गया। अब तो बहू की ज़रा सी गलती पर उसका बड़बड़ाना शुरू हो जाता। बब्बा की चिढ़ की वजह से घर में रोज कलह होने लगा। बहू सोचती, पता नहीं कौन घर में ‘किलकिलयाऊ’ फेंक गया कि खाई रोटी नहीं पचती है।
मुहल्ला वाले बब्बा की इन हरकतों से खूब मौज लेने लगे। सरमन आगे-पीछे सोचता है, बाप को कितना कहा जाय। ज्यादा कुछ कहता है तो लोग नाम धरेंगे कि लड़का बाप को लगाए बना रहता है। सरमन नाम धरने से डरता है। पत्नी को कितना रोके। जब आदमी दिन भर बड़बड़ाएगा, तो सामने वाला कब तक शांत रह सकता है। पता नहीं, बूढ़ों को ये बातें क्यों समझ में नहीं आती हैं। बस ये अपनी ही चलाना चाहते हैं। मैं बैलों जैसी डोर ताने रहता हूँ, फिर भी गृहस्थी की गाड़ी इधर से उधर हो ही जाती है। बहू गलती न करे तो भी वह गलती निकाल लेता है। सरमन बाप को खूब बरजता है कि घर के गीत बाहर नहीं गाए जाते हैं। सुनने में अच्छा नहीं लगता है। रगबर बब्बा कान दाबे सुनता रहता है। सरमन ने परसों ही उसे समझाया था “तुम तो आदत से मजबूर हो गए हो। यह आदत बुढ़ापे में कैसे छूट सकती है। यह तो  मरघटा में ही छूटेगी।” बहू ऐसे ही अवसर की ताक में रहती है। सरमन की इन बातों के बीच में उसने झपट्टा मारा “यह बुढ़रा आज थोड़े मरघटा जा रहा है। जब तक यह जाएगा-जाएगा तब तक हमें नकुअन कर देगा।” वैसे सरमन बाप की बातों में कम पड़ता है, पर बब्बा उसे चुप बैठने ही नहीं देता है।
कल तो उसने हद ही कर दी। बब्बा ने बहू से महीने पूछ लिए। बहू ने ढाड़न अंसुआ गिराकर सरमन से सारी बात कह दी। उसकी इस हरकत से सरमन को बड़ा गुस्सा आया। इसी गुस्से में उसने बाप को फटकारा “बूढ़े हो गए हो, ईसें सठया गए। कोई सुनेगा तो क्या कहेगा। शर्म नहीं आती? तुम्हें बैठे-बैठे खाते तो बनता नहीं है, दुनिया भर की उटकापचारी लगाए रहते हो।” बतबड़याव सुनकर पड़ोसी शंभु वहीं आ गया। शंभु ऐसे शुभ अवसर की ताक में हमेशा रहता है। वह बातों की जड़-पत्ते में सेंधमारी करने लगा। चार उचक्कों में से एक शंभु हूँका में चूका नहीं पड़ने देता है।
“तुम्हें क्या करना है? बिगड़ेगा तो हमारा बिगड़ेगा। तुम तो निपट चुके। बिटियाँ ब्याह ली… लड़का ब्याह लिया। अब तुम भगवान का भजन करो। तुमको इस दुन्द कथा से क्या लेना-देना है।” – “रहने दे सरमन, बूढ़ों की तो आदत होती है।” शंभु ने तुरप मारी। “ऐसे बूढ़े?” सरमन शंभु की ओर मुखातिब हुआ “यही अकेले बूढ़े हुए हैं क्या? संसार में कोई बूढ़ा नहीं हुआ?” सरमन कुछ लरजा “भैया शंभु, चार नहीं बजेंगे, ये चिल्लाना शुरू कर देंगे। चार बजे से ये न जाने कौन सा बखर हँकवाना चाहते हैं। इनके मारे पूरी नींद नहीं सो पाते हैं। इन्हें तो बुढ़ापा चढ़ा है। ये चिरइया जैसी नींद ले लेंगे और शुरू हो जाएंगे। कुछ नहीं है तो गाना ही गाने लगते हैं। हम जानते हैं कि इन्हें गाने बहुत आते हैं। इन्हें ज्यादा गाने सुनाने हैं तो खेतों की तरफ निकल जाएं, वहाँ खूब गाना सुनाएं।” उसने साँस ली “ये वहाँ नहीं जाएंगे। इन्हें तो हमें जगाना है। कैसे नींद टूटेगी, ये सारे छल-छद्म जानते हैं।”
चरन सींग बब्बा की गोद में बैठा बब्बा की तांसनवाई को ध्यान से सुन रहा था। वह कुछ-कुछ समझ गया था कि इस समय बब्बा की हालत बहुत पतली है और उसका कवच काफी कमजोर पड़ गया है। इसी से वह बब्बा के कौंचरे तले दुबक गया। चरन सींग को बब्बा के कोंचरे तले दबा देखकर सरमन और तमतमा गया- “इसे देखो, यह इतना बड़ा लुंगरा हो गया है, ये अपने हाथों शौच नहीं पाता है।” चरन सींग की आँखें लिड़या गईं। उसे यह माहौल भारी-भारी लग रहा था। वह कभी अपनी आँखें बन्द कर लेता था, कभी खोल लेता। सरमन ने चरन को उँगली दिखाई “बेटा, एकाद दिन मेरे चक्कर मे पड़ गया तो शौच लगाए, सब कुछ सीख जाएगा।” चरन सींग बब्बा से और चिपट गया। बहुत देर से चुप बैठे बब्बा को बात का सिरा पकड़ में आ गया- “सुन लै रे सरमन! चरन खें छू न दइए। मैंने कैसे पालो मैं जानत। तै का जानत ? तैने तो पैदा कर दओ, कभऊँ हगाओ-मुताओ नहियां। ऐसें कहूँ पलत है लरका।” बब्बा शंभु को साक्षी बनाकर बोला- “लरका है, अभै कौन बड़ौ हो गओ। यौ लौंडा के पछाऊँ परो रहत। दिखियो भइया चरन इतनौ हुसियार निकर है कि संग के लरका एखे दिमाग खें न पाहै। ई बेकूफ सें तौ अभै हुसियार है। ऊ बड़े-बड़ेन के कान काटत।”
– “तुम्हीं अपने कान कटवाओ।” सरमन गुस्सा में अपने पाँव पटकता हुआ बाहर निकल गया। बाप की इन्हीं बातों से उसे चिढ़ होती है।
बब्बा को जमीन की पड़ी है। कहीं दो-चार बीघा खेत मिले तो खरीद लिया जाए, पर जमीन खरीदना इतना आसान थोड़े है। बुड्ढा जमीन के बँटवारे के पक्ष में नहीं है। वह लड़का-बहू को कैसे समझाए कि एक लड़का ठीक है। बेटा-बहू एक संतान पर विश्वास नहीं करते हैं। बारौ पूत, हरीरी खेती, पता नहीं कब धोखा दे जाए। बहू का सातवाँ महीना चल रहा है। देह फैल गई है और दोनों गालों पर तबा (काले धब्बा) पड़ गए हैं। बहू को मिट्टी सौंधी लगती है। वह सबसे छिपाकर मिट्टी खाती है। कोई देख लेता है तो टोका-टाकी करने लगता है। बहू एक डलिया मिट्टी अपने खेत से भर लाई थी। उसे जब भी सुरत लगती है, वह मिट्टी का टुकड़ा मुँह में डाल लेती है। अगर बब्बा ने माटी खाते हुए देख लिया, तो वह उसको डपटने से नहीं चूकता- “माटी खात, पेट पथरा हो जैहै। कारी माटी पेट में गच सी बैठत।” बब्बा का रेडियो शुरू हुआ तो मुश्किल से बन्द होता है। बहू अपनी इस आदत को गलत समझकर शेष मिट्टी धीरे से धरती पर गिरा देती है पर बब्बा का रेडियो प्रायोजित कार्यक्रम की तरह अबाध रूप से बजता रहता है। बहू समझ जाती है कि बिना बोले यह कार्यक्रम बन्द नहीं होगा क्योंकि बुढ़रा को उपदेश झाड़ने की पुरानी बीमारी है। बहू भी अपनी खुटी खोंसकर अपने फुल फार्म में आ जाती है- “चबर-चबर बन्द क्यों नहीं करते हो? पेट मेरा फटेगा या तुम्हारा?” बहू ने मुँह बनाया “इस बुड़ढ़ा को कब अकल आएगी कि जब औरत दो-जी से होती है, तो उसे कुछ-न-कुछ खाने की सुरत लगती है। ये मेरा ही पहरा लगाए रहता है। अपनी लुगाई तो भर ज्वानी में चाट ली, अब मेरे पीछे पड़ा है।” बहू ने उसे चेताया- “अपने लड़के को कुछ भी कहते रहो, मुझे कोई मतलब नहीं है। मुझे कुछ मत कहना वरना ऐसी सुनाऊँगी कि सुनी नहीं होगी।”
बब्बा को बहू की बातें बुरी नहीं लगती। बात बुरी तो तब लगेगी जब बब्बा किसी तरह से हीन हो। अभाव और हीनता गहरे तक चोट पहुँचाते हैं। बब्बा किस बात पर हीन है? वह दस बीघा जमीन का मालिक है। जमीन की ठसक में उसकी छाती हमेशा चौड़ी बनी रहती है। बेटा सरमन को भी दस बीघा जमीन का घमण्ड है। आज भले ही यह जमीन उसके नाम नहीं है लेकिन बाप के बाद तो उसी के नाम आ जाएगी। इसी दस बीघा जमीन की ठसक-मसक बहू को भी है। दस बीघा जमीन पर तीनों केन्द्रित, तीनों आश्रित और तीनों को बराबर का घमंड। बब्बा किसी के आश्रित थोड़े है। उसके लिए जमीन से ज्यादा मुख्य बात और कोई हो ही नहीं सकती है। अगर कोई दूसरी बात है भी तो वह उसके लिए लिए गौण है।
इस जमीन ने बब्बा के घर को कुछ ऐसा बना दिया है कि जिसे जो कहना है, वह कह डालता है। कोई भी किसी तरह की लगी-लिपटी नहीं रखता है। गरयाना, चूना जैसी चहकाई सुनाना उनके लिए आम बात है। सब कुछ कह-सुन लेने के बाद भी बब्बा बहू के पेट से आतंकित है। वह ईश्वर से विनती करता रहता है कि बहू को लड़का पैदा न हो, बिटिया हो जाए तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। जुड़वाँ सन्तान की कल्पना में तो वह आधा सूख जाता है। बहरहाल बब्बा को यह अन्दाज़ा है कि बहू को जुड़वाँ बच्चे पैदा नहीं होंगे क्योंकि बहू ज्यादा गरई नहीं है। फिर भी बन्द मुट्ठी का अंदाज़ लगाना मुश्किल तो होता ही है। बब्बा रात-दिन इसी गणित में उलझा रहता है।
नवें महीने की परछाई दाबते ही बहू के पेट में पीड़ा उठी। रात के ग्यारह बज चुके थे। सरमन दौड़कर दाई को बुला लाया। लहरों जैसी पीड़ा से बहू बेहाल हुई जा रही थी। यहाँ बब्बा को बहू से कम पीड़ा नहीं थी। बहू और बब्बा में शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं का अन्तर था। बहू जल्दी से जल्दी निनुरना चाहती है और बब्बा खुद के पाले-पोसे आतंक से मुक्त होना चाहता था। कुछ पल की देर थी लेकिन ये पल बब्बा को युग के समान बीत रहे थे। माँ और बब्बा की पीड़ाओं से अनभिज्ञ चरन सींग चारपाई में सुख की नींद सो रहा था। अन्दर के कमरे से आती कराह से बब्बा का ध्यान उसी आवाज़ की तरफ चला गया। बब्बा को इस कराह के साथ ही मुहल्ले की औरतों की आवाज सुनाई दे रही थी “जिज्जी लगत है चरन सींगई हो है।”
“चरन सींग नई री, मौड़ी भओ चाहिए। बब्बा बहुत चुलकत, मौड़ी भए पै सब चुलकबो बन्द हो जैहै।” दूसरी वाली औरत बोली।
“ठीक कही जिज्जी, अभै तो ऊ धरती-धरती नईं चलत।” पहली वाली बोली- “बिटिया के ब्याव में बब्बा कौ सबरौ मूँड़ हल जैहै।”
– “चोदे की फटी डरी रैहै। बहू की तो एक देर…, बब्बा की कई देर फट है।” बहू की कमर सूँट रही तीसरी औरत ने चुहल की। प्रसव गृह महिलाओं की हँसी से खनक उठा।
औरतों की ये बातें बब्बा के कान में पड़ी। बब्बा मुस्कराया ‘ससुर की दाईं मोई हंसी उड़ाउत।’
अचानक कहाँ…ऽ…ऽ… कहाँ… ऽ…ऽ की आवाज सुनकर बब्बा सतर्क हो गया। वह शिशु के रुदन का अन्दाजा लगाने लगा। यह रुदन लड़की का है या लडके का? बब्बा ने अपने कान दरवाजे के नजदीक और सटा दिए।

लखनलाल पाल
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह) वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001 ई-मेल – [email protected]


RELATED ARTICLES

6 टिप्पणी

  1. कहानी पढना शुरू किया तो चली गई अपने बचपन में। यही बोली बानी सुनते बड़ी हुई। एक एक शब्द अपना लगा। बहुत अच्छी लगी। बब्बा से लेकर हर शब्द और कथानक आत्मीयता में डुबो गया।

    • जिस माहौल में, जिस बोली बानी में हम पले-बढ़े होते हैं जब वह सुनने को या पढ़ने को मिल जाता है तो उस लिखे से आत्मीयता हो ही जाती है। रेखा जी आपको कहानी अच्छी लगी इसके लिए आपका बहुत बहुत आभार

  2. लखनलाल जी,

    “दस बीघा” बहुत अनोखी व मजेदार कहानी है। बब्बा जैसे नमूने सभी लोगों के लिये फ्री मनोरंजन के साधन बन जाते हैं।

    इस कहानी में एक बब्बा हैं जिन्होंने अपनी गालियों व अपने विचित्र स्वभाव से गाँव भर में तहलका यानि अपना दबदबा बना रखा है। एक तरफ उनका बेटा सरमन और बहू उनकी बातों और हरकतों से दुखी रहते हैं वहीं बाहर वाले उन्हें भड़काकर उनकी बातों व गालियों से अपना मनोरंजन करते रहते हैं।

    बब्बा को अपनी दस बीघा जमीन पर इतना गुमान है कि गाँव में दूसरों की अधिक जमीन होने की कल्पना भी उनसे बर्दाश्त नहीं होती। किसी और का सुख उनसे देखा नहीं जाता।

    कहते हैं कि बुढ़ापे में लोगों में अधिक बोलने की शक्ति नहीं होती लेकिन बब्बा की जुबान पर कोई लगाम नहीं। चपर-चपर चले ही जाती है। इस उमर में कुछ अधिक तो करने-धरने को है नहीं है सो अपनी बड़बड़ से घर के हर छोटे-बड़े काम में टाँग अड़ाना वह अपना परम कर्तव्य समझते हैं। चाहें बेटा बहू की फटकार ही क्यों न खानी पड़े। पर वह चिकने घड़े ही बने रहते हैं। बेटा जब कहता है “तुम तो आदत से मजबूर हो गए हो। यह आदत बुढ़ापे में कैसे छूट सकती है। यह तो मरघटा में ही छूटेगी।” तो बहू भी ऐसे ही अवसर की ताक में रहती है “यह बुढ़रा आज थोड़े मरघटा जा रहा है। जब तक यह जाएगा-जाएगा तब तक हमें नकुअन कर देगा।” बहू-बेटा चुप रहना चाहकर भी कभी कभार चुप नहीं रह पाते।

    पोते को लाड़ करने के भी बब्बा के अलग ही रंग-ढंग हैं। अपनी छाँव में पोते चरन सींग के सींग भी नहीं निकलने दे रहे बब्बा। यानि पोता सात साल का हो चुका है पर उसके हगने-मूतने की जिम्मेदारी बब्बा ने ही ले रखी है। उनके शुच्ची कराये बिना चरन सींग अधनंगा घूमता रहता है। बच्चा किस उमर में शौचना सीखेगा?

    अजीबो गरीब सोच है बब्बा की। बहू जब दोबारा गर्भवती होती है तो मरोड़ बब्बा के पेट में होने लगती है। यह सोचकर कि कहीं दूसरा पोता हो गया तो वह दस बीघा जमीन दो हिस्सों में बंट जायेगी।

    बब्बा को किसी भी तरह चैन नहीं। बस उस दस बीघा जमीन को लेकर उसके चारों तरफ ही उनका दिमाग घूमता रहता है। उन्हें लगता है कि उस दस बीघा जमीन से गाँव में उनकी गरिमा बनी हुई है। मन ही मन वह चाहते हैं कि बहू पोती को ही जनम दे ताकि वह दस बीघा जमीन खानदान में पोते चरन सींग की ही रहे।

    फिर कहानी के अंत में लेखक यानि लखनलाल जी बब्बा की तरह ही पाठक को भी अंधे कुयें में धकेल देते है। बेटी हुई या बेटा यह पता ही नहीं लगने देते। जानने को उधर बब्बा छटपटाते है और इधर पाठक बेताब रहता है। दोनों का ही ख्वाब अधूरा रह जाता है। दोनों को अपना सिर खुजाते हुये और असमंजस में छोड़कर लेखक चरन सींग की तरह चैन की नींद सो जाता है।
    As usual सस्पेंस, सस्पेंस! बब्बा टेंस, पाठक भी tense

    गाँव की लुभावनी बोली (गालियों समेत), कथानक में नयापन, आपके लिखने का अनोखा अंदाज सब मिलाकर 100 out of 100 आपको सर जी। लेखन पर आपको हार्दिक बधाई।

    -शन्नो अग्रवाल

    • शन्नो जी कहानी पर आपकी प्रतिक्रिया बड़ी सुहानी है। मैंने कहानी लिखते समय ये नहीं सोचा था कि ऐसी भी प्रतिक्रिया आएगी। मैं इसे पढ़कर मुस्करा रहा हूं। कोई भी पढ़ेगा तो वह भी मुस्कराए बिना नहीं रह सकता है। आपने कहानी की इतनी बढ़िया समीक्षा की इसके लिए आपका बहुत-बहुत आभार

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest