Thursday, March 5, 2026
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दिलीप कुमार की संस्मरण कथा – हीरोगीरी

ये बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक के शुरुआती वर्ष थे। हिंदी सिनेमा गुणवत्ता के हिसाब से अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था। थोक के भाव से हिंसा और अश्लीलता से भरी मसालेदार फिल्में रिलीज होती थीं। क्रिकेट का भी जलवा था, मगर क्रिकेट पूरे वर्ष ना होकर सीजनल खेल हुआ करता था। सचिन तेंदुलकर देश की धड़कन बन चुके थे,लेकिन क्रिकेट 4– 5  महीने ही टीवी पर आती थी,इसलिये पूरे वर्ष सिनेमा ही मनोरंजन का मुख्य साधन हुआ करता था ।
लोगबाग नई फिल्मों से निराश थे तो सिनेमा हॉल वाले पुरानी हिट फिल्में ही अक्सर लगाया करते थेऐसे ही किसी दौर में एक पुरानी हिट फिल्म “धर्मवीर” सिनेमा हॉल में पुनः लगी। उसी वर्ष सिनेस्टार धर्मेंद्र की फ़िल्म “तहलका “ ने देश में लोकप्रियता का तहलका मचा दिया था । हम नवीं क्लास के लड़के धर्मेंद की फिल्में देखना चाहते थे । तभी धर्मवीर लग गयी  । उन दिनों किसी लड़के की क्रिकेट और फ़िल्म में रुचि ना हो ये करीब करीब असंभव बात थी
लेकिन धरती वीरों से खाली नहीं थी । मेरा सबसे करीबी दोस्त अरुण कुमार था। वह उन दोनों आकर्षणों में कोई विशेष रुचि नहीं रखता था। हो सकता है कि उसकी कम रुचि का कारण ये रहा हो कि मुहल्ले के लोग उसी के घर में टीवी देखने जाते थी जिसमें क्रिकेट और शनिवार रविवार के धारावाहिक और फिल्में प्रमुख होती थीं । अब की पीढ़ी को ये बात बेहद हैरानी भरी लग सकती है लेकिन रामायण,महाभारत धारावाहिकों के प्रसारण के दौर में एक परिवार के लोग दूसरे परिवार के घर टीवी देखने जाया करते थे जो कि पड़ोस में मेलजोल बढाने में काफी सहायक हुआ करता था।
धर्मवीर फ़िल्म के पोस्टर सड़कों पर जगह जगह लगे थे मुझे इंटर कालेज जाते हुए मानो पूछते हों “कि कब देखोगे धर्मवीर”?
मुझसे पोस्टरों का चिढ़ाना देखा नहीं जा रहा था मेरे लिये असहय हो रहा थामेरे प्रिय हीमैन धर्मेंद की फ़िल्म को नजरअंदाज करना और ये डर भी था कि पुरानी फ़िल्म है पता नहीं कब रातोंरात उतर जाये ?सो जल्द से जल्द देख ली जाए।
सो मैंने चुनौती स्वीकार कर ली कि
“ देखेंगे तुझे धर्मवीमगर कैसे?
ये वो दौर था जब माता पिता का स्पष्ट मानना था कि “पैसा पाने से बच्चे बिगड़ जाते हैं। दौर का असर तो हर घर में था लेकिन ऐसा लगता था कि ये सिद्धांत मानों मेरी मम्मी ने ही प्रतिपादित किया हो ।
सो जेबखर्च के नाम पर हमें फूटी कौड़ी भी नहीं मिलती थी यदि कुछ खाना पीना हो बाहर का, तो बड़े भाई के साथ जाओउन्ही को पैसे दे दिए जाते और वही भुगतान करते थे । चाट ,बर्फ, आइसक्रीम वगैरह दरवाजे पर बिकने आती थी तो वहीं घरवाले खरीद देते । एक धेला भी मुझे अपने हाथ से खर्च करने को नहीं मिलता ।पैसे खर्च करने को इसलिये नहीं मिलते थे,क्योंकि पैसे खर्च करने में यदि लड़के ने पैसे बचा लिए तो पैसे पैसे जोड़कर लड़का रुपया बना लेगा और रुपये से लड़का फ़िल्म देख लेगा । लड़का फ़िल्म देख लेगा तो बिगड़ जायेगा जैसे मोहल्ले के कई लड़के बिगड़ गए । सो लड़के को बिगड़ने से बचाना है तो उसे पैसे हर्गिज ना मिलने दोपैसा नहीं होगा तो ना ही व फ़िल्म देखेगा और ना ही बिगड़ेगा।
इस फिलासफी से त्रस्त मैं कड़का ही रहता था लेकिन अरुण के घर की हालत जरा अलग थी। उसकी माँ गांव में रहती थीं वह पिता और भाई  के साथ रहता था । उसके बड़े भाई बीमार रहा करते थे और पिता नौकरी के सिलसिले में अक्सर बाहर रहते थे।सो घर के सामान वही खरीदकर लाता था । उसके हाथ मे हमेशा पैसे रहते थे । अरुण मेरा पड़ोसी था, मुझसे उम्र में दो तीन साल बड़ा था , क्लास में भी मुझसे दो दर्जा आगे रहा करता था लेकिन वो पढ़ने में बहुत कच्चा था। एक साल फेल होने और एक साल विद्यालय बदलने के चक्कर मे वो दो साल उसी क्लास में रुका रहा।
नतीजा इंटर कालेज में क्लास नौ में हम दोनों एक ही क्लास के एक सेक्शन में थे मोहल्ले का पड़ोसी होने के कारण उससे पुरानी मित्रता थी हमारीलेकिन क्लास एक होने से वह मित्रता और भी प्रगाढ़ हो गयी। व अपनी पढ़ाई लिखाई के लिये मुझ पर निर्भर रहा करता था और मैं अपने परिवार से वर्जित माने जाने खर्चों के लिये काफी हद तक उस पर निर्भर रहता था।जिसमें सिनेमा देखना और चाट खाना ही प्रमुख था।
धर्मवीर के लिये मैंने उससे बात कीउसने कोई खास रुचि ना दिखाई क्योंकि पहली बात उसने कहीं गांव में वीडियो पर धर्मवीर देख ली थी कुछ वक्त पहले ही।दूसरे उसका भी पैसों से हाथ तंग था ।क्योंकि उसकी अम्मा उन दिनों गांव से शहर आयी हुई थीं और उसके पापा सारे पैसे उसकी अम्मा को ही देकर जाते थे उसकी अम्मा की सोच भी मेरी मम्मी जैसी ही थी कि “पैसा पाने से बच्चे बिगड़ जाते हैं। सो व भी फिलवक्त “ठन ठन गोपालही था।
जब मैंने अपना प्रस्ताव और उत्कट इच्छा अरुण के सामने प्रकट की तो उसने पैसों को लेकर अपनी विवशता बताई और खुद को असमर्थ बताया ।
उसकी बात सुनते ही मेरा चेहरा उतर गया और मन बैठ गया। मैं कालेज से उसके पास से घर चला आया। दोपहर भर मुंह ढांपे  अंधेरे कमरे में पड़ा रहा । ढली दोपहर व मुझे ट्यूशन पढ़ने के लिये बुलाने आयामैंने पेट दर्द का बहाना करके घरवालों से कहलवा दिया कि मैं आज नहीं जा सकूंगा।
शाम को व मुझे फिर बुलाने आया पावर हाउस के मैदान में “सिक्स ए साइड” टूर्नामेंट चल रहा था जिसे हम रोज देखने जाते थेइस दिलचस्प टूर्नामेंट में एक तरफ ही सिर्फ सिक्स मारना होता था । ना कोई रन दौड़ना और ना ही किसी दूसरी तरफ कोई सिक्स मारनासिर्फ एक तरफ ही छक्के मारने का टूर्नामेंट था जिसके विजेता टीम को दो सौ रुपये मिलने थे यानी पूरी विजेता टीम का हर खिलाड़ी करीब चार फिल्में जीते हुए पैसों से देख सकता था क्योंकि बाल्कनी के टिकट सिर्फ पांच रुपये के आते थे । तकरीबन हर दिन वो टूर्नामेंट मैं देखने जाता था औऱ हमेशा अरुण के साथ ही जाता थाइसकी वजह यह थी कि उस टूर्नामेंट में अपना एक बेहद जिगरी दोस्त संजय मिश्रा भी खेल रहा था । संजय क्रिकेट का बहुत ही बड़ा कीड़ा थाउसकी दुनिया में क्रिकेट के अलावा कुछ भी नहीं था। संजय मेरा पुराना पड़ोसी हुआ करता था मगर अब दूसरे मोहल्ले में रहता था उससे मित्रता तो बहुत थी मगर मुलाकात कम ही हो पाती थी क्योंकि व हमेशा क्रिकेट ही जीता था। व या तो क्रिकेट खेलता था या क्रिकेट देखता था। इस सबसे कभी खाली होता था तो वह सिर्फ क्रिकेट की बातें करता था। मोहल्ले में क्रिकेट, घर मे पांच छह भाई बहनों के साथ क्रिकेट, इंटर कालेज में क्रिकेट, ट्यूशन में क्रिकेट ।
संजय मिश्रा  हर दिन शहर के किसी मोहल्ले में किसी ना किसी टूर्नामेंट में किसी ना किसी टीम से खेलता ही रहता था। अगर टूर्नामेंट नहीं चल रहे होते थे तो प्रैक्टिस करता। संजय एक आक्रामक तेज बल्लेबाज था और उससे भी ज्यादा खतरनाक तेज गेंदबाज भी था। सब उसे कपिलदेव बुलाते थे । वपढ़ने में तो ठीक था लेकिन पढ़ता बिल्कुल भी नहीं था। कालेज की पढ़ाई के काम और ट्यूशन के लिये वो मुझ पर पूर्ण निर्भर था । उसका छोटा भाई जिसे सब रवि शास्त्री बुलाते थेअक्सर मेरे घर आकर कापियां ले जाता और उसकी बहनें उसका काम पूरा करती थीं।
संजय का सेमीफाइनल था “सिक्स ए साइड” टूर्नामेंट का संजय अगर टूर्नामेंट जीत जाता तो मुझे फ़िल्म जरूर दिखाता लेकिन टूर्नामेंट का फाइनल तीन दिन बाद था और वो भी शाम को। अगर संजय टूर्नामेंट जीत भी गया तो मुझे वो चार दिन बाद ही फ़िल्म दिखा सकता था और तब तक फ़िल्म के बदल जाने की पूरी संभावना थी।
एक और बात थी फ़िल्म मेरा शौक थी और क्रिकेट संजय का पैशन था। उसके सपने और जीना मरना सब क्रिकेट ही था। उसे हमेशा ही बैट, पैड, ग्लव्स वगैरह की कमी रहा करती थी चाहे वह जितना भी जुटा ले उसे नए पुरानी किसी भी क्रिकेट के सामग्री से कोई परहेज नहीं था ।व अपनी जरूरत की पुरानी सामग्री अन्य खिलाड़ियों से या तो खरीद लेता था या मुफ्त में मांग लाता था। मुझे पता था कि उसे बैटिंग ग्लोव्स खरीदने हैं इसलिये मैं अपने शौक के लिये संजय के सपनों की बलि नहीं दे सकता था सो मैंने मन ही मन संजय के फ़िल्म दिखाने के सपनों को अपनी आत्मा की आवाज पर खारिज कर दिया था ।
अरुण मुझे संजय का सेमीफाइनल मैच देखने के लिये बुलाने आया लेकिन मैंने वही पेट दर्द का बहाना करके जाने से इनकार कर दिया।
अगले दिन भी मैनें पेटदर्द का बहाना जारी रखा सुबह अरुण साइकिल लेकर मुझे बुलाने आया लेकिन मैंने उससे घर के भीतर से ही तेज आवाज में कहलवा दिया कि
“मैं नहीं जा सकूंगा,पेट में दर्द है”।
अरुण निराश होकर चला गया।  अरुण जानता था कि मैं उससे नाराज़ हूँमैं उससे नाराज़ नहीं था बल्कि अपने आप से ही अनमना और खिन्न था। मुझे खुद से कोफ्त हो रही थी और अपनी हालत से ख़ासा नाराज़ भी था। मुझे मेरे घर वालों पर भी बहुत गुस्सा आ रहा था लेकिन क्या कर सकता था? क्योंकि सिनेमा हाल में जाकर सिनेमा देखने की बात से घर में मेरी भयंकर पिटाई निश्चित थी।
अगला दिन भी यूँ ही बीता। मैंने घर में भी पेट दर्द का बनाये रखा। मैं  ना तो कॉलेज ना ही ट्यूशन गया और कहीं खेलने भी नहीं गया।
तीसरे दिन सुबह अरुण आयाउसने आते ही मुझसे कहा
“नाटक मत फैलाओमैंने पैसों का जुगाड़ कर लिया है, लेकिन सिर्फ पांच रुपये का जुगाड़ हो सका है। अब एक काम करो या तो इन पांच रुपयों से तुम अकेले ही बाल्कनी देख लो या तो हम दोनों सेकेंड क्लास देख लें। लेकिन अगर फ़िल्म देखनी है तो कालेज चलना होगा और वहीं से खिसकना होगा”।
“खिसकना तो होगा लेकिन कालेज से सीधे नहींक्योंकि भैया को पता चल जायेगा। तुम्हारे और हमारे दोनों के बड़े भाई भी उसे कालेज में हैं सो कोई हमारी क्लास चेक करने आ गया तो? ऐसा करते हैं कि कॉलेज जाएंगे भी और कॉलेज से हम तुरंत लौट आयेंगें कोई बहाना बनाकर। घर पर आकर बारह बजे बता देंगे कि वसीम के भाई के बारात में जाना है। मुसलमानों में शादियां दिन में होती ही हैं। सो कोई हम पर शक भी नहीं करेगा” मैंने राह सुझाई।
“और खाना? वसीम के भाई की बारात में भी नहीं जाएंगे और घर पर बताकर जाएंगे कि बारात में जा रहे हैं तो घर पर खाने का सवाल ही नहीं रहेगा। तो हम खाना कब और कहाँ खाएंगे। तू तो जानता है कि मुझसे भूख बर्दाश्त नहीं होती” अरुण ने अपनी चिंता जाहिर की।
“अब दोस्ती में इतना तो करना ही पड़ेगा। हमारी दोस्ती भी धर्मवीर की जोड़ी है। एक टाइम का खाना मत खाना यार। मैं भी तो भूखा रहूंगा। कुछ ना कुछ जुगाड़ कर लेंगे” मैंने उसे प्रोत्साहित करने का प्रयास किया।
अरुण मेरी बात से मुतमईन ना हुआ। लेकिन मेरी योजना में वह बेमन से ही सही, आख़िरकार शामिल हो ही गया।
योजनानुसार हम कालेज गएदो पीरियड बाद ही मैंने पेटदर्द का बहाना बनाकर कालेज से छुट्टी ले लीजिस तरह के पेट दर्द के भयंकर होने की मैंने दुहाई दी थी और किसी की मदद की दरकार भी चाही थी। उसी तरह तुरन्त अध्यापक द्वारा मुझे सुरक्षित घर पहुंचाने के लिये अरुण को भी छुट्टी दे दी गयी।
वसीम जो हमारे ट्यूशन का साथी था। उसने हमें कार्ड तो दिया था लेकिन बारात में नहीं बुलाया था बल्कि वलीमे में बुलाया था। जो कि एक दिन बाद होना था। उसका कार्ड हमारी ढाल बना और हम बारात के नाम पर घर से चल दिये।
मैंने अपनी योजना को अमली रुप देने के लिये नए कपड़े भी पहने और क्रीम, पाउडर,सेंट भी लगाया ताकि बिल्कुल बाराती लगूंलेकिन अरुण ने ऐसी कोई पहल नहीं कीक्योंकि उसके घर में पूछताछ भी ज्यादा नहीं थी।
छिपतेछिपते रेलवे लाइन के किनारे चलते हुए हम सिनेमा हॉल पहुंच गएगेट के बाहर ही छिपे रहे ताकि कोई अडोसपड़ोस का या घरवालों का परिचित हमें देख ना ले जो बाद में हमारी पिटाई की वज़ह बने।
 जब हूटर बजा कि फ़िल्म शुरू हो गयी तो सिनेमा हॉल का अहाता खाली हो गया और टिकट खिड़की सुनसान। हमने मैदान साफ़ देखा और दौड़ कर अंदर गए और सवा दो रुपये के हिसाब से सेकेंड क्लास की दो टिकटें खरीद लीं।
सैकेंड क्लास का एक विशेष दरवाजा था। वहां जाने पर एक व्यक्ति ने हमें टिकट देखकर अंदर किया और फिर टॉर्च की रोशनी में ले जाकर हमें एक सीट की कतार पर छोड़ दिया। हम अपनी रुचि के स्थान पर बैठे। 
इंटरवल तक हमने फ़िल्म का लुत्फ़ लिया। इंटरवल में हमें बहुत जोरों की भूख लगी थीपचास पैसे में पेट कैसे भरे? कोई और दिन होता तो हम चाट खाते। लेकिन आज चाट से पेट नहीं भरने वाला था।
सो हमने सिंघाड़ा खरीदा जो पचास पैसे में पाव भर मिल गया। इस ठोस अल्पाहार से हममें एक ताज़गी और ऊर्जा आ गयी। फ़िल्म दुबारा शुरू हुई इंटवल के बादअब हमें फ़िल्म में और भी लुत्फ़ आने लगा था।
हाल में रोशनी फैल गयी थी, सिनेमा के पर्दे पर चल रहे दृश्यों की वजह से। हमने देखा कि सेकेंड क्लास में हमारे अलावा गिनती के ही लोग थे। बाल्कनी ऊपर हुआ करती थीजिसका टिकट पांच रुपये होता था। जीने से चढ़कर जाना पड़ता था। बाल्कनी में बैठे लोग सामने पर्दे पर बराबरी से सिनेमा देख सकते थे। उन्हें गर्दन नहीं उचकानी पड़ती थी। नीचे के तल पर डीसी हुआ करता था, जिसका टिकट तीन रुपये पचहत्तर पैसे होता था। ये भूतल पर मगर थोड़ी ऊंचाई पर होता था। गेटमैन यहीं पर खड़ा रहता था। यहां से भी सिनेमा देखते समय गर्दन उठाकर नहीं देखना पड़ता था। उसके बाद थोड़ी ढलान पर उसी तल पर फर्स्ट क्लास होता था जिसमें थोड़ी से गर्दन उठाकर देखना पड़ता थाइसका शुल्क सवा तीन रुपये होता था। उसके बाद तनिक गहरी ढलान पर सिनेमा के पर्दे के बिल्कुल पास सेकेंड क्लास होता था। जिसमें गर्दन ऊंची करके पूरी फिल्म देखनी पड़ती थी और साउंड सिस्टम पास लगे होने के कारण फ़िल्म की आवाज़ साफ़ नहीं सुनाई पड़ती थी और इसी सेकेंड क्लास में हम विद्यमान थे। 
एक बार फ़िल्म शुरू होने के बाद नीचे के तल के सभी गेट बंद कर दिए जाते थे, और डीसी के इकलौते गेट पर टिकट चेक करने वाला व्यक्ति मौजूद रहता और वही डीसी, फर्स्ट क्लास और सेकेंड क्लास की सीटें, टिकट आदि चेक करता रहता था।
हम अक्सर चोरीचुपके फ़िल्में देखते आते रहते थे और उस बेहद लहीमसहीम  गेटमैन को पहचानते थे; जो करीब छह फुट से ऊपर का पहलवान टाइप का व्यक्ति था; जो हमेशा लम्बी टार्च लेकर दिख ही जाता था, साइकिल से आते जातेवह हमारे शहर के ही नीलबाग मोहल्ले में रहता था।
मैंने अरुण से कहा
 “फ़र्स्ट क्लास  खाली हैयहाँ साउंड का शोर भी बहुत है। डायलॉग समझ में नहीं आते। गर्दन उठाकर देखतेदेखते अकड़ गयी है। चल वहीं बैठते हैं”।
अरुण ने कहा
 “नहीं रहने दो, गेटमैन आ गया तो? फ़र्स्ट क्लास में बैठे हुए पकड़े गए तो फर्स्ट क्लास का जुर्माना लग जायेगा और अब एक भी पैसा नहीं है अपने पास । बवाल हो जाएगा बेवजह। मुझे नहीं जाना”।
“कुछ नहीं होगा यार। जो होगा मैं निपट लूंगातू चल तो मेरे साथ सही। मेरी ज़िम्मेदारी है” मैंने उसे आश्वासन दिया।
अरुण आनाकानी करता रहामैं उससे लगातार कहता रहा। थोड़ी देर बाद अरुण मेरे दबाव से टूट गया और हम दोनों फ़र्स्ट क्लास में आकर बैठ गये। 
बीस मिनट ही बीते होंगे कि वही पहलवान छाप गेटमैन टिकट चेक करने आ गया। उसने हमारी टिकटें चेक की और सख्ती से पूछा
“सेकेंड क्लास का टिकट लिया है तो फ़र्स्ट क्लास में क्यों बैठे हो”?
“ये इधर खाली ही थीं कुर्सियां तो हम इधर ही आ गए। यूँ ही बैठ गए। कोई यहां बैठा थोड़ी ना है”
मैंने अपना तर्क दिया। 
“अच्छा, तुम्हारा घर है क्या कि, जहां चाहोगे वहाँ बैठ जाओगे। खाली तो बाल्कनी में भी है कुर्सियां, तो क्या सेकेंड का टिकट लेकर बाल्कनी में बैठ जाओगे? उठकर चुपचाप चले जाओ और सेकेंड क्लास में बैठो” उसने तल्ख़ लहज़े में कहा।
उसके घुड़कने पर हम आकर सेकेंड क्लास में फिर से बैठ गए और वह अंधेरे में कहीं गुम हो गया।
फ़िल्म आधे घन्टे और चली। लेकिन मैं सेकेंड क्लास की परेशानियों से फ़िल्म का पूरा मजा  नहीं ले पा रहा था और फिर फ़र्स्ट क्लास में थोड़ी देर तक मैं फ़िल्म देखने का सुख ले चुका था। सो अब यह सेकेंड क्लास की असुविधा अब मुझे और भी खटकने लगी थी। मैंने अंधेरे में गर्दन घुमाकर टोह ली और जब सन्तुष्ट हो गया कि गेटमैन आसपास कहीं नहीं है तो मैंने अरुण से कहा
“चल यारयहां मजा नहीं आ रहा है। चलकर फ़र्स्ट क्लास में बैठते हैं। गेटमैन नहीं हैवो गेट के बाहर चला गया है। चल चलते हैंअबकी फर्स्ट क्लास के दूसरे कोने में बैठेंगे। वहां हमें कोई भी देख नहीं पायेगा।यह पक्की बात है”।
“उस बार तो गेटमैन ने छोड़ दिया था। लेकिन इस बार या तो जुर्माना करेगा या पिटाई। मुझे नहीं जाना। तुझे जाना है तो जा” अरुण ने मुझे टका सा जवाब दिया।
अगले पांच मिनट तक मैं अरुण को मनाता रहा और वो आनाकानी करता रहा। अंततः अरुण ने फिर उकताकर हामी भर दी और हम सेकेंड क्लास की अपनी सीट छोड़कर फर्स्ट क्लास में एक ऐसी जगह जाकर बैठ गएजहां हमारे मुताबिक हमें कोई पकड़ नहीं सकता था।
दस मिनट भी नहीं बीते थे कि वही पहलवान गेटमैन फिर हाज़िर हुआ। इस बार उसने हमसे टिकट नहीं मांगे। वो जानता ही था कि हम सेकेंड क्लास वाले हैं और एक बार उसकी चेतावनी को नजरअंदाज कर चुके हैं।
उसने बिना किसी भूमिका के लगभग डांटते हुए हमसे कहा
“पिछली बार छोड़ दिया था तो तुम लोग की समझ में नहीं आया। सेकेंड क्लास की टिकट लेकर फर्स्ट क्लास में नहीं बैठ सकते। चुपचाप उठकर सेकेंड क्लास में चले जाओनहीं तो वो झापड़ मारूंगा कि दांत टूट कर हाथ में आ जाएंगे। सारी हीरोगीरी निकल जायेगी। चलो उठो यहाँ से”।
उसके हड़काने पर हम तुरन्त वहां से उठ लिये। अरुण भुनभुनाते हुये और अंगारों पर लोटते हुए वहां से उठा और उसके पीछेपीछे मैं भी चल दिया। हम दोनों फिर आकर सेकेंड क्लास में बैठ गए।
फ़िल्म मुश्किल से आधे घन्टे की बची रही होगीफ़िल्म के रंग में हम भी रंग गए और अपने साथ हुए थोड़ी देर की घटनाओं की कड़वाहट हमारे मन से मिट चुकी थी। पुरानी फिल्मों अंतिम एक्शन के दृश्य बहुत लंबे होते थे जो अक्सर एक गीत के साथ समाप्त होते थे। जब अन्तिम गीत शुरू हुआ तो मैंने सोचा कि अंतिम एक्शन के सीन अच्छे तरीके से बैठकर फर्स्ट क्लास में देख लिया जाए। अब आख़िर के कुछ मिनटों में क्या फ़र्स्ट और सेकेंड क्लास का मसला रह जाता है?
मैंने अपना प्रस्ताव फिर अरुण के सामने रखा उसने तुरंत हाथ खड़े कर दिए और मुझसे कहा
“तुझे याद हो ना हो मगर मुझे याद है कि उस पहलवान ने क्या कहा था कि इतना मारेगा कि दांत टूट जाएंगे। तेरा मन रखने के लिये दो बार गया अब नहीं पिटना मुझे। उधर पर्दे पर धर्मेंद पीटेगा किसी को और इधर गेटमैन हम दोनों को पीट देगा। तुझे जाना है तो जा और पिट ले। मुझे उस पहलवान से मार नहीं खानी”।
अरुण ने मेरी बात तो ख़ारिज कर दी लेकिन मैं जानता था कि अरुण को मना लेना मेरे लिये कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है।
“मारेगा कैसे, मारेगा तो हम दोनों उसे पटक कर मारेंगे। अगर वो भिड़ा तो हम दोनों एक साथ उससे भिड़ जाएंगे। गेटमैन की इतनी औकात कि वो हमको मारेगा! तू चल तो सही देख लेंगे उसको। वैसे भी वो अब गेट पर रहेगा। अब टिकट चेक करने थोड़ी ना आएगा। कुछ ही मिनट तो बचे हैं अब उसे पिक्चर हाल के सब दरवाजे खोलने हैं। अब वो अंदर नहीं आएगा, पक्की बात है ये” मैंने उसे तसल्ली दी। 
अरुण मेरे तर्कों से सन्तुष्ट नहीं दिख रहा था लेकिन मैं उसको लगातार बोलता रहा तो हमेशा की तरह उसने उकताकर हामी भर दी।
लेकिन इस बार अरुण बेहद सतर्क और चौकन्ना था। उसने भी गर्दन घुमाकर, सिनेमा हॉल के आधीअधूरी रोशनी में आंखे फाड़फाड़कर देखा कि गेटमैन कहीं आसपास तो नहीं है।
उसे ऐसा करते देखकर मैं जान गया कि वह मेरी बात मान गया है। मैंने फ़र्स्ट क्लास की तरफ़ चलना शुरू किया और एक सीट पर जाकर बैठ गया। अरुण भी मेरे पीछे आ गया और मेरी बगल में बैठ गया।
हम अभी ठीक से बैठे भी ना थे कि ना जाने कहां से गेटमैन लगभग दौड़ते हुए आया और उसने अपशब्दों का प्रयोग करते हुए अरुण की धुनाई शुरू कर दी। उसकी जुबान और हाथ एक साथ चल रहे रहे थे उसने गालियां बकते हुए अरुण को आठदस, घूंसेतमाचे जड़ दिए। अरुण की इतनी ज्यादा पिटाई देखकर मेरी घिग्घी बंध गयी। मुझे डर के मारे सांप सूँघ गया और अपनी सम्भावित पिटाई डर के मारे मेरे पांव कांप गए और कलेजा लरज गया।
मैं सांस रोके अपने पीटे जाने की प्रतीक्षा कर रहा था कि अगर अरुण को जितने तमाचेघूंसे पड़े हैं क्या मुझे उतने ही पड़ेंगे या उससे कुछ ज्यादा। हो सकता है गेटमैन का गुस्सा कुछ कम हो गया हो और अरुण को पीटकर गेटमैन कुछ थक गया हो तो मुझे कुछ कम पीटे। मैं अपनी पिटाई की कल्पना करके लरजता रहालेकिन मेरा इंतजार खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। गेटमैन ने जी भर पीटने और गालियां देने के बाद अरुण को  खींचकर एक तरफ़ खड़ा किया और सेकेंड क्लास में जाने का हुक्म सुनाकर और फिर जिधर से अंधेरे में आया था उधर ही अंधेरे में कहीं गुम हो गया।
मैं हतप्रभ, अवाक और डर के मारे मतिशून्य हो गया था। अरुण तो मानों जड़ हो गया था। हम दोनों को कुछ भी समझ नहीं आया। मैं अरुण का हाथ पकड़कर उसे सेकेंड क्लास में ले आया। 
मैं डरा, सहमा और हैरान था और अरुण का चेहरा पिटाई से लाल और आंसुओं से तरतर था। अरुण मुझे देखे जा रहा था वह मानों मुझसे पूछना चाहता था कि, कहाँ गयीं वो मेरी योजनाएं जिसमें मैनें कहा था कि गेटमैन के हमला करते ही हम दोनों एक साथ उसके ऊपर टूट पड़ेंगे और मिलकर मुकाबला करेंगे, किसी भी विषम परिस्थित काकहाँ गयीं मेरी बातें, मेरी डींगें, मेरी मित्रता?
अरुण मुझे देख रहा था और मैं शर्मिंदगी से उससे नज़रें मिला नहीं पा रहा था। सो उसकी नजरों से अंजान बनने के लिये मैनें सिनेमाहाल के पर्दे पर नजरें गड़ा दीं।
थोड़ी देर में फ़िल्म ख़त्म हो गयीहम चुपचाप बाहर निकले। बाहर आकर सिनेमा हॉल के अहाते में लगे नल में मैंने पानी पीने की बात की। मैंने सोचा कि अरुण भी पानी पी ले और हाथ मुंह धो ले तो थोड़ा सामान्य दिखेगावरना पिटाई से लाल और आंसुओं की वज़ह से फूला हुआ चेहरा, हमारे साथ हुई अनहोनी की गवाही दे सकता है और फिर बात का बतंगड़ बन जायेगाबात खुली और घर वाले जान गए तो हमारे अगले दौर की पिटाई निश्चित थी और जिसमें पिटाई का बड़ा हिस्सा मुझे ही मिलना था।
हम दोनों ने हाथ-मुंह धोया,पानी पिया, बगल में खड़ी मोटरसाइकिलों के शीशे में अपने बाल सँवारे और शॉर्टकट के रास्तों से अपने घरों के तरफ चल पड़े।
रास्ते में हम साथ चल रहे थे तो मैंने अरुण को तसल्ली देते हुए कहा
“पहलवान गेटमैन बहुत लंबा चौड़ा थाहम दोनों मिलकर भी उससे शायद जीत ना पातेफिर वहाँ अंधेरा भी बहुत थाजगह कम थी तो पटकते कैसे उसे? ये गेटमैन नीलबाग मोहल्ले में रहता हैसुबह ग्यारह बजे आता है ड्यूटी। साइकिल से आतेजाते देखा है इसे मैनें। संजय मिश्रा को भी ले लेंगे और किसी दिन हम तीनों मिलकर इसे ड्यूटी आते वक्त पानी टँकी के पास पटक कर मारेंगे। बदला जरूर लेंगे, पहलवान की सारी हीरोगीरी निकाल देंगे, कसम है हमको” मैं ऐसा ही कुछ बोल रहा था और अरुण चलतेचलते मुझे एकटक देख रहा था। मैं जानता था कि वो मेरी आँखों में आंखे डालकर देखना चाहता था कि मेरे कहे का कोई मतलब बचा है क्या?”
इसीलिये मैं बोल तो रहा था लेकिन अरुण से नजरें मिला नहीं रहा था और सामने देखते हुए चला जा रहा था। 
इस घटना को आज तीन दशक बीतने को हैं और मैं आज भी सोचता हूँ कि उस दिन मेरी भी पिटाई क्यों नहीं हुई? क्या बारात जाने के नाम पर पहने गए नए कपड़ों और सेंट लगाने के कारण ही मैं पिटाई से बच गया था! अरुण की ही पिटाई क्यों हुई थी जबकि सारी योजना तो मेरी थी। मन ही मन काफ़ी शर्मिंदा होने के बावजूद ना जाने क्यों मैनें अरुण से कभी इस बात के लिये माफी नहीं मांगी और गेटमैन को कभी नहीं पीट पाया। अरुण ने इस घटना का ज़िक्र कभी किसी से नहीं किया। आगे चलकर हमारी मित्रता अच्छी ही रही। कुछ वर्षों बाद अरुण के पिता का तबादला, बस्ती जिले में कहीं हो गया और वह हमारे शहर से चला गया। अरुण कहाँ है अब, मुझे नहीं पता! उसने मुझे कभी याद नहीं किया। लेकिन मैं उसे कभी भुला नहीं सका।  एक वह था जो मित्र की ख़ुशी के लिये कहीं से पैसों का जुगाड़ करके लाया और एक मैं था जो अपनी ख़ुशी के लिये उसे पिटता देखकर कुछ नहीं कर सका। ये कैसी हीरोगीरी थी? ये बात मैं अब तक मैं ख़ुद को भी नहीं समझा पाया।
उस पिटाई का जिम्मेदार और हक़दार मैं थालेकिन मेरे हिस्से का दंड अरुण ने भोगा, इस बात की टीस अब तक सालती है।
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8 टिप्पणी

  1. सजा आपको मिल चुकी है और वह यह कि यह बात तीन दशकों तक भी आपकी स्मृति में ताजी है। पश्चाताप से बढ़कर भी क्या कोई सजा हो सकती है???

  2. आपका पूरा संस्मरण पढ़ा दिलीप जी!कहते हैं पश्चाताप के आँसुओं से मन का मैल धुल जाता है। लेकिन यह बात भी सच है कि गलतियों का, लापरवाहियों का दुख भुलाए नहीं भूलता। एक टीस की तरह नासूर सा टिस-टिस कर सालता है।
    पढ़कर आपकी और मित्र अरुण दोनों के लिए दुख हुआ। गलती का एहसास होने पर आँखें मिलाना बड़ा कठिन होता है।
    मन की पीड़ा को अभिव्यक्ति देखकर आपको जरूर सुकून मिला होगा। ईश्वर से प्रार्थना कीजिए और शिद्दत से तलाश कीजिए अपने मित्र की। हमने अपनी सभी सखियों को 50 साल बाद ढूँढा पर ढूँढ लिया।
    संस्मरण के लिए शुक्रिया।

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