Saturday, May 18, 2024
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नीलम राकेश की कहानी – अपना घर

किसी पंख कटे पंछी की तरह फड़फड़ा रही थी उसकी अंतर आत्मा। उसकी व्याकुलता आज चरम सीमा पर थी। अपने अस्तित्व को खोजती हुई वह अपना घर तलाश रही थी।
‘‘मेरा अपना घर कहाँ है?’’ यह प्रश्न एक विकराल रूप लेकर सत्या के सामने खड़ा था। जितना ही वह सोचती प्रश्न और भी विकराल होकर डरावना लगने लगता। मंजिल पाकर भी मंजिल खो गई थी उसकी। नम हो आई आँखों से बचपन से लेकर आज तक का सफर खुली आँखों ही तय करने लगी सत्या।
वह बचपन से ही मेधावी छात्रा रही। पढ़ने का कुछ ज्यादा ही चाव था उसे। जब भी मौका मिला वह अपनी पुस्तक उठाकर घर का एकांत कोना तलाशकर पढ़ने बैठ जाती। परन्तु माँ को उसका हर समय पढ़ना फूटी आँखों नहीं सुहाता था। हमेशा उलाहना देतीं,  ‘‘कुछ काम-धाम सीख लो, अपने घर जाकर क्या हमारी नाक कटवाओगी?’’
पिता मुस्कराते हुये उसका पक्ष लेते, ‘‘सीख लेगी, अभी तो इसके खाने-खेलने के दिन हैं। जब अपने घर जायेगी उसके पहले सब सीख लेगी।’’
माँ का गुस्सा पिता की ओर ही घूम जाता, ‘‘खूब सिर चढ़ाओ लड़की को, जब इसके घर वाले ताना देंगे तब मुझे दोष मत देना, कहे देती हूँ, हाँ!’’
बचपन से ही माँ, दादी, पिता से यह सब सुनती आई थी इसलिये सब बड़ा ही स्वाभाविक लगता था। एक विश्वास सा मन में बैठ गया कि एक उसका अपना घर है कहीं, जहाँ उसे जाना है; जो उसका अपना होगा। उम्र के बढ़ने के साथ-साथ यह विश्वास भी गहरा होता गया। अपने मन में सत्या ने ‘अपने घर’ का एक सुन्दर सपना संजोया और उसे कल्पना के सुनहरे रंगों से नित सजाने लगी। उस घर में रहने वाले अनजान, अनाम लोगों के प्रति भी वह एक गहरा लगाव महसूस करने लगी। जो उसके अपने घर में रहते हैं, वे एक दिन उसके अपने हो जायेंगे।
समय कब ठहरा है! वह तो अपने सतरंगी पंख फैलाये सदा ही बढ़ता रहता है। फिर भला लड़कियों को बढ़ने में कितना समय लगता था। एक-एक कर उसकी दोनों बड़ी बहनें ब्याह दी गई। उनकी शिक्षा के पूरा होने न होने का न किसी ने सोचा, न ही उन्हें स्वयं कोई चिन्ता थी। बस जैसे ब्याह की ही अनिवार्यता, उसी की प्रतीक्षा थी। किसी तरह इण्टर किया और अपनी-अपनी दुनिया में मगन हो गई।
बहुत अच्छे अंकों से सत्या ने इण्टर पास किया। माँ और दादी ने उसकी शादी के लिये रोज हल्ला करना शुरू कर दिया। माँ का वही पुराना तर्क, ‘‘हमें जितना पढ़ाना था पढ़ा दिया। अब आगे पढ़ना है तो अपने घर जाकर पढ़ लेगी। तुम तो बस अब इसके हाथ पीले करो।’’
केवल अपनी जिद और पिता के सहयोग से ही सत्या कॉलेज जा सकी। किन्तु झटका उसे तब लगा जब बी.ए. प्रथम वर्ष का परीक्षाफल आते ही उसे अपनी शादी तय होने की भी सूचना मिली। उसने तो घर सिर पर उठा लिया। बी.ए. करने से पहले ब्याह नहीं करूँगी, यही जिद थी उसकी। किन्तु कहाँ चली उसकी कोई बात। घर-परिवार की मान-मर्यादा, समाज, हजार बातें समझाई गईं उसे। पिता ने कहा, ‘‘तेरे घर वाले बहुत अच्छे लोग हैं। वो तुझे आगे जरूर पढ़ायेंगे। चिन्ता बिल्कुल मत कर। मैं उनसे बात कर लूँगा।’’
इस घर में- अपने घर में आकर बहुत खुश थी वह । सबने उसका खुले मन से स्वागत किया था। यह तीन महीने पति के साथ घूमते-फिरते कब कैसे बीत गये, पता ही नहीं चला। अपनी मंजिल को पाकर वह तृप्त थी। सत्या को कभी डाल से टूटे फूल जैसी अनुभूति हुई ही नहीं, वह तो नैहर की उस शाखा पर फूली ही इसलिये थी कि एक दिन इस घर आकर अपने पति रत्नेश के चरणों में समर्पित हो जायेगी। यह घर पहले दिन से ही उसे अपना लगा। यहाँ के हर रीति-रिवाज, नियम-कायदे के साथ उसने अपना ताल-मेल बैठा लिया। पूरी तरह रच बस गई थी वह अपने इस घर में।
जिन्दगी  से पूरी तरह संतुष्ट वह खुशियों के हिंडोले में झूला झूल रही थी कि आज सुबह अचानक यह भूचाल आया और उसके पैरों के नीचे से धरती ही खिसक गई। इतने दिनों से उसने अपनी पुस्तकों को हाथ नहीं लगाया था। आज घर के सारे काम निपटाकर बहुत मन से वह अपनी प्यारी पुस्तकें लेकर पढ़ने बैठी थी। अभी वह दस मिनट भी नहीं पढ़ पाई थी कि सास किसी काम से उसके कमरे में आ गई। उसे पढ़ता देखकर चौंक गई।
‘‘क्या पढ़ रही हो बहू?’’
‘‘माँ जी, चार-पाँच महीने बाद बी.ए. की परीक्षा देनी है उसी की तैयारी कर रही हूँ।’’ माँ जी तो उसे ऐसे देखने लगीं जैसे सत्या ने कोई अनहोनी कह दी हो। एकदम फट पड़ीं, ‘‘यह सब इस घर में नहीं चलेगा बहू। क्या करोगी आखिर इतना पढ़कर? कोई नौकरी तो करना है नहीं। आखिर तो यही चूल्हा-चौका करना है। उसके लिये जितना पढ़ी हो काफी है। अब छोड़ो, यह सब घर के काम देखो।’’
‘‘माँ जी, मैं सब काम करके ही पढ़ने बैठी हूँ। कुछ और करना हो तो बता दीजिये उसे भी करके तब पढूँगी।’’
‘‘बहू, इतना ही शौक था अगर तुम्हें पढ़ने का तो अपने घर से पढ़कर आना था। इस घर में यह सब नहीं चलेगा।’’ और माँ जी गुस्से से बाहर चली गई।
अवाक् सत्या के कानों में एक ही शब्द गूँज रहा था।
‘‘अपना घर……….. अपना घर………….अपना घर…………..’’
तो क्या यह घर उसका ‘अपना’ नहीं?
वह तो यही समझ रही थी कि यह उसका अपना घर है। बचपन से आज तक यही तो सुनती आई थी कि ब्याह कर जहाँ जायेगी वही उसका ‘अपना घर’ होगा। परन्तु यह भी अगर उसका अपना घर नहीं, तो कहाँ है उसका अपना घर? क्या कहीं भी किसी को उसकी जरूरत नहीं है। पीहर और नैहर की देहरी में डोलता उसका अस्तित्व अपने वजूद को तलाशने लगा।
तभी कन्धे पर हल्का स्पर्श महसूस कर सत्या वर्तमान में लौट आई। नम आँखों को ऊपर उठाया तो सामने पति रत्नेश खड़ा था। उसके जलसिक्त नयनों को देख कर परेशान, ‘‘क्या हुआ सत्या?’’
पति के प्यार का संबल पाकर जैसे एक सैलाब सा उमड़ पड़ा……सब कुछ धुँधला होता गया………. सब कुछ गड्डमड्ड। याद रही तो बस वह पगडंडी जिससे चलकर वह अपनी इस मंजिल तक पहुँची थी। और आज वह भी खोती जा रही थी….रेत की तरह हाथ से छूटती नजर आ रही थी।
पति के मजबूत कन्धों का सहारा पाकर उसके अन्दर की सारी तपिश मोम बनकर पिघलने लगी और उसके नयनों से एक अविरल धारा बनकर आँसू के रूप में बरसने लगी।
सत्या से पूरी बात जान-समझकर रत्नेश प्यार से बोला, ‘‘सत्या यही तुम्हारा अपना घर है। जब मैं ही तुम्हारा हूँ तो मेरी बाकी सब चीजें तो अपने आप तुम्हारी हो गई। माँ की बात को दिल से मत लगाओ।’’
सत्या के आँसू पोंछकर रत्नेश फिर बोला, ‘‘सत्या तुमने ‘जनरेशन-गैप’ शब्द सुना होगा ‘पीढ़ी अन्तराल’………….
जो कुछ मेरी माँ ने कहा या तुम्हारी माँ और दादी कहती आई सब इसका परिणाम है। बरसों पुरानी रूढ़ि जो उस पीढ़ी के मानस पर गहरी अंकित है, यह सब उसी का प्रतिबिम्ब है। सच तो यह है सत्या कि पिता का घर भी बेटी का घर है और पति का घर तो पूरी तरह से उसका अपना घर है ही। पति की हर चीज पर पहला हक पत्नी का ही होता है। यहाँ तक कि पति पर भी।’’
सत्या के दोनों कन्धे पकड़कर रत्नेश बोला, ‘‘इस दुविधा के भँवर से बाहर आओ सत्या। यह तुम्हारा अपना घर है। यहाँ तुम जो चाहोगी करोगी, जितना चाहोगी पढ़ोगी। हाँ! बुजुर्गों को थोड़ा समझाना होगा। मुझे विश्वास है हम दोनों मिलकर यह काम कर लेंगे। अब मुस्कराओ, तुम्हारी मुस्कान मेरा संबल है। तुम्हारे आँसू मुझे कमजोर कर देंगे।’’
रत्नेश की बातों ने सत्या को एक ठोस धरातल दे दिया था। उसके नयनों में जीवन की चमक लौट आई थी। रत्नेश को-उसके पति को- उसकी जरूरत है, उसका वजूद उसका अस्तित्व अपने रत्नेश के लिये है। फिर उसे व्यर्थ ही नैहर और पीहर की मृगमरीचिका में भटकने की क्या आवश्यकता।
पति के आगोश में सिमटी सत्या को लग रहा था जीवन के ठोस धरातल पर चारों ओर प्यार की धूप खिल उठी है और जिन्दगी एक नए अन्दाज में मुस्कराने लगी है। 
नीलम राकेश
610/60, केशव नगर कालोनी
सीतापुर रोडलखनऊउत्तरप्रदेश-226020
दूरभाष नम्बर : 8400477299, neelamrakeshchandra@gmail.com
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